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ताओ उपनिषाद--(भाग--3) ओशोे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--064

मार्ग है बोधपूर्वक निसर्ग के अनुकूल जीना—(प्रवचन—चौंसठवां)

प्रश्न-सार

1--मृतकों को भोजनादि देने का क्या अर्थ है?

2--कैसे जानें कि प्रकृति के हम अनुकूल हैं?

3--प्रकृति के अनुकूल चलें तो समाज का क्या होगा?

4--निसर्ग के अनुकूल होने से पशु जैसे तो नहीं हो जाएंगे?

5--हठी कुपुत्र को सुधारने के लिए क्या करें?

बहुत से प्रश्न हैं।

एक मित्र ने पूछा है कि इजिप्त के पिरामिड के संबंध में आपने कहा कि उनकी सभ्यता, संस्कृति ऊंचाई के एक शिखर पर थी। लेकिन उन लोगों ने पिरामिडों के भीतर मनुष्यों के मृत शरीर रखे हैं, ममीज रखी हैं; और उनमें खाना-पीना, कपड़े, जवाहरात, इस तरह का सामान भी रखा है, ताकि उनको मरने के बाद के सफर में काम आए। तो यह समझाएं कि जो इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हुए सभ्य लोग थे, क्या उन्हें यह भी पता नहीं था कि मरने के बाद यह कुछ भी काम नहीं आता है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--063

विजयोत्सव ऐसे मना जैसे कि वह अंत्येष्टि हो—(प्रवचन—तैरष्‍ठवां)

अध्याय 31 : खंड 2

अनिष्ट के शस्त्रास्त्र

विजय में भी कोई सौंदर्य नहीं है।
और जो इसमें सौंदर्य देखता है,
वह वही है, जो रक्तपात में रस लेता है।
और जिसे हत्या में रस है,
वह संसार पर शासन करने की
अपनी महत्वाकांक्षा में सफल नहीं होगा।
(शुभ लक्षण की चीजें वामपक्ष को चाहती हैं,
अशुभ लक्षण की चीजें दक्षिणपक्ष को।
उप-सेनापति वामपक्ष में खड़ा होता है,
और सेनापति दक्षिणपक्ष में।
अर्थात, अंत्येष्टि क्रिया की
भांति यह मनाया जाता है।)
हजारों की हत्या के लिए
शोकानुभूति जरूरी है,
और विजय का उत्सव अंत्येष्टि
क्रिया की भांति मनाया जाना चाहिए।

हिंसा में कौन उत्सुक है? हत्या में किसका रस है? और विध्वंस किसकी अभीप्सा बन जाती है? इसे हम थोड़ा समझ लें; फिर इस सूत्र पर विचार आसान होगा।
सिगमंड फ्रायड ने इस सदी में मनुष्य के मन में गहरा से गहरा प्रवेश किया है। इस सदी का पतंजलि कहें उसे। सिगमंड फ्रायड की गहनतम खोज मनुष्य की दो आकांक्षाओं के संबंध में है। उन दो को सिगमंड फ्रायड ने कहा है--एक को जीवेषणा और दूसरे को मृत्यु-एषणा। आदमी जीना भी चाहता है, इसकी भी वासना है, और आदमी के भीतर मरने की भी वासना है।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--062

युद्ध अनिवार्य हो तो शांत प्रतिरोध ही नीति है—(प्रवचन—बासठवां)

अध्याय 31 : खंड 1

अनिष्ट के शस्त्रास्त्र

सैनिक, सबसे बढ़ कर, अनिष्ट के औजार होते हैं,
और लोग उनसे घृणा करते हैं।
इसलिए, ताओ से युक्त धार्मिक पुरुष उनसे बचता है।
सज्जन असैनिक जीवन में वामपक्ष अर्थात
शुभ के लक्षण की ओर झुकता है;
लेकिन युद्ध के मौकों पर वह दक्षिणपक्ष अर्थात
अशुभ के लक्षण की ओर मुड़ जाता है।
सैनिक अनिष्ट के शस्त्र-अस्त्र होते हैं,
वे सज्जनों के लिए शस्त्र नहीं हो सकते।
जब सैनिकों का उपयोग अनिवार्य हो जाए,
तब शांत प्रतिरोध ही सर्वश्रेष्ठ नीति है।

स सूत्र को समझने के लिए कुछ प्रारंभिक बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात: वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी का सारा विकास अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा हुआ है; मनुष्य की सारी प्रगति हिंसा के कारण हुई है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--061

खेदपूर्ण आवश्यकता से अधिक हिंसा का निषेध--(प्रवचन--इकसठवां)


अध्याय 30

बल-प्रयोग से बचें!

जो ताओ के अनुसार राजा को मंत्रणा देता है,
वह शस्त्र-बल से विजय का विरोध करेगा।
क्योंकि ऐसी विजय विजयी के लिए
भी बहुत दुष्परिणाम लाती है।
जहां सेनाएं होती हैं, वहां कांटों
की झाड़ियां लग जाती हैं।
और जब सेनाएं खड़ी की जाती हैं,
उसके अगले वर्ष में ही अकाल
की कालिमा छा जाती है।
इसलिए एक अच्छा सेनापति अपना
प्रयोजन पूरा कर रुक जाता है।
वह शस्त्र-बल का भरोसा कदापि नहीं करता है।
वह अपना कर्तव्य भर निभाता है,
पर उस पर गर्व नहीं करता है।
वह अपना कर्तव्य भर निभाता है,
पर शेखी नहीं बघारता।
वह अपना कर्तव्य भर निभाता है,
पर उसके लिए घमंड नहीं करता है।
वह एक खेदपूर्ण आवश्यकता के रूप में युद्ध करता है।
वह युद्ध करता है, लेकिन हिंसा से प्रेम नहीं करता।
क्योंकि, चीजें अपना शिखर छूकर फिर
गिरावट को उपलब्ध हो जाती हैं।
हिंसा ताओ के विपरीत है।
और जो ताओ के विपरीत है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--060

प्रकृति व स्वभाव के साथ अहस्तक्षेप—(प्रवचन—साठवां)

अध्याय 29

हस्तक्षेप से सावधान

वैसे लोग भी हैं, जो संसार को जीत लेंगे;
और उसे अपने मन के अनुरूप बनाना चाहेंगे।
लेकिन मैं देखता हूं कि वे सफल नहीं होंगे।
संसार परमात्मा का गढ़ा हुआ पात्र है,
इसे फिर से मानवीय हस्तक्षेप के
द्वारा नहीं गढ़ा जा सकता।
जो ऐसा करता है, वह उसे बिगाड़ देता है।
और जो उसे पकड़ना चाहता है,
वह उसे खो देता है।
क्योंकि: कुछ चीजें आगे जाती हैं,
कुछ चीजें पीछे-पीछे चलती हैं।
एक ही क्रिया से विपरीत परिणाम आते हैं,
जैसे फूंकने से गरम हो जाती हैं चीजें,
और फूंकने से ही ठंडी।
कोई बलवान है, और कोई दुर्बल;
कोई टूट सकता है, तो कोई गिर सकता है।
इसलिए, संत अति से दूर रहता है,
अपव्यय से बचता है, और अहंकार से भी।

ह सूत्र इस सदी के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लाओत्से ने जो कहा है, कुछ लोग हैं, जो जगत को जीत लेना चाहेंगे और उसे अपने मन के अनुरूप गढ़ना भी चाहेंगे।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--059

संस्कृति से गुजर कर निसर्ग में वापसी—(प्रवचन—उन्‍नष्‍ठवां)

अध्याय 28 : खंड 2

स्त्रैण में वास

जो सम्मान और गौरव से परिचित है,
लेकिन अज्ञात की तरह रहता है,
वह संसार के लिए घाटी बन जाता है।
और संसार की घाटी होकर,
उसको वह सनातन शक्ति प्राप्त हो जाती है,
जो स्वयं में पर्याप्त है।
और वह पुनः अनगढ़ लकड़ी की
नैसर्गिक समग्रता में वापस लौट जाता है।
इस अनगढ़ लकड़ी को खंडित करें या तराशें,
तो वही पात्र बन जाती है।
ज्ञानी के हाथों में पड़कर,
वे उस आभिजात्य को उपलब्ध होते हैं,
जो शासन करता है।
इसलिए महान शासक खंडन नहीं करता है।

स्त्रैण मनुष्य का एक और आयाम!
स्त्री और पुरुष के चित्त को समझ लेना साधना की अनिवार्य भूमिका है।
जैसा मैंने कल कहा, स्त्री है अनाक्रामक; आमंत्रण है, आक्रमण नहीं है।

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--058

सनातन शक्ति, जो कभी भूल नहीं करती—(प्रवचन—अट्ठावनवां) 

अध्याय 28 : खंड 1

स्त्रैण में वास

जो पुरुष को तो जानता है,
लेकिन स्त्रैण में वास करता है,
वह संसार के लिए घाटी बन जाता है।
और संसार की घाटी होकर,
वह उस मूल स्वरूप में स्थित रहता है,
जो अखंड है।
और वह पुनः शिशुवत
निर्दोषता को उपलब्ध हो जाता है।
जो शुक्ल (प्रकाश) के प्रति होशपूर्ण है,
लेकिन कृष्ण (अंधेरे) के साथ जीता है,
वह संसार के लिए आदर्श बन जाता है।
और संसार का आदर्श होकर,
उसको वह सनातन शक्ति प्राप्त हो जाती है,
जो कभी भूल नहीं करती।
और वह पुनः अनादि अनस्तित्व में वापस लौट जाता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--057

श्रद्धा, संस्कार, पुनर्जन्म, कीर्तन व भगवत्ता—(प्रवचन—सत्‍तावनवां)


प्रश्न-सार

1-श्रद्धा अंधविश्वास कैसे न बने?

2-कोई गरीब क्यों, कोई अमीर क्यों?

3-पुनर्जन्म का हिसाब कहां रहता है?

4-प्रवचन के बाद कीर्तन क्यों?

5-आप शिष्य किसके हैं?

6-आप अपने को भगवान क्यों कहते हैं?

7-बहुत से सवाल हैं।

एक मित्र ने पूछा है, श्रद्धा अंधविश्वास न बने, इसके लिए क्या करें?

हली बात, श्रद्धा के परिणाम से निर्णीत होता है कि श्रद्धा श्रद्धा है या अंधविश्वास है। आप किसी पर श्रद्धा करते हैं। वह आदमी गलत भी हो सकता है। वह श्रद्धा का पात्र न भी हो, यह भी हो सकता है। अगर ऐसे आदमी पर आप श्रद्धा करते हैं, तो लोग कहेंगे यह अंधश्रद्धा है।

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--056

शिष्य होना बड़ी बात है—(प्रवचन—छप्‍पनवां) 

अध्याय 27 : खंड 2

प्रकाशोपलब्धि

इसलिए सज्जन दुर्जन का गुरु है;

और दुर्जन सज्जन के लिए सबक है।

जो न अपने गुरु को मूल्य देता है,

और न जिसे अपना सबक पसंद है,

वह वही है जो दूर भटक गया है,

यद्यपि वह विद्वान हो सकता है।

यही सूक्ष्म व गुह्य रहस्य है।

जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उपयोगी न हो--वह चाहे अच्छा हो या बुरा। अच्छा और बुरा हमारी परिभाषाओं के कारण है। लेकिन अस्तित्व में उसकी अपनी अपरिहार्य जगह है। इसलिए जो जानते हैं, वे बुरे का भी उपयोग कर लेते हैं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--055

प्रकाश का चुराना ज्ञानोपलब्धि है--(प्रवचन--पचपनवां)
अध्याय 27 : खंड 1

प्रकाशोपलब्धि

एक कुशल धावक पदचिह्न नहीं छोड़ता है।

एक बढ़िया वक्तव्य प्रतिवाद के लिए दोषरहित होता है।

एक कुशल गणक को गणित्र की जरूरत नहीं होती।

ठीक से बंद हुए द्वार में

और किसी प्रकार का बोल्ट लगाना अनावश्यक है,

फिर भी उसे खोला नहीं जा सकता।

ठीक से बंधी गांठ के लिए रस्सी की कोई जरूरत नहीं है,

फिर भी उसे अनबंधा नहीं किया जा सकता।

संत लोगों का कल्याण करने में सक्षम हैं;

इसी कारण उनके लिए कोई परित्यक्त नहीं है।

संत सभी चीजों की परख रखते हैं;

इसी कारण उनके लिए कुछ भी त्याज्य नहीं है।

-- इसे ही प्रकाश का चुराना या ज्ञानोपलब्धि कहते हैं।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--054

अद्वैत की अनूठी दृष्टि लाओत्से की—(प्रवचन—चौवनवां)
 अध्याय 26

गुरुता और लघुता

जो हलका है, उसका आधार ठोस है, गंभीर है;
और निश्चल चलायमान का स्वामी है।
इसलिए संत दिन भर यात्रा करता है,
लेकिन जीवन-ऊर्जा के स्रोत से जुड़ा रहता है।
सम्मान व गौरव के बीच भी
वह विश्रामपूर्ण व अविचल जीता है।
एक महान देश का सम्राट कैसे अपने राज्य में
अपने शरीर को उछालता फिर सकता है?
हलके छिछोरेपन में केंद्र खो जाता है,
जल्दबाजी के काम में स्वामित्व,
स्वयं की मालकियत नष्ट हो जाती है।

न सोचता है सदा द्वंद्व में। निर्द्वंद्व की उसे कोई झलक भी नहीं है। विचार बांट लेता है अस्तित्व को दो में। एक का उसे कोई अनुभव नहीं है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--053

स्वभाव की उपलब्धि अयात्रा में है—(प्रवचन—तैरेपनवां)

अध्याय 25 : खंड 2

चार शाश्वत आदर्श

इसलिए: ताओ महान है,
स्वर्ग महान है,
पृथ्वी महान है,
सम्राट भी महान है।
ब्रह्मांड के ये चार महान हैं,
और सम्राट उनमें से एक है।
मनुष्य अपने को पृथ्वी के अनुरूप बनाता है;
पृथ्वी अपने को स्वर्ग के अनुरूप बनाती है;
स्वर्ग अपने को ताओ के अनुरूप बनाता है;
और ताओ अपने को स्वभाव के अनुरूप बनाता है।

लाओत्से ने चार आदर्श बताए हैं।
"ताओ महान है, स्वर्ग महान है, पृथ्वी महान है और सम्राट भी।'
पहले इन चारों का लाओत्से का अर्थ समझ लें।
ताओ परम आदर्श है। उसके पार फिर कुछ भी नहीं। ताओ का अर्थ है जीवन के आत्यंतिक नियम के अनुसार हो जाना, कोई विरोध न रह जाए अस्तित्व में और स्वयं में।

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--052

वर्तुलाकार अस्तित्व में यात्रा प्रतियात्रा भी है—(प्रवचन—बावनवां)

अध्याय 25 : खंड 1

चार शाश्वत आदर्श

स्वर्ग और पृथ्वी के अस्तित्व में आने के पूर्व
सब कुछ कोहरे से भरा था:
मौन, पृथक,
एकाकी खड़ा और अपरिवर्तित,
नित्य व निरंतर घूमता हुआ,
सभी चीजों की जननी बनने योग्य!
मैं उसका नाम नहीं जानता हूं,
और उसे ताओ कह कर पुकारता हूं।
यदि मुझे नाम देना ही पड़े तो मैं उसे महान कहूंगा।
महान होने का अर्थ है अंतरिक्ष में फैलाव की क्षमता,
और अंतरिक्ष में फैलाव की क्षमता है दूरगामी,
यही दूरगामिता मूल बिंदु की ओर प्रतिगामिता भी है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--051

सदगुण के तलछट और फोड़े—(प्रवचन—इक्‍यावनवां)

अध्याय 24
सदगुण के तलछट और फोड़े

जो अपने पंजों के बल खड़ा होता है,
वह दृढ़ता से खड़ा नहीं होता;
जो अपने कदमों को तानता है,
वह ठीक से नहीं चलता;
जो अपने को दिखाता फिरता है,
वह वस्तुतः दीप्तिवान नहीं है;
जो स्वयं अपना औचित्य बताता है,
वह विख्यात नहीं है;
जो अपनी डींग हांकता है,
वह श्रेय से वंचित रह जाता है;
जो घमंड करता है,
वह लोगों का अग्रणी नहीं होता।
ताओ की दृष्टि में
उन्हें सदगुणों के तलछट और फोड़े कहते हैं।
वे जुगुप्सा पैदा करने वाली चीजें हैं।
इसलिए ताओ का प्रेमी उनसे दूर ही रहता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--050

न नया, न पुराना; सत्य सनातन है—(प्रवचन--पचासवां)

प्रश्न-सार

1--ताओ की परिभाषा क्या है?

2--आप तो इतना बोलते हैं!

3-- अस्तित्व में स्वतंत्रता का स्थान क्या है?

4-- प्रकृति सदा प्रसन्न है तो मेरी प्रसन्नता में फर्क क्यों?

5-- शैली और शब्द के अलावा अंतर क्या है?
 बहुत से प्रश्न हैं।

एक मित्र ने पूछा है, ताओ की परिभाषा क्या है?

सी की परिभाषा का हम प्रयास कर रहे हैं। और सारा प्रयास पूरा हो जाने पर भी परिभाषा उसकी समझ में आएगी नहीं। क्योंकि जब समझाने का सारा प्रयास भी पूरा हो जाता है, तब भी ताओ परिभाषा के बाहर छूट जाता है। वह तो जब आप उसका प्रयोग भी करेंगे, तभी समझ में आएगी।