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ताओ उपनिषाद--(भाग--2) ओशोे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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बुधवार, 27 जून 2018

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--034

संत की पहचान: सजग व अनिर्णीत, अहंशून्य व लीलामय—(प्रवचन—चौंतीसवां) 

अध्याय 15 : खंड 1

प्राचीन समय के संतजन

प्राचीन समय में ताओ में प्रतिष्ठित एवं निष्णात संतजन सूक्ष्म
और अति संवेदनशील अंतर्दृष्टि से उसके रहस्यों को समझने में
सफल हुए। और वे इतने गहन थे कि मनुष्य की समझ के परे थे।
और चूंकि वे मनुष्य के ज्ञान के परे थे, इसलिए उनके संबंध में
इस प्रकार कुछ कहने का प्रयास किया जा सकता है कि वे अत्यंत
सतर्क व सजग हैं, जैसा कोई शीत-ऋतु में किसी नाले को पार करते
समय हो; वे सतत अनिर्णीत व चौकन्ने रहते हैं, जैसा कि
कोई व्यक्ति जो कि सब ओर खतरों से घिरा हो;
वे जीवन में जैसे कि अतिथि हों, ऐसा गंभीर अभिनय करते हैं।
उनकी अस्मिता सतत विसर्जित होती रहती है, जैसे कि प्रतिपल
बिखरता हुआ बर्फ हो; वे अपने बारे में किसी प्रकार की घोषणा
नहीं करते, जैसे कि वह लकड़ी, जिसे अभी कोई भी रूप नहीं
दिया गया है; वे एक घाटी की भांति रिक्त और
मटमैले जल की भांति विनम्र होते हैं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--025

 आमंत्रण भरा भाव व नमनीय मेधा—(प्रवचन—पचीसवां)

अध्याय 10 : सूत्र 2
अद्वय की स्वीकृति

जनसमूह के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने में और शासन के
व्यवस्थापन की प्रक्रिया में क्या वह सोद्देश्य
कर्म के बिना अग्रसर नहीं हो सकता?
क्या वह स्वर्ग के अपने दरवाजे (नासारंध्र)
को खोलने और बंद करने में एक स्त्रैण
पक्षी की तरह काम नहीं कर सकता?
जब उसकी मेधा सभी दिशाओं की ओर अभिमुख हो,
तब क्या वह ज्ञानरहित होने जैसा नहीं दिख सकता?

विचारशील मनुष्य निरंतर ही पूछता है: जीवन का उद्देश्य क्या? जीएं क्यों? किसलिए? और ऐसा आज नहीं, सदा से ही विचारशील मनुष्य ने पूछा है। समस्त धर्मों का जन्म और समस्त दर्शनों का जन्म इस प्रश्न के आस-पास ही निर्मित हुआ है: उद्देश्य क्या है? प्रयोजन क्या है? लक्ष्य क्या है? अंत क्या है? और जो ऐसा नहीं पूछते हैं, विचारशील लोग सोचते रहे हैं कि वे विचारहीन हैं, अज्ञानी हैं। जो ऐसे ही जीए चले जाते हैं, बिना लक्ष्य को पूछे, उन्हें विचारशील लोग सदा से अज्ञानी समझते रहे हैं।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन-043


धर्म है--स्वयं जैसा हो जाना—(प्रवचन—तैंतालीसवां)

प्रश्न-सार


1-क्या रुकने के लिए दौड़ना जरूरी नहीं?

2-सांसारिक और आध्यात्मिक वासना में भेद क्या?

      3-क्या सत्य साधारण लोगों के लिए नहीं है?

4-आत्म-हीनता और आत्म-विश्वास क्यों?

5-क्या ऐसी शिक्षा संभव है जो आवरण न बने?

6-जिज्ञासा के लिए क्या पूर्व-ज्ञान आवश्यक नहीं है?

      7-क्या स्व-बोध आनंद-स्वरूप है?

8-हम धार्मिक ही क्यों हों?

एक मित्र ने पूछा है: क्या रुकने के लिए दौड़ना जरूरी नहीं है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--042

आध्यात्मिक वासना का त्याग व सरल स्व का उदघाटन—(प्रवचन—बयालिसवां)

अध्याय 19 : सूत्र 2

स्वयं को जानो

लेकिन ये तीनों ही बाह्य हैं और अपर्याप्त हैं;

लोगों को संबल के लिए कुछ और भी चाहिए:

(इसके लिए) तुम अपने सरल स्व का उदघाटन करो,

अपने मूल स्वभाव का आलिंगन करो,

अपनी स्वार्थपरता त्यागो,

अपनी वासनाओं को क्षीण करो।

बुद्धिमत्ता और ज्ञान, मानवता और न्याय, चालाकी और उपयोगिता, इन सब को छोड़ देना नकारात्मक है। इनका छोड़ना जरूरी है, लेकिन काफी नहीं; आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। विधायक को भी प्रकट करना होगा, पाजिटिव को भी प्रकट करना होगा।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--041

सिद्धांत व आचरण में नहीं, सरल-सहज स्वभाव में जीना--प्रवचन--इकतालिसवां

अध्याय 19 : सूत्र 1

स्वयं को जानो

1. बुद्धिमत्ता को छोड़ो, ज्ञान को हटाओ,
और लोग सौ गुना लाभान्वित होंगे;
मानवता को छोड़ो, न्याय को हटाओ,
और लोग अपनों को पुनः प्रेम करने लगेंगे;
चालाकी छोड़ो, उपयोगिता को हटाओ,
और चोर तथा लुटेरे अपने आप ही लुप्त हो जाएंगे।

लाओत्से को समझने में जो बड़ी से बड़ी कठिनाई है, वह हमारे चिंतन की कोटियां हैं। चिंतन का जो ढंग हमारा है, लाओत्से को उसी ढंग से पकड़ना बहुत मुश्किल होगा। और लाओत्से का चिंतन का ढंग ही विपरीत है; उसका तर्क ही विपरीत है। वह दूसरे ही आयाम से जीवन को देखता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--040

ताओ के पतन पर सिद्धांतों का जन्म—(प्रवचन—चालीसवां)

अध्याय 18 : सूत्र 1

ताओ का पतन

महान ताओ के पतन पर,
मानवता और न्याय के सिद्धांत का उदय हुआ।
और जब ज्ञान और होशियारी का जन्म हुआ,
तब पाखंड भी अपनी पूरी तीव्रता में सक्रिय हो गया।
जब संबंधों के बीच शांति असंभव हो गई,
तब दयालु माता-पिता और आज्ञाकारी पुत्रों की प्रशंसा शुरू हुई।
और जब देश में कुशासन और अराजकता छा गई,
तब स्वामिभक्त मंत्रियों की प्रशंसा होने लगी।

जीवन की अत्यंत कठिन पहेली के संबंध में यह सूत्र है।
लाओत्से, जिन्हें हम बड़े नैतिक सिद्धांत कहते हैं, उनके विपरीत है, उनके विरोध में है। क्योंकि लाओत्से का मौलिक सिद्धांत यही है कि जीवन में एक गहरा संतुलन प्रतिपल स्थापित होता रहता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--039

श्रेष्ठ शासक कौन?--जो परमात्मा जैसा हो--(प्रवचन--उनतालीसवां)

 अध्याय 17 : खंड 1

शासक

सर्वश्रेष्ठ शासक कौन है?

जिसके होने की भी खबर प्रजा को न हो;

उससे कम श्रेष्ठ को प्रजा प्रेम और प्रशंसा देती है;

उससे भी कम से वह डरती है;

और सब से घटिया शासक की वह निंदा करती है।

जब शासक प्रजा की श्रद्धा के पात्र नहीं रह जाते,

और प्रजा उनमें विश्वास नहीं करती,

तब ऐसे शासक शपथों का सहारा लेते हैं!

लेकिन जब श्रेष्ठ शासक का काम पूरा हो जाता है,

तब प्रजा कहती है: "यह हमने स्वयं किया है।'

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--038

ताओ का द्वार--सहिष्णुता व निष्पक्षता—(प्रवचन—अड़तीसवां)


अध्याय 16 : सूत्र 2

शाश्वत नियम का ज्ञान

जो शाश्वत नियम को जान लेता है, वह सहिष्णु हो जाता है;

सहिष्णु होकर वह निष्पक्ष हो जाता है;

निष्पक्ष होकर वह सम्राट जैसी गरिमा को उपलब्ध होता है;

इस गरिमा के साथ प्रतिष्ठित हो वह हो जाता है स्वभाव के साथ अनुरूप;

स्वभाव के अनुरूप हुआ वह ताओ में प्रविष्ट होता है;

ताओ में प्रविष्ट वह अविनाशी है;

और इस प्रकार उसका समग्र जीवन दुख के पार हो जाता है।

न्नीस सौ उनसठ में एक बहुत अनूठी नोबल प्राइज दो अमरीकी वैज्ञानिकों को दी गई। एक का नाम है डाक्टर सेग्रेल और दूसरे का नाम है डाक्टर चैंबरलेन। अनूठी इसलिए कि उन्होंने जो खोज की, वह अब तक की सारी वैज्ञानिक व्यवस्था के प्रतिकूल है।

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--037

निष्क्रियता, नियति व शाश्वत नियम में वापसी—(प्रवचन—सैतीसवां)

अध्याय 16 : सूत्र 1

शाश्वत नियम का ज्ञान

निष्क्रियता की चरम स्थिति को उपलब्ध करें,

और प्रशांति के आधार से दृढ़ता से जुड़े रहें।

सभी चीजें रूपायित होकर सक्रिय होती हैं;

लेकिन हम उन्हें विश्रांति में पुनः वापस लौटते भी देखते हैं।

जैसे वनस्पति-जगत लहलहाती वृद्धि को पाकर

फिर अपनी उदगम-भूमि को लौट जाता है।

उदगम को लौट जाना विश्रांति है;

इसे ही अपनी नियति में वापस लौटना कहते हैं।

स्वयं की नियति को पुनः उपलब्ध हो जाना

शाश्वत नियम को पा लेना है।

शाश्वत नियम को जानना ही ज्ञान से आलोकित होना है।

और शाश्वत नियम का अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का जनक है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--036

तटस्थ प्रतीक्षा, अस्मिता-विसर्जन व अनेकता में एकता—(प्रवचन—छतीसवां)

प्रश्न-सार

साधना में प्रतीक्षा का क्या महत्व है?



अहंकार और अस्मिता में क्या अंतर है?



सत्य की निषेधात्मक और विधायक अभिव्यक्तियां क्या हैं?



शांति, अशांति और समता क्या हैं?



लाओत्से और कृष्ण के व्यवहार में इतनी भिन्नता क्यों?

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--035

विश्रांति से समता व मध्य मार्ग से मुक्ति—(प्रवचन—पैंतीसवां)

अध्याय 15 : खंड 2

पुराने समय के संत

इस अशुद्धि व अशांति से भरे संसार में कौन विश्रांति को उपलब्ध होता है?
जो स्थिरता में रुक कर अशुद्धियों को बह जाने देता है।
कौन अपनी समता व शांति को सतत बनाए रख सकता है?
जो प्रत्येक सक्रियता के बाद सहज ही घटित होने वाले विश्राम के राज को जान लेता है।
अतः जो व्यक्ति ताओ को उपलब्ध होता है,
वह हमेशा स्वयं को अति पूर्णता से बचाता है।
और चूंकि वह अति पूर्णता से बचा रहता है,
इसलिए वह क्षय और पुनर्जीवन के पार चला जाता है।

ल के सूत्र की अंतिम पंक्तियां अधूरी रह गई हैं। उनसे ही हम शुरू करें।
संत के लक्षण में अंतिम बात लाओत्से ने कही, घाटी की भांति रिक्त और मटमैले पानी की भांति विनम्र।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--033

अक्षय व निराकार, सनातन व शून्यता की प्रतिमूर्ति—(प्रवचन—तैतीसवां)

अध्याय 14 : खंड 2

पूर्व-ऐतिहासिक स्रोत

न उसके प्रकट होने पर होता प्रकाश,
न उसके डूबने पर होता अंधेरा।
ऐसा है वह अक्षय और अविच्छिन्न रहस्य,
जिसकी परिभाषा संभव नहीं है।
और पुनः-पुनः वह शून्यता के आयाम में प्रविष्ट हो जाता है।
इसीलिए निराकार ही उसका आकार कहा जाता है।
वह शून्यता की प्रतिमूर्ति है।
इन सब कारणों से उसे दुर्गम्य भी कहा जाता है।
उससे मिलो, फिर भी उसका चेहरा दिखाई नहीं पड़ता;
उसका अनुगमन करो, फिर भी उसकी पीठ दिखाई नहीं पड़ती।
वर्तमान कार्यों के समापन के लिए जो व्यक्ति पुरातन व
सनातन ताओ को सम्यकरूपेण धारण करता है,
वह उस आदि स्रोत को जानने में सक्षम हो जाता है
जो कि ताओ का सातत्य है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--032

अदृश्य, अश्राव्य व अस्पर्शनीय ताओ—(प्रवचन—बत्‍तीसवां)

अध्याय 14 : खंड 1

पूर्व-ऐतिहासिक स्रोत

उसे देखें, फिर भी वह अनदिखा रह जाता है;
इसीलिए उसे अदृश्य कहा जाता है।
उसे सुनें, फिर भी वह अनसुना रह जाता है;
इसीलिए उसे अश्राव्य कहा जाता है।
उसे समझें, फिर भी वह अछूता रह जाता है;
इसीलिए उसे अस्पर्शनीय कहा जाता है।
इस प्रकार वह अदृश्य, अश्राव्य और अस्पर्शनीय
हमारी जिज्ञासा की पकड़ से छूट जाता है;
और वह दुर्ग्राह्य बना रहता है।

स्तित्व के परम रहस्य के संबंध में यह सूत्र है।
जिन शब्दों में उस रहस्य को कहा जाता है, वे सभी शब्द छोटे पड़ जाते हैं। न केवल छोटे, बल्कि जो कहना चाहते हैं हम, उससे विपरीत उन शब्दों से प्रकट होता है। इसे दोत्तीन दिशाओं से समझना जरूरी होगा।

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--031

अहंकार-शून्य व्यक्ति ही शासक होने योग्य—(प्रवचन—इक्‍कतीसवां)

अध्याय 13 : सूत्र 2

प्रशंसा और निंदा

इसका क्या अर्थ है कि सम्मान और अपमान दोनों ही
स्वयं के भीतर हैं?
हम इस कारण भयभीत होते हैं,
क्योंकि हमने अहंकार को ही अपना होना समझ लिया है।
जब हम अहंकार को ही अपनी आत्मा नहीं मानते,
तो डर किस बात का होगा?
इसलिए जो व्यक्ति संसार को उतना ही सम्मान दे,
जितना कि स्वयं को, तो ऐसे व्यक्ति के
हाथ में संसार का शासन सौंपा जा सकता है।
और जो संसार को उतना ही प्रेम करे, जितना स्वयं को,
तो उसके हाथों में संसार की सुरक्षा सौंपी जा सकती है।

कल के सूत्र के संबंध में एक प्रश्न है। प्रश्न महत्वपूर्ण है, मात्र जिज्ञासा के कारण नहीं, बल्कि साधना की दृष्टि से भी।

पूछा है, सुख की कामना का त्याग ही दुखों से निवृत्ति है। सुख का, सम्मान का, जीवन का चुनाव हमारे हाथ में है। दुख, अपमान तथा मृत्यु परिणाम मात्र हैं, उनसे बचना हमारे बस की बात नहीं है। जीवन का चुनाव हमारे हाथ में है, यह कैसे संभव है? यह जानना चाहता हूं। मुझे इतना ही जानना है कि मेरा पुनर्जन्म न हो, यह मेरे हाथ में कैसे है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--030

एक ही सिक्के के दो पहलू: सम्मान व अपमान, लोभ व भय—(प्रवचन—तीसवां)

अध्याय 13 : खंड 1

निंदा और प्रशंसा

सम्मान और अपमान, दोनों से हमें निराशा मिलती है;
हम जिसे मूल्यवान समझते हैं और जिससे भयभीत होते हैं,
वे दोनों ही हमारे स्वयं के भीतर हैं।
सम्मान और अपमान के संबंध में ऐसा कहने का क्या अर्थ है?
सम्मान-प्राप्ति के बाद निम्न स्थिति में होना ही अपमान है।
सम्मान की उपलब्धि से उसे खोने का भय पैदा होता है;
और उसे खोने पर और अधिक संकटों के भय का जन्म होता है।

"निंदा और प्रशंसा, सम्मान और अपमान, दोनों से हमें निराशा मिलती है। हम जिसे मूल्यवान समझते हैं और जिससे भयभीत होते हैं, वे दोनों ही हमारे स्वयं के भीतर हैं। सम्मान और अपमान के संबंध में ऐसा कहने का क्या अर्थ है? सम्मान-प्राप्ति के बाद निम्न स्थिति में होना ही अपमान है। और सम्मान की उपलब्धि से उसे खोने का भय भी पैदा होता है। और उसे खोने पर और अधिक संकटों के भय का जन्म होता है।'

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--029

ताओ की साधना--योग के संदर्भ में—(प्रवचन—उन्‍नतीसवां)

प्रश्न-सार

1-योग और ताओ में भेद व समानता।

2-ताओ की नाभि केंद्र की साधना।

3-लाओत्से की अक्रिया और कृष्ण के कर्म में भेद।

4-ताओ की अयात्रा और यात्रा क्या है?

5-प्रकृति बुराई क्यों करती है?


बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं। एक प्रश्न दोत्तीन मित्रों ने पूछा है और स्वाभाविक है कि आपके मन में भी उठे।

योग ऊर्ध्वगमन की पद्धति है, ऊर्जा को, शक्ति को ऊपर की ओर ले जाना है। और लाओत्से की पद्धति ठीक विपरीत मालूम पड़ती है--ऊर्जा को नीचे की ओर, नाभि की ओर लाना है। तो प्रश्न उठना बिलकुल स्वाभाविक है कि इन दोनों पद्धतियों में कौन सी पद्धति सही है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--028

एंद्रिक भूख की नहीं-- नाभि-केंद्र की आध्यात्मिक भूख की फिक्र—(प्रवचन—अठाईसवां)

अध्याय 12 : सूत्र 1

पंचेंद्रियां

पंच रंग मनुष्य की आंखों को अंधा कर जाते हैं;
पंच स्वर उसके कानों को बहरा कर जाते हैं;
पंच स्वाद उसकी रुचि को नष्ट कर देते हैं;
घुड़दौड़ और शिकार उसके मन को पागल कर देते हैं;
दुर्लभ और विचित्र पदार्थों की खोज उसके आचरण को भ्रष्ट कर देती है।
इस कारण संत बहिर नेत्रों की दुष्पूर आकांक्षाओं की तृप्ति नहीं,
वरन उस भूख की चिंता करते हैं, जो नाभि के अंतरस्थ केंद्र में निहित है।
संत एक का निषेध और दूसरे का समर्थन करते हैं।
हां हम जीते हैं, जैसे हम जीते हैं, उस जीवन का अंतिम फल मृत्यु के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता है। कहा जा सकता है कि हम सिर्फ जीने के नाम पर रोज-रोज मरते हैं। और मृत्यु एक दिन अचानक नहीं आती। अचानक इस जगत में कुछ भी नहीं होता है। जिन्हें हम घटनाएं समझते हैं, वे भी घटनाएं नहीं होतीं। वे भी लंबी प्रक्रियाएं होती हैं।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--027

अनस्तित्व और खालीपन है आधार सब का—(प्रवचन—सताईसवां)
अध्याय 11 : सूत्र 1

अनस्तित्व की उपयोगिता

पहिए की तीसों तीलियां उसके मध्य भाग में आकर जुड़ जाती हैं,
किंतु पहिए की उपयोगिता धुरी के लिए छोड़ी गई खाली जगह पर निर्भर होती है।
मिट्टी से घड़े का निर्माण होता है, किंतु उसकी उपयोगिता
उसके शून्य खालीपन में निहित है।
दरवाजे और खिड़कियों को, दीवारों में काट कर प्रकोष्ठ बनाए जाते हैं,
किंतु कमरे की उपयोगिता उसके भीतर के शून्य पर अवलंबित होती है।
इसलिए, वस्तुओं का विधायक अस्तित्व तो लाभकारी सुविधा देता है,
परंतु उनके अनस्तित्व में ही उनकी वास्तविक उपयोगिता है।

जो व्यक्ति जीवन को ऊपर से ही देख लेते हैं और जीवन की सतह को ही सब कुछ समझ लेते हैं, उन्हें शून्य का उपयोग दिखाई नहीं पड़ेगा। जो तर्क तक ही अपने को सीमित रखते हैं और सोच-विचार से ज्यादा गहराई में कभी नहीं उतरते, उन्हें भी, जो उपस्थित नहीं है वह भी जीवन का आधार है, ऐसा कभी दिखाई नहीं पड़ेगा।