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रविवार, 19 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--42)

संन्यास का निर्णय और ध्यान में छलांग—(प्रवचन—बयालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':  
से संकलित प्रवचनांश
गीता—ज्ञान—यज्ञ पूना।
दिनांक 26 नवम्बर 1971

 क्या संन्यास ध्यान की गति बढ़ाने में सहायक होता है?

संन्यास का अAर्थ ही यही है कि मैं निर्णय लेता हूं कि अब से मेरे जीवन का केंद्र ध्यान होगा। और कोई अर्थ ही नहीं है संन्यास का। जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंद्र ध्यान होगा, धर्म होगा, परमात्मा होगा—ऐसे निर्णय का नाम ही संन्यास है। जीवन के केंद्र को बदलने की प्रक्रिया संन्यास है। वह जो जीवन के मंदिर में हमने प्रतिष्ठा कर रखी है—इंद्रियों की, वासनाओं की, इच्छाओं की, उनकी जगह शइक्त की, मोक्ष की, निर्वाण की, प्रभु—मिलन की, मूर्ति की प्रतिष्ठा ध्यान है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--41)

की पूरब श्रेष्ठतम देन : संन्यास—(प्रवचन—इक्‍कतालिसवां)

'नव— संन्यास क्या?':  
से संकलित 'संन्यास: मेरी दृष्टि में' :
रेडिओ—वार्ता आकाशवाणी बम्बई से प्रसारित
दिनांक 3 जुलाई 1971

नुष्‍य है एक बीज—अनन्त सम्भावनाओं से भरा हुआ। बहुत फूल खिल सकते हैं मनुष्य में, अलग—अलग प्रकार के। बुद्धि विकसित हो मनुष्य की तो विज्ञान का फूल खिल सकता है और हृदय विकसित हो तो काव्य का और पूरा मनुष्य ही विकसित हो जाए तो संन्यास का।
संन्यास है, समग्र मनुष्य का विकास। और पूरब की प्रतिभा ने पूरी मनुष्यता को जो सबसे बड़ा दान दिया—वह है संन्यास।
संन्यास का अर्थ है, जीवन को एक काम की भांति नहीं वरन एक खेल की भांति जीना। जीवन नाटक से ज्यादा न रह जाए, बन जाए एक अभिनय। जीवन में कुछ भी इतना महत्वपूर्ण न रह जाए कि चिन्ता को जन्म दे सके।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--40)

सावधिक संन्यास की धारणा—(प्रवचन—चालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':
से संकलित प्रवचनांश
साधना—शिविर, लोनावाला (महाराष्‍ट्र)
दिनांक 24 दिसम्‍बर 1976

 मेरे मन में इधर बहुत दिन से एक बात निरंत्तर खयाल में आती है और वह यह है कि सारी दुनियां से आनेवाले दिनों में संन्यासी के समाप्त हो जाने की संभावना है। संन्यासी आनेवाले पचास वर्षों के बाद पृथ्वी पर नहीं बच सकेगा, वह संस्था विलीन हो जाएगी। उस संस्था की नीचे की ईंटें तो खिसका दी गयी हैं और अब उसका मकान भी गिर जाएगा। लेकिन संन्यास इतनी बहुमूल्य चीज है कि जिस दिन दुनियां से विलीन हो जाएगा उस दिन दुनियां का बहुत अहित हो जाएगा।

मेरे देखे पुराना संन्यासी तो चला जाना चाहिए पर संन्यास बच जाना चाहिए और इसके लिए सावधिक संन्यास का, पीरियाडिकल रिनन्सिएशन का मेरे मन में खयाल है। ऐसा कोई आदमी नहीं होना चाहिए जो वर्ष में एक महीने के लिए संन्यासी न हो।

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--39)

संन्यास का एक नया अभियान—(प्रवचन—उन्‍नतालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':
गीता—सत्र से संदर्भ प्रवचनांश
बम्बई प्रथम सप्ताह जनवरी 1971  
एवं ला प्रथम सप्ताह फरवरी 1971

जो भी मैं कह रहा हूं संन्यास के संबंध में ही कह रहा हूं। यह सारी गीता संन्यास का ही विवरण है। और जिस सन्यास की मैं बात कर रहा हूं वह वही संन्यास है जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं—करते
हुए अकर्त्ता हो जाना, करते हुए भी ऐसे हो जाना जैसे मैं करने वाला नहीं हूं। बस संन्यास का यही लक्षण है।
गृहस्थ का क्या लक्षण है? गृहस्थ का लक्षण है, हर चीज में कर्त्ता हो जाना। संन्यासी का लक्षण है, हर चीज में अकर्त्ता हो जाना। संन्यास जीवन को देखने का और ही ढंग है।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--38)

आनंद व अहोभाव में डूबा हुआ नव—संन्‍यास—(प्रवचन—अडतीसवां)

नव—संन्‍यास क्‍या? :
चर्चा व प्रश्‍नोत्‍तर
अहमदाबाद, दिनांक 6 दिसम्‍बर 1970

भी—अभी साधना मंदिर में जो भजन चल रहा था। उसे देखकर मुझे एक बात खयाल में आती है। वहां सब इतना मुर्दा, इतना मरा हुआ था जैसे जीवन कि कोई लहर नहीं है, सब औपचारिक था—करना है, इसलिए कर लिया। तुम्‍हारा भजन, तुम्हारा नृत्य, तुम्‍हारा जीवन भी औपचारिक न हो, फॉरमल न हो। उदासी के लिए तो नव—संन्यास 'में जरा भी जगह न हो। क्‍योंकि संन्यास अगर मरा तो उदास लोगों के हाथ में पड़कर मरा।

'हंसता हुआ संन्यास', पहला सूत्र तुम्हारे खयाल में होना चाहिए। अगर हंस न सको तो समझना कि संन्यासी नहीं हो। पूरी जिंदगी एक हंसी हो जानी चाहिए। संन्यासी ही हंस सकता है। उदासी एवं गंभीरता संन्यासी के लिए एक रोग जैसा है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--37)

संन्‍यास के फूल: संसार की भूमि में—(प्रवचन—सैंतीसवां)   

'नव—संन्यास क्या?':
चर्चा व प्रश्रोत्तर
जबलपुर प्रथम सप्ताह नवम्बर 1970

गवान श्री आपने कहा है कि बाहर से व्यक्तित्व व चेहरे आरोपित कर लेने में सूक्ष्म चोरी है तथा इससे पाखष्ड और अधर्म का जन्म होता है। लेकिन देखा जा रहा है कि आजकल आपके आसपास अनेक नये—नये संन्यासी इकट्ठे हो रहे हैं और बिना किसी विशेष तैयारी और परिपक्‍कता के आप उनके संन्यास को मान्यता दे रहे हैं। क्या इससे आप धर्म को भारी हानि नहीं पहुंचा रहे हैं? कृपया इसे समझाएं?
हली बात, अगर कोई व्यक्ति मेरे जैसा होने की कोशिश करे तो मैं उसे रोकूंगा। उसे मैं कहूंगा, कि मेरे जैसा होने की कोशिश आत्मघात है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--36)

संन्यास और संसार—(प्रवचन—छत्‍तिसवां)

'नव— संन्यास क्या?':
चर्चा एवं प्रश्रोत्तर 
दिनांक 20 अक्टूबर 1970

संसार को छोड़कर भागने का कोई उपाय ही नहीं है, कारण हम जहां भी जाएंगे वह होगा ही, शक्लें बदल सकती हैं। इस तरह के त्याग को मैं संन्यास नहीं कहता। संन्यास मैं उसे कहूंगा कि हम जहां भी हों वहा होते हुए भी संसार हमारे मन में न हो। अगर तुम परिवार में भी हो तो परिवार तुम्हारे भीतर बहुत प्रवेश नहीं करेगा। परिवार में रहकर भी तुम अकेले हो सकते हो और ठेठ भीड़ में खडे होकर भी अकेले हो सकते हो।
इससे उल्टा भी हो सकता है कि एक आदमी अकेला जंगल में बैठा हो लेकिन मन में पूरी भीड़ घिरी हो और ठेठ बाजार में बैठकर भी एक आदमी अकेला हो सकता है।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--35)

संन्यास : नयी दिशा, नया बोध—(प्रवचन—पैंतीसवां)

'नव—संन्यास क्या?’
से संकलित एक प्रवचन साधना—शिविर मनाली (हिमाचल प्रदेश),
दिनांक 28 सितम्बर 197० रात्रि

 पको अपने संन्यास का स्मरण रखकर ही जीना है ताकि आप अगर क्रोध भी करेंगे तो न केवल आपको अखरेगा, दूसरा भी आप से कहेगा कि आप कैसे संन्यासी हैं। साथ ही साथ उनका नाम भी बदल दिया जाएगा। ताकि अन्य पुराने नाम से उनकी जो आइडेन्टिटी, उनका जो तादात्थ था वह टूट जाए। अब तक उन्होंने अपने व्यक्तित्व को जिससे बनाया था उसका केन्द्र उनका नाम है। उसके आस—पास उन्होंने एक दुनियां रचायी, उसको बिखेर देना है ताकि उनका पुनर्जन्म हो जाए। इस नये नाम से वे शुरू करेंगे यात्रा और इस नये नाम के आस—पास अब वे संन्यासी की भांति कुछ इकट्ठा करेंगे। अब तक उन्होंने जिस नाम के आस—पास सब इकट्ठा किया था वह गृहस्थ की तरह इकट्ठा किया था।

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--34)

नव—संन्यास का सूत्रपात—(प्रवचन—चौतीसवां)

'नव—संन्यास क्या?’
से संकलित एक प्रवचन साधना—शिविर मनाली (हिमाचल प्रदेश),
दिनांक 28 सितम्बर 197० रात्रि
 संन्यास मेरे लिए त्याग नही, आनन्द है। संन्यास निषेध भी नहीं है, उपलब्धि है। लेकिन आज तक पृथ्वी पर संन्यास को निषेधात्मक अर्थों में ही देखा गया है—त्याग के अर्थों में, छोड़ने के अर्थों मे—पाने के अर्थ में नहीं। मैं सन्यास को देखता हूं पाने के अर्थ में। निश्चित ही जब कोई हीरे—जवाहरात पा लेता है तो कंकड़ —पत्थरों को छोड देता है। लेकिन कंकड—पत्थरों को छोडने का अर्थ इतना ही है कि हीर—जवाहरातों के लिए जगह बनानी पड़ती है। कंकड़—पत्थरों का त्याग नहीं किया जाता। त्याग तो हम उसी बात का करते हैं जिसका बहुत मूल्य मालूम होता है। कंकड़—पत्थर तो ऐसे छोड़े जाते है जैसे घर से कचरा फेंक दिया जाता है। घर से फेंके हुए कचरे का हम हिसाब नहीं रखते कि हमने कितना कचरा त्याग दिया।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--33)

ब्रह्म के दो रूप(प्रवचनतैतिसवां)

अमृत— वाणी'
से संकलित सुधा— बिंदु 1971—71

 भी विगत पन्द्रह वर्षों की गहन खोज ने विज्ञान को एक नयी धारणा दी है— 'एक्सपेंडिंग युनिवर्स' की, फैलते हुए विश्व की। सदा से ऐसा समझा जाता था कि विश्व जैसा है, वैसा है। नया विज्ञान कहता है, विश्व उतना ही नहीं है जितना है—रोज फैल रहा है, जैसे कि कोई गुब्बारे में हवा भरता चला जाए और गुब्बारा बड़ा होता चला जाए! यह जो विस्तार है जगत का, यह उतना नहीं है, जितना कल था। यह निरंत्तर फैल रहा है।

ये जो तारे रात हमे दिखायी पड़ते है, ये एक दूसरे से प्रति पल दूर जा रहे है—'एक्सपेंडिंगयुनिवर्स’, फैलता हुआ विश्व! इसके दो अर्थ हुए : कि एक क्षण ऐसा भी रहा होगा, जब यह विश्व इतना सिकुड़ा रहा होगा कि शून्य केंद्र पर रहा होगा—आप पीछे लौटें! समय में जितने पीछे लौटेंगे, विश्व छोटा होता जाएगा, सिकुड़ता जाएगा।

मंगलवार, 31 मार्च 2015

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--32)

जागते—जागते.....(प्रवचनबत्‍तीसवां)

'अमृत—वाणी'
से संकलित सुधा—बिंदु 1970—71

 1—परमात्मा की चाह नहीं हो सकती

 न मांगता रहता है संसार को, वासनाएं दौड़ती रहती हैं वस्तुओं की तरफ, शरीर आतुर होता है शरीरों के लिए, आकांक्षाएं विक्षिप्त रहती हैं पूर्ति के लिए। हमारा जीवन आग की लपट है, वासनाएं जलती हैं उन लपटों में— आकांक्षाएं इच्छाएं जलती हैं। गीला ईंधन जलता है इच्छा का, और सब धुआं— धुआं हो जाता है। इन लपटों में जलते हुए कभी—कभी मन थकता भी है, बेचैन भी होता है, निराश भी, हताश भी होता है।

हताशा में, बेचैनी में कभी—कभी प्रभु की तरफ भी मुड़ता है। दौड़ते—दौड़ते इच्छाओं के साथ कभी—कभी प्रार्थना करने का मन भी हो आता है। दौड़ते—दौड़ते वासनाओं के साथ कभी—कभी प्रभु की सन्निधि में आंख बंदकर ध्यान में डूब जाने की कामना भी जन्म लेती है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--31)

भगवतप्रेम(प्रवचनइक्कतीसवां) 

'अमृत—वाणी' से संकलित
सुधा—बिंदु 1970—1971

 गत में तीन प्रकार के प्रेम हैं—एक : वस्तुओं का प्रेम, जिससे हम सब परिचित हैं। अधिकतर हम वस्तुओं के प्रेम से ही परिचित हैं। दूसरा : व्यक्तियों का प्रेम। कभी लाख में एकाध आदमी व्यक्ति के प्रेम से परिचित होता है। लाख में एक कह रहा हूं सिर्फ इसलिए कि आपको अपने बचाने की सुविधा रहे कि मैं तो लाख में एक हूं ही। नहीं, इस तरह बचाना मत!
एक फ्रेंच चित्रकार सींजां एक गांव में ठहरा। उस गांव के होटल के मैनेजर ने कहा, यह गांव स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अच्छा है। यह पूरी पहाड़ी अंदभुत है। सींजां ने पूछा, इसके अदभुत होने का राज, रहस्य, प्रमाण?

सोमवार, 30 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--30)

मृत्यु और परलोक(प्रवचनतीसवां)

'अमृत—वाणी' से संकलित
सुधा—बिंदु 19701971

स जगत में अज्ञान के अतिरिक्त और कोई मृत्यु नहीं है। अज्ञान ही मृत्यु है, 'इग्रोरेन्स इज़ डेथ'। क्या अर्थ हुआ इसका कि अज्ञान ही मृत्यु है? अगर अज्ञान मृत्यु है, तो ही ज्ञान अमृत हो सकता है। अज्ञान मृत्यु है, इसका अर्थ हुआ कि मृत्यु कही है ही नही। हम नहीं जानते इसलिए मृत्यु मालूम पड़ती है। मृत्यु असम्भव है। मृत्यु इस पृथ्वी पर सर्वाधिक असम्भव घटना है जो हो ही नहीं सकती, जो कभी हुई नहीं, जो कभी होगी नहीं, लेकिन रोज मृत्यु मालूम पड़ती है।

हम अंधेरे में खड़े हैं, अज्ञान में खड़े हैं। जो नहीं मरता वह मरता हुआ दिखाई पड़ता है। इस अर्थ में अज्ञान ही मृत्यु है। और जिस दिन हम यह जान लेते हैं, उस दिन मृत्यु तिरोहित हो जाती है और अमृत ही, अमृत्व ही शेष रह जाता है— 'इम्मारलिटी' ही शेष रह जाती है।

शनिवार, 28 मार्च 2015

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--29)

जो बोएंगे बीज वही काटेंगे फसल(प्रवचनउन्नतीसवां)

'अमृत वाणी' से संकलित
सुधा—बिंदु 1970—71

 किसे हम कहें कि अपना मित्र है और किसे हम कहें कि अपना शत्रु है। एक छोटी—सी परिभाषा निर्मित की जा सकती है। हम ऐसा कुछ भी करते हों, जिससे दुख फलित होता है तो हम अपने मित्र नहीं

 कहे जा सकते। स्वयं के लिए दुख के बीज बोनेवाला व्यक्ति अपना शत्रु है। और हम सब स्वयं के लिए दुख का बीज बोते हैं। निश्‍चित ही बीज बोने में और फसल काटने में बहुत वक्त लग जाता है, इसलिए हमें याद भी नहीं रहता कि हम अपने ही बीजों के साथ की गई मेहनत की फसल काट रहे हैं। अकसर फासला इतना हो जाता है कि हम सोचते हैं, बीज तो हमने बोए थे अमृत के, न मालूम कैसा दुर्भाग्य—कि फल जहर के और विष के उपलब्ध हुए हैं!

मै कहता आंखन देखी--(प्रवचन--28)

यह मन क्‍या है?—(प्रवचनअट्ठाईसवां)

'अमृत वाणी'
से संकलित सुधा—बिन्दु 1970—71
क आकाश, एक स्पेस बाहर है, जिसमें हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं—जहां भवन निर्मित होते हैं और खंडहर हो जाते हैं। जहां पक्षी उड़ते, शून्य जन्मते और पृथ्‍वीयां विलुप्त होती है—यह आकाश हमारे बाहर है। किंतु यह आकाश जो बाहर फैला है, यही अकेला आकाश नहीं है— 'दिस स्पेस इज नाट द ओनली स्पेस' —एक और भी आकाश है, वह हमारे भीतर है। जो आकाश हमारे बाहर है वह असीम है।
वैज्ञानिक कहते हैं, उसकी सीमा का कोई पता नहीं लगता। लेकिन जो आकाश हमारे भीतर फैला है, बाहर का आकाश उसके सामने कुछ भी नहीं है। कहें कि वह असीम से भी ज्यादा असीम है। अनंत आयामी उसकी असीमता है— 'मल्टी डायमेंशनल इनफिनिटी' है।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--27)

मैं मृत्यु सिखाता हूं(प्रवचनसत्‍ताईसवा)

'मै कौन हूं?’
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

 मैं प्रकाश की बात नहीं करता है वह कोई प्रश्‍न ही नहीं है। प्रश्‍न वस्तुत: आंख का है। वह है, तो प्रकाश है। वह नहीं है, तो प्रकाश नहीं है। क्या है वह, हम नहीं जानते हैं। जो हम जान सकते है, वही हम जानते हैं। इसलिए विचारणीय सत्ता नहीं, विचारणीय ज्ञान की क्षमता है। सत्ता उतनी ही ज्ञात होती है, जितना ज्ञान जागृत होता है।

कोई पूछता था— आत्मा है या नहीं है? मैने कहा—आपके पास उसे देखने की आंख है, तो है, अन्यथा नहीं ही है। साधारणत: हम केवल पदार्थ को ही देखते है। इन्द्रियों से केवल वही ग्रहण होता है। देह के माध्यम से जो भी जाना जाता है वह देह से अन्य हो भी कैसे सकता है। देह, देह को ही देखती है और देख सकती है।

बुधवार, 25 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--26)

अहिंसा का अर्थ(प्रवचनछब्‍बीसवां)

'मैं कौन हूं?’
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं उन दिनों का स्मरण करता हूं जब चित्त पर घना अंधकार था और स्वयं के भीतर कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ता था। तब की एक बात खयाल में है। वह यह कि उन दिनों किसी के प्रति कोई प्रेम प्रतीत नहीं होता था। दूसरे तो दूर, स्वयं के प्रति भी कोई प्रेम नहीं था।
फिर, जब समाधि को जाना तो साथ ही यह भी जाना कि जैसे भीतर सोए हुए प्रेम से अनन्त झरने अनायास ही सहज और सक्रिय हो गए है। यह प्रेम विशेष रूप से किसी के प्रति नहीं था। यह तो बस था, और सहज ही प्रवाहित हो रहा था। जैसे दीये से प्रकाश बहता है और फूलों से सुगंध, ऐसे ही वह भी बह रहा था। बोध के उस अदभुत क्षण में जाना था कि वह तो स्वभाव का प्रकाश है। वह किसी के प्रति नहीं होता है। वह तो स्वयं की स्फुरित है।

मैं कहता हूं अांखन देखी--(प्रवचन--25)

नीति, भय और प्रेम(प्रवचनपच्‍चीसवां)

'मैं कौन हूं?’
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं सोचता हूं कि क्या बोलूं? मनुष्य के संबंध में विचार करते ही मुझे उन हजार आंखों का स्मरण आता है, जिन्हें देखने और जिनमें झांकने का मुझे मौका मिला है। उनकी स्मृति आते ही मैं दुखी हो जाता हूं। जो उनमें देखा है, वह हृदय में काटो की भांति चुभता है। क्या देखना चाहता था और क्या देखने को मिला! आनंद को खोजता था, पाया विषाद। आलोक को खोजता था, पाया अंधकार। प्रभु को खोजता था, पाया पाप। मनुष्य को यह क्या हो गया है?

उसका जीवन जीवन भी तो नहीं मालूम होता है। जहां शांति न हो, संगीत न हो, शक्ति न हो, आनंद न हो—वहां जीवन भी क्या होगा? आनंदरिक्त, अर्थशून्य अराजकता को जीवन कैसे कहें? जीवन नहीं, बस एक दुःस्वप्न ही उसे कहा जा सकता है—एक मूर्च्छा, एक बेहोशी और पीड़ाओं की एक लंबी शृंखला।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--24)

प्रेम ही प्रभु है(प्रवचनचौबीसवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं मनुष्य को रोज विकृति से विकृति की ओर जाते देख रहा हूं उसके भीतर कोई आधार टूट गया है। कोई बहुत अनिवार्य जीवन—स्नायु जैसे नष्ट हो गए हैं और हम संस्कृति में नहीं, विकृति में जी रहे हैं।

 इस विकृति और विघटन के परिणाम व्यक्ति से समष्टि तक फैल गए हैं, परिवार से लेकर पृथ्वी की समग्र परिधि तक उसकी बेसुरी प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं। जिसे हम संस्कृति कहें, वह संगीत कहीं भी सुनाई नहीं पड़ता है।

मनुष्य के अंतस के तार सुव्यवस्थित हों तो वह संगीत भी हो सकता है। अन्यथा उससे बेसुरा कोई वाद्य नहीं है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--23)

मांगो और मिलेगा(प्रवचनतेइसवां) 

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

 ह क्या देख रहा हूं? यह कैसी निराशा तुम्हारी आंखों में है? और क्या तुम्हें शात नहीं है कि जब आंखें निराश होती हैं, तब हृदय की वह अग्रि बुझ जाती है और वे सारी अभीप्साएं सो जाती हैं, जिनके कारण मनुष्य मनुष्य है।
निराशा पाप है, क्योंकि जीवन उसकी धारा में निश्‍चय ही ऊर्ध्वगमन खो देता है।
निराशा पाप ही नहीं, आत्मघात भी है क्योंकि जो श्रेष्ठतर जीवन को पाने में संलग्न नहीं है, उसके चरण अनायास ही मृत्यु की ओर बढ़ जाते हैं।

यह शाश्वत नियम है कि जो ऊपर नहीं उठता, वह नीचे गिर जाता है, और जो आगे नहीं बढ़ता, वह पीछे धकेल दिया जाता है।