जीवन गीत-ओशो
प्रवचन-पांचवां
एकांत का मूल्य
तीन दिनों के शिविर की अंतिम चर्चा है, कुछ थोड़ी सी ऐसी जरूरी बातें जो तुम्हारे लिए
उपयोगी हो सकें उन पर भी बात करूंगा।
एक तो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उन सभी लोगों के लिए जिनके मन में परमात्मा कोजानने की कोई भी प्यास जगी हो- या परमात्मा की प्यास उसे न कहें, जिनके हृदय में शांत होने की आकांक्षा पैदा हुई हो- या शांति की आकांक्षा भी उसे न कहें, जिनके हृदय में आनंद को उपलब्ध करने की अभीप्सा पैदा हुई हो उन सभी के लिए कुछ बहुत आधारभूत बातें जरूरी हैं। यदि उन बातों पर ध्यान न हो तो इस दिशा में- आनंद की, शांति की या परमात्मा की दिशा में- कोई भी प्रयत्न सफल नहीं हो सकता है।
पहली बात : जिस पर से कि ध्यान करीब-करीब सारी मनुष्य-जाति का उचट गयाहै, वह है एकांत का मूल्य। धीरे- धीरे मनुष्य भीड़ में, समूह में खोता गया है और अकेले होने की भी कोई स्थिति है यह उसे भूल गई है। सुबह से हम उठते हैं और जो दुनिया शुरूहोती है जो काम शुरू होता है, वह हमें भीड़ में ले जाता है। दिन भर की मेहनत के बाद अगर कभी थोड़ी देर बैठने का समय मिलता है तो अखबार पढ़ते हैं रेडियो सुनते हैं, और उस कारण भी एकांत संभव नहीं हो पाता। अगर वक्त मिलता है मित्रों से मिलते हैं, होटल, सिनेमा या क्लब वहां भी हम अकेले नहीं होते। जब थक जाते हैं तो रात सो जातेहै फिर सुबह से वही दुनिया शुरू हो जाती है।
प्रवचन-पांचवां
एकांत का मूल्य
तीन दिनों के शिविर की अंतिम चर्चा है, कुछ थोड़ी सी ऐसी जरूरी बातें जो तुम्हारे लिए
उपयोगी हो सकें उन पर भी बात करूंगा।
एक तो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उन सभी लोगों के लिए जिनके मन में परमात्मा कोजानने की कोई भी प्यास जगी हो- या परमात्मा की प्यास उसे न कहें, जिनके हृदय में शांत होने की आकांक्षा पैदा हुई हो- या शांति की आकांक्षा भी उसे न कहें, जिनके हृदय में आनंद को उपलब्ध करने की अभीप्सा पैदा हुई हो उन सभी के लिए कुछ बहुत आधारभूत बातें जरूरी हैं। यदि उन बातों पर ध्यान न हो तो इस दिशा में- आनंद की, शांति की या परमात्मा की दिशा में- कोई भी प्रयत्न सफल नहीं हो सकता है।
पहली बात : जिस पर से कि ध्यान करीब-करीब सारी मनुष्य-जाति का उचट गयाहै, वह है एकांत का मूल्य। धीरे- धीरे मनुष्य भीड़ में, समूह में खोता गया है और अकेले होने की भी कोई स्थिति है यह उसे भूल गई है। सुबह से हम उठते हैं और जो दुनिया शुरूहोती है जो काम शुरू होता है, वह हमें भीड़ में ले जाता है। दिन भर की मेहनत के बाद अगर कभी थोड़ी देर बैठने का समय मिलता है तो अखबार पढ़ते हैं रेडियो सुनते हैं, और उस कारण भी एकांत संभव नहीं हो पाता। अगर वक्त मिलता है मित्रों से मिलते हैं, होटल, सिनेमा या क्लब वहां भी हम अकेले नहीं होते। जब थक जाते हैं तो रात सो जातेहै फिर सुबह से वही दुनिया शुरू हो जाती है।

