कुल पेज दृश्य

जीवन गीत-(विविध) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवन गीत-(विविध) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

जीवन गीत-(प्रवचन-05)

जीवन गीत-ओशो

प्रवचन-पांचवां
एकांत का मूल्य
तीन दिनों के शिविर की अंतिम चर्चा है, कुछ थोड़ी सी ऐसी जरूरी बातें जो तुम्हारे लिए
उपयोगी हो सकें उन पर भी बात करूंगा।
एक तो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उन सभी लोगों के लिए जिनके मन में परमात्मा कोजानने की कोई भी प्यास जगी हो- या परमात्मा की प्यास उसे न कहें, जिनके हृदय में शांत होने की आकांक्षा पैदा हुई हो- या शांति की आकांक्षा भी उसे न कहें, जिनके हृदय में आनंद को उपलब्ध करने की अभीप्सा पैदा हुई हो उन सभी के लिए कुछ बहुत आधारभूत बातें जरूरी हैं। यदि उन बातों पर ध्यान न हो तो इस दिशा में- आनंद की, शांति की या परमात्मा की दिशा में- कोई भी प्रयत्न सफल नहीं हो सकता है।

पहली बात : जिस पर से कि ध्यान करीब-करीब सारी मनुष्य-जाति का उचट गयाहै, वह है एकांत का मूल्य। धीरे- धीरे मनुष्य भीड़ में, समूह में खोता गया है और अकेले होने की भी कोई स्थिति है यह उसे भूल गई है। सुबह से हम उठते हैं और जो दुनिया शुरूहोती है जो काम शुरू होता है, वह हमें भीड़ में ले जाता है। दिन भर की मेहनत के बाद अगर कभी थोड़ी देर बैठने का समय मिलता है तो अखबार पढ़ते हैं रेडियो सुनते हैं, और उस कारण भी एकांत संभव नहीं हो पाता। अगर वक्त मिलता है मित्रों से मिलते हैं, होटल, सिनेमा या क्लब वहां भी हम अकेले नहीं होते। जब थक जाते हैं तो रात सो जातेहै फिर सुबह से वही दुनिया शुरू हो जाती है।

जीवन गीत-(प्रवचन-04)

जीवन गीत-ओशो

प्रवचन-चौथा
ध्यान का द्वार:सरलता

बीते दो दिनों में कुछ थोड़ी सी बातें मैंने तुमसे कही हैं।
कैसे हम अपने जीवन को निरंतर सत्य के सौंदर्य के निकट ले जा सकें कैसे हमारा जीवन एक सार्थकता बन जाए, कैसे अंत मृत्यु को हम विजय कर सकें और परमात्मा का दर्शन हो सके बस इस संबंध में थोड़े से विचार कहे।
आज किस भांति हमारा मन संपूर्णतया दर्पण की भांति निर्मल बन सकता है, उसके थोड़े से सूत्र और तुमसे कहूंगा।
एक छोटी सी कहानी से मैं शुरू करूं।

एक बहुत बड़े सम्राट के द्वार पर दो चित्रकारों ने आकर निवेदन किया। उन दोनों ही चित्रकारों ने यह दावा किया कि उनसे बड़ा दूसरा चित्रकार पृथ्वी पर नहीं है। दोनों का ही यही दावा था। उस सम्राट के दरबार में चित्रकार का पद खाली हुआ थाऔर वह राज्य के उस बड़े से बड़े पद पर किसी श्रेष्ठ चित्रकार को नियुक्त करना चाहता था। उसे निर्णय करना था कि उन दोनों में किसका दावा ठीक है। उसने उन दोनों को कहा कि तुम अपनी- अपनी कलाकृतियां बना कर दिखाओ। जिसकी कृति श्रेष्ठ होगी, वही राजपद पर नियुक्त हो जाएगा।

जीवन गीत-(प्रवचन-03)

जीवन गीत-ओशो

प्रवचन-तीसरा
विचारों से लड़नामत, देखना
मैं समझता हूं कि कोई और प्रश्न नहीं हैं। जो प्रश्न पूछे हैं, कुछ प्रश्न दोपहर भी किसी नेपूछे थे और एक-दो प्रश्न कल के भी बिना उत्तर के रह गए हैं।
प्रश्नों के संबंध में सबसे पहली बात तो यह जाननी जरूरी है कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है उसके संबंध में किसी दूसरे से कोई भी उत्तर नहीं पाए जा सकते हैं। और जोभी उत्तर दूसरे से पाए जा सकते हैं वे भीतर जाकर न तो समाधान बनते हैं और न मनुष्यकी उलझन को हल कर पाते हैं। ठीक-ठीक जीवन के उत्तर तो खुद ही खोजने होते हैं - श्रम से साधना से। खुद ही उनके उत्तर पाने पड़ते हैं।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

जीवन गीत-(प्रवचन-02)

जीवन गीत-(विविध) ओशो

प्रवचन-दूसरा

ध्यान आँख के उपाय है


बहुत से प्रश्न आए हैं। धीरे- धीरे उत्तर दूंगा। अगर कोई आज छूट जाएगा तो परेशान न
हों, कल या परसों उस पर बातें हो जाएंगी।

सबसे पहले तो : ईश्वर सगुण है या निर्गुण? ईश्वर
है या नहीं है? ईश्वर में विश्वास मैं करता हूं या
नहीं करता हूं? या किस भांति के ईश्वर में
विश्वास करता हूं? इस भांति के जो एक-दो प्रश्न
हैं उनको मैं लूंगा।



एक बात जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और विचार करने जैसी है वह यह है किहजारों वर्षों से मनुष्य को विश्वास करने की प्रेरणा दी गई है। उसे समझाया गया है कि तुमविश्वास करो! ईश्वर में विश्वास करो आत्मा में विश्वास करो धर्म में विश्वास करो, गुरुजनों में विश्वास करो, शास्त्रों में विश्वास करो। इस भांति कोई हजारों वर्षों से मनुष्यको विश्वास के लिए दीक्षित और तैयार किया गया है।

जीवन गीत-(प्रवचन-01) 

जीवन गीत-(विविध)  ओशो

 जीवन की भूमि

पहला प्रवचन

मनुष्य का जीवन जन्म से उपलब्ध नहीं होता है। जन्म के बाद तो अवसर मिलता है कि हम जीवन का निर्माण करें। लेकिन जो लोग जन्म को ही काफी समझ लेते हैं उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है। इस संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने कल तुमसे कहीं। यह भी स्मरण दिला देना उपयोगी है और उसके बाद ही आज की चर्चा मैं प्रारंभ करूंगा कि जन्म के बाद जिस जीवन को हम वास्तविक जीवन मान लेते हैं वह धीरे- धीरे मरते जाने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। उसे जीवन कहना भी कठिन है। जो जानते हैं वे उसे धीमी मृत्यु ही कहेंगे। जन्म के बाद तुम्हें स्मरण होना चाहिए कि हम रोज-रोज धीरे- धीरे मरते जाते हैं। मृत्यु अचानक नहीं आती है। वह एक लंबा विकास है। जन्म के बाद अगर कोई व्यक्ति सत्तर वर्ष जीता है, तो सत्तरवें वर्ष पर अचानक मृत्यु नहीं आ जाती है।

मृत्यु रोज-रोज बढ़ती जाती है। और सत्तरवें वर्ष पर पूरी हो जाती है। रोज हम मर रहे हैं। यहां एक घंटा बैठ कर हम जो चर्चा करेंगे उसमें हम सबकी एक घंटे की उम्र कम हो जाएगी। एक दिन जिसको हम जी लेते हैं, वह हमारी उम्र से समाप्त हो जाता है। तो लंबे क्रम को हम समझ नहीं पाते कि यह मरने का कम है। लेकिन वस्तुत: यह मरने का ही कम है।