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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--88

समलैंगिकता के बारे में सब कुछ—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍नसार:



1—यदि मृत्यु ही आनी है, तो जीने में क्या सार है?



2—प्यारे ओशो, क्या आप वास्तव में बस एक मनुष्य हैं, जो सबुद्ध हो गया?



3—दिव्यता के भीतर कैसे प्रवेश हो?



4—क्या लोगों को अपनी समलैंगिक प्रवृत्तियों का दमन करना चाहिए?

सोमवार, 2 मार्च 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--100

मैं प्रेम के पक्ष में हूं—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक  10 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न—सार:

1—प्रत्येक मनुष्य समस्याओं से भरा हुआ और अप्रसन्न क्यों है?
2—मैं स्वप्न देखा करती हूं कि मैं उड रही हूं क्या हो रहा है?
3—आपके प्रवचनोपरांत उमंग, लेकिन दर्शन के बाद हताशा ऐसा क्यों?
4—पूरब में एक से प्रेम संबंध, पश्चिम में अनेक से, प्रेम पर आपकी दृष्टि क्या है?


 पहला प्रश्न:

प्रत्‍येक मनुष्य समस्‍याओं से भरा हुआ और अप्रसन्‍न क्‍यों है?

रविवार, 1 मार्च 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--99

कैवल्‍य–(प्रवचन—उन्‍नीसपवां)

दिनांक  9 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र—
(कैवल्‍यपाद)

विशेषदर्शिन आत्मभावभाबनाविनिवृत्तिः।।25।।
जब व्यक्ति विशेष को देख लेता है, तो उसकी आत्मभाव की भावना मिट जाती है।

तदा विवेकनिम्नं कैबल्यप्राग्भारं चित्तम्।।28।।
तब विवेक उन्‍मुख चित्त कैबल्य की ओर आकर्षित हो जाता है।

तच्छिद्रेषु प्रत्‍ययान्‍तरणि संस्कारेंभ्‍य:।। 27।।
पूर्व के संस्कारों के बल के माध्यम से विवेक ज्ञान के अंतराल में अन्य प्रत्ययों, अवधारणाओं का उदय होता है। इनका निराकरण भी अन्य मनस्तापों की भांति किया जाना चाहिए।

हानमेषां क्लेशवदुक्तम्।।28।।
उन प्रत्ययों, अवधारणाओं से निवृत्त हो जाना क्लेशों से निवृत्ति के समान कहा गया है।

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ: समाधि:।। 129।।
वह जिसमें समाधि की सर्वोच्च अवस्थाओं के प्रति भी इच्छारहितता का सातत्य बना हुआ है और जो विवेक के चरम का प्रवर्तन करने में समर्थ है, उस अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है जिसे धर्ममेध समाधि कहा जाता है।
            तत: क्‍लेशकर्मनिवृत्ति:।। 130।।
तब क्लेशों एवं कर्मों से मुक्ति हो जाती हैं।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--98

श्रद्धा: किसी के प्रति नहीं होती—(प्रवचन—अट्ठारहवां)


दिनांक  8 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न—सार:



1—आपके प्रति श्रद्धा रखने और स्वयं में श्रद्धा रखने में क्या विरोधाभास है?

2—बुद्ध को क्या प्रेरित करता है?

3—बच्चे पैदा करने का उचित समय कौन सा है?

4—केवल सेक्स, प्रेम और रोमांस के बारे में सोचना क्या गलत है?





 पहला प्रश्न—



आपके प्रवचनों एक प्रवचन में कहीं गई एक बात ने मुझे गहराई तक आंदोलित कर दिया है। यह बात है, आपने आप में श्रद्धा करने और आपमें श्रद्धा रखने में विरोधाभास में भीतर एक भाग है जो कहता है: यदि मैं अपने स्‍वयं के स्‍व में श्रद्धा करता हूं और अपने स्‍वयं के स्‍व का अनुसरण करता हूं, तो मैंने आपके समक्ष समर्पण कर दिया है और आपको हां कह दिया है। लेकिन मैं यह निश्‍चित नहीं कर पा रहा हूं कि क्‍या यह सब बस कोई तर्क द्वारा समझने का प्रयास है जिसे मैने अपने स्‍वयं के लिए निर्मित कर लिया है?’

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--97

साक्षी स्‍वप्रकाशित है—(प्रवचन—सत्रहवां)


दिनांक  7 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सूत्र

(कैवल्‍यपाद)



      सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तह्मभो: पुरुषस्यपिम्णामित्वात्।। 18।।

मन की वृत्तियों का ज्ञान सदैव इसके प्रभु, पुरुष, को शुद्ध चेतना के सातत्य के कारण होता है।

न तत्‍स्‍वाभासं दृश्यत्यात्।। 19।।

मन स्व प्रकाशित नहीं है, क्योंकि स्वयं इसका प्रत्यक्षीकरण हो जाता है।



एकसमये चोभयानवधारणमू।। 20।।

मन के लिए अपने आप को और किसी अन्य वस्तु को उसी समय में जानना असंभव है।



चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग: स्मृतिसंकरश्च।। 21।।

यदि यह मान लिया जाए कि दूसरा मन पहले मन को प्रकाशित करता है, तो बोध के बोध की कल्पना करनी पड़ेगी, और इससे स्मृतियों का संशय उत्पन्न होगा।



चितेखतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनमू।। 22।।

आत्म—बोध से अपनी स्वयं की प्रकृति का ज्ञान मिल जाता है, और जब चेतना इस रूप में आ जाती है तो यह एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं जाती।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--96

बिना तुम्‍हारे किसी निजी चुनाव के—(प्रवचन—सौलहवां)

     

दिनांक  6 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

 प्रश्‍नसार:

1—मैं आपके और रूडोल्फ स्टींनंरं के उपायों के बीच बंट गया हूं?
2—प्रकृति के सान्निध्य में ठीक लगता है, लोगों के साथ नहीं, यह विभाजन क्यों?
3—स्त्री के रूप मैं मेरे लिए संबोधि क्या है?
4—क्या हम वास्तव में अपने जीवन में घटित होने वाली चीजों को चुनते हैं?

 पहला प्रश्न:

ओशो, मेरा लालन पालन रूडोल्‍फ स्‍टीनर की शिक्षाओं के बीच हुआ है, किंतु अभी तक मैं उसके प्रति अपने मन के अवरोधो को नहीं तोड़ पाया हूं। यद्यपि मेरा विश्‍वास है कि पश्‍चिम को जो रास्‍ता उसने दिखाया, उचित ढंग से विचार करना खीखना अपने आपको माया से मुक्‍त करने की संभावना है। उसका कहना है कि ऐसा करके और ध्‍यान करके हम अपने अहंकारों को खोज और अपने मैं को पाने में समर्थ हो जाते है। उसके लिए केंद्रीय व्‍यक्‍ति क्राइस्‍ट है, जिनको वह जीसस से पूर्णत: भिन्‍न व्‍यक्‍तित्‍व के रूप में अलग कर देता है। आपके उपाय मुझको अलग प्रतीत होते है। क्‍या आप कृपा करके मुझको सलाह दे सकते है? एक प्रकार से मैं तो आपके और उस उपाय के बीच जो स्‍टीनर दिखाता है, बंट जाता है।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--95

यही है यह—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक  5 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र (कैवल्‍यपाद)

      हेतुफलाश्रयालम्बुत्रैं संगृहीत्‍त्‍वादेषमभावे तदभाक:।। 11।।
प्रभाव के कारण पर अवलंबित होने से, कारणों के मिटते ही प्रभाव तिरोहित हो जाते हैं।

      अतीतानागतं स्वरूपतोऽख्यध्यभेदाद्धर्माणाम्।। 12।।
अतीत और भविष्य का अस्तित्व वर्तमान में है, किंतु वर्तमान में उनकी अनुभूति नहीं हो पाती है, क्योंकि वे विभिन्न तलों पर होते हैं।

      ते व्यक्तसूक्ष्‍मा गुणात्मान:।। 13।।
वे व्यक्त हों या अव्यक्त अतीत, वर्तमान और भविष्‍य सत, रज और तम गुणों की प्रकृति हैं।
     
परिणामैकत्‍वाद्वस्‍तुतत्‍वम्।। 14।।
किसी वस्‍तु का सारतत्‍व, इन्‍हीं तीन गुणों के अनुपातों के अनूठेपन में निहित होता है।


      वस्‍तुसाम्‍ये चित्रदात्‍तयोर्विभिक्‍त: पन्‍था:।। 15।।
भिन्‍न—भिन्‍न मनों के द्वारा एक ही वस्‍तु विभिन्‍न ढंगों से देखी जाती है।


तदुपरागापेक्षित्याच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्।। 17।।
वस्तु का ज्ञान या अज्ञान इस पर निर्भर होता है कि मन उसके रंग में रंगा है या नहीं।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--94

सभी कुछ परस्‍पर निर्भर है—(प्रवचन—चौदहवां)


दिनांक  4 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न—सार:

1—आप कहते हैं, 'पूरब में हम कृपया इसका अभिप्राय समझाएं?

2—आप संसार में उपदेश देने क्यों नहीं जाते?

3—कपटी घड़ियाल की चेतना के बारे में कुछ कहिए?

4—परस्पर निर्भरता और पूर्ण स्वार्थ में क्या संबंध है?

5—समर्पण के लिए किस भांति कार्य करूं?

6—क्या परम ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति भी बच्चों को जन्म देते हैं?

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--93

      मौलिक मन पर लौटना(प्रवचनतैरहवां)


दिनांक  3 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र:
(कैवल्‍यपाद)


      तत्र ध्यानजमनाशयम्‍ ।। 6।।
केवल ध्यान से जन्मा मौलिक मन ही इच्छाओं से मुक्त होता है।

      कंर्माशुल्काकृष्णं योगिनस्तिबिधमितरेषामू।। 7।।
योगी के कर्म न शुद्ध होते हैं, न अशुद्ध, लेकिन अन्य सभी कर्म त्रि—आयामी होते हैं—शुद्ध, अशुद्ध और मिश्रित।

      ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्बासनानामू।। 8।।
जब उनकी पूर्णता के लिए परिस्थियां सहायक होती हैं तो इन कर्मों से इच्छाएं उठती हैं।’'

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्‍वात्।। 9।।
क्योंकि स्मृति और संस्कार समान रूप में ठहरते हैं, इसलिए कारण और प्रभाव का नियम जारी रहता है, भले ही वर्ण, स्थान समय में उनमें अंतर हो।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--92

एकांत अंतिम उपलब्‍धि है(प्रवचनबारहवां)


      

दिनांक  2 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍नसार:



1—क्या शिष्य अपने सदगुरु से कुछ चुराता है?



2—क्या व्यक्ति जीवन का आनंद अकेले नहीं ले सकता है?



3—जीवन क्या है? काम— भोग में संलग्न होना, धन कमाना, सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करना, व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर होना, और क्या यह सब खोजी की खोज को बहुत लंबा नहीं बना देगा?



4—क्या कोई शिष्य हुए बिना आपकी आत्मा से अंतरंग हो सकता है?

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग-5) प्रवचन--91

कृत्रिम मन का परित्‍याग(प्रवचनग्‍यारहवां)

दिनांक  1 मई  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र:
(कैवल्‍यापाद)

            जन्मौषधिमन्त्रतप समाषिजा: सिद्धंय:।। 1।।
सिद्धियां जन्म के समय प्रकट होतीं हैं, इन्हें औषधियों से, मंत्रों के जाप से, तपश्चर्याओं से या समाधि से भी अर्जित किया जा सकता है।

            जात्यन्तर परिणाम: प्रकृत्यापूरात्।। 2।।
एक वर्ग, प्रजाति, या वर्ण से अन्य में रूपातरण, प्राकृतिक प्रवृत्तियों या क्षमताओं के अतिरेक से होता है।

            निमित्तम प्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्‍तु तत: क्षेत्रिकवत्।। 3।।
आकस्मिक कारक प्राकृतिक प्रवृतियों को सक्रिय होने के लिए प्रेरित नहीं करता, यह तो बस अवरोधों को हटा देता है—जैसे खेत सींचता हुआ किसान; वह बाधाओं को हटा देता है और तब पानी स्वत: ही मुक्त होकर प्रवाहित होने लगता है।

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--90

अब तुम वाटरूलू पुल से छलांग लगा सकते हो(प्रवचनदसवां)

दिनांक 30 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न—सार:

1—काम की समस्या उठ खडी हुई है, क्‍या किया जाए?

2—निष्क्रियता पूर्वक सजग कैसे हुआ जाए?

3—मेरा सामान रेलगाड़ी ले जाती है, मैं रह जाता हूं। इस स्वप्न का अर्थ क्या है?

4—जिस समय आप मुझसे कुछ कहते हैं मैं आपकी बात नहीं मानता। इससे छुटकारा कैसे हो?

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--89

कैवल्‍य: परम एकांत(प्रवचननौवां)

दिनांक 29 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र:
(विभूतिपाद)

      सत्त्वपुरुषके शुद्धिसाम्पे कैबल्‍यम्।। 56।।
जब पुरुष और सत्व के मध्य शुद्धता में साम्य होता है, तभी कैवल्य उपलब्ध हो जाता है।

छान्दोग्य उपनिषद में एक सुंदर कथा है। आओ हम इसी से आरंभ करें।
सत्‍यकाम ने अपनी मां जाबाला से पूछा. मां, मैं परम ज्ञान के विद्यार्थी के रूप में जीवन जीना चाहता हूं। मेरा पारिवारिक नाम क्या है? मेरे पिता कौन हैं?
मेरे बच्चे, मां ने उत्तर दिया, मुझे ज्ञात नहीं; अपनी युवावस्था में जब मैं सेविका का कार्य करती थी तो मैंने अनेक पुरुषों का संसर्ग करते हुए अपने गर्भ में तुम्हें धारण किया था, मैं नहीं जानती कि तुम्हारा पिता कौन है—: मैं जाबाला हूं और तुम सत्यकाम हो, इसलिए तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहो।
तब वह बालक उस समय के महान ऋषि गौतम के पास गया और उनसे स्वयं को शिष्य की भांति स्वीकार किए जाने के लिए कहा। वत्स, तुम किस परिवार से हो? ऋषि ने पूछा।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--87

उच्‍चतम ज्ञान: संपूर्ण अभी(प्रवचनसातवां)


दिनांक 27 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

योग—सूत्र--
('विभूतिपाद')
     
क्षणतत्कमयौ: संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।। 53।।
वर्तमान क्षण पर संयम साधने से क्षण विलीन हो जाता है, और आने वाला क्षण परम तत्व के बोध से जन्मे ज्ञान को लेकर आता है।

      जातिलक्षमदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्तत: प्रतिपत्ति:।। 54
इससे वर्ग, चरित्र या स्थान से न पहचाने जा सकने वाली समान वस्तुओं मे विभेद की योग्यता आती है।

      तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्।। 55।।
यथार्थ के बोध से उत्पन्न उच्चतम ज्ञान, सारी वस्तुओं और प्रक्रियाओं के भूत, भविष्य और वर्तमान से संबंधित समस्त विषयों की तत्क्षण पहचान के परे है, और यह वैश्विक प्रक्रिया का अतिक्रमण कर लेता है।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--5) प्रवचन--86

केवल परमात्‍मा जानता है—(प्रवचन—छठवां)


दिनांक 26 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍नसार:

1—उपद्रव की स्थितियों के मध्‍य गहरे—और—गहरे कैसे संभव हो सकता है?

2—जब मैं आपसे निकटता अनुभव करती हूं, उन क्षणों में मैं हंसना चाहती हूं।
ऐसा क्यों होता है?

3—इन रोगों का उपचार .कैसे हो; कृपणता, बकवास रहना, अभिनेता व्यक्तिव और अभिमान। क्या इनसे निबटने के लिए ध्यान प्रर्याप्‍त है?

4—में यह व्यक्‍ति जो प्रत्येक सुबह श्वेत वस्त्रों में उस कुर्सी पर बैठता है, कौन है?