साक्षी स्वप्रकाशित
है—(प्रवचन—सत्रहवां)
दिनांक 7 मई 1976 ओशो आश्रम पूूूूना।
योग—सूत्र
(कैवल्यपाद)
सदा
ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तह्मभो:
पुरुषस्यपिम्णामित्वात्।।
18।।
मन
की वृत्तियों
का ज्ञान सदैव
इसके प्रभु, पुरुष,
को शुद्ध
चेतना के
सातत्य के
कारण होता है।
न तत्स्वाभासं
दृश्यत्यात्।।
19।।
मन
स्व प्रकाशित
नहीं है, क्योंकि
स्वयं इसका
प्रत्यक्षीकरण
हो जाता है।
एकसमये
चोभयानवधारणमू।।
20।।
मन
के लिए अपने
आप को और किसी
अन्य वस्तु को
उसी समय में
जानना असंभव
है।
चित्तान्तरदृश्ये
बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग:
स्मृतिसंकरश्च।।
21।।
यदि
यह मान लिया
जाए कि दूसरा
मन पहले मन को
प्रकाशित
करता है, तो
बोध के बोध की
कल्पना करनी
पड़ेगी, और
इससे
स्मृतियों का
संशय उत्पन्न
होगा।
चितेखतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ
स्वबुद्धिसंवेदनमू।।
22।।
आत्म—बोध
से अपनी स्वयं
की प्रकृति का
ज्ञान मिल जाता
है,
और जब चेतना
इस रूप में आ
जाती है तो यह
एक स्थान से
दूसरे स्थान
को नहीं जाती।