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सोमवार, 11 जून 2018

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--27)

वासना संसार है, बोध मुक्ति हैप्रवचनबारहवां
 दिनांक: 7 अक्‍टूबर, 1976;

      श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

अष्टावक्र उवाच:

            कृताकृते न द्वंद्वानि कदा शांतानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाभ्रव त्यागपरोऽव्रती ।। 83।।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा व बुभुत्सोयशमं गताः ।। 84।।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितय दूषितम्।
असारं निंदितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ।। 85।।
काउसौ कालो वया: किं वा यत्र द्वंद्वानि नो नृणाम्।
तान्युयेक्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाघ्नुयात।। 86।।
नाना मतं महर्षीणां साधुनां योगिनां तथा।
द्वष्टव निर्वेदमापन्‍न: को न शाम्यति मानव:।। 87।।
कृत्वा मूर्तियरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरू:।
निर्वेदसमतायक्तया यस्तारयति संसते: ।। 88।।
पश्य भूतविकारास्त्‍वं भूतमात्रान् यथार्थत:।
तत्‍क्षणाद बंधनिर्मुक्त: स्वरूयस्थो भविष्यसि।। 89।।
वासना एव संसार ड़ति सर्वा विमुज्‍च ता:।
तत्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ।। 90।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--22)

एकटि नमस्‍कारे प्रभु एकटि नमस्‍कारे!—प्रवचन—सातवां 

दिनांक: 2 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

कपिल ऋषि के सांख्य—दर्शन, अष्टावक्र की महागीता और कृष्णमूर्ति की देशना में क्या देश—काल अनुसार अभिव्यक्ति का ही भेद है? कृपा करके समझाइये!

 त्य तो कालातीत है, देशातीत है। सत्‍य को तो देश और काल से कोई संबंध नहीं। सत्य तो शाश्वत है; समय की सीमा के बाहर है। लेकिन अभिव्यक्ति कालातीत नहीं है, देशातीत नहीं है। अभिव्यक्ति समय के भीतर है; सत्य समय के बाहर है। जो जाना जाता है, वह तो समय में नहीं जाना जाता; लेकिन जो कहा जाता है, वह समय में कहा जाता है। जो जाना जाता है, वह तो नितांत एकांत में; वहां तो कोई दूसरा नहीं होता। लेकिन जो कहा जाता है, वह तो दूसरे से ही कहा जाता है।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--30)

संन्‍यास बांसुरी है साक्षीभाव की--(प्रवचन-पंद्रहवां)

      दिनांक: 10 अक्‍टूबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

आपने बताया कि जब अष्टावक्र मां के गर्भ में थे, उनके पिता ने उन्हें शाप दिया, जिसकी वजह से उनका शरीर आठ जगहों से आड़ा—तिरछा हो गया। भगवान, इस आठ का क्या रहस्य है? वे अठारह जगह से भी टेढ़े—मेढ़े हो सकते थे और अष्टावक्र कहलाते। यह आठ का ही आंकड़ा क्यों?

 यह आठ आंकड़ा अर्थपूर्ण है। ये छोटी—छोटी कहानियां गहरे सांकेतिक अर्थ लिए हैं। इन्हें तुम इतिहास मत समझना। इनका तथ्य से बहुत कम संबंध है। इनका तो भीतर के रहस्यों से संबंध है।
आठ का आंकड़ा योग के अष्टांगों से संबंधित है। पतंजलि ने कहा है. आठ अंगों को जो पूरा करेगा—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—वही केवल सत्य को उपलब्ध होगा। यह पिता की नाराजगी, यह पिता का अभिशाप सिर्फ इतनी ही सूचना देता है कि वे आठ अंग, जिनसे व्यक्ति परम सत्य को उपलब्ध होता है, मैं तेरे विकृत किए देता हूं।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--29)

ध्यान अर्थात उपरामप्रवचनचौदहवां

दिनांक: 9 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

अष्टावक्र उवाच।

            विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम्।
धर्ममष्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ।। 91।।
स्वप्तेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पैल वा।
मित्रक्षेत्रधना गारदारदायादिसम्पद ।।92 ।।
यत्र यत्र भवेतृष्णा संसार विद्धि तत्र वै।
प्रौढ़वैराग्यमाश्रित्य वीततृष्ण: सुखी भव ।। 93।।
तृष्णमात्रात्मको बंधस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्प्रर्मुहु ।। 94।।
त्वमेकश्चेतन: शद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि किंचित्सा का बुभुत्मा तथापि ते।। 95।।
राज्यं सता कलत्राणि शरीराणि सखानि च।
संसक्तस्यायि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि।। 96।।
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनायि कर्मणा।
एभ्य: संसारकांतारे न विश्रांतमभून्मन: ।। 97।।
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुखमायासदं कर्म तदताध्युपरम्यताम्!। 98।।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--28)

बोध से जीयोसिद्धांत से नहींप्रवचनतैहरवां

 दिनांक: 8 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र ने कहा कि महर्षियों, साधुओं और योगियों के अनेक मत हैं—ऐसा देख कर निर्वेद को प्राप्त हुआ कौन मनुष्य शांति को नहीं प्राप्त होता है? कहीं इसलिए ही तो नहीं आप एक साथ सबके रोल— महर्षि, साधु और योगो के; अष्टावक्र, बुद्ध, पतंजलि और चैतन्य तक के रोल—पूरा कर रहे हैं, ताकि हम निवेंद को प्राप्त हों?

 निश्चय ही ऐसा ही है। जिससे मुक्त होना हो, उसे जानना जरूरी है। जाने बिना कोई मुक्त नहीं होता।

तर्क से मुक्त होना हो तो तर्क को जानना जरूरी है। तर्क में जिनकी गहराई है, वे ही तर्क के पार उठ पाते हैं। बुद्धि के पार जाना हो तो बुद्धि में निखार चाहिए। अति बुद्धिमान ही बुद्धि के पार जा पाते हैं। बुद्धि के पार जाने के लिए जितनी धार रखी जा सके बुद्धि पर, उतना ही सहयोगी है।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--26)

स्वतंत्रता की झील मर्यादा के कमलप्रवचनग्यारहवां

दिनांक: 6 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
      प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

भारतीय मनीषा ने आत्मज्ञानी को सर्वतंत्र स्वतंत्र कहा है। और आप उस कोटिहीन कोटि में हैं। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि उस परम स्वतंत्रता से इतना सुंदर अनुशासन और गहन दायित्व कैसे फलित होता है!

सा प्रश्न स्वाभाविक है। क्योंकि साधारणत: तो मनुष्य अथक चेष्टा करके भी जीवन में अनुशासन नहीं ला पाता। सतत अभ्यास के बावजूद भी दायित्व आंनदपूर्ण नहीं हो पाता। दायित्व में भीतर कहीं पीड़ा बनी रहती है। जो भी हमें कर्तव्य जैसा मालूम पड़ता है, उसमें ही बंधन दिखाई पड़ता है। और जहां बंधन है, वहां प्रतिरोध है। और जहां बंधन है, वहां से मुक्त होने की आकांक्षा है।

कर्तव्य या दायित्व, हमें लगते हैं, ऊपर से थोपे गए हैं। समाज ने, संस्कृति ने, परिवार ने, या स्वयं की सुरक्षा की कामना ने हमें कर्तव्यों से बंध जाने के लिए मजबूर किया है—पर मजबूरी है वहां, विवशता है, असहाय अवस्था है।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--25)

दृश्य स्वप्न हैद्रष्टा सत्य है-प्रवचन--दसवां

दिनांक: 5 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

तदा अधो यदा चित्तं किंचिद्वाच्छति शोचति।
किंचिन्मुज्‍चति गृहणाति किंचिड़ष्यति कुप्‍यति।। 71।।
तदा मक्तिर्यदा चित्तं न वांछति न शोचति।
मज्‍चति न गृहणाति न हष्यति न कथ्यति।। 72।।
तदा अधो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु।
तदा मोक्षो यदा चितंसक्तं सर्व द्वष्टिषु।। 73।।
यदा नाहं तदर मोक्षो यदाहं बंधन तदा।
मत्वेति हेलंयर किंचित् मा गृहाण विमुज्‍च मा।। 74।।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--24)

कितनी लधु अंजुलि हमारीप्रवचननौवां

दिनांक: 4 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

आपने कहा कि सब आदर्श गलत हैं। लेकिन क्या अपने गंतव्य को, अपनी नियति को पाने का आदर्श भी उतना ही गलत है?

 दर्श गलत है; किस बात को पाने का आदर्श है, इससे कोई भेद नहीं पड़ता। आदर्श का अर्थ है : भविष्य में होगा। आदर्श का अर्थ है : कल होगा। आदर्श का अर्थ है. आज उपलब्ध नहीं है। आदर्श स्थगन है—भविष्य के लिए।
जो तुम्हारी नियति है उसे तो आदर्श बनाने की कोई भी जरूरत नहीं; वह तो होकर ही रहेगा, वह तो हुआ ही हुआ है।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--23)

दृष्‍टि ही सृष्‍टि है—प्रवचन—आठवां

      दिनांक: 3 अक्‍टूबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम पूना।
     
      सूत्र:

जनक उवाच।

            मथ्यनन्तमहाम्मोधौ विश्वयोत ड़तस्तत:!
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्लसहिध्याता।। 74।।
मय्यनन्तमहाम्मोधौ जगद्वीचि स्वभावत:।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न न क्षति:।। 75।।
मय्यनन्तमहाम्मोधौ विश्व नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थित:।। 76।।
नात्मा भावेष नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने।
ड़त्यसक्तोउसह: शान्त एतदेवाहमास्थिता:।। 77।।
अहो चिन्यात्रमेवाह मिन्द्रजालोपमं जगत्।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्यना।। 78।।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--21)

ज्ञान मुक्‍ति है—प्रवचन—छटवां

दिनांक: 1 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र:

अष्‍टावक्र उवाच।

न ते संगोउस्ति केनायि किं शद्धस्त्‍यक्तमिच्छसि।
संघातविलयं कुर्वन्नेमेव लयं व्रज।।66।।
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुदबुद:।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लय व्रज।। 67।।
प्रत्यक्षमथ्यवस्तुत्वद्विश्वं नास्तमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यकृमेवमेव लय व्रज।। 68।।
समदु:ख सुख: पूर्ण आशानैराश्ययो:  सम:।
समजीवित मृत्यु: सन्नैवमेव लयं व्रज।। 69।।

 जनक उवाच।

            आकाशवदनंतोऽहं धटवत् प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्थ न त्यागो न ग्रहो लय:।।70 ।।
महौदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसन्निभि:।
इति ज्ञानं तथैतस्थ न त्यागो न ग्रहो लय:।। 71।।
अहं स शुक्तिसंकाशो रूप्‍पवद्विश्वकल्यना।
इति ज्ञानं तथैतस्थ न त्यागो न ग्रहो लय:।। 72।।
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभतान्ययो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लय:।। 73।।

बुधवार, 29 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--20)

क्रांति: निजी और वैयक्‍तिक—प्रवचन—पांचवां  

      दिनांक: 30 सितंबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

आप आज मौजूद हैं, तो भी मनुष्य नीचे और नीचे की ओर जा रहा है; जबकि बद्धों के आगमन पर मनुष्यता कोई शिखर छूने लगती है। हजारों आंखें आपकी ओर लगी हैं कि शायद आपके द्वारा फिर नवजागरण होगा और धर्म का जगत निर्मित होगा। कृपया बताएं कि यह विस्फोट कब और कैसे होगा? क्योंकि बदलना तो दूर, उलटे लोग आपका ही विरोध कर रहे हैं।


 हली बात, मनुष्यता सदा ऐसी की ऐसी ही रही है। कुछ विरले मनुष्य बदलते हैं, मनुष्यता जरा भी नहीं

 बदलती बाहर की स्थितियां बदलती हैं, व्यवस्थाएं बदलती हैं, भीतर मनुष्य वैसा का ही वैसा रहता है! तो पहले तो इस भ्रांति को छोड़ दो कि आज का मनुष्य पतित हो गया है।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--19)

संन्यास का अनुशासन : सहजता—प्रवचन—चौथा 

 दिनांक: 29 सितंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

हंतात्मज्ञस्य धीरस्थ खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढ़ै सह समानता।।60।।
यत्यदं प्रेम्मवो दीना: शक्राद्या सर्वदेइवता:।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुयगच्छति।।61।।
तज्‍जस्‍य पुण्ययायाथ्यां स्पर्शो ह्रयन्तर्न जायते।
न हयकाशस्थ धूमेन झयमानोऽयि संगति:।।62।।
आत्यवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमान तं निषेद्युं क्षमेत क्र:।।63।।
आब्रह्मस्तम्बयर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने।। 64।।
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानति जगदीश्वरम।
यद्वेति तत्स कुस्ते न भयं तस्य कुत्रचित्।। 65।।