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शुक्रवार, 31 मार्च 2017

असंभव क्रांंति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 21-10-67 रात्रि   
(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-दसवां-(बस एक कदम)


शिविर की इस अंतिम रात्रि में थोड़े से प्रश्नों पर और हम विचार कर सकेंगे। कुछ प्रश्न तो ऐसे हैं, जो मेरे शब्दों को, विचारों को ठीक से न सुन पाने, न समझ पाने की वजह से पैदा हो गए हैं। एक शब्द भी यहां से वहां कर लें तो बहुत अंतर पैदा हो जाता है।

उन प्रश्नों के तो उत्तर मैं नहीं दे पाऊंगा। निवेदन करूंगा कि जो मैंने कहा है, उसे फिर एक बार सोचें। उसे समझने की कोशिश करें। जरा सा भेद आप कर लेते हैं, कुछ अपनी तरफ से जोड़ लेते हैं या कुछ मैंने जो कहा उसे छोड़ देते हैं, तो बहुत सी भ्रांतियां, दूसरे अर्थ पैदा हो जाते हैं। और जरा से फर्क से बहुत बड़ा फर्क पैदा हो जाता है।
एक राजधानी में उस देश के धर्मगुरुओं की एक सभा हो रही थी। सैकड़ों धर्मगुरु देश के कोने-कोने से इकट्ठे हुए थे। उस नगर ने उनके स्वागत का सब इंतजाम किया। सभा का जब उदघाटन होने को था तो मंच पर से परदा उठाया गया।

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 दोपहर

(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-नौवां-(काम का रूपांतरण)

सुबह मैंने उर्वशी की कथा कही। उससे दोपहर उन्हें अत्यंत कामोत्तेजक स्वप्न आया। तो उन्होंने चाहा है कि मैं ऐसी बातें न कहूं जिनसे कामवासना भड़क उठे। मैं तो सिर्फ सत्य जानने का रास्ता बताऊं।

मेरी कथा से उनकी कामवासना जाग्रत हुई है, या कि कामवासना उनमें दबी हुई पड़ी थी, मेरी कथा उसे बाहर निकाल लाई है।
एक कुएं में हम बाल्टी डालते हैं, बाल्टी में पानी भरकर बाहर आ जाता है, क्योंकि कुएं में पानी है। अगर कुआं खाली हो तो बाल्टी हम कितनी ही डालें, और कितनी ही बड़ी, और कितनी ही अच्छी, कुएं से पानी नहीं आ सकेगा। बाल्टी पानी केवल बाहर लाती है, होता कुएं में पानी है। लेकिन अगर हम बाल्टी को दोष दें कि इसकी वजह से ही यह पानी आ गया तो गलती हो जाएगी। बाल्टी केवल खबर ले आती है कि भीतर पानी है। और हम न भी बाल्टी डालें तो पानी विलीन नहीं हो जाता, वह मौजूद है।

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 21-10-67 सुबह  

(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-आठवां-(सृजन का सूत्र)
मेरे प्रिय आत्मन्,
मनुष्य एक तिमंजिला मकान है। उसकी एक मंजिल तो भूमि के ऊपर है, बाकी दो मंजिल जमीन के नीचे। उसकी पहली मंजिल में, जो भूमि के ऊपर है, थोड़ा प्रकाश है। उसकी दूसरी मंजिल में, जो जमीन के नीचे दबी है और भी कम प्रकाश है। और उसकी तीसरी मंजिल में जो बिलकुल भूगर्भ में छिपी है, पूर्ण अंधकार है, वहां कोई प्रकाश नहीं है।
इस तीन मंजिल के मकान में--जो कि मनुष्य है, अधिक लोग ऊपर की मंजिल में ही जीवन को व्यतीत कर देते हैं। उन्हें नीचे की दो मंजिलों का न तो कोई पता होता है, न खयाल होता है। ऊपर की मंजिल बहुत छोटी है। नीचे की दो मंजिलें बहुत बड़ी हैं। और जो अंतिम अंधेरा भवन है नीचे, वही सबसे बड़ा है--वही आधार है सारे जीवन का।

असंभव क्रांति-(साधन-शिविर)-प्रवचन-07

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 रात्री  
 
(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-सातवां-(सत्य का संगीत)

एक मित्र ने पूछा है कि मैं शास्त्रों को जला डालने के लिए कहता हूं। और मेरी बातों से कहीं थोड़े कम समझ लोग भ्रांत होकर भटक न जाएं?

लोग भटकेंगे या नहीं, लेकिन जिन्होंने प्रश्न पूछा है, वे मेरी बात सुनकर जरूर भटक गए हैं। मैंने कब कहा कि शास्त्रों को जला डालें। मैंने सिर्फ अपनी किताबों को--अगर वे किसी दिन शास्त्र बन जाएं तो जला डालने को कहा है। मेरी किताबें हैं, उनको जला डालने के लिए मैं कह सकता हूं। लेकिन दूसरों की किताबें जला डालने को मैं क्यों कहूंगा।
और फिर मैंने कहा शास्त्रों को जला डालें--किताबों को जलाने के लिए मैंने कभी कहा नहीं है। अगर इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती है तो फिर मैं और जो कह रहा हूं, वह क्या समझ में आता होगा?

मंगलवार, 28 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06



असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 रात्रि   
(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-छटवां-(मौन का स्वर)


एक मित्र ने आज सुबह सलाह दी है कि मैं सभी प्रश्नों के उत्तर न दूं। उन्होंने कहा है कि बहुत से प्रश्न तो फिजूल होते हैं, उनको आप छोड़ दें।

मुझे उनकी बात सुनकर एक घटना स्मरण हो आई।
एक धर्मगुरु पहली बार ही चर्च में भाषण देने गया था। उसे डर था कि लोग कहीं कोई प्रश्न न पूछें। तो अपने एक मित्र को उसने दो प्रश्न सिखा रखे थे। इसके पहले कि लोग पूछें, तुम मुझसे यह प्रश्न पूछ लेना, उत्तर मेरे तैयार हैं।
जैसे ही उसका बोलना समाप्त हुआ, उसका मित्र खड़ा हुआ। उसने पहला प्रश्न पूछा--वह वही प्रश्न था, जो कि बोलने वाले ने उसे सिखाया हुआ था। बोलने वाले के पास उत्तर भी तैयार था। उसने उत्तर दिया। वह इतना अदभुत उत्तर मालूम पड़ा कि उस चर्च में इकट्ठे लोग अत्याधिक प्रभावित हुए। फिर उसी व्यक्ति ने खड़े होकर दूसरा प्रश्न पूछा। वह भी सिखाया हुआ था। उसका उत्तर और भी प्रभावपूर्ण था, चर्च तालियों से गूंज उठा और तभी वह मित्र तीसरी बार खड़ा हुआ और उसने कहा कि महानुभाव! आपने जो तीसरा प्रश्न पूछने को मुझे बताया था, वह मैं भूल गया हूं।

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05



असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 सुबह

(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-पांचवां-(क्रांति का क्षण)

मेरे प्रिय आत्मन्,
एक बहुत पुरानी कथा है। किसी पहाड़ की दुर्गम चोटियों में बसा हुआ एक छोटा सा गांव था। उस गांव का कोई संबंध, वृहत्तर मनुष्य जाति से नहीं था। उस गांव के लोगों को प्रकाश कैसे पैदा होता है, इसकी कोई खबर न थी।
लेकिन अंधकार दुखपूर्ण है, अंधकार भयपूर्ण है, अंधकार अप्रीतिकर है, इसका उस गांव के लोगों को भी बोध होता था। उस गांव के लोगों ने अंधकार को दूर करने की बहुत चेष्टा की। इतनी चेष्टा की कि वे अंधकार को दूर करने के प्रयास में करीब-करीब समाप्त ही हो गए। वे रात को टोकरियों में भरकर अंधकार को घाटियों में फेंक आते। लेकिन पाते कि टोकरियां भरकर फेंक भी आए हैं, फिर भी अंधकार अपनी ही जगह बना रहता है।

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04




असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)

साधना-शिविर माथेरान,
दिनांक 19-10-67 रात्रि
(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-चौथा-(ध्यान की आँख)
एक मित्र ने पूछा है, कि क्या मैं संन्यास के पक्ष में नहीं हूं?

मैं संन्यास के तो पक्ष में हूं, लेकिन संन्यासियों के पक्ष में नहीं हूं। संन्यास बड़ी और बात है और संन्यासी हो जाना बड़ी और। संन्यासी होकर शायद हम संन्यास का धोखा देना चाहते हैं और कुछ भी नहीं। संन्यास तो अंतःकरण की बात है, अंतस की। और संन्यासी हो जाना बिलकुल बाह्य अभिनय है। और बाह्य अभिनेताओं के कारण इस देश में संन्यास को, धर्म को जितनी हानि उठानी पड़ी है, उसका हिसाब लगाना भी कठिन है।
संन्यास जीवन-विरोधी बात नहीं है। लेकिन तथाकथित संन्यासी जीवन-विरोधी होता हुआ दिखाई पड़ता है। संन्सास तो जीवन को परिपूर्ण रूप से भोगने का उपाय है। संन्यास त्याग भी नहीं है। वस्तुतः तो जीवन के आनंद को हम कैसे पूरा उपलब्ध कर सकें--इसकी प्रक्रिया, इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया ही संन्यास है। संन्यास दुख उठाने का नाम नहीं।

सोमवार, 27 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(साधना-शिवििर)-प्रवचन-03



असंभव क्रांति-(ओशो)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 19-10-67 रात्रि
(अति-प्राचिन प्रवचन)


प्रवचन-तीसरा-(जीवन का आविर्भाव)

सुबह हमने चित्त की स्वतंत्रता के संबंध में थोड़ी सी बातें कीं।

एक मित्र ने पूछा है कि चित्त स्वतंत्र होगा, तो स्वच्छंद तो नहीं हो जाएगा?

हमें स्वतंत्रता का कोई भी पता नहीं है। हम केवल चित्त की दो ही स्थितियां जानते हैं। एक तो परतंत्रता की, और एक स्वच्छंदता की। या तो हम गुलाम होना जानते हैं, और या फिर उच्छृंखल होना जानते हैं। स्वतंत्रता का हमें कोई अनुभव नहीं है। स्वतंत्रता, स्वच्छंदता से उतनी ही भिन्न बात है, जितनी परतंत्रता से।
सच्चाई तो यह है कि स्वतंत्रता का स्वच्छंदता से कोई संबंध नहीं। स्वच्छंदता का परतंत्रता से जरूर संबंध है। परतंत्र चित्त की जो प्रतिक्रिया है, वही स्वच्छंदता है। परतंत्र चित्त का जो विद्रोह है, वही स्वच्छंदता है। परतंत्र चित्त का जो विरोध है, वही स्वच्छंदता है। लेकिन स्वतंत्रता तो बहुत ही अनूठी दिशा है। उसका इन दोनों बातों से कोई भी संबंध नहीं। न तो स्वतंत्र व्यक्ति परतंत्र होता है, और न स्वच्छंद होता है।

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02



असंभव क्रांति-(ओशो)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 19-10-1967 रात्रि

(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-दूसरा-(आत्मा के फूल)

ज्ञान की कोई भिक्षा संभव नहीं हो सकती। ज्ञान भीख नहीं है। धन तो कोई भीख में मांग भी ले, क्योंकि धन बाहर है। लेकिन ज्ञान? ज्ञान स्थूल नहीं है, बाहर नहीं है, उसके कोई सिक्के नहीं हैं, उसे किसी से मांगा नहीं जा सकता। उसे तो जानना ही होता है। लेकिन आलस्य हमारा, प्रमाद हमारा, श्रम न करने की हमारी इच्छा, हमें इस बासे उधार ज्ञान को, जो कि ज्ञान नहीं है, इकट्ठा कर लेने के लिए तैयार कर देती है।
इससे बड़ा मनुष्य का और कोई अपमान नहीं है कि वह ज्ञान मांगने किसी के द्वार पर जाए। इससे बड़ा कोई अपमान नहीं है। इससे बड़ा कोई पाप नहीं है। लेकिन इस बात को तो धर्म समझा जाता रहा है। जिसे मैं पाप कह रहा हूं। जो आदमी जितना शास्त्रों से, शास्ताओं से ज्ञान इकट्ठा कर लेता है, उतना धार्मिक समझा जाता है।

असंभव क्रांति-(साधन-शिविर)-प्रवचन-01



असंभव क्रांति-(ओशो)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 18-10-1967 रात्रि

(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-पहला-(सत्य का द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन्,
एक सम्राट एक दिन सुबह अपने बगीचे में निकला। निकलते ही उसके पैर में कांटा गड़ गया। बहुत पीड़ा उसे हुई। और उसने सारे साम्राज्य में जितने भी विचारशील लोग थे, उन्हें राजधानी आमंत्रित किया। और उन लोगों से कहा, ऐसी कोई आयोजना करो कि मेरे पैर में कांटा न गड़ पाए।
वे विचारशील लोग हजारों की संख्या में महीनों तक विचार करते रहे और अंततः उन्होंने यह निर्णय किया कि सारी पृथ्वी को चमड़े से ढांक दिया जाए, ताकि सम्राट के पैर में कांटा न गड़े। यह खबर पूरे राज्य में फैल गई। किसान घबड़ा उठे। अगर सारी जमीन चमड़े से ढंक दी गई तो अनाज कैसे पैदा होगा? सारे लोग घबड़ा उठे--राजा के पैर में कांटा न गड़े, कहीं इसके पहले सारी मनुष्य जाति की हत्या तो नहीं कर दी जाएगी? क्योंकि सारी जमीन ढंक जाएगी तो जीवन असंभव हो जाएगा।
लाखों लोगों ने राजमहल के द्वार पर प्रार्थना की और राजा को कहा, ऐसा न करें कोई और उपाय खोजें। विद्वान थे, बुलाए गए और उन्होंने कहा, तब दूसरा उपाय यह है कि पृथ्वी से सारी धूल अलग कर दी जाए, कांटे अलग कर दिए जाएं, ताकि आपको कोई तकलीफ न हो।

रविवार, 26 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-10



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 20 सितम्बर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।
दसवां प्रवचन-(नीति: कागज का फूल)

प्रश्न-सार:

1—आचरणवादी (बिहेवियरिस्ट) मनस्विदों का यह खयाल कि आचरण के प्रशिक्षण से आदमी को बेहतर बनाया जा सकता है, कहां तक सही है?
2—आरोपित दिखाऊ नीति से क्या समाज का काम चल जाता है?
क्या उसे धर्म से उदभूत नीति की और संतों की आवश्यकता नहीं रहती है?
3—भगवान महावीर और महात्मा गांधी की अहिंसा में फर्क क्या है?
4—कल ध्यान के प्रयोग में कुछ क्षणों के लिए परम शांति की अनुभूति हुई।
तो क्या वह विशेष विधि मेरे अनुकूल आई? और क्या मैं उसे जारी रखूं?
5—जीवन में अनुभव कर-कर के देखना उचित है या देख-देख कर करना उचित है?

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-09



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 19 सितम्‍बर सन् 1975,                         
श्री ओशो आश्रम पूना।
नौवां –प्रवचन-(भीतर के मल धोई)

सूत्र:
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
झूठा सांचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सबके कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
सांचे का साहब धनी, समरथ सिरजनहार।
पाखंड की यह पिर्थवी, परपंच का संसार।।
पाखंड पीव न पाइए, जे अंतर सांच न होई।
ऊपर थैं क्यों ही रहौ, भीतर के मल धोई।।
जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।।

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-08



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 18 सितम्‍बर सन् 1975,

श्री ओशो आश्रम पूना।
आठवां –प्रवचन-(प्रेम जीवन है)
प्रश्न-सार

1—ध्यान, समाधि और प्रेम के अंतर्संबंध को समझाने की कृपा करें।
2—क्या प्रेम ही जीवन है? जीवंतता है?
3—जिसके प्रति भी समर्पण का भाव हो, चाहे परमात्मा के प्रति या गुरु के प्रति, उसके संबंध में कोई न कोई धारणा तो होगी ही। तो यह समर्पण भी एक धारणा के प्रति ही होगा न!
4—भक्त कितना ही भाव में गहरा जाए, लेकिन अंत तक भी शायद उसका संबंध द्वैत का ही बना रहता है। और द्वैत बना रहे तो मुक्ति क्या संभव है?
5—क्या शरीर में रहते हुए चरम अद्वैत की उपलब्धि संभव नहीं है?

शनिवार, 25 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-07



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 17 सित्‍मबर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।


सातवां -प्रवचन
इसक अलह का अंग
सूत्र

जब लगि सीस न सौंपिए, तब लगि इसक न होई।
आसिक मरणै न डरै, पिया पियाला सोई।।

दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोई।
बेद पुरान पुस्तक पढ़ै, प्रेम बिना क्या होई।।

प्रीति जो मेरे पीव की, पैठी पिंजर माहिं।
रोम-रोम पिव-पिव करै, दादू दूसर नाहिं।।

आसिक मासूक हुई गया, इसक कहावै सोई।
दादू उस मासूक का, अल्लहि आसिक होई।।

इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग।।

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-06



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 16 सित्‍मबर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।

छठवां -प्रवचन
तथागत जीता है तथाता में

प्रश्न-सार
1—क्या झेन संत बोकोजू का अपनी मृत्यु का पूर्व-नियोजन तथाता के विपरीत नहीं था?
2—दादू कहते हैं: ज्यूं राखै त्यूं रहेंगे, अपने बल नाहीं।
इसी तरह का एक पद संत मलूक का है--
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम।।
क्या संत मलूक भी सही हैं?
3—साधक या भक्त के लिए मन का कोई विधायक उपयोग है अथवा नहीं?
4—आपने कहा, अस्तित्व एक दर्पण है जिसमें हम अपने को ही देखते हैं।
यदि यह सच है, तो सर्वथा शुद्ध और शून्य हो गए संतों को हम सांसारिकों की पीड़ा, पाप और नरक कैसे दिखाई पड़ते हैं?
5—आपने कहा कि चित्त की अनेक आकांक्षाओं के साथ भगवत-प्राप्ति को एक अतिरिक्त आकांक्षा की तरह नहीं जोड़ा जा सकता।
धर्म-पथ की यात्रा फिर आरंभ कैसे होगी?
6—कभी-कभी नगरवासी आपके और आश्रम के संबंध में प्रश्न पूछते हैं। उनके कुछ प्रश्न इस प्रकार हैं:
7—आपके भगवान का पूरे दिन का कार्यक्रम क्या है?
8—वे लोगों को खानगी मुलाकात क्यों नहीं देते?
9—आश्रम में इतनी गोपनीयता क्यों है?
10-आश्रम में इतने अधिक विदेशी क्यों हैं, भारतीय क्यों नहीं हैं?
11-यहां आश्रम में सुंदर और युवा युवतियों का इतना आधिक्य क्यों है?
12-कुछ विदेशी संन्यासिनियों के गर्भवती होने की खबर क्या सच है?
13-आश्रम के लिए धन कहां से आता है?

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संंत दादू दयाल)-प्रवचन-05



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक : 15 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
पांचवां प्रवचन
समरथ सब बिधि साइयां
सारसूत्र:

समरथ सब बिधि साइयां, ताकी मैं बलि जाऊं।
अंतर एक जु सो बसे, औरां चित्त न लाऊं।।

ज्यूं राखै त्यूं रहेंगे, अपने बल नाहीं।
सबै तुम्हारे हाथि है, भाजि कत जाहीं।।

दादू दूजा क्यूं कहै, सिर परि साहब एक।
सो हमको क्यूं बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक।।

कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार।
करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार।।

आप अकेला सब करै, औरुं के सिर देई।
दादू सोभा दास कूं, अपना नाम न लेई।।

सबै सयाने एक मत-(संंत दादू दयाल)-प्रवचन-04



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)

दिनांक : 14 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
चौथा प्रवचन
मृत्यु श्रेष्ठतम है
प्रश्न-सार:
1—कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं, पर सभी सयाने उनके प्रति एकमत क्यों नहीं हैं?
2—आपने कहा है, गुरु मृत्यु है, ध्यान मृत्यु है, समाधि मृत्यु है। जीवन में जो भी श्रेष्ठतम है उसे मृत्यु ही क्यों कहा गया है?
3—शून्य चित्त में यह प्रत्यभिज्ञा, पहचान कैसे होगी कि यह सत्य है?
आप कहते हैं कि हर आकांक्षा के भीतर उसका विपरीत छिपा है। सम्मान की आकांक्षा में अपमान छिपा बैठा है; जीने की आकांक्षा में ही मृत्यु का भय भरा है। ऐसा क्रूर विधि-विधान क्यों है?

गुरुवार, 23 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-03


सबै सयाने एक मत-(संत दादू)
दिनांक : 13 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
तीसरा -प्रवचन
मेरे आगे मैं खड़ा
 सूत्र:

जीवत माटी हुई रहै, साईं सनमुख होई।
दादू पहिली मरि रहै, पीछे तो सब कोई।।

(दादू) मेरा बैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोई।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होई।।

मेरे आगे मैं खड़ा, ताथैं रह्या लुकाई।
दादू परगट पीव है, जे यहु आपा जाई।।

दादू आप छिपाइए, जहां न देखै कोई।
पिव को देखि दिखाइए, त्यों-त्यों आनंद होई।।

(दादू) साईं कारण मांस का, लोहू पानी होई।
सूकै आटा अस्थि का, दादू पावै सोई।।