छठवां-प्रवचन-(निर्विचार)
बीते दो दिनों में मनुष्य के मन की दो स्थितियों पर विचार किया है। पहले दिन अविचार के संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने कहीं। अविचार विश्वास और श्रद्धा से जन्म पाता है। और अविचार में जो अपने को बंद कर लेते हैं वे जीवन-सत्य को जानने से वंचित हो जाते हैं। कल विचार का जन्म कैसे हो, इस संबंध में हमने विचार किया। केवल उनके ही चित्त विचार को अविर्भाव दे पाते हैं जो विश्वासों, श्रद्धाओं और मान्यताओं से मुक्त होते हैं। जो इतना साहस करते हैं कि परंपराओं और समाजों के द्वारा दी गई अंधी धारणाओं को तोड़ने में अपने को समर्थ बना लेते हैं, केवल उनके भीतर ही उस विचार का जन्म होता है; जो स्वतंत्रता लाता है और सत्य की दिशा में गति देता है।आज हम निर्विचार के संबंध में थोड़ी सी चर्चा करेंगे। निर्विचार से मेरा क्या प्रयोजन है उसको कहने के पहले हम कैसे विचारों के जाल में खड़े हैं, उस संबंध में दो बात कर लेनी जरूरी हैं। मनुष्य का मन चैबीस घंटे ही किसी न किसी भांति के विचारों के तंतुओं से घिरा रहता है। एक भीड़ भीतर चलती रहती है। कभी-कभी उसका हमें बोध भी होता है। अधिकांशतः बोध भी नहीं होता। जैसे भीतर एक काम जारी रहता है। भीतर एक दौड़ जारी रहती है। उस दौड़ के प्रति अगर हम पूरे जागें तो शायद घबड़ा जाएं। शायद हमें ज्ञात हो कि कोई पागल मनुष्य हमारे भीतर बैठा हुआ है।

