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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 40)

मैं कल्‍कि अवतार नहीं हूं
     
      मैं खड़ा हूं—अजीब बात है, इस समय तो मैं आराम कर रहा हूं—मेरा मतलब है अपनी स्मृति में मैं मस्‍तो कि साथ खड़ा हूं। निश्‍चित ही तो ऐसा कोई और नहीं है जिसके साथ मैं खड़ा हो सकता हूं। मस्‍तो के बाद दूसरे किसी का संग-साथ तो बिलकुल अर्थहीन है।
      मस्‍तो तो पूर्णतया समृद्ध थे—भीतर से भी और बाहर से भी। उनके रोम-रोम से उनकी आंतरिक समृद्धि झलकती थी। अपने विविध संबंधों का उन्‍होंने जो विशाल जाल बुन रखा था उसका हर तंतु मूल्‍य वान था और इसके बारे मैं उन्‍होंने मुझे धीरे-धीरे अवगत किया। अपने जाने-पहचाने सब लोगो से तो उन्‍होंने मुझे परिचित नहीं कराया—ऐसा करना संभव नहीं था। मुझे जल्‍दी थी वह करने की जिसे में कहता हूं, न करना। वे मेरे प्रति अपनी जिम्‍मेवारी को पूरा करने की जल्‍दी मैं थे। चाहते हुए भी वह मेरे लिए अपने सब संबंधों का लाभ उपलब्‍ध न करा सके। इसके दूसरे कारण भी थे।

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 39 )

पंडित जवाहरलाल नेहरू से भेट

      देव गीत, मुझे लगता है तुम किसी बात से परेशान हो रहे हो। ।तुम्‍हें परेशान नहीं होना चाहिए, ठीक है?
      ठीक है।
      ....नहीं तो नोट कौन लिखेगी, अब लिखने वाले को तो कम से कम लिखने वाला ही चाहिए।
      अच्‍छा। ये आंसू तुम्‍हारे लिए है, इसीलिए तो ये दाईं और है। आशु चुक गई। वह बाईं और एक छोटा सा आंसू उसके लिए भी आ रहा है। मैं बहुत कठोर नहीं हो सकता। दुर्भाग्‍यवश मेरी केवल दो ही आंखें है। और देवराज भी यहीं है। उसके लिए तो मैं प्रतीक्षा करता रहा हूं। और व्‍यर्थ में नहीं। वह मेरा तरीका नहीं है। जब में प्रतीक्षा करता हूं। तो वैसा होना ही चाहिए। अगर वैसा नहीं होता तो इसका मतलब है कि मैं सचमुच प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। अब फिर कहानी को शुरू किया जाए।
      मैं इंदिरा गांधी के पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के दो कारणों से नहीं मिलना चाहता था। मैंने इसके बारे में मस्‍तो से कहा भी किंतु वे नहीं माने। वह मेरे लिए बिलकुल ठीक आदमी थे। पागल बाबा ने गलत आदमी के लिए सही आदमी को चुना था। मैं तो किसी की भी नजर में कभी भी ठीक नहीं रहा। किंतु मस्‍तो था। मेरे सिवाय आरे कोई नहीं जानता था कह वह बच्‍चें की तरह हंसता था। परंतु वह हमारी निजी बात थी—और भी कई निजी बातें थीं,अब इनकी चर्चा करके मैं इनको सार्वजनिक बना रहा हूं।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

ओशो का जीवन में प्रवेश--एक परर्कमा-(खंड़-2)

ओशो का जीवन में प्रवेश

      कुछ बातें जीवन में ऐसी होती है, न तो उनके आने की आहट हमें सुनाई देती है और न ही उनके पदचाप ही हमारे ह्रदय में कही छपते है। वे अदृष्‍य मूक हमारे जीवन में प्रवेश कर जाना चाहती है। लेकिन ये कुदरत की प्रबोधन के आगमन अनुभूति इतना पारदर्शी अस्‍पर्शित होती है, कि वो अनछुआ क्वारी की क्वारी ही रह जाती है।। वो इतना शूक्ष्माति-शूक्ष्‍म होता है कि चाहे तो उसके आर-पार आसानी से आया जाया जा सकता है। मेरे जीवन में ओशो का प्रवेश भी कुछ ऐसे ही हुआ। हुआ भी नहीं का जा सकता क्‍योंकि जब उन्‍होंने आकर दस्‍तक दी तो मैं द्वार बंद कर करवट बदल कर सो गया।
      बात सन् 1985 की है उन दिनों ओशो अमरीका से भारत आये थे। मेरा व्‍यवसाय उस समय बहुत अच्‍छा चल रहा था। घर में वो सब कुछ था जो होना चाहिए। घर में ख़ुशियों के साथ-साथ जरूरत की हर चीज थी। मेरी लड़की अन्‍नू( मां बोद्धीउनमनी) उस समय पाँच वर्ष की थी। उसे एक टीचर पढ़ाने आया करता था। वो ओशो को पढ़ता था। एक दिन न जाने उस के मन में क्‍या आई वो जो ओशो पुस्‍तक हाथ में लिए हुए था।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 38 )

मोज़ेज और जीसस—पहलगाम (कश्‍मीर)में मरे

    ओ. के.। मैं तुम्‍हें एक सीधा-सादा सरल सा सत्‍य बताना चाहता था। शायद सरल होने के कारण ही वह भुला दिया गया है। और कोई भी धर्म उसका अभ्‍यास नहीं कर सकता। क्‍योंकि जैसे ही तुम किसी धर्म के अंग बन जाते हो वैसे ही तुम न तो सरल रहते हो और न ही धार्मिक। मैं तुम्‍हें एक सीधी सह बात बताना चाहता था। जो कि मैंने बड़े मुश्‍किल ढंग से सीखी है। शायद तुम्‍हें तो यह बहुत सस्‍ते में मिल रही है। साधी और सरल सदा सस्‍ता ही माना जाता है। यह सस्‍ता बिलकुल नहीं है। यह बड़ा कीमती है। क्‍योंकि इस सरल से सत्‍य के मूल्‍य को चुकाने के लिए अपने सारे जीवन को दांव पर लगाना पड़ता है। और वह है समर्पण, श्रद्धा।   
      ट्रस्‍ट, श्रद्धा को तुम लोग गलत समझते हो। कितनी बार मैं तुम्‍हें बता चुका हूं? शायद लाखों बार बताया है। परंतु क्‍या तुमने एक बार भी ध्‍यान से सुना है। अभी उस रात मेरी सैक्रेटरी रो रही थी और मैंने उससे पूछा कि वह क्‍यों रो रही है?

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

शब्दों के आयाम—एक परिक्रमा ( 01)

शब्‍दों के आयाम
   

      ओशो के स्‍वर्णिम बचपन के सत्र-37 लिखते-लिखते अचानक बीच में ऐसा लगा की मैं जो लिख रहा हूं वो शब्‍द और में एक ही हो गए है, मैं खुद शब्‍द और अपने होने के भेद को भूल गया, इतना लवलीन हो गया शब्‍दों में की शरीर से भी नीर भार हो गया, शरीर का भी भार है। हम उसे जब महसूस करते जब हम स्‍वास्‍थ होते है वो भी पूर्ण नहीं, एक झलक मात्र, नहीं तो कितने ही लोगों को तो शारीर का होना भी जब पता चलता है जब अस्वस्थ होते है। मानों शरीर झर गया निर्झरा, शरीर एक घुल कण कि तरह छटक गया। कितना सुखद अस्‍वाद होता है शरीर विहीन होना मानों हमारी पकड़ इस पृथ्‍वी से पलभर के लिए छुट गई।
      लेकिन ये स्‍थिति ज्‍यादा देर नहीं रही और कुछ ही देर में अपने पर लोट आया। लेकिन इसके बाद मन की तरंगें ही बदल गई, मुहँ का स्‍वाद, स्वादों कि खुशबु, मन मानों समुन्दर होकर तरंगें मारने लगा , एक मीठा सा तूफान  लह लाने लगा।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 37 )

बे घर का मुसाफिर
ओ. के. । हम लोग अभी मेरे प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही है। बस, ऐसा ही होगा, हर रोज नई-नई बातें खुलती जाएंगी। अभी तक मैंने दूसरे दिन का वर्णन समाप्‍त नहीं किया आज में उसे समाप्‍त करने की पूरी कोशिश करूंगा।
      जीवन अंतर्संबंधित है। इसे टुकड़ो में काटा नहीं जा सकता। यह कपड़े का टुकड़ा नहीं है। इसको तुम काट नहीं सकते। क्‍योंकि जैसे ही इसको अपने सब संबंधों से काट दिया जाएगा, यह पहले जैसा नहीं रहेगा—यह श्‍वास नहीं ले सकेगा और मृत हो जाएगा। मैं चाहता हूं कि अपनी गति से बहता रहे। मैं इसे किसी विशेष दिशा की और उन्‍मुख नहीं करना चाहता। क्‍योंकि मैंने इसका दिशा-निर्देश पहले से ही नहीं किया। यह बिना किसी पथ-प्रदर्शन के अपनी ही गति से चलता रहा है।
      मुझे इन मार्ग दर्शकों से नफरत है। क्‍योंकि ये जो है उसके साथ प्रवाहित होने से तुम्‍हें रोक देते है। वे रास्‍ता दिखाते है और उन्हें तुम्‍हें अगली जगह पहुंचाने की जल्‍दी रहती है। उनका काम है तुम्‍हें यह जताना कि तुम जानने के लिए आए हो। न जो वह जानते है, न तुम जानते हो। सच तो यह है कि जब बिना किसी दिशा-निर्देंश के, बिना किसी पथ-प्रदर्शन के जीवन को जिया जाता है तब हम जान पाते है। मैं तो इसी प्रकार जिया हूं और जी रहा हूं।  

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 36 )


भी-अभी मैं एक कहानी के बारे में सोच रहा था। मुझे नहीं मालूम कि इस कहानी को किसने रचा
और क्‍यों? और मैं उसके निष्‍कर्ष से भी सहमत नहीं हूं फिर भी यह कहानी मुझे बहुत प्रिय है। कहानी बहुत सरल है। तुमने इसे सुना होगा किंतु शायद समझा नहीं होगा क्‍योंकि यह इतनी सरल है। यह अजीब दुनिया है। हर आदमी को यह खयाल है कि वह सरलता को समझता है। लोग जटिलता को समझने की कोशिश करते है और सरलता की और ध्‍यान ही नहीं देते यह सोच कर कि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। शायद तुमने भी इस कहानी पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया होगा किंत1 जब मैं इसे तुम्‍हें सुनाऊंगा तो निशचित ही तुम्‍हें याद आ जाएगी।
      कहानियां विचित्र प्राणी हैं, वे कभी मरती नहीं हैं, उनका कभी जन्‍म भी नहीं होता है। वे उतनी ही पुरानी है जितना आदमी। इसीलिए तो वे मुझे बहुत प्रिय है। अगर कहानी में सत्‍य न हो तो वह कहानी नहीं है। तब वह फिलासफी होगी या थियोसाफी होगी या एन्‍थ्रोपोसाफी होगी और न जाने कितनी ही ‘’ सॉफीज ‘’ हैं, वे सब बकवास है। नॉनसेंस है। नॉनसेंस ही लिखों, शुद्ध बकवास, पयोर नॉनसेंस। प्राय: इस शब्‍द के बीच में हाइफन, संयोजक रेखा डाली जाती है—जैसे नॉनसेंस। इसकी क्‍या जरूरत है। मेरे शब्‍दों में से तो इसे हटा दो। परंतु जब मैं कहता हूं कि झेन नॉनसेंस है, तब इस हाइफन की, इस संयोजक-रेखा की जरूरत है।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 35 )

अल्‍लाउद्दीन खां और पं रविशंकर

      ओ. के.। मैं रविशंकर को सितार बजाते हुए सुना है। हम जो सोच सकें, वे सब गुण उनमें है। उनका व्‍यक्‍तित्‍व गायक का है। अपने वाद्ययंत्र पर उनका पूर्ण अधिकार है। और उनमें नवीनता उत्‍पन्‍न करने की योग्‍यता है। जो कि शास्त्रीय संगीतज्ञों में दुर्लभ ही होती है। रविशंकर को नवीनता से बहुत प्रेम है। इन्‍होंने यहूदी मैन हून की वायलिन के साथ अपनी सितार की जुगल बंदी की है। दूसरा कोई भी भारतीय सितारवादक इसके लिए तैयार नहीं होता। क्‍योंकि इसके पहले किसी ने ऐसा प्रयोग नहीं किया। वायलिन के साथ सितार वादन। क्‍या तुम पागल हो? परंतु नये की खोज करने वाल लोग थोड़े पागल ही होते है। इसीलिए तो वे नवीनता को जन्‍म दे सकते है।
      तथाकथित स्‍वस्‍थ दिमाग वाले लोग सुबह से रात तक परंपरागत जीवन ही जीते है। रात से सुबह तक, कुछ कहा ही नहीं जाना चाहिए—नहीं कि कहने में मुझे कुछ डर है। लेकिन मैं उनकी बात कर रहा हूं। वे आजीवन लकीर के फकीर बने रहते है और परंपरागत नियमों के आधार पर ही चलते है। वे कभी भी निधार्रित पथ से जरा भी इधर उधर नहीं होते।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--( सत्र--34 )

प्रोफेसर एस. एस. राय

      आज सुबह मैंने मस्‍तो से एकाएक विदा ली और दिन भर मुझे यह बात खटकती रही। कम से कम इस मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता इससे मुझे उस समय की याद आ गई जब मैं कई बरसों तक नानी के साथ रहने के बाद उनसे विदा लेकर कालेज जा रहा था।
      नानी की मृत्‍यु के बाद जब वे बिलकुल अकेली हो गई तो मेरे सिवाय उनके जीवन में और कोई न था। उनके लिए यह आसान न था और न ही मेरे लिए। मैं सिर्फ नानी के कारण ही उस गांव में रहता था। मुझे अभी तक सर्दी के मौसम की वह सुबह याद है जब गांव के लोग मुझे विदा देने के लिए एकत्रित हुए थे।
      आज भी मध्य भारत के उस भाग में आधुनिक युग का आगमन नहीं हुआ। अभी भी वह  कम से कम दो हजार बरस पिछड़ा हुआ है। किसी से पास कोई खास काम नहीं है। आवारागर्दी करने के लिए सबके पास काफी समय मालूम होता है। सचमुच हर आदमी आवारागर्द है। आवारागर्द से मेरा सीधा शाब्‍दिक अर्थ है जिसके पास कोई खास काम न हो। कोई और अर्थ मत समझना। तो सब आवारागर्द वहां पर जमा हो गए थे।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 33 )

 मस्‍तो का सितार बजाना—नानी का नवयौवना होना
      .के.। अभी उस दिन मैं तुम लोगों को मस्‍तो के गायब हो जाने के बारे में बता रहा था। मुझे लगता है कि वह अभी भी जीवित है। सच तो यह है कि मैं जानता हूं कि वह जीवित है। पूर्व में यह एक अति प्राचीन प्रथा है। मरने से पहले व्‍यक्‍ति हिमालय में खो जाता है। किसी और जगह रहने से तो इस सुंदर स्‍थल में मरना ज्‍यादा मूल्‍य बान है। वहां पर मरने में भी शाश्‍वतता का कुछ अंश है। इसका कारण शायद यह है कि हजारों वर्षों तक ऋषि मुनि वहां पर जो मंत्रोच्‍चार कर रहे थे। उसकी तरंगें अभी भी वहां के वातावरण में पाई जाती है। वेदों की रचना वहां हुई, गीता वहां लिखी गई। बुद्ध वहां पर जन्मे और मरे। लाओत्से भी अपने अंतिम दिनों में हिमालय में ही खो गया था। और मस्‍तो ने भी ऐसा ही किया।
      किसी को यह मालूम नहीं है कि लाओत्से मरा या नहीं। इसके बारे में निश्चय रूप से कोई कैसे कुछ कह सकता है। इसलिए जनश्रुति कहती है कि वह अमर हो गया। लेकिन लोगों को उसकी मृत्‍यु की कोई जानकारी नहीं है। अगर कोई चुपचाप बिलकुल एकांत में निजी ढंग से मरना चाहे तो यह उसका अधिकार है। वह ऐसा कर सके, ऐसा होना चाहिए।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—( 32 )

( भगवान )—मस्‍तो बाबा का उद्घोष

    मुझे सदा यह हैरानी होती है कि आरंभ से ही मेरे साथ कुछ ठीक हुआ है। किसी भी भाषा में ऐसा कोई मुहावरा नहीं है। कुछ गलत हो गया, जैसा मुहावरा तो पाया गया है। लेकिन कुछ ठीक हो गया जैसा मुहावरा है ही नहीं। पर मैं भी क्‍या कर सकता हूं। जब से मैंने पहली श्‍वास ली है तब से अब तक सब ठीक चलता रहा है। आशा है कि आगे भी यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा, क्‍योंकि यही उसका ढंग बन गया है।
      न जाने कितने लोगों ने अकारण ही मुझसे प्रेम किया है। लोगों का आदर उनके गुणों या योग्‍यता के कारण होता है। लेकिन मुझे तो लोगों ने मैं जैसा हूं वैसा ही होने के कारण प्रेम किया है। सिर्फ अभी ही ऐसा नहीं है—इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आरंभ से ही सब बातें पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ठीक घटती रही हैं। अन्‍यथा कैसे सब सही होगा।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—( 31 )

मस्‍तो बाबा से मिलन
      पागल बाबा अपने अंतिम दिनों में हमेशा कुछ चिंतित रहते थे। मैं यह देख सकता था, हालांकि उन्‍होंने कुछ कहा नहीं था, न ही किसी और ने इसका उल्‍लेख किया था। शायद किसी और को इसका अहसास भी नहीं था कि वे चिंतित थे। अपनी बीमारी, बुढ़ापा या आसन्‍न मृत्‍यु के बारे में तो निशचित ही उन्‍हें कोई फ़िकर नहीं थी। उनके लिए इनका कोई महत्‍व नहीं था।
      एक रात मैं जब उनके साथ अकेला था, मैंने उनसे पूछा, सच तो यह है कि मुझे आधी रात को उन्‍हें नींद से जगाना पड़ा, क्‍योंकि ऐसा कोई क्षण खोजना जब उनके पास कोई न हो बहुत ही कठिन था। उन्‍होंने मुझसे कहा, क्‍या बात है, अवश्‍य ही कोई बहुत महत्‍वपूर्ण बात होगी अन्‍यथा तुम मुझे न जगाते। मैंने कहा: हां, प्रश्‍न तो यही है, मैं देख रहा हूं कि थोड़ी चिंता की छाया ने आप को घेर लिया है। पहले तो यह कभी नहीं होती थी। आपका आभा मंडल सदा सुर्य के प्रकाश की तरह स्‍वच्‍छ और तेज रहा है। लेकिन अब मुझे थोड़ी सी छाया दिखाई देती है। यह मृत्यु तो नहीं हो सकती।  

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

स्वुर्णिम बचपन—(सत्र—30)

विजय भैया....मेरे लक्ष्‍मण थे
      मैं पागल बाबा और उन तीन बांसुरी वादकों के बारे में बता रहा था। जिनसे उन्‍होंने मुझे परिचित करवाया था। अभी भी वह याद बड़ी सुंदर और ताजा है। कि वे किस प्रकार से इन लोगों से मेरा परिचय कराते थे—विशेषत: उनसे जो बहुत सम्‍मानित थे, जिनको बहुत आदर दिया जाता था। सबसे पहले वे उनसे कहते, इस लड़के के पैर छुओ।
      मुझे याद है कैसे विभिन्‍न प्रकार से लोग प्रतिक्रिया करते थे। और बाद में हम दोनों कैसे हंसते थे। पन्‍ना लाल घोष को मुझसे परिचित करवाया गया था। कलकत्ता में, उनके अपने घर में। पागल बाबा उनके मेहमान थे और मैं पागल बाबा का मेहमान था। पन्‍ना लाल घोष बहुत प्रसिद्ध थे। और जब बाबा ने उनसे कहा कि पहले इस लड़के के पैर छुओ, उसके बाद ही मैं तुम्‍हें अपने पैर छूने दूँगा। तो वे एक क्षण के लिए तो झझके, फिर उन्‍होंने मेरे पैरों को छुआ तो जरूर लेकिन उसमें छूने का कोई भाव न था। पैरों को छूकर भी नहीं छुआ।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 29 )

    पागल बाब और रहस्‍य


      सारी रात हवा पेड़ों में से सरसराती हुई बहती रही। यह आवाज इतनी अच्‍छी लगी कि मैंने पन्‍ना लाल घोष के संगीत को सुना। उन बांसुरी वादकों में से जिनको पागल बाबा ने मुझसे परिचित करवाया था। अभी-अभी मैं उनके संगीत को सुन रहा था। उनका बांसुरी बजाने का ढंग अपना ही है। उनकी प्रस्‍तावना बहुत लंबी होती है। गुड़िया ने जब मुझे बुलाया तो अभी भूमिका ही चल रही था—मेरा मतलब है कि तब तक उन्‍होने अपनी बांसुरी को बजाना आरंभ नहीं किया था। सितार और तबला उनकी बांसुरी के बजने की पृष्‍ठभूमि तैयार कर रहे थे। पिछली रात शायद दो साल के बाद मैंने उनके संगीत को दुबारा सुनी।
      पागल बाबा की बात परोक्ष‍ रूप मैं ही करनी पड़ती है। उनकी यही विशेषता थी। वे सदा अदृश्‍य से ही बने रहते थे। उन्‍होंने मेरा परिचय अनेक संगीतज्ञों से कराया। और मैं सदा उन से पूछता था कि वे ऐसा क्‍यों करते है। वे कहते थे: ‘’ एक दिन तुम संगीतज्ञ बनोगें।‘’

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(28)

पन्‍न लाल घोष और सचदेवा
      अभी-अभी मैं फिर सुन रहा था—हरी प्रसाद चौरासिया को नहीं, बल्‍कि एक दूसरे बांसुरी वादक को। भारत मैं बांसुरी के दो आयाम है: एक दक्षिणी और दूसरा उत्‍तरी। हरी प्रसाद चौरासिया उत्‍तरी बांसुरी वादक है। मैं ठीक इसके उलटे, आयाम, दक्षिणी को सुन रहा था। इस आदमी से भी मेरा परिचय पागल बाबा ने ही करवाया था। मेरा परिचय देते हुए उन्‍होंने उस संगीतज्ञ से कहा: शायद यह तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा कि मैं इस लड़के से तुम्‍हारा परिचय क्‍यों करा रहा हूँ। अभी तो तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा, लेकिन शायद एक दिन प्रभु-इच्‍छा से तुम समझ जाओगे।
      यह आदमी भी वैसी ही बांसुरी बजाता है, लेकिन बिलकुल दूसरे ढंग से। दक्षिण की बांसुरी बहुत ही तीखी और भीतर चुभनें वाली होती है। वह सुनने वाले के अंतर को झकझोर देती है। उत्‍तर भारतीय बांसुरी बहुत ही मधुर होती है, लेकिन थोड़ी सपाट होती है—उत्‍तर भारत की तरह सपाट।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--( 27 )

पागल बाबा और हरी प्रसाद
      यहां आने से पहले मैं सुप्रसिद्ध बांसुरी वादकों में से एक, हरि प्रसाद की बांसुरी सुन रहा था। इससे बहुत सी यादें ताजा हो गई।
      संसार में अनेक प्रकार की बांसुरियां हैं। सबसे महत्‍वपूर्ण अरबी है और सबसे सुंदर है जापानी—ओर, और भी कई है। लेकिन भारत की छोटी सा बांस की बांसुरी की मधुरता की तुलना दुसरी कोई बांसुरी नहीं कर सकती। और बांसुरी वादक का जहां तक सवाल है तो उस पर तो हरि प्रसाद का पूर्ण अधिकार है। उन्‍होंने एक बार नहीं, कई बार मेरे सामने बांसुरी बजाईं है। जब कभी उनके भीतर पूरी तरह डूब कर, उच्‍चतम बांसुरी बजाने का भाव उठता तो मैं जहां कही भी होता वे वहां आ जाते—कभी-कभी तो हजारों मील का सफर तय करके मेरे पास पहुंचते, सिर्फ अकेले में घंटे भर मुझे जी भर कर अपनी बांसुरी सुनाने के लिए।
      मैने उनसे पूछा: हरि प्रसाद, आप अपनी बांसुरी कहीं भी बजा सकते हो। इतना लंबा सफर करने की क्‍या आवश्‍यकता है। और भारत में एक हजार मील पश्चिम के बीस हजार मील के बराबर है। भारतीय रेलगाड़ियाँ अभी भी दौड़ती नहीं,चलती है।