चौथा प्रवचन
अंतिम स्वर्ण सोपान: परम मौन
पहला प्रश्नः
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाःवृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
नासो धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेलानुविद्धम्।।
‘जिसमें वृद्ध नहीं हैं वह सभा नहीं है; जो धर्म को नहीं बतलाते वे वृद्ध नहीं हैं।
जिसमें सत्य नहीं है वह धर्म नहीं है; जिसमें छल मिला हुआ है वह सत्य नहीं है।’
महाभारत के इस सुभाषित पर कुछ कहने की कृपा करें।
सहजानंद, वृद्ध होना तो बहुत आसान है। कुछ न करो तो भी वृद्ध हो ही जाओगे। अधार्मिक भी वृद्ध हो जाता है, धार्मिक भी वृद्ध हो जाता है; पापी भी, पुण्यात्मा भी; साधु भी, असाधु भी। वृद्ध होना कोई कला नहीं है। पशु-पक्षी भी वृद्ध होते हैं, वृक्ष भी वृद्ध होते हैं, पहाड़-पर्वत भी वृद्ध होते हैं।
जैसे विंध्याचल पर्वत पृथ्वी का सबसे बूूढा पर्वत है..इतना कि उसकी कमर झुक गई है। उसकी झुकी कमर के कारण ही यह कहानी बनी कि अगस्त्य ऋषि दक्षिण गए, तब विंध्याचल ने झुक कर उनको नमस्कार किया। और वे कह गए कि जब तक मैं लौट न आऊं, तब तक तू झुका रहना। फिर वे लौटे नहीं, वे समाप्त ही हो गए। तब से बेचारा विंध्याचल झुका ही है। असलियत यह है कि विंध्याचल पृथ्वी पर सबसे बूढ़ा पर्वत है और हिमालय सबसे युवा।

