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शनिवार, 25 अगस्त 2018

एक नया द्वार-(प्रवचन-05)

पांचवां-प्रवचन-(सजग चेतना और शांत चित्त)

इंदौर, लायंस क्लब, दिनांक 8 मई, 1967, प्रातःकाल
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी चर्चा शुरू करूंगा।
यूनान में एक बड़ा मूर्तिकार हुआ। उसकी बड़ी दूर-दूर तक ख्याति थी। दूर देशों तक उसका नाम और उसकी कीर्ति पहुंच गई थी। उसकी मूर्तियां विश्व के सभी बाजारों में बिकी थीं, और शायद ही कोई राजमहल हो जहां उसकी मूर्तियां न पहुंची हों। बड़ी उसकी ख्याति थी, बड़ा उसका यश था। यश और ख्याति में वह भूल ही गया था, एक दिन मौत आ जाती है और सब नष्ट हो जाता है। एक दिन मौत आ गई।

मैंने कहा, कहानी है; सच्ची तो नहीं होती लेकिन कभी-कभी कहानियां ऐसे सत्य कह देती हैं जो जीवन में भी उपलब्ध नहीं होतीं। उसकी मौत आ गई। बड़ा कलाकार था और बड़ा मूर्तिकार था। आते हुए बुढ़ापे और मृत्य को देख कर उसने सोचा, मैं बचने का कोई उपाय करूं। मौत से किस भांति बचूं! एक सीधी सी बात जो उसे सूझ गई वह यह थी। उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तियां बना लीं और जिस दिन मौत उसके द्वार पर आई, वह उन ग्यारह मूर्तियों में छिप कर खड़ा हो गया। उसकी कुशलता इतनी अदभुत थी कि यह तय करना मुश्किल था कि कौन मूर्ति है और कौन मूल! असली आदमी कौन है उन बारह मूर्तियों में, खोजना कठिन था।

एक नया द्वार-(प्रवचन-04)

चौथा-प्रवचन-(पक्षपातों से मुक्त मन)

इंदौर, दिनांक 7 मई, 1967, प्रातःकाल।
बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। थोड़े से प्रश्नों की अभी चर्चा हो सकेगी।
एक मित्र ने पूछा है, ज्ञान मुक्ति है, ऐसा कहा गया है। लेकिन मैंने कहा, अज्ञान द्वार है। इसका क्या अर्थ है?
ज्ञान निश्चय ही मुक्ति है, लेकिन वह ज्ञान नहीं है जो दूसरों से हमें उपलब्ध होता है। जो ज्ञान मन के भीतर जन्मता है, मन की चेतना में आविर्भूत होता है, वह निश्चय ही मुक्ति है। लेकिन वह ज्ञान, जो हम दूसरों से स्वीकार करते हैं, शास्त्रों से, समाज से, परंपराओं से, वह ज्ञान मुक्ति तो दूर, वह ज्ञान ही मुक्ति के मार्ग में सब से बड़ी बाधा है। इसलिए मैंने कहा कि इसके पहले कि यह ज्ञान मिल सके जो मुक्त करता है, उस ज्ञान को छोड़ देना होगा जो कि परतंत्र करता है। असल में उस ज्ञान को ज्ञान कहना ही उचित नहीं है जो हम दूसरों से उधार इकट्ठा कर लेते हैं। लेकिन हमारा सारा ज्ञान ऐसा ही है।

कोई आदमी कुआं खोदता है तो कुआं खोदने में मिट्टी और पत्थर निकाल कर बाहर कर देने होते हैं। मिट्टी और पत्थर निकालता जाता है, खोदता जाता है, थोड़ी देर नीचे जलस्रोत उपलब्ध हो जाते हैं। जल तो नीचे मौजूद था, उसे कहीं से लाना नहीं पड़ा। लेकिन मिट्टी पत्थर से बीच में उन्हें अलग कर देना पड़ा। लेकिन दूसरा आदमी हौज बनाता है। वह मिट्टी-पत्थर खरीद के लाता है, उनकी दीवाल बनाता है और कहीं से पानी लाकर उसमें भर देता है। कुएं में भी पानी होता है, हौज में भी पानी होता है, लेकिन दोनों के पानी में जमीन-आसमान का भेद है।

एक नया द्वार-(प्रवचन-03)

तीसरा--प्रवचन-(चित्त की सरलता)

  इंदौर, दिनांक 6 मई, 1967, सायंकाल
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक अंधेरी रात में सौ ऊंटों का काफिला एक सराय में आकर ठहरा। कोई आधी रात बीत गई थी। काफिले के लोग थके हुए थे और उनका ठहर जाना जरूरी था। एक छोटी सी सराय में वे मेहमान गए। जब काफिले के लोग अपने ऊंटों को बांधने गए, उन्होंने खूंटियां गाड़ीं, रस्सियां बांधी, तो पाया कि सौ ऊंट हैं और केवल निन्यानवें को बांधने की व्यवस्था है। एक खूंटी और एक ऊंट की रस्सी कहीं राह में खो गई थी। उस ऊंट को खुला हुआ छोड़ना खतरनाक था। रात में वह कहीं भटक भी सकता था। तो वे सराय के मालिक के पास गए और उन्होंने कहा, हमारी एक खूंटी और रस्सियां खो गई हैं, निन्यानवें ऊंट बांध दिए गए, एक ऊंट बिना बंधा है। हम क्या करें? आपके पास खूंटी और रस्सी हो तो दे दें।

वह सराय बड़ी छोटी थी और उनके पास कोई भी सामान नहीं था। लेकिन उस बू.ढ़े आदमी ने कहाः तुम एक काम करो। जाओ, खूंटी गाड़ दो, रस्सी बांध दो और ऊंट को कहो कि बैठ जाओ। लेकिन उन लोगों ने कहाः वह तो हम समझे, लेकिन खूंटी कहां है, रस्सी कहां है? उस बू.ढ़े आदमी ने कहाः झूठी खूंटी ठोंक दो, लेकिन ठोकना जरूर। और झूठी रस्सी गले में बांध दो, लेकिन बांधना जरूर।

एक नया द्वार-(प्रवचन-02)

दूसरा-प्रवचन

विश्वास और धारणाएं हमारे बंधन

मेरे प्रिय आत्मन्!
कुछ प्रश्न मेरे सामने आए हैं। कल रात्रि मैंने आपसे कहा मनुष्य का मन जब तक सीखे हुए ज्ञान से मुक्त नहीं होता है तब तक वह उस ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकेगा जो कि स्वयं में ही सोया हुआ है। और जिसे बाहर से सीखने का कोई भी उपाय नहीं है। मनुष्य की चेतना में, मनुष्य की आत्मा में, मनुष्य के स्वयं के जीवन के केंद्र पर कोई शक्ति सोई हुई है, वह जागे तो ही सत्य का ज्ञान उपलब्ध हो सकता है। सत्य के ज्ञान को पाने के लिए बाहर से जो भी हम सीख लेते हैं वह सब बाधा बन जाती है, यह कल मैंने आपसे कहा। इस संबंध में ही कुछ प्रश्न हैं, पहले उनके आपको उत्तर दूं।


पूछा हैः हम यदि अर्जित ज्ञान को छोड़ दें, जो हमने सीखा है उसे यदि छोड़ दें, तो कहीं जड़ता और निष्क्रियता पैदा न हो जाए?

अर्जित ज्ञान को दो हिस्सों में बांट लेना जरूरी है। बाहर के जगत के संबंध में जो ज्ञान है वह तो अर्जित ज्ञान ही होगा। उस संबंध में जो हम पदार्थ के बाबत जानते हैं, संसार के संबंध में जानते हैं, उसे तो बाहर से ही पाना पड़ता है। जो ज्ञान बाहर के संबंध में है वह बाहर से ही उपलब्ध होता है। लेकिन जो ज्ञान स्वयं के संबंध में है वह बाहर से उपलब्ध नहीं होता है।

एक नया द्वार-(प्रवचन-01)

एक नया द्वार-(विविध)

पहला-प्रवचन

दूसरों के विचार और ज्ञान से मुक्ति

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी बात शुरू करना चाहूंगा।
एक अंधेरी रात में जब कि गांव के सारे लोग सोए थे, अचानक एक झोपड़े से जोर से आवाज उठने लगीः मेरे घर में आग लगी है, मैं आग में जल रही हूं। कोई स्त्री जोर से रो रही और चिल्ला रही थी। सोया हुआ गांव जाग गया, सोए हुए लोग उठे और उस झोपड़े की तरफ भागे। करीब-करीब सारा गांव उठ गया और झोपड़े के पास इकट्ठा हो गया। लेकिन आग तो दूर उस झोपड़े में एक दीये की रोशनी भी नहीं थी। घना अंधकार था। लेकिन भीतर से कोई रोए और चिल्लाए जा रहा थाः मेरे घर में आग लगी है, मैं जल रही हूूं।

लोगों ने द्वार खटखटाए, लोग द्वार खोल कर भीतर गए, कोई पास से लालटेन ढूंढ लाया, कोई बाल्टियों में पानी लेकर आ गए। भीतर पाया उस बूढ़ी औरत को जो चिल्लाती थी, उससे पूछा, कहां आग लगी है? हम बुझा दें, आग तो कहीं दिखाई नहीं पड़ती? वह बूढ़ी औरत हंसने लगी और उसने कहाः आग मेरे बाहर होती तो तुम बुझा भी सकते थे, आग मेरे भीतर लगी है।