पांचवां-प्रवचन-(सजग चेतना और शांत चित्त)
इंदौर, लायंस क्लब, दिनांक 8 मई, 1967, प्रातःकालमेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी चर्चा शुरू करूंगा।
यूनान में एक बड़ा मूर्तिकार हुआ। उसकी बड़ी दूर-दूर तक ख्याति थी। दूर देशों तक उसका नाम और उसकी कीर्ति पहुंच गई थी। उसकी मूर्तियां विश्व के सभी बाजारों में बिकी थीं, और शायद ही कोई राजमहल हो जहां उसकी मूर्तियां न पहुंची हों। बड़ी उसकी ख्याति थी, बड़ा उसका यश था। यश और ख्याति में वह भूल ही गया था, एक दिन मौत आ जाती है और सब नष्ट हो जाता है। एक दिन मौत आ गई।
मैंने कहा, कहानी है; सच्ची तो नहीं होती लेकिन कभी-कभी कहानियां ऐसे सत्य कह देती हैं जो जीवन में भी उपलब्ध नहीं होतीं। उसकी मौत आ गई। बड़ा कलाकार था और बड़ा मूर्तिकार था। आते हुए बुढ़ापे और मृत्य को देख कर उसने सोचा, मैं बचने का कोई उपाय करूं। मौत से किस भांति बचूं! एक सीधी सी बात जो उसे सूझ गई वह यह थी। उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तियां बना लीं और जिस दिन मौत उसके द्वार पर आई, वह उन ग्यारह मूर्तियों में छिप कर खड़ा हो गया। उसकी कुशलता इतनी अदभुत थी कि यह तय करना मुश्किल था कि कौन मूर्ति है और कौन मूल! असली आदमी कौन है उन बारह मूर्तियों में, खोजना कठिन था।

