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सोमवार, 11 जुलाई 2016

अमी झरत बि‍‍गसत कंवल--(प्रवचन--14)

अंतर जगत की फाग(प्रवचन—चौदहवां)
दिनांक 25 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—आधुनिक मनुष्य की सब से बड़ी कठिनाई क्या है?
2—साधु—संतों को देखकर ही मुझे चिढ़ होती है और क्रोध आता है। मैं तो उन में सिवाय पाखंड के और कुछ भी नहीं देखता हूं, पर आपने न मालूम क्या कर दिया के श्रद्धा उमड़ती है! आपका प्रभाव का रहस्य क्या है?
3भगवान! बुरे कामों के प्रति जागरण से बुरे काम छूट जाते हैं तो फिर अच्छे काम जैसे प्रेम, भक्ति के प्रति जागरण हो तो क्या होता है, कृपया इसे स्पष्ट करें।
4भगवान! प्रभु—मिलन में वस्तुतः क्या होता है? पूछते डरता हूं। पर जिज्ञासा बिना पूछे मानती भी नहीं। भूल हो तो क्षमा करें।

शनिवार, 2 जुलाई 2016

अमी झरत बिगसत कंवल—(प्रवचन—13)

अमी झरत बिगसत कंवल—(प्रवचन—तेरहवां)
दिनांक 23 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
      सारसूत्र:
नाम बिन भाव करम नहिं छूटै।।
साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतन लूटै।।
मल सेती जो मल को धोवै, सो माल कैसे छूटै।।
प्रेम का साबुन नाम का पानी, दोय मिल तांता टूटै।।
भेद अभेद भरम का भांडा, चौड़े पड़-पड़ फूटै।।
गुरमुख सब्द गहै उर अंतर, सकल भरम से छूटै।।
राम का ध्यान तूं धर रे प्रानी, अमृत का मेंह बूटै।।
जन दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै।।

गुरुवार, 30 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल--(प्रवचन--12)

नया मनुष्य—(प्रवचन—बारहवां)
दिनांक 22 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! मेरे आंसू स्वीकार करें। जा रही हूं आपकी नगरी से। कैसे जा रही हूं, आप ही जान सकते हैं। मेरे जीवन में दुख ही दुख था। कब और कैसे क्या हो गया, जो मैं सोच भी नहीं सकती थी; अंदर बाहर खुशी के फव्वारे फूटे रहे हैं! आपने मेरी झोली अपनी खुशियों से भर दी है, मगर हृदय में गहन उदासी है और जाने का सोचकर तो सांस रुकने लगी हैं। आप हर पल मेरे रोम-रोम में समाए हुए हैं। मुझे बल दें कि जब तक आपका बुलावा नहीं आता, मैं आपसे दूर रह सकूं।
2—मैं परमात्मा को पाना चाहता हूं, क्या करना आवश्यक है?

3—भगवान! आपके प्रवचन में सुना कि एक जैन मुनि आपकी शैली में बोलने की कोशिश करते हैं तोते की भांति। पर यह मुनि ही नहीं, बहुत-बहुत से महानुभवों को यह करते देख रहे हैं। चुपके-चुपके वे आपकी किताबें पढ़ते हैं, फिर बाहर घोर विरोध भी करते हैं। और बुरा तो तब बहुत लगता है जब आपके विचारों को अपना अहंकार बताते हैं, छपवाते हैं--फिर इतराते हैं। ऐसे तथाकथित प्रतिभाशालियों के पाखंड को सहा नहीं जाता तो क्या करें?
4—भगवान! आपको सुनते-सुनते आंसू क्यों बहने लगते हैं?

बुधवार, 29 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--11)

एक राम सारै सब काम—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)
दिनांक 21 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
आदि अनादी मेरा सांई।
द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माई।।
जो बनमाली सींचै मूल, सहजै पिवै डाल फल फूल।।
जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल सहज ही आवै।।
जो काई कर भान प्रकासै, तौ निस तारा सहजहि नासै।
गरुड़ पंख जो घर में लावै, सर्प जाति रहने नहिं पावै।।
दरिया सुमरै एक हि राम, एक राम सारै सब काम।।
आदि अंत मेरा है राम। उन बिन और सकल बेकाम।।

कहा करूं तेरा बेद पुरान।। जिन है सकल जगत भरमान।।
कहा करूं तेरी अनुभै-बानी। जिन तें मेरी सुद्धि भुलानी।।
कहा करूं ये मान बड़ाई। राम बिना सबही दुखदाई।।
कहा करूं तेरा सांख औ जोग। राम बिना सब बंदन रोग।।
कहा करूं इंद्रिन का सुक्ख। राम बिना देवा सब दुक्ख।।

मंगलवार, 28 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--10)

यह मशाल जलेगी—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 20 मार्च 1979, श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! आपने एक प्रवचन में कहा है कि भारत अपने आध्यात्मिक मूल्यों में गिरता जा रहा है। कृपया बताएं कि आगे कोई आशा की किरण नजर आती है?
2—भगवान! आज के प्रवचन में अणुव्रत की आपने बात की। मेरा जन्म उसी परिवार से है, जो आचार्य तुलसी का अनुयायी है। बचपन से ही आचार्य तुलसी के उपदेशों ने कभी हृदय को नहीं हुआ। अभी उन्होंने अपना उत्तराधिकारी आचार्य मुनि नथमल को आचार्य महाप्रज्ञ नाम देकर बनाया है। वे ठीक आपकी स्टाइल में प्रवचन देते हैं मगर उन्होंने भी कभी हृदय को नहीं छुआ। और आपके प्रथम प्रवचन को सुनते ही आपके चरणों में समर्पित होने का भाव पूरा हो गया और समर्पण कर दिया।

3—मैं दुख से इतना परिचित हूं कि सुख का मुझे भरोसा ही नहीं आता। एक दुख गया कि दूसरा आया, बस ऐसे ही सिलसिला चलता रहता है। क्या कभी मैं सुख के दर्शन पा सकूंगा? मार्ग दिखाएं कि सुख पाने के लिए क्या करूं? मैं सब कुछ करने को तैयार हूं।
4—भगवान! मुझे वह इक नजर, इक जाविदानी सी नजर दे दे, बस एक नजर जो अमृत के पहचान ले।

रविवार, 26 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--09)

मेरे सतगुर कला सिखाई—(प्रवचन—नौवां)
दिनांक 16 मार्च, 1079;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
जाके उर उपजी नहिं भाई। सो क्या जानै पीर पराई।।
ब्यावर जाने पीर की सार। बांझ सर क्या लखे बिकार।।
पतिव्रता पति को ब्रत जानै। बिभचारिन मिल कहा बखानै।।
हीरा पारख, जौहारि पावै। मूरख निरख के कहा बतावै।।
लागा घाव कराहै सोई। कोतगहार के दर्द न कोई।।
रामनाम मेरा प्रान—अधार। सोइ रामरस—पीवनहार।।
जन दरिया जानेगा सोई। प्रेम की भाल कलेजे पोई।।
जो धुनियां तौ मैं भी राम तुम्हारा।

अधम कमीन जाति मतिहीना तुम तौ हौ सिरताज हमारा।।
काया का जंत्र सब्द मन मुठिया सुषमन तांत चढ़ाई।।
गगन—मंडल में धुनुआं बैठा सतगुर कला सिखाई।।
पाप—पान हरि कुबुधि—कांकड़ा सहज सहज झड़ जाई।।
घुंडी गांठ रहन नहिं पावै इकरंगी होय आई।।
इकरंग हुआ भरा हरि चोला हरि कहै कहा दिलाऊं।।
मैं नाही केहनत का लोभी बकसो मौज भक्ति निज पाऊं।।
किरपा करि हरि बोले बानी तुम तौ हौ मन दास।।
दरिया कहै मेरे आतम भीतर मेली राम भक्ति—बिस्तास।।

शनिवार, 25 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--08)

सृजन की मधुर वेदना—(प्रवचन—आठवां)
दिनांक १८ मार्च, १९७९;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! संतों के अनुसार वैराग्य के उदय होने पर ही परमात्मा की ओर यात्रा संभव है और आप कहते हैं कि संसार में रहकर धर्म साधना संभव है। इस विरोधाभास पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।
2—भगवान! कभी झील में उठा कंवल देख आंदोलित हो उठता हूं, कभी अचानक कोयल की कूक सुन हृदय गदगद हो आता है, कभी बच्चे की मुसकान देख विमुग्ध हो जाता हूं। तब ऐसा लगता है जैसे सब कुछ थम गया; न विचार न कुछ। भगवान, लगता है ये क्षण कुछ कुछ संदेश लाते हैं, वह क्या होगा?

3—भगवान! यह शिकायत मत समझना, आपकी एक जिंदादिल भक्त की प्रेम—पुकार है।
आपसे दूर रहकर दिल पर क्या गुजरती है वह आप ही समझ सकेंगे।
दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं,
हमने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते हैं,
एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं।
बीत गया सावन का महीना मौसम ने नजरें बदलीं
लेकिन इन प्यासी आंखों से अब तक आंसू बहते हैं,
जिनके खातिर शहर भी छोड़ा जिनके लिए बदनाम हुए
आज वही हमने बेगाने से रहते हैं।

शुक्रवार, 24 जून 2016

अमी झरत बिगसत कंवल--(प्रवचन--07)

जागे सो सब से न्यारा—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 17 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:  
सब जग सोता सुध नहिं पावै। बोलै सो सोता बरड़ावै।।
संसय मोह भरम की रैन। अंधधुंध होय सोते अन।।
तीर्थ-दान जग प्रतिमा-सेवा। यह सब सुपना लेवा-देवा।।
कहना सुनना हार औ जीत। पछा-पछा सुपनो विपरती।।
चार बरन औ आस्रम चार। सुपना अंतर सब ब्यौहार।।
षट दरसन आदि भेद-भाव। सपना अंतर सब दरसाव।।
राजा राना तप बलवंता। सुपना माहीं सब बरतंता।।
पीर औलिया सबै सयाना। ख्याब माहिं बरतै बिध नाना।।
काजी सैयद औ सुलतान। ख्याब माहिं सब करत पयाना।।

गुरुवार, 23 जून 2016

अमीत झरत बिगत कंवल--(प्रवचन--06)

अपने माझी बनो—(प्रवचन—छठवां)
दिनांक 16 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
      प्रश्‍नसार:
1—भगवान! उपनिषद कहते हैं कि सत्य को खोजना खड्ग की धार पर चलने जैसा है। संत दरिया कहते हैं कि परमात्मा की खोज में पहले जलना ही जलना है। और आप कहते हैं कि गाते नाचते हुए प्रभु के मंदिर की और आओ। इन में कौन सा दृष्टिकोण सम्यक है?
2—वो नगमा बुलगुले रंगी नवा इक बार हो जाए।
कली की आंख खुल जाए चमन बेदार हो जाए।।
3—भगवान! आपको सुनता हूं तो लगता है कि पहले भी कभी सुना है। देखता हूं तो लगता है कि पहले भी कभी देखा है। वैसे मैं पहली ही बार यहां आया हूं, पहली ही बार आपको सुना और देखा है। मुझे यह क्या हो रहा है?
4—आप कुछ कहते हैं, लोग कुछ और ही समझते हैं! यह कैसे रुकेगा?
5—आपका मूल संदेश क्या है?

बुधवार, 22 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल--(प्रवचन--05)

जागे में फिर जागना—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक १५ मार्च, १९७९;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
तज बिकार आकार तज, निराकार को ध्यान।
निराकार में पैठकर, निराधार लौ लाय।।
प्रथम ध्यान अनुभौ करै, जासे उपजै ग्यान।
दरिया बहुत करत हैं, कथनी में गुजरान।।
पंछी उड़ै गगन में, खोज मंडै नहिं मांहिं।
दरिया जल में मीन गति, मारग दरसै नहिं।।
मन बुधि चित पहुंचै नहीं, सब्द सकै नहिं जाय।
दरिया धन वे साधवा, जहां रहे लौ लाय।।
किरकांटा किस काम का, पलट करे बहुत रंग।

शुक्रवार, 17 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल–(प्रवचन–04)

संसार की नींव, संन्यास के कलश—(प्रवचन—चौथा)
दिनांक 14 मार्च 1979;
श्री रजनीश, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! खाओ, पियो और मौज उड़ाओ--चार्वाकों का यह प्रसिद्ध संसार-सूत्र है। नाचो, गाओ और उत्सव मनाओ--यह आपका संन्यास सूत्र है। संसार सूत्र और संन्यास सूत्र के इस भेद को कृपा कर के हमें समझाएं।
2—बंबई के एक गुजराती भाषा के पत्रकार और लेखक श्री कांति भट्ट ने कृष्णमूर्ति के प्रवचन में आए हुए बंबई के लोगों को बुद्धिमत्ता का अर्क कहा है। श्री कांति भट्ट आपसे भी बंबई में मिल चुके हैं और यहां आश्रम में भी आए थे। लेकिन उन्होंने आपके पास आने वाले लोगों को कभी बुद्धिमान नहीं कहा। आप इस बाबत कुछ कहने की कृपा करेंगे।
3—संतों की वीणा में इतना रस किस स्रोत से आता है? और संतों की वाणी से इतनी तृप्ति और आश्वासन क्यों मिलता है?

गुरुवार, 16 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल–(प्रवचन–03)

बिरहिन का घर बिरह में—(प्रवचन—तीसरा)
दिनांक 13 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सारसूत्र:
दरिया हरि करिपा करी, बिरहा दिया पठाय।
यह बिरहा मेरे साध को सोता लिया जगाए।
दरिया बिरही साध का, तन पीला मन सूख।
रैन न आवै नींदड़ी, दिवस न लागै भूख।।
बिरहिन पिउ के कारने, ढूंढन बनखंड जाए।
निस बीती, पिउ ना मिला, दरद रही लिपटाय।।
बिरहिन का घर बिरह में, ता घट लोहु न मांस।
अपने साहब कारने, सिसकै सांसों सांस।

बुधवार, 15 जून 2016

अमीत झरत बीसगत कवंल--(प्रवचन--02)

कितना है जीवन अनमोल—(प्रवचन—दूसरा)
दिनांक 12 मार्च, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार—
1—भगवान! णमो णमो भगवान, फिर—फिर भूले को, चक्र में पड़े को शब्द की गूंज से, जागृति की चोट से, ज्ञानियों की व्याख्या से; विवेक स्मृति, सुरति, आत्म—स्मरण और जागृति की गूंज से फिर चौंका दिया भगवान! णमो णमो भगवान!
2—मानव जीवन की संतों ने इतनी महिमा क्यों गायी है?
3—जीवन सत्य है या असत्य?
4—भगवान! बलिहारी प्रभु आपकी
अंतर—ध्यान दिलाय।

मंगलवार, 14 जून 2016

अमी झरत बिसगत कंवल--(प्रवचन--01)

नमो नमो हरि गुरु नमो—(पहला—प्रवचन)
 
दिनांक 11 मार्च, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र—
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो नमो सब संत।
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत।।
दरिया सतगुर सब्द सौं, मिट गई खैंचातान।
भरम अंधेरा मिट गया, परसा पद निरबान।।
सोता था बहु जन्म का, सतगुरु दिया जगाय।
जन दरिया गुर सब्द सौं, सब दुख गये बिलाय।।
रात बिना फीका लगै, सब किरिया सास्तर ग्यान।
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान।।

दरिया नरत्तन पायकर, कीया चाहै काज।
राव रंक दोनों तरैं, जो बैठैं नाम—जहाज।।
मुसलमान हिंदू कहा, पट दरसन रंक राव।
जन दरिया हरिनाम बिन, सब पर जम का दाव।।

अमी झरत बिगसत कंवल—(दरिया)

अमी झरत बिगसत कंवल—(दरिया दास )


(ओशो द्वारा संत दरिया वाणी पर दिये गये 14 प्रवचनों का अमृत संकलन)
11,मई 1979 tसे 24, मई  1979 पूना ओशो   
नमो नमो हरि गुरु नमो, नमो नमो सब संत। 
जन दरिया बंदन करै, नमो नमो भगवंत।।
दरिया कहते हैं: पहला नमन गुरु को। और गुरु को हरि कहते हैं। नमो नमो हरि गुरु नमो! यह दोनों अर्थों में सही है। पहला अर्थ कि गुरु भगवान है और दूसरा अर्थ कि भगवान ही गुरु है। गुरु से बोल जाता है, वह वही है जिसे तुम खोजने चले हो। वह तुम्हारे भीतर भी बैठा है उतना ही जितना गुरु के भीतर लेकिन तुम्हें अभी बोध नहीं, तुम्हें अभी उसकी पहचान नहीं। गुरु के दर्पण में अपनी छवि को देखकर पहचान हो जाएगी। गुरु तुमसे वही कहता है जो तुम्हारे भीतर बैठा फिर भी तुमसे कहना चाहता है। मगर तुम सुनते नहीं।