धर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते है जिनमें बुद्धि नाममात्र को नहीं है। अस सिर्फ मूढ़ ही पाए जाते है मंदिरों में, मसजिदों में। जिसमें थोड़ा भी सोच विचार है, वहां से कभी का विदा हो चुका है। क्योंकि जिसमें थोड़ा-सोचविचार है, उसे दिखाई पड़ेगा कि धर्म ने नाम से जो चल रहा है वह धर्म नहीं, राजनीति है। कुछ और है।
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शनिवार, 28 जनवरी 2012
बुधवार, 25 मई 2011
(ओशो )--- आप अपनी आत्म कथा क्यों नहीं लिखते?—
यह सवाल ठीक है कि मैं अपनी आत्म कथा क्यों नहीं लिखता। यह बहुत मजेदार बात है। असल में आत्मा के जानने के बाद कोई आत्म कथा नहीं होती। और सब आत्म कथाएं अहंकार कथाएं है। आत्म कथाएं नहीं है, एगो-ग्राफीज है। पहला तो यह कि जिसे हम कहते है आत्म-कथा वह आत्म-कथा नहीं है। क्योंकि जब तक आत्मा का पता नहीं है तब तक जो भी हम लिखते है वह ईगो-ग्राफी है। वह अहम-कथा है।
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
भौतिक समृद्धि ओर आध्यात्मिक खोज--
क्या भौतिक समृद्धि के साथ-साथ अध्यात्मिक खोज नहीं चल सकती?
दोनों में कोई भी विरोध नहीं है। आध्यात्मिक विकास और भौतिक समृद्धि साथ-साथ चल सकते है। बस एक बात याद रखनी चाहिए कि भौतिक समृद्धि दास बनी रहे और आध्यात्मिक साधना स्वामी के स्थान पर रहे। किसी भी बिंदु पर भौतिक समृद्धि के लिए आध्यात्मिक विकास को बलि पर मत चढ़ाना।
गुरुवार, 17 मार्च 2011
सिद्घपुरुष और संबोधी व्यक्ति में भेद—
सिद्ध पुरूष—में वह सारी शक्तियां जिनकी योग बात करता है, और पतंजलि बात करेंगे जिनके बारे में—वे उसे आसानी से उपलब्ध होंगी। वह चमत्कारों से भरा होगा; उसका स्पर्श चमत्कारिक होगा। कोई भी चीज संभव होगी क्योंकि उसके पास निन्यानवे प्रतिशत विधायक मन होता है। विधायकता एक सामर्थ्य है, एक शक्ति है। वह बहुत शक्तिशाली होगा। लेकिन फिर भी वह संबोधी को उपलब्ध तो नहीं है। और वास्तविक बुद्ध की अपेक्षा इस व्यक्ति को तुम आसानी से बुद्ध कहना चाहोगे। क्योंकि संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति तो तुम्हारे पार ही चला जाता है। तुम नहीं समझ सकते उसे; वह अगम्य हो जाता है।बुधवार, 9 मार्च 2011
गुरु की खोज—
गुरु की खोज जितनी सरल और सहज हम समझते है। शायद उतनी आसान नहीं है। गुरु की खोज एक प्रतीक्षा है। और गुरु तुम्हें दिखाया नहीं जा सकता। कोई नहीं कह सकता,’’यहां जाओ और तुम्हें तुम्हारा सद्गुरू मिल जायेगा। तुम्हें खोजना होगा, तुम्हें कष्ट झेलना होगा, क्योंकि कष्ट झेलने और खोजने के द्वारा ही तुम उसे देखने के योग्य हो जाओगे। तुम्हारी आंखे स्वच्छ हो जायेगी। आंसू गायब हो जायेगे। तुम्हारी आंखों के आगे आये बादल छंट जायेंगे और बोध होगा कि यह सद्गुरू है।मंगलवार, 8 मार्च 2011
हंसी कि छ: कोटियां—
भगवान बुद्ध ने एक बार सारिपुत्र से कहां की तुम हंसी पर ध्यान के देखो और मुझे बतलाओ हंसी कितने प्रकार की होती है। सारिपुत्र ने पुरा विवरण बुद्ध भगवान को दिया। सारिपुत्र के पहले और सारिपुत्र के बाद कभी भी किसी ने हंसी को इतनी गहराई से नहीं समझा। सारिपुत्र ने हंसी के छह कोटियों में विभक्त किया। जिसमें हंसी की महिमा के सभी अच्छे और बुरे रूपों को वर्णन किया है। सारिपुत्र के सामने हास्य ने अपना पूरा रूप उद्घाटित कर दिया।
1—सिता
2—हंसिता
3—विहंसिता
4—उपहंसिता
5—अपहंसिता
6—अतिहंसिता
सोमवार, 31 जनवरी 2011
आदमी की प्रौढ़ता और ध्यान--
आदमी अकेला प्राणी है, जिसको प्रौढ़ होने में बहुत समय लगता है। कुत्ते का बच्चा पैदा होता है; कितनी देर लगती है प्रौढ़ होने में? घोड़े का बच्चा पैदा होता है; कितनी देर लगता है प्रौढ़ होने में? घोड़े का बच्चा पैदा होते ही चलने लग जाता है। प्रौढ़ हो गया। प्रौढ़ पैदा ही होता है। सिर्फ आदमी का बच्चा असहाय पैदा होता है। उसको प्रौढ़ होने में बीस-पच्चीस साल लग जाते है। पच्चीस साल का हो जाता है तब भी मां-बाप डरे रहते है कि अभी चल सकता है अपने पैरों पर। इतना लंबा समय मनुष्य को क्यों लगता है। प्रौढ़ होने के लिए?
धन-शक्ति का संचित रूप है—
धन-धन नहीं है। धन एक शक्ति का संचित रूप है। एक रूपया आपकी जेब में पडा है तो सिर्फ वह रूपया नहीं है, शक्ति संचित पड़ी है। इसका आप तत्काल उपयोग कर सकते है। जो आदमी अकड़ कर जा रहा था। उसको रूपया दिखा दीजिए, वह झुक जायेगा। वह रात भर आपके पैर दबायेगा। उस रूपए में वह आदमी छीपा था। जो रात भर पैर दबा सकता है। रूपये की इतनी दौड़ रूपए के लिए नहीं हे। रूपया तो संचित शक्ति है। कनड़ेंस्ड पावर। और अद्भुत शक्ति है। क्योंकि अगर आप एक तरह की शक्ति इकट्ठी कर लें तो आप दूसरी शक्ति में नहीं बदल सकते। रूपया बदला जा सकता है। एक रूपया आपकी जेब में पडा है, चाहे आप किसी से पैर दबाओ,चाहे किसी से सर पर मालिश करा लो। चाहे किसी से कहें कि पाँच दफे उठक-बैठक करो। उसके हजार उपयोग है। अगर आपके पास एक तरह की शक्ति है तो वे एक ही तरह की है, उसका एक ही उपयोग हे। रूपया अनंत आयामी है।
रविवार, 30 जनवरी 2011
अरविंद का आजादी में योगदान—गांधी जी से अधिक
श्री अरविंद को किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष की आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब छोड़कर आप पांडिचेरी में बैठ गए आँख बंद करके। वर्ष में एक बार आप निकलते है दर्शन देने को। आप जैसा संघर्षशील, तेजस्वी, व्यक्ति जो जीवन के घनेपन में खड़ा था और जीवन को रूपांतरित कर रहा था, वह अचानक इस भांति पलायनवादी होकर अंधेरे में क्यों छिप गया?इस सदी का बड़ा चमत्कार—
चीन का कम्यूनिज़म का हमला भंयकर है। न केवल चीन में, बल्कि तिब्बत से भी सारी संभावनाओं को विनाश करने की चेष्टा चीन ने की है। तिब्बत में भी लाओत्से और बुद्ध को मान कर चलने वाला एक वर्ग था। शायद पृथ्वी पर अपने तरह का अकेला ही मुल्क था तिब्बत, जिसको हम कह सकते है पूरा का पूरा देश एक आश्रम था। जहां धर्म मूल था, बाकी सब चीजें गोण थी।
शनिवार, 29 जनवरी 2011
स्वर्ग-पृथ्वी आलिंगन—और कैंसर
स्वर्ग और पृथ्वी–लाओत्से के लिए प्रतीक है। आपके भीतर भी दोनों हैं, आपके भीतर स्वर्ग ओर पृथ्वी दोनों है। और जब आप अपने स्वभाव के अनुकूल चल रहे होते है, तब स्वर्ग और पृथ्वी के आलिंगन में होते है। जब आप कुछ और होने की कोशिश कर रहे होते है। जो कि आपकी नियति नहीं है, तब आपकी परिधि और आपके केंद्र का संबंध टूट जाता है।
गुरुवार, 27 जनवरी 2011
गुरु की खोज—
हम बड़े मजेदार लोग है। हम में से अनेक लोग गुरु को खोजते फिरते है। पूछो कहां जा रहे हो, वो कहते है हम गुरु की खोज कर रहे है। आप कैसे गुरु की खोज करिएगा? आपके पास कोई मापदंड, कोई तराजू है? आप तौलिएगा कैसे कि कौन गुरु आपका? और अगर आप इतने कुशल हो गए है कि गुरु की भी जांच कर लेते है, तो अब बचा क्या है ?
बुधवार, 26 जनवरी 2011
महात्मा गांधी और हरिदास—
आप क्यों सुधारने के लिए इतने दीवाने है। ओर अगर किसी ने नही सुधरना है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते हो। इस दुनियां में किसी को जबरदस्ती ठीक करने का कोई उपाय नही है। जबरदस्ती ठीक करने की कोशिश उसको ओर जड़ कर सकती है। कई बार तो बहुत अच्छे बाप भी बहुत बुरे बेटों के कारण हो जाते है। महात्मा गांधी के लड़के सुधारने का बदला लिया है। अब महात्मा गांधी से अच्छा बाप पाना मुश्किल है। बहुत कठिन है। अच्छा बाप का जो भी अर्थ हो सकता है, वह महात्मा गांधी में पूरा है। लेकिन हरिदास के लिए बुरे बाप सिद्ध हुए। क्या कठिनाई हुई?सोमवार, 24 जनवरी 2011
महाभारत में एटम का विस्फोट—
अगर महाभारत पढ़ें, और महाभारत में जो युद्ध का विवरण है, पहली दफा जब हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिरा तो जो दृश्य बना, उस दृश्य का विवरण पूरा का पूरा महाभारत में है। उसके पहले तो कल्पना थी। महाभारत में जो बात लिखी थी।/ तब तो यही सोचा था कवि का ख्याल है। लेकिन जब हिरोशिमा में एटम गिरा और धुँऐ का बादल उठा और वृक्ष की तरह आकाश में फैला; नीचे जैसे वृक्ष की पीड़ होती है,
शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
शराब और कामवासना—
तो हम तो आपने को एक मादक बिन्दु बनाना चाहते है। जिसमें चारों तरफ, जिसके व्यक्तित्व में शराब हो और खींच ले। और महावीर कहते है कि जो दूसरे को खींचने जायेगा, वह पहले ही दूसरों से खिंच चुका है। जो दूसरों के आकर्षण पर जीयेगा वह दूसरों से आकर्षित है। और जो अपने भीतर मादकता भरेगा, बेहोशी भरेगा, लोग उसकी तरफ खीचेंगें जरूर,लेकिन वह अपने को खो रहा है और डूबा रहा है। और एक दिन रिक्त हो जायेगा, आरे जीवन के अवसर से चूक जायेगा।
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
पांचवी--पद्म लेश्या
शनिवार, 25 दिसंबर 2010
छ: लेश्याएं—ओर मनुष्य के चित के प्रकार(भाग-1)
कृष्ण, नील, कापोत—ये तीन अधर्म लेश्याएं है। इन तीनों से युक्त जीव दुर्गति में उत्पन्न होता है।
कृष्ण लेश्या—
तो पहले समझें कि लेश्या क्या है? ऐसा समझें कि सागर शांत है। कोई लहर नहीं है, फिर हवा का एक झोंका आजा है, लहरें उठनी शुरू हो जाती है, तरंगें उठती है। सागर डांवांडोल
हो जाता है, छाती अस्त वस्त हो जाती है। सब अराजक हो जाता है। उन लहरों का नाम लेश्या है। तो लेश्या का अर्थ हुआ चित की वृतियां।
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
मैंने स्वयं को भगवान घोषित क्या किया?
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
वृक्षों भी संवेगों और भावनाएँ महसूस करना—
वृक्षों के संवेगों पर, भावनाओं पर। वह बड़ा हैरान करने वालो प्रयोग हुआ। पहले किसी नह सोचा भी नहीं था कि वृक्षों में संवेग हो सकते है। महावीर के बाद जगदीश चंद्र बसु तक बात ही भूल गई थी। फिर जगदीश चंद्र बसु ने थोड़ा बात उठाई कि वृक्षों में जीवन है। लेकिन बसु भी धीरे-धीरे विस्मृत हो गए। विज्ञान से यह बात ही खो गई। इसकी चर्चा ही बंद हो गई।
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