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शनिवार, 28 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(सत्र—26)

यायावर

      मुझे चक्‍करों में जाना पड़ेगा—चक्‍कर के भीतर चक्‍कर, चक्‍कर के भीतर चक्‍कर, क्योंकि जीवन ऐसा है। और खासकर मेरे लिए। पचास वर्षो में मैंने कम से कम पचास जीवन जी लिए है। जीने के अतिरिक्‍त मैंने और कुछ किया ही नहीं है? और लोगों को तो बहुत काम धंधे है, लेकिन मैं तो बचपन से ही यायावर रहा, कुछ नहीं करता था, सिर्फ जिया। जब तुम कुछ नहीं करते, सिर्फ जीते हो तो जीवन का आयाम बदल जाता है। यह सपाट नहीं चलता, उसमें गहराई आ जाती है।
      देव गीत, अच्‍छा हुआ कि तुम कभी मेरे छात्र न थे, नहीं तो तुम कभी डेंटिस्‍ट न बन पाते। मैं तुम्‍हें कभी प्रमाणपत्र न देता। लेकिन यहां पर तुम हंस सकते हो यह सोच कर कि मैं आराम से बैठा हूं और कोई समस्‍या नहीं है। लेकिन याद रखो कि अगर में मर भी जांऊ तो भी तुम्‍हारे ऊपर चिल्‍लाने के लिए में कब्र से उठ कर आ सकता हूं। जीवन भर मैं यहीं तो करता रहा हूँ।

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(सत्र--25)

   शब्‍दों की अभिव्‍यक्‍त

      मैं बर्ट्रेड रसल को उद्धृत की रहा था—इस उद्धरण से मेरी बात को पुष्टि होगी उसने कहा है कि देर-अबेर सब लोगों को मनोविश्लेषण की आवश्यकता होगी। क्‍योंकि तुम्‍हारी बात सुनने के लिए या तुम पर ध्‍यान  देने के लिए किसी को खोजना बहुत कठि‍न हो गया है।
      और सब चाहते है कि उनकी और ध्‍यान दिया जाए। इसके लिए वे पैसे देने को भी तैयार है। कि‍ कोई मेरी बात को ध्यान से सुनें। भले ही सुनने वाले ने कानों में रूई डाल रखी हो। कोई मनोविश्लेषण दिन-रात मरीजों की बकवास को नहीं सुन सकता। फिर उसकी भी यही आवश्‍यकता है कि कोई दूसरा उसकी बातें सुने।
      तुम्‍हें जान कर आश्‍चर्य होगा कि सब मनोविश्लेषण एक दूसरे के पास जाते है। अपने पेशे के शिष्‍टाचार के कारण वे एक दूसरे से पैसे नहीं लेते। दिमाग पर जो बोझ इक्‍कठ्ठा हो जाता है। उसे उतारना जरूरी होता है। नहीं तो वह परेशान कर देता है।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

स्वनर्णिम बचपन--(सत्र—24)

फ्रेंंडशिप या मित्रता से उंचा प्रेम:
में तुम्हें फ्रेंडशिप, मित्रता, प्रेम से ऊंची है। किसी ने पहले ऐसा नहीं कहा। और मैं यह भी कहता हूं कि फ्रेंडशिप,मैत्री, मित्रता से भी ऊंची है। किसी ने यह भी कहा। निश्चित ही मुझे यह समझाना पड़ेगा।   
      प्रेम कितना भी सुंदर हो, इस धरातल के ऊपर नहीं उठता। यह पेड़ की जड़ों के समान है। प्रेम अपनी अंतर्निहित विशेषताओं तथा अन्‍य अंशों—शरीर—के साथ धरती के उपर उठने की कोशिश करता है। तो लोग कहते है कि वह प्रेम में गिर गया। अंग्रेजी में कहा जाता है कि फॉलन इन लव। जहां त‍क मुझे मालूम है, सब भाषाओं में प्रेम के लिए इन्‍हीं शब्‍दों का प्रयोग होता है। इसके बारे में अनेक देशों के लोगों से पूछ ताछ कि है मैंने। मैंने सभी दुतावासों को पत्र लि‍ख कर पूछा कि क्‍या उनकी भाषा में भी प्रेम में उठना जैसा शब्‍दों का प्रयोग है। उन सबने कहां नहीं, ऐसे पागलों को कोन उत्तर देगा जो ये पूछ रहा है प्रेम में उठना जैसा मुहावरा है।

रविवार, 22 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(सत्र—23)

  एकाकीपन या अकेलापन
     
      मैं तुम्‍हें बता रहा था एक विशेष संबंध के बारे में जो एक करीब नौ साल के बच्‍चे और शायद  पचास वर्ष के प्रौढ़ व्‍यक्ति में घटा। दानों की आयु में अंतर था, लेकिन प्रेम सब प्रकार की रुकावटों को पार कर जाता है। अगर चह पुरूष और स्‍त्री के बीच घट सकता है तो दूसरी इससे बड़ी क्‍या रूकावट और क्‍या हो सकती है। लेकिन इस संबंध को ‘प्रेम’ नहीं कहा जा सकता और यह था भी नहीं। मुझे अपना बेटा या पोता समझ कर भी प्रेम कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं था।
      जो घटा वह फ्रेंडलीनेस, मैत्री थी। और इस बात को रिकार्ड कर लो, मैं फ्रेंडलीनेस, मैत्री को प्रेम से कहीं अधिक मूल्‍य देता हूं। मैत्री, फ्रेंडलीनेस से ऊँचा और कुछ नहीं है। तूम लोगों ने देखा होगा कि मैंने फ्रेंडशिप मित्रता शबद का प्रयोग नहीं किया। कल तक तो इसका प्रयोग कर रहा था। लेकिन अब समय आ गया है जब मैं तुमको फ्रेंडशिप, मित्रता से भी कहीं महान फ्रेंडलीनेस, मैत्री के बारे में बताऊ।

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(सत्र—22)

सत्र-22  शंभु बाबू से अंतिम बिदाई 

      आज सुबह मैंने कार्ल‍ गुस्ताव जुंग के शब्‍द  सिन्‍क्रॉनिसिटी का उल्‍लेख किया था। मुझे वह आदमी अच्‍छा नहीं लगता, लेकिन उसने जिस नए शब्‍द को चालू किया वह मुझे बहुत पसंद है। उसके लिए तो उसकेा हर संभव श्रेय मिलना चाहिए। और किसी भी भाषा में सिन्‍क्रॉनिसिटी जैसे शब्‍द नहीं है। सब शब्‍द न किसी के द्वारा तो बराए ही गए है। इसलिए किसी शब्‍द के गढ़ने में कोई बुराई तो नहीं है। विशेषत: तब वह शब्‍द किसी ऐसे अनुभव को अभिव्‍यक्‍त करता हो जिसको सदियों से कोई नाम न दिया गया हो। केवल इस एक शब्‍द, सिन्‍क्रॉनिसिटी  के लिए जुंग को नोबल पुरस्‍कार मिलना चाहिए था। हालांकि था तो एक दम अति साधारण। परंतु जब इतने सारे साधारण लोगों को नोबल पुरस्‍कार मिला है तो एक को और मिल जाता तो इसमें क्‍या गलत था। और वे नोबल पुरस्‍कार तो मरणोपरांत भी देते है तो कृपया इस बेचारे कार्ल गुस्‍ताव जुग को भी नोबल पुरस्‍कार दे दो। मैं मजाक नहीं कर रहा। इस शबद के लिए मैं सचमुच आभारी हूं, क्‍योंकि मनुष्‍य की बुद्धि इसको कभी ठीक से नहीं पकड़ पाई, यह सदा उसकी समझ के बाहर रहा है।

बुधवार, 18 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—08

ब्राह्मण की चोटी काटना
    मेरे बचपन में—क्‍योंकि उसके बारे में मैं तुमसे अधिक अधिकार पूर्वक बात कर सकता हूं; मैं तुम्‍हारे बचपन के बारे में नहीं जानता, केवल अपने बचपन के बारे में जानता हूं—यह प्रश्न प्रतिदिन का था। मुझसे लगातार सत्‍यभाषी होने के लिए कहा जाता था। मैंने अपने पिता को कहा: ‘जब कभी आप मुझसे सत्‍यभाषी होने के लिए कहते है, आपकेा एक बाप स्‍मरण रखनी चाहिए कि सत्‍य को पुरस्‍कृत किया जाना चाहिए, अन्‍यथा आप मुझको सत्‍य भाषण न करने भाषण न करने के लिए बाध्‍य कर रहे है। में सत्‍य भाषण के लिए राज़ी हूं।’
      बहुत सालता से मैंने जान लिया था कि सत्‍य से कुछ नहीं मिलता, तुमको दंड दिया जाता है। असत्‍य से मिलता है: पुरस्‍कृत किए जाते हो तुम। अब यह प्रश्‍न बहुत निर्णायक था, बहुत अधिक महत्‍व का था। इसलिए मेंने अपने माता-पिता से यह मामला स्‍पष्‍ट कर दिया था कि यह बात बहुत साफ-साफ समझ जी जानी चाहिए, यदि आप चाहते है कि मैं सत्‍यवादी रहूँ तो सत्‍य को पुरस्‍कृत किया जाना चाहिए, और पुरस्‍कार भविष्‍य के जीवन में नहीं वरन अभी और यहीं मिलना चाहिए।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—(सत्र-21

 सत्र--21  शंभु बाबू से भेट

     ठीक है.....जिन सज्‍जन के बारे में मैं बात करने जा रहा हुँ, उन का पूरा नाम पंडित शंभु रत्न दुबे। हम उनको शंभु बाबू कहते थे। वे कवि थे, बहुत ही अनोखे, क्‍योंकि वे अपनी कविताओं को प्रकाशित नहीं करना चाहते थे। किसी कवि में ऐसा गुण बहुत ही दुर्लभ है। मैं सैकड़ों कवियों से मिला हूं, वे अपनी कविताओं को प्रकाशित करने के लिए इतने उत्सुक रहते है कि उनके लिए काव्य रचना गौण हो जाती है। किसी भी प्रकार से महत्‍वाकांक्षी लोगों को मैं राज‍नीतिज्ञ कहता हूं। और शंभु बाबू महत्‍वाकांक्षी नहीं थे।
      वे निर्वाचित उप सभापति भी नहीं थे। क्‍योंकि निर्वाचित होने के लिए कम से कम चुनाव में खड़ा होना पड़ता है। वे सभापति द्वारा मनोनीत थे। वह सभापति खुद तो गोबरगणेश था, जैसा कि मैंने पहले कहा। उसे कुछ आता-जात नहीं था। इसलिए उसे एक ऐसे बुद्धिमान व्‍यक्ति की आवश्‍यकता थी जो उसके सब काम कर दे। सभापति एकदम गोबरगणेश था और वह इस पद पर कई वर्षो से था। दूसरे गोबरगणेश ने बार-बार उसको र्नि‍वाचित किया था।

रविवार, 15 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—( सत्र-20)

सत्र-20  स्‍कूल का प्रथम दिन और काना मास्‍टर
          
      मैं अपने प्राइमरी स्‍कूल के हाथी-द्वार के सामने खड़ा था.....ओर उस फाटक ने मेरे जीवन में बहुत सह बातों को आरंभ किया। मैं वहां अकेला नहीं खड़ा था। मेरे पिता भी मेरे साथ खड़े थे। वह मुझे स्‍कूल में भरती कराने आए थे। उस बड़े फाटक को देखते ही मैंने उनसे कहा: ‘नहीं।’
      अभी भी मुझे वह शब्‍द सुनाई देता है। एक छोटा बच्‍चा जो सब कुछ खो चुका है, मैं अभी भी उस छोटे बच्‍चे के चेहरे पर अंकित प्रश्‍न-चिह्न को देख सकता हूं—वह सोच रहा हे कि अब क्‍या होने बाला है।
      मैं खड़े-खड़े फाटक की और देखता रहा और मेरे पिता ने पूछा: ‘क्‍या तुम इस बड़े फाटक से इतने प्रभावित हो गए?
      अब इस कहानी को मैं अपने हाथ में लेता हूं। मैंने पिता से कहा: ‘नहीं।’

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन—( सत्र--19 )

 सत्र--19  पिता के घर में    
                
      नाना की मृत्‍यु के बाद मुझे फिर नानी से दूर रहना पडा, लेकिन मैं जल्दी ही अपने पिता के गांव वापस आ गया। मैं वापस आना तो नहीं चाहता था, लेकिन वह इस के ओ. के. की तरह था जो कि मैंने शुरूआत में कहा, नहीं के मैं ओ. के. कहना चाहता था। लेकिन में दूसरों की चिंता की उपेक्षा नहीं कर सकता। मेरे माता-पिता मुझे अपने मृत नाना के घर भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी नानी भी मेरे साथ जाने को तैयार नहीं थी। और मैं सिर्फ सात साल का बच्‍चा था, मुझे इसमें कोई भविष्‍य नहीं दिखाई दे रहा था।
      बार-बार मैं कल्‍पना में अपने आप को उस पुराने घर को वापस जाते देखता, बैलगाड़ी में अकेले....भूरा बैलों से बात करते हुए। कम से कम उसको तो संग-साथ मिल जाता। मैं बैलगाड़ी के भीतर अकेले बैठे हुए भविष्‍य के बारे में सोच रहा होता। वहां मैं करूंगा भी क्‍या? हां, मेरे घोड़े वहां पर है। लेकिन उनको खिलाएगा कौन? और मुझे भी कौन खिलाएगा? मैं तो एक कप चाय भी नहीं बना सकता।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

स्वेर्णिम बचपन—18

सत्र-18  सेक्स या मृत्युय से मनोग्रस्त

पूरब‍ मृत्युक से मनोग्रस्तय है और पश्चिम सेक्सत से। पदार्थवादी को सेक्सत से मनोग्रस्तथ होना ही चाहिए और आध्यातत्मिक को मृत्यु् से । और ये दोनों मनेाग्रस्तेताएं ही है। और किसी भी मनोग्रस्तएता के साथ जीवन जीना—पूर्वीय या पश्चिमी—न जीने के समान है, यह पूरे मौके को चूकता है। पूरव और पश्चिम एक ही सिक्केृ के दो पहलु है। और इसी प्रकार मृत्यु और सेक्सक है। सेक्स् ऊर्जा है—जीवन का आरंभ‍; और मृत्यु जीवन का चरम बिंदु है, पराकाष्ठा है।

यह केवल संयोग नहीं है कि हजारों लोगों को कभी ऑर्गेज़म का कोई अनुभव नहीं होता। इसका सीधा सा कारण यह है जब तक तुम मृतयु जैसे अनुभव में से गुजरने के लिए तैयार नहीं होते तब‍ तक तुम ऑर्गेज़म को नहीं जान सकते। और कोई मरना नहीं चाहता; सब जीना चाहते है। बार-बार जीवन को आरंभ करना चाहते है। पूरब में विज्ञान विकसित नहीं हो सका, क्योंकि जब लोग चक्र को रोकने की कोशिश कर रहे है तो विज्ञान का अध्यनयन कोन करेगा, कौन सुनेगा? कौन इसकी चिंता करेगा, किस लिए, चक्र को रोकना है। अब यह तो कोई भी बेवकूफ इसके रास्तेा में पत्थ र रख कर सकता है। चाक को रोकने के लिए किसी टेक्नोलॉजी की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन उसे चलाने के लिए विज्ञान चाहिए।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--( 17 )

  सत्र-17  ‘’अजित सरस्‍वती मेरे महाकाश्यप है’’  

      पिछली रात अजित सरस्‍वती ने जो पहले शब्‍द मुझसे कहे, वे थे: ‘ओशो मुझे आशा नहीं थी कि मैं कभी भी ऐसा कर पाऊगा।’
      जो लोग वहां उपस्थित थे उन्‍होंने सोचा कि वे कम्‍यून में आकर रहने की बात कर रहे है। एक प्रकार से यह भी सच था। क्‍योंकि मुझे याद है बीस वर्ष पहले जब‍ वे पहली बार मुझसे मिलने आए थे तब मुझसे कुछ मिनट मिलने कि लिए उनको अपनी पत्‍नी से इजाजत लेनी पड़ी थी। इसलिए जो उपस्थित थे स्‍वभावत: उन्‍होंने समझा होगा कि उन्‍हें इस‍ बात की आशा नहीं थी कि वे अपना काम-धाम और बीबी-बच्‍चों को छोड़ कर यहां आ जाएंगे—सब कुछ छोड़-छाड़ कर सिर्फ यहां मेरे साथ होने के लिए। इसी को सच्‍चा त्‍याग कहते है। लेकिन उनका यह अर्थ नहीं था। और मैं समझ गया।
      मैंने उनसे कहा: ‘अजित, मैं भी हैरान हूं। ऐसा नहीं कि मुझे इसकी आशा नहीं थी—मुझे तो सदा इस क्षण की आशा, इच्‍छा और अपेक्षा थी। और मैं खुश हूं कि तुम आ गए।’

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—07

‘’पिता का थप्‍पड़ मारना’’

    मेरे दादा प्रत्‍येक मामले मैं सदैव मेरे पक्ष में रहा करते थे। यदि वे कर सकते तो वे मेरे साथ सहभागिता करने को तत्‍पर रहते थे। निस्‍संदेह उन्‍होंने कभी मुझे दंडित नहीं किया, उनहोंने मुझे सदा पुरस्‍कृत किया।
      मैं हर रात देर से घर आया करता था, और घर में घुसते ही जो पहली बात वे पूछते थे सह यह कि ‘आज तुमने क्‍या-क्या किया है।’ सब कुछ कैसा चल रहा है, कोई परेशानी तो पैदा नहीं हुई, रात में उनके बिस्‍तर पर साथ  बैठ कर हमारी सदा महफिल जमा करती थी। और वे हद बात का मजा लेते थे। मैं उनको हद बात बताया करता था। जो उस दिन हुई थी और वे कह देते, ‘वास्‍तव में एक अच्‍छा दिन था।’
      मेरे पिता ने मुझको केवल एक बार दंडित किया, क्‍योंकि मैं एक मेले में जो नगर से कुछ मील दूर प्रतिवर्ष हुआ करता था, चला गया था। वहां पर हिंदुओं की पवित्र नदियों में से एक नर्मदा बहा करती थी, और नर्मदा के तट पर एक महीने तक एक विशाल मेला लगा करता था। इसलिए मैं बिना उनसे पूछे वहां मेले में चला गया।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन-- ( 16 )

    सत्र-16  नानी प्रथम शिष्‍या और बुद्धत्‍व
 
            संसार में छह बड़े धर्म है। इनको दो वर्गों में बटा जा सकता है। पहला वर्ग है: यहूदी, ईसार्इ, और इस्‍लाम धर्म है। ये एक ही जीवन में विश्‍वास करते है। तुम सिर्फ जीवन और मृत्‍यु के बीच हो—जन्‍म और मृत्‍यु के पार कुछ भी नहीं है—यह जीवन ही सब कुछ है। जब कि ये स्‍वर्ग, नरक और परमात्‍मा में विश्‍वास करते है। फिर भी ये इनको एक ही जीवन का अर्जन मानते है। दूसरे वर्ग के अंतर्गत हैं: हिंदू, जैन, और बौद्ध धर्म। वे पुनर्जन्‍म के सिद्धांत में विश्‍वास करते है। आदमी को तब तक बार-बार जन्‍म होता है। जब ते कि वो बुद्धत्‍व, एनलाइटेनमेंट, पाप्‍त नहीं कर लेता है, और तब यह चक्र रूक जाता है।
      मरते समय मेरे नाना यही कह रहे थे, लेकिन उस समय मैं इसके महत्‍व को, इसके अर्थ को नहीं जानता था। हालांकि मैंने मशीन की तरह बारूदों को दोहराया, बिना यह समझे कि में क्‍या कह रहा हूं। या क्‍या कर रहा हूँ।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—06

दादा और मेरी शरारतें
     मेरे दादा मेरी शरारतों के कारण मुझसे बहुत प्रेम करते थे। उस वृद्धावस्‍था में भी वे शरारती थे। उन्‍होंने मेरे पिता या चाचाओं को कभी पसंद नहीं किया, क्‍योंकि वे सभी इस बूढ़े आदमी की शरारतों के विरूद्ध थे। वे सभी उनसे कहते थे कि ’अब आप सत्‍तर साल के हो चुके है और आपको उसी प्रकार से आचरण करना चाहिए। अब आपके बेटे पचास-पचपन साल के है, आपकी बेटियाँ पचास साल कि है। उनके बच्‍चों की शादियाँ हो चुकी है, उनके बच्‍चों के बच्‍चें हो चूके है। और आप ऐसे काम करते रहते है कि हमको शर्म आती है।’
      मैं एक मात्र व्यिक्त था। जिससे उनकी निकटता थी, क्‍योंकि मैं उन्‍हें इसीलिए चाहता था कि सत्‍तर साल की आयु में भी उन्‍होंने अपना बचपना नहीं खोया था। वे किसी बच्‍चे की भांति ही शरारती थे। और वे शरारतें अपने स्‍वयं के बेटों और बेटियों और दामादों के साथ किया करते थे। और वे लोग केवल अचंभित रह जात थे।

स्वेर्णिम बचपन—( सत्र—15 )

   सत्र--15 मग्गा बाबा और मोज़ेज

      जब‍ मैं कमरे से बाहर जा रहा था तो तुम मुस्‍कुरा रहे थे। लेकिन तुम्‍हारी मुस्‍कुराहट में उदासी थी। मैं इसको नहीं भूल सका। जब कि मैं सब कुछ आसानी से भूल जाता है। लेकिन जब‍ कभी मैं कठोर हाता हूं तो मैं इसे नहीं भूल सकता। में दुनिया में सब‍को क्षमा कर सकता हूं, लेकिन अपने आप को नहीं कर सकता। शायद मेरे न सोने का यही कारण था। मेरी नींद तो सिर्फ एक पतली पर्त है। उसके नीचे मैं सदा जागता रहता हूं। इस झीनी सी पर्त  बड़ी आसानी से विचलित किया जा सकता है। लेकिन केवल मैं ही ऐसा कर सकता हूं कोई और नहीं।
      मुझे थोड़ा अफसोस हुआ। मैं ‘थोड़ा’ कह रहा हूं, क्‍योंकि मेरे लिए थोड़ा अफसोस भी बहुत ज्‍यादा हो जाता है। मेरा सिर्फ एक आंसू ही बहुत है। मुझे घंटों रो-रो करा अपने बाल नोचने की जरूरत नहीं है जो कि अब हैं ही नहीं। कभी किसी ने यह नहीं सुना कि कोई अपनी दाढ़ी नोचता है। मैं नहीं सोचता कि किसी भी भाषा में, यहां तक कि हिब्रू में भी ऐसा कोई मुहावरा है, अपनी दाढ़ी नोचना और तुमको मालूम है कि यहूदियों और उनके बाइबिल के सब पैगंबरों की दाढि़यां थी। यह तो एक प्राकृतिक नियम है कि अगर किसी को दाढ़ी है तो वह गंजा हो जाएगा, क्‍योंकि प्रकृति सदा संतुलन बनाए रखती है।

रविवार, 8 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—05

सत्‍य का आचरण

      एक दिन मैं खेल रहा था। मेरी आयु चार पाँच साल कि रही होगी, उससे अधिक नहीं। जिस समय किसी ने दरवाजे पर दस्‍तक दी, उस समय मेरे पिता अपनी दाढ़ी बना रहे थे। मेरे पिता ने मुझसे कहा, जरा चले जाओ और उनसे कह दो, ‘मेरे पिता जी धर पर नहीं है।’
      मैं बहार चला गया और मैंने कहा: ‘मेरे पिता दाढ़ी बना रहे है और वे आपको बताने के लिए कह रहें है कि मेरे पिता घर पर नहीं है।‘
      उस व्‍यक्ति ने कहा: ‘क्‍या? वे भीतर है।’
      मैंने कहा: ‘हां लेकिन जो उन्‍होंने मुझसे कहा वह यही है। मैंने आपको पूरा सत्‍य बता दिया है।’
      वह व्‍यक्ति‍ भीतर आया और मरे पिता ने मेरी और देखा, क्‍या हो गया, और वह व्‍यक्ति बहुत क्रोधित हो गया था, उसने कहा: ‘जरूर कोर्इ बात है, आपने मुझको इस समय घर आने को कहा था, और आपने इस लड़के के द्वारा मुझे खबर भेज दी कि आप बाहर चले गए है।’  
      मेरे पिता ने उससे पूछा, लेकिन आप को किस तरह पता चला कि मैं घर के भीतर हूं।
      उसने कहा: ‘इस लड़के ने मुझको पूरी बात बता दी है कि मेरे पिता भीतर है। वे अपनी दाढ़ी बना रहे है और उन्‍होंने मुझको आपसे यह बताने के लिए कहा है कि वे बाहर गए हुए है।’

स्‍वर्णिम बचपन-- ( 14 )

सत्र--14 नीत्‍शे और एडोल्‍फ हिटलर

 त्‍वदीयं वस्‍तु गोविंदम्‍ा, तुभ्‍यमेव समर्पयेत। ‘हे प्रभु,’ यह जीवन जो तुमने मुझे दिया वह तुम्‍हें आभार सहि‍त वापस समर्पित करता हूं। ये मरते समय मेरे नाना के अंतिम शब्‍द थे।
      हालांकि उन्‍होंने परमात्‍मा में कभी विश्‍वास नहीं किया और पे हिंदू नहीं थे। यह वाकय, सह सूत्र हिंदू सूत्र है। लेकिन भारत में सब चीजें घुल मिल गई है। विशेषकर अच्‍छी बातें। मरने से पहले अन्‍य बातों के बीच उन्‍होंने एक बात बार-बार कहीं, ‘चक्र को रोको।’
      उस समय तो मैं यह नहीं समझ सका अगर हम गाड़ी का चाक रोक दें और उस समय वहां पर तो केवल बैलगाड़ी का चक्र-चाक था। तो हम अस्‍पताल कैसे पहुंच सकेंगे। जब उन्‍होंने बार-बार कहा कि चक्र को रोको तो मैंने अपनी नानी से पूछा ’क्‍या नाना जी का दिमाग खराब हो गया है।’

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—04

विश्वास चमत्‍कार और साईं बाबा

      कल ही मेरी मां मुझे बता रही थीं.....ओर विवेक ने पहली बार इस उत्‍साह से इतनी देर तक बात‍ करते हुए सुना; वरना जो कुछ भी उनसे पूछा जाता है वह एक या दो वाक्‍यों में, हां या नहीं में उत्‍तर दिया करती है और वार्तालाप संपन्‍न हो जाता है। लेकिन कल उन्‍होंने लंबे समय बात की और वे काफी उत्‍साहित थी, इसलिए विवेक ने मुझसे पूछा, ‘आपकी मां आपको क्‍या बता रही थी।’
      मैंने उससे कहा: ‘वे कुछ बातें याद कर रही थी। मैंने उसे अभी तक नहीं बताया कि वे मुझे क्‍या बता रही थी, क्‍योंकि यह एक लंबी कहानी थी। वे मुझको बता रही थी कि उनके गर्भ में जब मैं पाँच माह का था तब एक चमत्‍कार घटित हुआ था।’
      वे मेरे पिता के घर से अपने पिता के घर जा रही थी।  और यह बरसात का मौसम था। भारत में यह रिवाज है कि पहले बच्‍चे का जन्‍म नाना के घर पर हो, इसलिए यद्यपि बरसात का मौसम चल रहा था और जाना बहुत कठिन था, सड़कें नहीं थी और उन्‍हें घोड़े पर जाना पडा था। जितनी जल्‍दी वे पहुंच जातीं उतनी ही बेहतर होता, यदि उन्‍होंने और अधिक प्रतीक्षा की होती तो यह और कठिन हो जाता, इसलिए वे अपने चचेरे भाई के साथ चली गई।

स्‍वर्णिम बचपन--( सत्र-13 )

सत्र--13   मैं पागल आदमी हूं 


     मैं जीसस को नहीं भूल सकता। मैं उन्‍हें दुनिया के किसी भी ईसाई से कहीं अधिक याद करता हूं। जीसस कहते है, ‘धन्य भागी हैं वे’ जो छोटे बच्‍चे जैसे है, क्‍योंकि प्रभु का राज्‍य उनका है।
      यहां पर जो याद रखने बाला सबसे अधिक महत्वपूर्ण शब्‍द है वह है क्‍योंकि। जीसस के उन सब वक्तव्य में से जो ‘जो धन्‍य भागी है से आरंभ होता है और समाप्‍त होता है, ‘प्रभु के राज्‍य ’ के साथ। उनमें से केवल यही एक वक्तव्य अनोखा है। क्‍योंकि शेष सब वक्तव्य क‍हते है। ‘धन्‍यभागी है वे जो विनम्र है, दीन-हीन है, क्‍योंकि वे प्रभु के राज्‍य के उतराधिकारी होंगे।’ वे वक्तव्य तर्कपूर्ण है और वे भविष्‍य का वादा करते है—भविष्‍य, जिसका कोई अस्तित्‍व नहीं है। यही एकमात्र वक्तव्य है जो कहता है,.....क्‍योंकि प्रभु का राज्‍य उनका है।‘ इसमें न कोई भविष्‍य है, न तर्क है, न किसी लाभ का कोई वादा है। तथ्‍य का शुद्ध वक्तव्य है या यूं कहिए कि तथ्‍य का सीधा-सरल वक्तव्य है।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—03

दूकान पर मेरा नग्न आना

क बार मेरे पिता ने मेरी सभी सलवारें और मेरे कुर्ते और मेरी तीनों तुर्की टोपियों एक पोटली में बाँध कर घर के तहखाने में ऐसे स्‍थान पर रख दीं जहां अनेक प्रकार की बेकार टूटी-फूटी चीजें पड़ी हुई थी। मुझे पहनने के लिए उनमें से कुछ नहीं मिला, इसलिए जब मैं स्‍नानगृह से बहार आया तो अपनी आंखें बंद करके नग्नावस्था में दुकान में पहुंच गया। जैसे ही मैं बाहर निकल रहा था, मेरे पिता ने कहा: ‘ठहरो, जरा भीतर तो आओ, अपने वस्‍त्र लिए जाओ।’
      मैंने कहा: ‘वे जहां कहीं भी हैं आप उनको लेकर आइए।’
      उन्‍होंने कहा: ‘मैंने कभी न सोचा था कि तुम ऐसा करोगे। मैंने सोचा कि तुम चारों और देखोगे और कपड़ों की खोज करोगे, और जब वे तुम्‍हें नहीं मिलेंगे—क्‍योंकि मैंने उनको ऐसे स्‍थान पर रख दिया है कि तुम्‍हें वह नहीं मिल पाते, तब स्‍वभावत: तुम उन सामान्‍य से वस्‍त्रों को पहन लोगे जो तुम्‍हें पहनना चाहिए। मैंने कभी नहीं सोचा तुम ऐसा कर ड़ालोगे।’
      मैंने कहा: ‘मैं सीधे ही कर डालता हूं, मैं अनावश्‍यक वार्ता में भरोसा नहीं करता; मैं किसी से पूछता भी नहीं कि मेरे वस्‍त्र कहां रखे है। मुझे क्‍यों पूछना चाहिए? मेरी नग्‍नता यही उद्देश्‍य पूरा कर देगी।’

स्‍वर्णिम बचपन--(सत्र- 12 )

सत्र--12   जीवक और देव गीत
 
      बुद्ध का वैद्य, जीवक, सम्राट बिंब सार ने बुद्ध को दिया था। एक और बात है कि बिंब सार बुद्ध का संन्‍यासी नहीं था, वह केवल उनका हितैषी था, शुभ चिंतक था। उसने बुद्ध को जीवक क्‍यों दिया? जीवक बिंब सार का निजी वैद्य था, उस समय  का सबसे प्रसिद्ध, क्‍योंकि एक दूसरे राजा से उसकी प्रतियोगिता चल रही थी, जिसका नाम प्रेसनजित था। प्रसेनजित ले बुद्ध से कहा था, आपको जब‍ भी आवश्‍यकता हो, मेरा वैद्य आपकी सेवा में उपस्थित हो जाएगा।
      यह बिंबसार के लिए बहुत बड़ी बात थी। अगर प्रसेनजित यह कर सकता है, तो‍ बिंबसार उसे दिखएगा कि वह बुद्ध को अपना सबसे प्रिय निजी वैद्य भेंट कर सकता है। इसलिए यद्यपि बुद्ध जहां-जहां गए जीवक उनके साथ-साथ गया, लेकिन याद रखना, वह उनका शिष्‍य नहीं था। वह हिंदू ब्राह्मण ही बना रहा था।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन--( 11 )

     सत्र-11  भोपा का महल

      जिस गांव में मेरा जन्‍म हुआ था वह ब्रिटिश साम्राज्‍य का हिस्‍सा नहीं था। वह एक छोटी सी रियासत थी जिस पर एक मुसलमान बेगम शासन करता थी। अभी मैं उसे देख सकता हूं। बड़ी अजीब बात है, वह भी इंग्लैंड की महारानी जैसी ही सुंदर थी, बिलकुल वैसी ही सुन्‍दर। लेकिन एक अच्‍छी बात यह थी कि वह मुसलमान थी। लेकिन इंग्लैंड की महारानी मुसलमान नहीं थी। ऐसी औरतों को हमेशा मुसलमान होना चाहिए, क्‍योंकि उन्‍हें एक पर्दे के पीछे, बुरक़े में छिपे रहना होता है। वह बेगम कभी-कभी हमारे गांव आती थी। और उस गांव में केवल मेरा घर ही ऐसा थी जहां वह ठहर सकती थी। और इसके अतिरिक्‍त वह मेरी नानी को बहुत प्रेम करती थी।
      मेरी नानी और वह, दोनों आपस में बातें कर रही थी जब पहली बार मैंने उस महारानी को बिना बुरक़े के देखा थी। मुझे तो विश्‍वास ही न हो सका कि यह घरेलू सी दिखाई देने बाली अति साधारण औरत महारानी है। तब मेरी समझ में आया कि बुरक़े का उद्देश्‍य क्‍या है, इसे हिंदू पर्दा कहते है। यह कुरूप औरतों के लिए अच्‍छा है।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—02

मृत्युं के प्रतीक्षा

एक ज्यो‍तिषी ने मेरी जन्म -कुंडली तैयार करने का वादा किया था, लेकिन उससे पहले कि वह यह काम कर पाता उसकी मृत्यु हो गई, इसलिए उसके बेटे को जन्मा-कुंडली तैयार करनी पड़ी। लेकिन वह भी हैरान था। उसने कहा: ‘यह करीब-करीब निश्चित है कि यह बच्चा इक्कीपस वर्ष की आयु में मर जाएगा। प्रत्ये क सात साल के बाद उसको मृत्यु को सामना करना पड़ेगा।’

इसलिए मेरे माता-पिता, मेरा परिवार सदैव मेरी मृत्यु को लेकर चिंति‍त रहा करते थे। जब कभी मैं नये सात वर्ष के चक्र के आरंभ में प्रवेश करता, वे भयभीत हो जाते। और वह सही था। सात वर्ष की आयु में मैं बच गया। लेकिन मुझे मृत्यु का गहन अनुभव हुआ—मेरी अपनी मृत्यु का नहीं बल्कि मेरे नाना की मृत्यु का। और मेरा उनसे इतना लगाव था कि उनकी मृत्यु मुझको अपनी स्वायं की मृत्यु प्रतीत हुई। अपने स्वायं के बचपन के ढंग से मैंने उनकी मृत्यु की अनुकृति की। मैंने लगातार तीन दिनों तक भोजन नहीं किया, पानी नहीं पिया, क्योंमकि मुझको लगा कि यदि मैं यह सब करता तो यह नाना के साथ विश्वा सघात होता।

स्‍वर्णिम बचपन-- सत्र- ( 10 )

सत्र-10  बुद्धत्‍व  के भी पार 


      मेरे पास एक नहीं बल्कि चार घोड़े थे। एक मेरा अपना था और तुम्‍हें मालूम है कि मैं कितना ‘फसी’ जिद्दी हूं, आज भी रॉल्‍स रॉयसेस में कोई दूसरा नहीं बैठ सकता। यह सिर्फ फसीनेस, जिद्दी पन है।  उस समय भी मैं ऐसा ही था। कोर्इ नहीं यहाँ तक कि मेरे नाना भी मेरे घोड़े पर सवार नहीं हो सकते थे। निश्चित ही मैं दूसरों के घोड़ों पर सबरा हो सकता था। दोनों मेरे नाना और नानी के पास एक-एक घोड़ा था। भारतीय गांव की  स्‍त्री का घुड़सवारी करना कुछ अजीब सा फासले पर मेरे पीछे-पीछे बंदूक लिए चलता था।
      नियति भी अजीब है, मैंने अपने जीवन में किसी का कोई नुकसान नहीं किया—अपने सपने में भी नहीं। मैं तो शुद्ध शाकाहारी हूं। लेकिन भाग्‍य का खेल देखो कि बचपन से ले कर अब तक मेरी रक्षा के लिए एक पहरेदार‍ सदा साथ रहा है। न जाने क्‍यों लेकिन भूरा से लेकर अब तक मैं कभी बिना पहरेदार के नहीं रहा। आज भी या तो मेरे आगे चलते है या मेरे पीछे पर सदा साथ ही रहते है। भूरा ने सारा खेल आरंभ किया।

रविवार, 1 नवंबर 2009

संदेह

संदेह पैदा क्योंन होता है दुनिया में, संदेह पैदा होता है, झूठी श्रद्धा थोप देने के कारण। छोटा बच्चा है, तुम कहते हो मंदिर चलो। छोटा बच्चाट पुछता है किस लिए?
अभी मैं खेल रहा हूं, तुम कहते हो, मंदिर में और ज्या दा आनंद आएगा।
और छोटे बच्चेह को वह आनंद नहीं आता, तुम तो श्रद्धा सिखा रहे हो और बच्चाह सोचता है, ये कैसा आनंद, यहां बड़े-बड़े बैठे है उदास,
यहां दोड भी नहीं सकता, खेल भी नहीं सकता। नाच भी नहीं सकता, चीख पुकार नहीं कर सकता, यह कैसा आनंद। फिर बाप कहता है, झुको, यह भगवान की मूर्ति है। बच्चाा कहता है भगवान यह तो पत्थहर की मूर्ति को कपड़े पहना रखे है। झुको अभी, तुम छोटे हो अभी तुम्हा री बात समझ में नहीं आएगी। ध्या न रखना तुम सोचते हो तुम श्रद्धा पैदा कर रहे हो, वह बच्चा‍ सर तो झुका लेगा लेकिन जानता है, कि यह पत्थेर की मूर्ति है। उसे न केवल इस मूर्ति पर संदेह आ रहा है। अब तुम पर भी संदेह आ रहा है, तुम्हाेरी बुद्धि पर भी संदेह आ रहा है। अब वह सोचता है ये बाप भी कुछ मूढ़ मालूम होता है। कह नहीं सकता, कहेगा, जबत तुम बूढे हो जाओगे, मां-बाप पीछे परेशान होते है, वे कहते है कि क्यास मामला है।
बच्चेी हम पर श्रद्धा क्योंह नहीं रखते, तुम्हींा ने नष्टू करवा दी श्रद्धा। तुम ने ऐसी-ऐसी बातें बच्चेह पर थोपी, बच्चोम का सरल ह्रदय तो टुट गया। उसके पीछे संदेह पैदा हो गया, झूठी श्रद्धा कभी संदेह से मुक्तं होती ही नहीं। संदेह की जन्मेदात्री है। झूठी श्रद्धा के पीछे आता है संदेह, मुझे पहली दफा मंदिर ले जाया गया, और कहा की झुको, मैंने कहा, मुझे झुका दो, क्योंाकि मुझे झुकने जैसा कुछ नजर आ नहीं रहा।
पर मैं कहता हूं, मुझे अच्छे बड़े बूढे मिले, मुझे झुकाया नहीं गया। कहा, ठीक है जब तेरा मन करे तब झुकना,
उसके कारण अब भी मेरे मन मैं अब भी अपने बड़े-बूढ़ो के प्रति श्रद्धा है। ख्या ल रखना, किसी पर जबर्दस्ती़ थोपना मत, थोपने का प्रतिकार है संदेह। जिसका अपने मां-बाप पर भरोसा खो गया, उसका अस्तित्व़ पर भरोसा खो गया। श्रद्धा का बीज तुम्हामरी झूठे संदेह के नीचे सुख गया।
--एस धम्मो सनंतनो

परंपरा और धर्म

परंपरा और धर्म
       


धर्म विद्रोह है।
धर्म का और कोई रूप होता ही नहीं।
धम्र कभी परंपरा बनता ही नहीं,
जो बन जाता है, परंपरा वह धर्म है ही नहीं।
परंपरा तो ऐसे है जैसे आदमी गुजर गया,
उसके जूते के चिन्‍ह रेत पर पड़े रह गए।
वे चिन्‍ह जीवित आदमी तो है ही नहीं,
आदमी के जूते भी नहीं है।
जीवित आदमी तो छोड़ो,
मुर्दा जूते भी उन चिन्‍हों में नहीं है,
छाया की भी छाया है।
धर्म खतरनाक है,
धर्म से ज्‍यादा खतरनाक और को चीज़ पृथ्‍वी पर नहीं है।
लेकिन अक्‍सर देखोगे भीरूओं को धार्मिक बने।
घुटने टेके, प्रार्थनाएं-स्‍तुति करते हुए, भयाक्रांत।
उनका भगवन उनके भय का निचोड़ है।
धर्म तो खतरनाक ढंग से जीने का नाम है।
धर्म का अर्थ है निरंतर अभियान।
धर्म का अर्थ ही है पुराने और पीटे-पिटाए से राज़ी न हो जाना।
नए की, मौलिक की खोज।
धर्म का अर्थ है, अन्‍वेषण।
धर्म का अर्थ है, जिज्ञासा, मुमुक्षा।
धर्म का अर्थ है, उधार और बासे से तृप्‍त न हो जाना,
धर्म वेद से राज़ी नहीं होता,
जब तक अपना वेद निर्मित न हो जाए।
धर्म स्‍मृति में नहीं है। धर्म अनुभूति में है।
श्रुति और स्‍मृति। या तो सुना, या याद रखा।
लेकिन धम्र तो है, अनुभूति, न श्रुति, न स्मृति

--एस धम्‍मो सनंतनो

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—01

पीपल का वृक्ष और मेरे आंसू---


      इस बारे में तुम मेरी मां से पूछ सकते हो—क्‍योंकि इस समय वे यहीं है...। अपने जन्‍म के बाद तीन दि‍नों तक मैंने जरा भी दुध नहीं पिया, और वे सभी परेशान थे, चिंतित थे। चिकित्‍सक चिंतित थे कि यदि यह बच्‍चा दूध पीने से इनकार कर रहा है तो वह किस प्रकार जी सकेगा। लेकिन उन्‍हें मेरी परेशानी का कोई भी अनुमान नहीं था, कि वे मेरे लिए क्‍या कठिनाई पैदा कर रहे थे। वे प्रत्‍येक संभव उपाय से मुझे दुध पीने के लिए बाध्‍य करने का प्रयास कर रहे थे। और ऐसा कोई उपाय न था जिससे मैं उनको समझा सकूँ, या वे स्‍वयं ही मेरी कठिनाई को समझ लेते।
      अपने पिछले जन्‍म में अपनी मृत्‍यु से पूर्व मैं उपवास में था। मैं इक्‍कीस दिनों का उपवास पूरा करना चाहता था, किंतु इसके पहले कि मेरा उपवास पूरा हो पाता तीन दिन पूर्व मेरी हत्‍या कर दी गई। तीन दिनों का इस जन्‍म में भी मुझको पूरा बोध था, कि मुझे अपना उपवास पूरा करना है। मैं वास्‍तव में जिद्दी हूं, वरना लोग चीजों को एक जन्‍म से दूसरे जन्‍म ले नहीं जाते; एक बार एक अध्‍याय बंद हो गया तो बंद हो गया।

स्‍वर्णिम बचपन--( 9 )

सत्र-09  ऊँचे आकाश में निमंत्रण

समय वापस नहीं जा सकता, लेकिन मन जा सकता है। ऐसा मन जो कभी कुछ भी भूल सकता एक ऐसे व्यतक्ति को देना जो स्व यं को ता अमन की स्थिति में पहुंच ही गया है साथ ही दूसरों को भी इससे छुटकारा पाने के लिए कह रहा है, कितना व्यसर्थ है। जहां तक मेरे मन का प्रश्ना है—या रखना कि मेरा मन, मैं नहीं—वह वैसा ही यंत्र है, जैसा यहां पर इस्तेनमाल किया जा रहा है। मेरे मन का अर्थ है सिर्फ एक मशीन, पर एक अच्छीय मशीन, जो ऐसे व्यरक्ति को दी गई है जो उसे फेंक देगा। इस लिए मैं कहता हूं कि यह कितनी बरबादी है। लेकिन मुझे कारण मालूम है। जब तक तुम्हाररे पास बढ़िया मन न हो तब तक उसे फेंक देने की समझ तुम्हाूरे भीतर नहीं हो सकती। जीवन विरोधाभासों से भर हुआ है। यह कोई बुरी बात नहीं है। इसके कारण जीवन अधिक रंगीन हो जाता है।