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शनिवार, 17 नवंबर 2018

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन-मन का पात्र कभी भरता नहीं 

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
एक राजमहल के द्वार पर बहुत भीड़ लगी हुई थी। भीड़ सुबह से लगनी शुरू हुई थी, दोपहर आ गई थी और भीड़ बढ़ती चली गई थी। जो भी उस द्वार पर आकर रुका था वह रुका ही रह गया था। वहां कोई बड़ी अभूतपूर्व घटना घट गई थी। और जिसको भी राजधानी में खबर लगी वह भागा हुआ महल की तरफ चला आ रहा था। सांझ भी आ गई। करीब-करीब सारी राजधानी महल के द्वार पर इकट्ठी हो गई थी। लाखों लोग इकट्ठे थे।
उस द्वार पर सुबह-सुबह एक भिक्षु आया था। और उस भिक्षु ने राजा से कहा था, मुझे कुछ भिक्षा मिल सकेगी? राजा ने कहा था कोई कमी नहीं है, तुम जो चाहो मांग लो। उस भिखारी ने एक बड़ी अजीब शर्त रखी। उसने कहा कि मैं भिक्षा तभी लेता हूं जब मुझे यह आश्वासन मिल जाए, यह वचन मिल जाए कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भर दिया जाएगा। मैं अधूरा भिक्षापात्र लेकर नहीं जाऊंगा। तो यदि यह वचन देते हों कि मेरा पूरा भिक्षापात्र भर देंगे तो मैं भिक्षा लूं अन्यथा मैं किसी और द्वार पर चला जाऊं।

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन

विज्ञान और धर्म में कोई विरोध नहीं 

 

एक मित्र ने पूछा है कि विज्ञानवाद और धर्मवाद में कैसे मेल बनाया जा सकता है?

मेल उन चीजों में बनाना होता है जिनमें कोई विरोध हो। धर्म और विज्ञान में तो कोई विरोध नहीं है। इसलिए मेल बनाने की बात ही फिजूल। दो चीजों में दुश्मनी हो तो दोस्ती करवानी होती है, लेकिन दुश्मनी ही न हो तो, तो दोस्ती का सवाल क्या? धर्म और विज्ञान में विरोध नहीं है, विज्ञान और अंधविश्वास में विरोध है। और अंधविश्वास धर्म नहीं है। अंधविश्वास को ही क्योंकि हम धर्म समझते रहे हैं, तो इसलिए कठिनाई खड़ी हो गई। अन्यथा धर्म से ज्यादा वैज्ञानिक तो और कोई चीज नहीं है। विज्ञान तो एक पद्धति है, एक मेथड है सत्य की खोज का। जब उस पद्धति का हम उपयोग करते हैं पदार्थ के लिए तो साइंस जन्म जाती है और जब उसी पद्धति का उपयोग करते हैं हम चेतना की खोज में तो धर्म जन्म जाता है। विज्ञान का एक प्रयोग साइंस है, दूसरा प्रयोग धर्म है। विज्ञान एक पद्धति है, साइंटिफिक एटिट््यूड, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने का एक ढंग है। लेकिन यह प्रश्न इसीलिए उठ आया होगा तुम्हारे मनों ने क्योंकि जिसे हम धर्म कहते हैं वह विज्ञान से बड़े विरोध में मालूम पड़ता है। तो स्मरण रखना, वह धर्म ही नहीं है जो विज्ञान के विरोध में पड़ जाता हो। वह होगा कोई अंधापन। कोई सुपरस्टीशन और अंधविश्वास विज्ञान के मार्ग में ही बाधा नहीं है, धर्म के मार्ग में भी बाधा है। इसलिए दुनिया में बढ़ रही वैज्ञानिक रुचि उस सारे धर्म को जला कर नष्ट कर देगी जो धर्म नहीं है। और इस वैज्ञानिक क्रांति से गुजर जाने के बाद जो शेष रह जाएगा वही खरा सच्चा सोना होगा, वही धर्म होगा।

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन-चित को बदलने की कीमिया

मैं अत्यंत आनंदित हूं कि आपसे संध्या अपने हृदय की थोड़ी सी बातें कर सकूंगा। अभी कहा गया कि यह समय अंधकारपूर्ण है और यह युग पतन का, भौतिकवाद का और मैटीरियलिज्म का है।
सबसे पहले मैं आपको निवेदन कर दूं, यह बात अत्यंत गलत है, यह बात झूठी है। इस बात से यह भ्रम पैदा होता है कि पहले के लोग प्रकाशपूर्ण थे और आज के लोग अंधकारपूर्ण हैं। इससे यह भ्रम पैदा होता है कि पहले के लोग अंधकार में नहीं थे और हम अंधकार में हैं। इस भ्रम के पैदा हो जाने के कुछ कारण हैं। लेकिन यह बात सच नहीं है। हम अनैतिक हैं, इम्मारल हैं और पहले के लोग नैतिक थे, यह बात भी ठीक नहीं है।
अगर पहले के लोग नैतिक थे तो महावीर ने किसको समझाया कि हिंसा मत करो, चोरी मत करो, असत्य मत बोलो? बुद्ध ने किसको उपदेश दिए? राम और कृष्ण किन लोगों को समझा रहे थे अच्छा होने के लिए? अगर लोग अच्छे थे तो ये उपदेश व्यर्थ थे, झूठे थे, इनकी कोई जरूरत न थी। ये दुनिया में, पुरानी सदियों में इतने-इतने बड़े शिक्षक हुए ये क्यों पैदा हुए?

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन -धर्म की सहीं शिक्षा 

धर्म और शिक्षा पर इससे पहले कि मैं कुछ आपसे कहूं, एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात शुरू करना चाहूंगा।
धन्यवाद।
एक सूफी फकीर एक रात सोया, सोते समय उस फकीर के मन में एक प्रार्थना थी, परमात्मा के दर्शन की इच्छा थी। रात उसने एक सपना देखा, सपने में देखा कि वह परमात्मा के नगर में पहुंच गया है। बहुत भीड़-भाड़ है रास्तों पर, कोई बहुत बड़ा उत्सव मनाया जा रहा है। उसने पूछा किसी से, तो ज्ञात हुआ परमात्मा का जन्म-दिन है। एक बहुत बड़े रथ पर एक बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति सवार है, पूछा यही परमात्मा हैं, उधर से ज्ञात हुआ नहीं, ये तो राम हैं और उनके पीछे राम के हजारों-लाखों भक्त हैं। फिर और पीछे घोड़े पर सवार कोई बहुत महिमाशाली व्यक्ति है, पूछा, ये परमात्मा हैं, ज्ञात हुआ, ये तो मोहम्मद हैं और उनके पीछे उनके भक्त हैं। और ऐसे वह शोभायात्रा लंबी होती गई। क्राइस्ट निकले, और महावीर, और बुद्ध, और जरथुस्त्र, और धीरे-धीरे शोभायात्रा समाप्त हो गई। और सबसे अंत में एक बहुत बूढ़ा आदमी एक घोड़े पर निकला जिसके साथ कोई भी नहीं था। उसे देख कर, उस फकीर को देख कर हंसी आने लगी, किसी से उसने पूछा कि यह कौन पागल है जो अकेला घोड़े पर सवार है, और जिसके साथ कोई भी नहीं है? तो ज्ञात हुआ वह परमात्मा है। उसे बहुत हैरानी हुई। और उसने पूछा कि राम के साथ बहुत लोग हैं, क्राइस्ट के साथ बहुत लोग हैं, बुद्ध और महावीर के साथ बहुत लोग हैं, मोहम्मद के साथ बहुत लोग हैं, लेकिन परमात्मा के साथ कोई क्यों नहीं? ज्ञात हुआ, सारे लोग मोहम्मद, महावीर और राम में बंट गए हैं, परमात्मा के लिए कोई बचा नहीं।

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-01)

अज्ञात की ओर-(विविध)

पहला प्रवचन

न भोग, न त्याग-वरन रूपांतरण 

मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं अत्यंत आनंदित हूं अपने हृदय की थोड़ी सी बात आपसे कर पाऊंगा इसलिए। आनंद जितना बंट जाए, उतना बढ़ जाता है। जो मुझे दिखाई पड़ता है जीवन जैसा सुंदर, जैसा संगीत से पूर्ण, जैसा आह्लादकारी, जैसी धन्यता मुझे उसमें दिखाई पड़ती है, हृदय में कामना उठती है आपको भी जीवन वैसा दिखाई पड़े। और स्मरण रहे, जीवन वैसा ही हो जाता है जैसी देखने की हमारे पास दृष्टि होती है। वही जीवन नरक हो सकता है, वही स्वर्ग भी; वही बंधन हो सकता है और वही मुक्ति भी। लेकिन इधर कई हजार वर्षों से जीवन को बदलने की नहीं बल्कि जीवन से भागने की शिक्षा दी गई।
समझाया गया है कि जीवन को छोड़ दो, और समझाया गया है कि जीवन से ही जो मुक्त हो जाए वही परम धन्य है। यह बात एकदम घातक, एकदम विष-भरी है। इस शिक्षा का यह दुष्परिणाम हुआ, इस संस्कार का यह
दुष्परिणाम हुआ कि जो जीवन बदला जा सकता था, जो दृष्टि इसी जीवन में परमात्मा को अनुभव कर सकती थी, उसके पैदा होने की सारी संभावना समाप्त हो गई।