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शनिवार, 5 मई 2012

आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--

ऊर्जा बह्मांड़—

आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?
       इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।
       सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

जवान रहना है तो मौन हो जाओ? –आइंस्‍टीन की क्रांतिकारी खोज

अल्‍बर्ट आइंस्टीन ने खोज की और निश्‍चित ही यह सही होगी, क्‍योंकि अंतरिक्ष के बारे में इस व्‍यक्‍ति ने बहुत कठोर परिश्रम किया था। उसकी खोज बहुत गजब की है। उसने स्‍वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी क्‍योंकि उसे भय था कि कोई उस पर विश्‍वास नहीं करेगा। खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है। परंतु खोज इतनी महत्‍वपूर्ण थी की उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जग जाहिर करने का तय किया।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

मात्र एक प्रश्न:

1. मनुष्‍य संध्‍या समय क्यों शराब पीना चाहता है?
ये प्रश्‍न मेरे अंतस से उठी एक जिज्ञासा अभीप्सा है। और में प्रत्‍येक मित्र से चाहता हूं, इसका उत्‍तर दे। क्‍योंकि इसका उत्‍तर जीवन में है, जीने की कला में है,  न की किताबों में......बिना झिझक, प्रयास रहित, चाहे वो शराब पिता हो या नहीं ये बात मायने नहीं रखती। शराब तो मैंने भी कभी नहीं पी परन्‍तु प्रश्‍न ने तो मुझे घेर लिया...याद रखे हम सब का उत्‍तर ही मिल एक उत्‍तर होगा......
स्‍वामी आनंद प्रसाद


रविवार, 25 दिसंबर 2011

जीसस के अज्ञात जीवन का रहस्‍य : (ओशो)

ओशो कहते है कि जीसस पूर्णत: संबुद्ध थे किंतु वे ऐसे लोगों में रहते थे जो संबोधि या समाधि के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए जीसस को ऐसी भाषा का प्रयोग करना पडा जिससे यह गलतफहमी हो जाती है कि वे संबुद्ध नहीं थे। प्रबुद्ध नहीं थे। वे दूसरी किसी भाषा का प्रयोग कर भी नहीं  सकते। बुद्ध की भाषा इनसे बिलकुल भिन्‍न है। बुद्ध ऐसे शब्‍दों का प्रयोग कभी नहीं कर सकत कि ‘’मैं परमात्‍मा का पुत्र हूं।’’ वे ‘’पिता’’ और ‘’पुत्र’’ जैस शब्‍दों का प्रयोग नहीं करते क्‍योंकि ये शब्‍द व्‍यर्थ है। परंतु जीसस करते भी क्‍या। जहां वे बोल रहे थ वहां के लोग इसी प्रकार की भाषा को समझते थ। बुद्ध की भाषा अलग है क्‍योंकि वे बिलकुल अलग प्रकार के लोगों से बात कर रहे थे।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

दांतों में छिपे रहस्‍य: ओशो

एक समबुद्ध का निजि अनुभव:

इन पिछले कुछ दिनों से मेरे दांतों में भयानक दर्द है। मैं बिलकुल भी सो नहीं पाया। घंटों लेटे रहते हुए मैंने अपने जीवन में पहली बार दांतों के बारे में सोचा। साधारणतया डेंटिस्ट, दंत चिकित्‍सक को छोड़कर दांतों के बारे में कौन सोचता है।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

दोस्‍तोव्‍सकी और फांसी—

दोस्तोव्सकी को फांसी की सज़ा दी गई थी—रूस के एक चिंतक, विचारक और लेखक को। ठीक छह बजे उसका जीवन नष्‍ट हो ने वाला था, और छह बजने के पाँच मिनट पहले खबर आई , जार की कि वह क्षमा कर दिया गया है। एन वक्‍त पर उसकी फांसी की सज़ा माफ हो गई। दोस्‍तोव्‍सकी ने बाद में अपने संस्‍मरणों में लिखा है। कि उस क्षण जब छह बजने के करीब आ रहे थे तक मेरे मन में न कोई वासना थी और न कोई इच्‍छा थी। न कोई जीवन में रस था। न ही सपने बचे थे।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

चौथी लेश्‍या—तेज(लाल) लेश्‍या–

 
यह जो लाल लेश्‍या है, इसके संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। क्‍योंकि धर्म की यात्रा पर यह पहला रंग हुआ। आकाशी, अधर्म की यात्रा पर संन्‍यासी रंग था। लाल, धर्म की यात्रा पर पहला रंग हुआ। इसलिए हिन्‍दुओं ने लाल को, गैरिक को संन्‍यासी का रंग चुना; क्‍योंकि धर्म के पथ पर यह पहला रंग है। हिंदुओं ने साधु के लिए गैरिक रंग चुना है, क्‍योंकि उसके शरीर की पूरी आभा लाल से भर जाए। उसका आभा मंडल लाल होगा। उसके वस्‍त्र भी उसमे ताल मेल बन जाएं, एक हो जायें। तो शरीर और उसकी आत्‍मा में उसके वस्‍त्रों और आभा में किसी तरह का विरोध न रहे; एक तारतम्‍य,एक संगीत पैदा हो जाये।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

तीसरी लेश्‍या—कापोत लेश्‍या


तीसरी लेश्‍या को महावीर ने ‘’कापोत’’ कहा है—कबूतर के कंठ के रंग की। नीला रंग और भी फीका हो गया। आकाशी रंग हो गया। ऐसा व्‍यक्‍ति खुद को थोड़ी हानि भी पहुंच जाए, तो भी दूसरे को हानि नहीं पहुँचाता। खुद को थोड़ा नुकसान भी होता हो तो सह लेगा। लेकिन इस कारण दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। ऐसा व्‍यक्‍ति प्रार्थी होने लगेगा। उसके जीवन में दूसरे की चिंतना और दूसरे का ध्‍यान आना शुरू हो जायेगा।

दूसरी लेश्‍या--नील लेश्‍या--

 
नील लेश्‍या दूसरी लेश्‍या है। जो व्‍यक्‍ति अपने को भी हानि पहुँचाकर दूसरे को हानि पहुंचने में रस लेता है। वह कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा है। जो व्‍यक्‍ति अपने को हानि न पहुँचाए, खुद को हानि पहुंचाने लगे तो रूक जाये। लेकिन दूसरे को हानि पहुंचाने की चेष्‍टा करे, वैसा व्‍यक्‍ति नील लेश्‍या में है।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

नारी-माहवारी—विद्युत झंझावात

अभी स्‍त्रियों के संबंध में एक खोज पूरी हुई है। उस खोज ने स्‍त्रियों के मन के संबंध में बड़ी गहरी बातें साफ कर दी है। जो अब तक साफ नहीं थी। लेकिन खोज विद्युत की है। मनोवैज्ञानिक जिसे साफ नहीं कर पाता था।
      हजारों साल से स्‍त्री एक रहस्‍य रही है। वह किस तरह का व्‍यवहार करेगी किस क्षण में, अनिश्चित है। स्‍त्री अनप्रिडिक्‍टेबल है, उसकी कोई भविष्‍यवाणी नहीं हो सकती। ज्योतिषी उससे बुरी तरह हार चुके है।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

दूध और कामवासना—

 
दूध असल में अत्‍यधिक कामोत्तेजक आहार है और मनुष्‍य को छोड़कर पृथ्‍वी पर कोई पशु इतना कामवासना से भरा हुआ नहीं है। और उसका एक कारण दूध है। क्‍योंकि कोई पशु बचपन के कुछ समय के बाद दूध नहीं पीता, सिर्फ आदमी को छोड़ कर। पशु को जरूरत भी नहीं है। शरीर का काम पूरा हो जाता है। सभी पशु दूध पीते है अपनी मां का, लेकिन दूसरों की माताओं का दूध सिर्फ आदमी पीता है और वह भी आदमी की माताओं का नहीं जानवरों की माताओं का भी पीता है।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

निजिन्‍सकी का असाधारण नृत्‍य—

 
अभी एक बहुत अद्भुत नृत्‍यकार हुआ पश्‍चिम में—निजिन्सकी। उसका नृत्‍य असाधारण था, शायद पृथ्‍वी पर वैसा नृत्‍यकार इसके पहले नहीं था। असाधारण यह थी वह अपने नाच में जमीन से 10-12 फीट हवा में ऊपर उठ जाता था। जितना की साधारणतया उठना नामुमकिन है। और इससे भी ज्‍यादा आश्‍चर्य जनक यह था कि वह ऊपर से जमीन की तरफ आता था तो इतने स्‍लोली, इतने धीमें आता था कि जो बहुत हैरानी की बात है।

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

अंधी लड़की बिना हाथ से छू कर पढ़ना—

  पिछले दस वर्ष पहले1961 में रूस में एक अंधी लड़की ने हाथ से पढ़ना शुरू कर दिया। हैरानी की बात थी। बहुत परीक्षण किए गए। पाँच वर्ष तक निरंतर वैज्ञानिक परीक्षण किए गए। और फिर रूस की जो सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्‍था है, एकेडमी, उसने घोषणा की; पाँच वर्ष के निरंतर अध्ययन के बाद कि लड़की ठीक कहती है। और हैरानी की बात है कि हाथ आँख से भी ज्‍यादा ग्रहण शील होकर अध्ययन कर रहे है। अगर लिखे हुए कागज पर—ब्रेल में नहीं, अंधों की भाषा में नहीं आपकी भाषा में लिखे हुए कागज पर—वह हाथ फेरती है तो पढ़ लेती है। आपके लिए हुए कागज पर कपड़ा ढाँक दिया गया है और उस कपड़े पर हाथ रखती है, तो पढ़ लेती है। तो यह तो आँख भी नहीं कर पाती है। यह तो जो वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे है। वे भी नहीं पढ़ पाते है सामने, कि नीचे क्‍या लिखा है।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--2 (एक पहचान परदों के पार)

 
यह तो आपके अहंकार पर सब तरफ से सीधी चोट थी। उससे आपके अंदर क्रोध नहीं उठता होगा?
      मुझे बहुत मजा आ रहा था, विनोद ने उस स्‍थिति का जायका लेते हुए कहा। मैं इतना मस्‍ती में था कि मुझे ओशो के पास रहने का मौका मिल रहा है। मेरे मन की सारी उथल पुथल शांत हो गई थी। शायद इस फकीरी की ही मुझे तलाश थी। मैं खूब काम करता था ओर खूब ध्‍यान करता था। समाधि टैंक मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। उसमें मां के गर्भ जैसी स्‍थिति बनाई जाती है। वहां पर मुझे अपने जन्‍म का अनुभव भी हुआ।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--एक पहचान परदों के पार

मेरा आध्‍यात्‍मिक जीवन तब शुरू हुआ जब मैं उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां पर बहार की कोई चीज में मायना नहीं रखती थी। सब कुछ था मेरे पास: पैसा था, अच्‍छा परिवार था, शोहरत थी, इज्जत.....जो भी इच्‍छाएं थीं सब पूरी हो चुकी थी। उस वक्‍त मैंने यह सोचना शुरू कर दिया कि यह जो चेतना है( कांशसनेस) जिसकी सभी गुरु चर्चा करते है। वह क्‍या है। तो मैं पुस्‍तकों की दुकानों में खोजा करता था। किसी पुस्‍तक में मुझे क्‍या मिलेगा....
      यह किस उम्र में आपकी खोज शुरू हुई?
            वैसे तो में आठ साल का था तभी से में साधुओं के पास जाया करता था। किसी को हाथ दिखा था , किसी के पास आंखें बंद करके, ध्‍यान में बैठ जाता था। फिर मेरी पढ़ाई शुरू हुई, कॉलेज गया तो मेरा यह हिस्‍सा पीछे की और चला गया। मेरे अंदर ख्‍वाहिश जाग उठी के मैं अभिनेता बनूं। उस दिशा में मेरे कदम चल पड़े। वह कहानी ताक सबको पता है। फिर जब मेरा कैरियर कामयाब हो गया तो बचपन की वो चीजें फिर वापस आई। मैं एक दुकान में गया और मैंने परमहंस योगानंद की वह मशहूर किताब खरीद ली: आटो बाई ग्राफी आफ एक योगी—एक ही रात में उसे पुरी पुस्‍तक को पढ़ गया। योगानंद जी की फोटो देख कर मुझे लगा मैं इस आदमी को जानता हूं।
      फिर मेरी ध्‍यान की खोज शुरू हुई। डेढ़ दो साल तक मैंने टी. एम. किया। लेकिन उसमें एक जगह जाकर लगा, अब दिवाल आ गई। थोड़ी बहुत शांति आ जाती है लेकिन उसके बाद कुछ नहीं है। उस बीस मिनट के दौरान थोड़े रंग दिखाई देते थे। दृश्‍य तैरते थे लेकिन आगे क्‍याइसे समझाने वाला कोई नहीं था। उन दिनों हमारे क्षेत्र के विजय आनंद ओशो से संन्‍यास ले चुके थे। महेश भट्ट भी ओशो को सुनते बहुत थे। ये दोनों मेरे अच्‍छे दोस्‍त थे। उनके साथ में पूना आया और ओशो की कुछ कैसेट खरीदे। आश्‍चर्य की बात, उन प्रवचनों में मुझे उन सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर मिल गए जो मेरे मन में चलते थे।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

एक यहूदी लोक कथा—(गधे की कब्र)

एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।
      लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा।