मेरा आध्यात्मिक जीवन तब शुरू हुआ जब मैं उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां पर बहार की कोई चीज में मायना नहीं रखती थी। सब कुछ था मेरे पास: पैसा था, अच्छा परिवार था, शोहरत थी, इज्जत.....जो भी इच्छाएं थीं सब पूरी हो चुकी थी। उस वक्त मैंने यह सोचना शुरू कर दिया कि यह जो चेतना है( कांशसनेस) जिसकी सभी गुरु चर्चा करते है। वह क्या है। तो मैं पुस्तकों की दुकानों में खोजा करता था। किसी पुस्तक में मुझे क्या मिलेगा....
यह किस उम्र में आपकी खोज शुरू हुई?
वैसे तो में आठ साल का था तभी से में साधुओं के पास जाया करता था। किसी को हाथ दिखा था , किसी के पास आंखें बंद करके, ध्यान में बैठ जाता था। फिर मेरी पढ़ाई शुरू हुई, कॉलेज गया तो मेरा यह हिस्सा पीछे की और चला गया। मेरे अंदर ख्वाहिश जाग उठी के मैं अभिनेता बनूं। उस दिशा में मेरे कदम चल पड़े। वह कहानी ताक सबको पता है। फिर जब मेरा कैरियर कामयाब हो गया तो बचपन की वो चीजें फिर वापस आई। मैं एक दुकान में गया और मैंने परमहंस योगानंद की वह मशहूर किताब खरीद ली: आटो बाई ग्राफी आफ एक योगी—एक ही रात में उसे पुरी पुस्तक को पढ़ गया। योगानंद जी की फोटो देख कर मुझे लगा मैं इस आदमी को जानता हूं।
फिर मेरी ध्यान की खोज शुरू हुई। डेढ़ दो साल तक मैंने टी. एम. किया। लेकिन उसमें एक जगह जाकर लगा, अब दिवाल आ गई। थोड़ी बहुत शांति आ जाती है लेकिन उसके बाद कुछ नहीं है। उस बीस मिनट के दौरान थोड़े रंग दिखाई देते थे। दृश्य तैरते थे लेकिन आगे क्या? इसे समझाने वाला कोई नहीं था। उन दिनों हमारे क्षेत्र के विजय आनंद ओशो से संन्यास ले चुके थे। महेश भट्ट भी ओशो को सुनते बहुत थे। ये दोनों मेरे अच्छे दोस्त थे। उनके साथ में पूना आया और ओशो की कुछ कैसेट खरीदे। आश्चर्य की बात, उन प्रवचनों में मुझे उन सारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए जो मेरे मन में चलते थे।