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ओशो की शौर्य गाथा—स्‍वामी संजय भारती लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

जिम जोंस का स्‍वर्ग रथ—सामूहिक बेहोशी

स्‍वर्ग रथ की प्रतीक्षा में—
       सत्‍तर के दशक में अमरीका में एक करिश्‍माई नेता जिम जोंस का प्रभाव बढ़ने लगा। उसके वक्‍तव्‍य बड़े सम्‍मोहक होते और उसके अनुयाई अंधों की तरह उसका अनुसरण करते। जिम जोंस ने कार्ल मार्क्‍स, विंस्‍टन चर्चिल, और एडोल्फ हिटलर जैसे लोगों को गहन अध्‍ययन किया था। उसके जीवन पर किए गए अध्‍ययनों के अनुसार वह बचपन से मृत्‍यु की घटना से बड़ा प्रभावित था। अक्‍सर छोटे-छोटे मृत जानवरों को लाकर उनका अंतिम संस्‍कार किया करता था। वह अपनेआप को महात्‍मा गांधी, कार्ल मार्कस, जीसस और बुद्ध का अवतार भी कहता था।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

ओशो: भगवान या आम आदमी ?

ए बी पी न्‍यूज का प्रश्न—
     18 जनवरी को सायं 9:30 अपने प्राइम स्‍लॉट पर प्रमुख न्‍यूज चैनल ए बी पी ने ओशो की पुण्‍य तिथि’—19 जनवरी—के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया। इससे पहले कि हम इस कार्यक्रम की विषय वस्‍तु पर बात करें, यह स्‍पष्‍ट हो जाना जरूरी है कि ओशो की कोई पूण्‍य तिथि नहीं है। ओशो के लिए सभी तिथियां पुण्‍य है क्‍योंकि उनकी देशना के अनुसार इस अस्‍तित्‍व में पुण्‍य के अतिरिक्‍त और कुछ है ही नहीं। जन्‍म-मरण की तिथियां ओशो पर लागू नहीं होती। अपना शरीर छोड़ने के चालीस दिन पूर्व ही लिखवा दिया था—ओशो: जिसका न कभी जन्‍म हुआ न मृत्‍यु,जो केवल इस पृथ्‍वी ग्रह की यात्रा पर आये।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

ओशो) आपको गोली क्‍यों न मार दी जाए?

  ‘’28 अगस्‍त 1968 को जो क्रांति–स्‍वर उठाया था, उसका अलगा चरण प्रारंभ हुआ 28 सितंबर से। ऐतिहासिक गोवालिया टैंक मैदान में, जहां गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरू आत की थी। संयोगवश उसी वर्ष भारत छोड़ो आंदोलन की रजत जयंती के अवसर पर गोवालिया टैंक का नाम बदल कर अगस्‍त कांति मैदान कर दिया गया। उस समय कौन जानता था कि 1968 की अगस्‍त कांति पूरी मनुष्‍यता के इतिहास का ही नया खाका खींचने वाली है।‘’
      ढलते हुए मानसून का मौसम बंबई में बड़ा खूबसूरत होता है, इसलिए चार दिन को ये सभा खुले मैदान में रखने का तय हुआ था। लेकिन 28 सितंबर को सुबह से ही झड़ी लगी हुई थी। आशंका थी कि शायद काफी लोग जो आना चाहते थे वे न आ पाएँ। लेकिन शाम होते-होते बादल भी छंट गये और सभा शुरू होने से काफी पहले ही मैदान भी पूरा भर गया। इधर प्रेस भी अपने पूरे दल-बल समेत मौजूद था। अध्‍यात्‍म से जुड़े एक व्‍यक्‍ति द्वारा सेक्‍स पर चर्चा होगी। यह प्रेस के लिए एक अच्‍छी कहानी का मसाला था। लेकिन शायद इस सभा में उन्‍हें बहुत बार चौंकना था।

मंगलवार, 5 जून 2012

‘’ओशो की शौर्य गाथा’’—स्‍वामी संजय भारती

ओशो किसी और तैयारी में थे--
      जैसा कि हमने पीछे देखा, धर्म और राजनीति की मशीनरी या तो ओशो के जबरदस्‍त विरोध में थी या मौन समर्थन में जिसे कोई खास समर्थन नहीं कहां जा सकता। लेकिन इस दौर में ज्‍यों-ज्‍यों उनकी आवाज ऊंची और पैनी होती गई, उनके कार्य के प्रति भारतीय समाज के धुरंधरों का ध्रुवीकरण होता गया। जहां राजनेता और धर्माचार्य उनके प्रति अपने वैमनस्‍य में सने हर कोशिश कर रहे थे कि उन्‍हें बोलने ही नहीं दिया जाए, उन्‍हें गोली ही क्‍यों न मार दी जाए, वही साहित्‍य और कला के क्षेत्र से जुड़े हुए प्रमुख नाम उनके पक्ष में आकर खड़े होते हुए—और उनका समर्थन नेहरू या शास्‍त्री की तरह मौन नहीं मुखर था।