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सोमवार, 3 नवंबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-27)

मनुष्‍यत्‍व : बढ़ते हुए होश की धारा—(प्रवचन—सत्‍ताइसवां)

दिनांक 12 सितम्‍बर,1972,
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

चतुरंगीय—सूत्र :

      चत्तारि परमंगाणि, टुल्लहाणीह जंतुणो।
माणुसत्तं सुई सद्धा, संजमम्मि य वीरियं।।
कम्माणं तु पहाणए, आणुपुव्‍वी क्याई उ।
जीवा सोहिमणुप्पत्ता, आययन्ति्र मणुस्सयं।।
माणुसत्तम्मि आयाओं, जो धम्मं सोच्च सद्हे।
तवस्सी वीरियं लडूं, संबुडे निद्धृणे स्व।।

 संसार में जीवों को इन चार श्रेष्ठ अंगों का प्राप्त होना बड़ा दुर्लभ है—मनुष्यत्व, धर्म—श्रवण, श्रद्धा और संयम के लिए पुरुषार्थ।

महावीर वाणी-(प्रवचन-26)

विनय—शिष्‍य का लक्षण है—(प्रवचन—छब्‍बीसवां)

दिनांक 11 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, मुम्‍बई।

 विनय—सूत्र:

      आणा—निद्देसकरे, गुरुणमुववायकारए।
इंगिया—ऽऽ गारसंपन्ने, से विणीए त्ति बुच्चई।।
अह पन्नरसहिं ठाणेहिं, सुविणीए ति बुच्चई।
नीयावत्ती अचवले, अमाई अकुऊहले।।
अप्प च अहिक्सिवई, पबन्धं च न कुब्बई।
मेत्तिजमाणो भयई, सुयं लध्‍दुं न मज्जई।।
नय पावपरिक्सेवी, न य मित्तेसु कुप्पई।
अप्पियस्साऽवि मित्तस्त, रहे कल्लाण भासई।।
कलहड़मरवज्जिए, बुद्धे अभिजाइए।
हरिमं पडिसंलीणे, शुइवणीए ति बुच्चई।।

शनिवार, 1 नवंबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-25)

अरात्रि भोजन : शरीर—ऊर्जा का संतुलन—(प्रवचन—पच्‍चीसवां)

      दिनांक 10 सितम्‍बर, 1972;
      द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
      पाटकर हाल, बम्‍बई।

अरात्रि—भोजन—सूत्र :

      अत्थंगयंमि आइज्‍चे, पुरत्था य अणुग्गए।
आहारमाइयं सव्‍वं, भणसा वि न पत्थए।।
पाणिवह—मुसावायाऽदत्त मेहुण—परिग्गहा विरओ।
राइभोयणविरओ, जीवो भवइ अणासवो।।

 सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद श्रेयार्थी को सभी प्रकार के भोजन—पान आदि की मन से भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन, परिग्रह और रात्रि—भोजन से जो जीव विरत रहता है, वह निराश्रव अर्थात निर्दोष हो जाता है।

महावीर वाणी-(प्रवचन-24)

संग्रह : अंदर के लोभ की झलक—(प्रवचन—चौबीसवां)

दिनांक 9 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण, व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

अपरिग्रह—सूत्र:

 न सो परिग्गह बुत्तो, नायपुत्तेण ताइणा।
मूच्‍छा परिग्गहो द्वी, इइ बुतं महेसिणा।।
लोहस्सेस अणुकोसी, मन्ने अन्नरामवि।
जे सिया सन्निहिकामे, गिही पब्बइए न से।।

 प्राणिमात्र के संरक्षक ज्ञातपुत्र ( भगवान महावीर) ने कुछ वस्‍त्र आदि स्थूल पदार्थों के रखने को परिग्रह नहीं बतलाया है। लेकिन इन सामग्रियों में असक्ति, ममता व मूर्छा रखना ही परिग्रह है, ऐसा उन महर्षि ने बताया है।
संग्रह करना, यह अंदर रहने वाले लोभ की झलक है। अतएव मैं मानता हूं कि जो संग्रह करने की वृत्ति रखते हैं, वे गृहस्थ हैं, साधु नहीं।

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-23)

ब्रह्मचर्य : कामवासना से मुक्‍ति—प्रवचन—तेईसवां

दिनांक 8 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

ब्रह्मचर्य—सूत्र : 2

      सद्दे रूवे य गंधे य, रसे फासे तहेव य।
पंचविहे कामगुणे, निच्चसो परिवज्जए।।
    कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं,
    सब्बस्स लोगस्स सदेवगस्स।
          जे काइयं माणसिय च किचि,
          तस्सऽन्तगं गच्छइ वीयरागो।।
 देवदाणव गंधब्बा जक्सरक्ससकिन्नरा।
बंभयारि नमंसन्ति टुकरं जे करेलि तं।।
एस धम्मे धुवे निच्चे, सासए जिणदेसिए।
   सिद्धासिज्झन्ति चाणेण, सिाइस्कृस्सन्तितहाऽवरे।।

 शब्द, रूप गंध, रस और स्पर्श इन पांच प्रकार के काम गुणों को भिक्षु सदा के लिए त्याग दें।
देवलोक सहित समस्त संसार के शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुख का मूल काम—भोगों की वासना ही है। जो साधक इस संबंध में वीतराग हो जाता है, वह शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुखों से छूट जाता है।

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-22)

कामवासना है दूसरे की खोज—(प्रवचन—बाइसवां)

दिनांक 7 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

ब्रह्मचर्य—सूत्र : 1

      विरई अबंभचेरस्स, काम—भोगरसत्रुणा।
उग्‍गं महव्ययं बम, धारेयव्‍वं सुदुक्करं।।
मूलमेयमहम्मस्स महोदोससमुस्सयं।
तन्हा मेहुणसंसग्गं, निग्गंधा वज्जयन्ति णं।।
विआ ईत्थिसंसग्गो, पणीय रसभोयण।
नरस्सऽत्तगवेसिस्स, विसं तालउडं जहा।।

 जो मनुष्य काम और भोगों के रस को जानता है, उनका अनुभवी है, उसके लिए अब्रह्मचर्य त्यागकर, ब्रह्मचर्य के महाव्रत को धारण करना अत्यन्त दुष्कर है।
निर्ग्रन्थ मुनि अब्रह्मचर्य अर्थात मैथुन—संसर्ग का त्याग करते है, क्योंकि यह अधर्म का मूल ही नहीं, अपितु बड़े दोषों का भी स्थान
जो मनुष्य अपना चित्त शुद्ध करने, स्वरूप की खोज करने के लिए तत्‍पर है उसके लिए देह का शृंगार, स्त्रियों का संसर्ग और स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन दूध, मलाई, घी, मक्खन, विविध मिठाइयां आदि — का सेवन विष जैसा।

महावीर वाणी-(प्रवचन-21)

सत्‍य सदा सार्वभौम है—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

दिनांक 6 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पयुषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

सत्‍य--सूत्र :

  निच्चकालऽप्पमत्तेणं, मुसावायविवज्जण।
भासियब्ब हिय सच्चं, निच्चाऽऽउत्तेण रूर।।
तहेव सावज्जऽणुमोयणी गिरा,
ओहारिणी जा य परोवघायणी।
से कोह लोह भय हास माणवो,
न हासमाणो वि गिर वएज्‍जा।।

 सदा अप्रमादी व सावधान रहते हुए असत्य को त्याग कर हितकारी सत्य—वचन ही बोलना चाहिए। इस प्रकार का सत्य बोलना सदा बड़ा कठिन होता है।
श्रेष्ठ साधु पापमय, निश्रयात्मक और दूसरों को दुख देने वाली वाणी न बोलें। इसी प्रकार श्रेष्ठ मानव को क्रोध, लोभ, भय और हंसी—मजाक में भी पापवचन नहीं बोलना चाहिए।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-20)

धर्म का मार्ग : सत्‍य का सीधा साक्षात्—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 5 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल,बम्‍बई।

धम्म—सुत्र : 3

 जहां सागडिओ जाण, समं हिच्चा महापहं।
विसम मग्गमोइण्णो, अक्से भग्गम्मि सोयई।।
एवं धम्मं विउकम्म, अहम्म पडिवजिया।
वाले मुस्तुमुहं पत्ते, अक्सेभग्गे व सोयई।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
अहम्मं कुणमाणस्स, अफला जन्ति राइओ।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
धम्म च कुणमाणस्स, सफला जन्ति राइओ।।
जरा जाव न पीडेई, वाही जाव न वड्ढई।
जाविन्दिया न हायति, ताव धम्म समायरे।।

 जिस प्रकार मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़ विषम (टेढ़े—मेढ़े, ऊबड़—खाबड़) मार्ग पर चल पड़ता है और गाड़ी की धुरी टूट जाने पर शोक करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य जान—बूझकर धर्म मार्ग को छोड़कर अधर्म मार्ग को पकड़ लेता है और अंत में मृत्यु मुख में पहुंचने पर जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।

महावीर वाणी-(प्रवचन-19)

धर्म : एक मात्र शरण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

     दिनांक 4 सितम्‍बर, 1972;
      द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
      पाटकर हाल, बम्‍बई।

धम्म—सूत्र : 2

      जरामरणवेगेण, वुज्झमाणाण पाणिणं।
धम्मों दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं।।

 जरा और मरण के तेज प्रवाह में बहते हुए जीव के लिए धर्म ही एकमात्र द्वीप, प्रतिष्ठा, गति और उत्तम शरण है।

अरस्‍तु ने कहा है कि—यदि मृत्यु न हो, तो जगत में कोई धर्म भी न हो। ठीक ही है उसकी बात, क्योंकि अगर मृत्यु न हो, तो जगत में कोई जीवन भी नहीं हो सकता मृत्यु केवल मनुष्य के लिए है।
इसे थोड़ा समझ लें।
पशु भी मरते है, पौधे भी मरते है, लेकिन मृत्यु मानवीय घटना है। पौधे मरते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मृत्यु का कोई बोध नहीं है। पशु भी मरते हैं, लेकिन अपनी मृत्यु के संबंध में चिंतन करने में असमर्थ है।

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-18)

कायोत्‍सर्ग : शरीर से विदा लेने की क्षमता—(प्रवचन—अठारहवां)
 

      दिनांक 4 सितम्‍बर, 1971;
      प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
      पाटकर हाल, बम्‍बई।

      धम्‍म—सूत्र :

धम्मो मंगलमुकिट्ठं,
अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति,
जस्त धम्मे सया मणो।।

 धर्म सर्वश्रेष्ठमंगल है। (कौनसा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्र रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

महावीर के साधना सूत्रों में आज बारहवें और अंतिम तप पर बात करेंगे। अंतिम तप को महावीर ने कहा है—कायोत्सर्ग— शरीर का छूट जाना। मृत्यु में तो सभी का शरीर छूट जाता है। शरीर तो छूट जाता है मृत्यु में, लेकिन मन की आकांक्षा शरीर को पक्के रखने की नहीं छूटती।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-17)

सामायिक : स्‍वभाव में ठहर जाना—(प्रवचन—सत्रहवां) 
 

दिनांक 3 सितम्‍बर, 1971;
प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल; बम्‍बई

धम्म—सूत्र:

धम्मो मंगलमुकिट्ठं,

अहिंसा संजमो तवों।

देवा वि तं नमंसन्ति,

जस्म धम्मे सया मणो।।

 धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलन्‍ग रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

ग्‍यारहवां तप या पांचवां अंतर—कर—तप है ध्यान। जो दस तपो से गुजरते है उन्हें तो ध्यान को समझना कठिन नहीं होता। लेकिन जो केवल दस तपो को समझ से समझते हैं, उन्हें ध्यान को समझना बहुत कठिन होता है। फिर भी कुछ संकेत ध्यान के संबंध में समझे जा सकते हैं।

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-16)

वैयावृत्य और स्वाध्याय—(प्रवचन—सोलहवां)

 दिनांक 2 सितम्बर, 1971;
प्रथम पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

धम्म-सूत्र

धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,
अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति,
जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

तीसरा अंतरत्तप महावीर ने कहा है, वैयावृत्य। वैयावृत्य का अर्थ होता है--सेवा। लेकिन महावीर सेवा से बहुत दूसरे अर्थ लेते हैं।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-15)

विनय : परिणति निरअहंकारिता की—(प्रवचन—पन्‍द्रहवां)


दिनांक 1 सितम्‍बर,1971;
प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल बम्‍बई।

धम्म-सूत्र :
 धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,
अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति,
जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

अंतरत्तप की दूसरी सीढ़ी है विनय। प्रायश्चित के बाद ही विनय के पैदा होने की सम्भावना है। क्योंकि जब तक मन देखता रहता है दूसरे के दोष, तब तक विनय पैदा नहीं हो सकती। जब तक मनुष्य सोचता है कि मुझे छोड़कर शेष सब गलत हैं, तब तक विनय पैदा नहीं हो सकती।