ओशो
सर्वथा मौलिक
हैं, क्योंकि
उनकी
सत्व
की अनुणतइ
शाख्यों रो
नहीं हुई,
उधार
ज्ञान से नहीं
हुई, परमात्मा
के मूल
स्त्रोत
से जुड़ने से
हुई है। जो मूल
से जुड
जाता
है वह मौलिक हो
जाता है।
ओशो
कौन हैं? यह
प्रश्न लाखों
नए
जिज्ञासुओं
का भी प्रश्न है।
इस प्रश्न का
उत्तर देना
बहुत कठिन है,
क्योंकि
कोई भी उत्तर
बहुत छोटा और
ओछा होगा, कण
मात्र कह
पाएंगें और एक
महासागर पीछे
छूट जाएगा।
ओशो एक ऐसे
बहु— आयामी
व्यक्तित्व
का नाम है—
व्यक्तित्व
ही नहीं, अस्तित्व
का नाम है।

