कुल पेज दृश्य

नये भारत का जन्म-(राष्ट्रीय-सामाजिक) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नये भारत का जन्म-(राष्ट्रीय-सामाजिक) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-11)

ग्यारहवां-प्रवचन-(ओशो)

मेरा भरोसा व्यक्ति पर है

प्रश्नः पंद्रह अगस्त के दिन मैंने कहा, उसी संदर्भ में पूरे हिंदुस्तान की स्थिति स्वरूप में है, उसके लिए कौन जिम्मेवार? हमारे नेता और हम?
उसके लिए हमारे नेता जिम्मेवार हैं। लेकिन हमारे नेताओं के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। अंततः की जिम्मेवारी हमारी ही है। क्योंकि हमारे नेता हमसे कुछ अलग और भिन्न नहीं हैं। और हमने उन्हें चुना है, तो यह हमारी मनोस्थिति के प्रमाण हैं। हमारी जिम्मेवारी में, दो-चार बातें बहुत बुनियादी हैं। जैसे एक तो हमारी कोई राजनीतिक चेतना, कोई पोलिटिकल कनसनट्रेट नहीं है। आजादी की लड़ाई भी जो हम संघर्ष कर रहे थे, वह भी हमें राजनीतिक रूप से चेतन नहीं कर पाया। और न करने का कारण था कि हिंदुस्तान की पूरी परम्परा धार्मिक चेतना की परम्परा है। उसके पास कोई राजनीतिक चेतना नहीं। स्वभावतः इसीलिए हम इतने दिन तक गुलाम भी रह सके। क्योंकि हमारे धार्मिक मन को हमारी राजनीतिक गुलामी से कोई अंतर नहीं पड़ता। यदि हमने स्वतंत्रता के संबंध में भी कभी सोचा है, तो वो आतीक स्वतंत्रता की बात है। हमारा शरीर भी स्वतंत्र हो, हमारा सामान्य जीवन भी स्वतंत्र हो, उसके आगे हमारी कोई कामना नहीं थी। हमारी आत्मा मोक्ष जाए, तो आत्मा तो जंजीरों में भी मोक्ष जा सकती है और जेलखाने में भी मोक्ष जा सकती है। इसलिए भारत के पास जिसको पोलिटिकल कनसनट्रेट कहें, वह है ही नहीं।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-10)

दसवां-प्रवचन-(ओशो)

अध्यात्म बीमारी बन गया

भारत के दुर्भाग्य की कहानी तो लंबी है। लेकिन इस कहानी के बुनियादी सूत्र बहुत थोड़े, बहुत पंक्चुअल हैं। तीन सूत्रों पर मैं आपसे बात करना चाहूंगा। और एक छोटी सी कहानी से शुरू करूंगा।
सुना है मैंने एक ज्योतिषी, रात्रि के अंधेरे में, आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ, किसी गांव के पास से गुजरता था। आकाश को देख रहा था, इसलिए स्वभावतः जमीन को देखने की सुविधा न मिली। आकाश के तारों पर नजर थी, इसलिए पैर कहां मुड़ गए, यह पता न चला, और वह एक सूखे कुएं में गिर पड़ा। चिल्लाया बहुत, पास से किसी किसान की झोपड़ी से लोगों ने निकल कर उसे बचाया। किसान भी घर पर न था, उसकी बूढ़ी मां ही घर पर थी। किसी तरह उस ज्योतिषी को बाहर निकाला जा सका था। और जब वह बाहर निकल आया तो उसने स्वभावतः धन्यवाद दिया, और उस बूढ़ी औरत को कहा कि मां, अगर कभी ज्योतिष के संबंध में कुछ समझना हो, तो इस समय पृथ्वी पर तारों को मुझसे ज्यादा जानने वाला कोई भी नहीं, तुम आ जाना। उस बूढ़ी स्त्री ने कहाः क्षमा करो मुझे। जिसे अभी जमीन के गड्ढों का पता नहीं, उसके आकाश के तारों के ज्ञान का भरोसा नहीं हो सकता।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-09)

नौवां-प्रवचन-(ओशो)

चरित्रहीनता के कारण ही गुलामी आई

साधारणतः हम ऐसा ही सोचते हैं कि गुलामी के कारण हमारा चरित्र नष्ट हो गया है। गुलामी के कारण हमारा व्यक्तित्व नष्ट हुआ लेकिन...
प्रश्नः अभी जरा कठिनाई है कि गुलामी आई तभी से चरित्रहीन रहे,...?
इसको, इसको मैं कहना चाहता हूं। इसको ही मैं कहना चाहता हूं। चरित्रहीनता जो है, वह गुलामी के कारण नहीं आई, बल्कि चरित्रहीनता के कारण ही गुलामी आई। और चरित्रहीन हम बने ऐसा कहना मुश्किल है, चरित्रहीन हम थे। बनने का तो मतलब यह होता है कि हम चरित्रवान थे। फिर हम चरित्रहीन बने। तो हमें कारण खोजने पडे. कि हम चरित्रवान कैसे थे? कब थे? और कैसे हम चरित्रहीन बने। मुझे नहीं दिखाई पड़ता कि हम कभी चरित्रवान थे। हमारी चरित्रहीनता बड़ी पुरानी है।
और चरित्रहीनता का जो बुनियादी कारण है, वह हमारी संस्कृति में सदा से मौजूद है। उसकी वजह से गुरूवाणी का आनंद बिल्कुल स्वाभाविक था। और आज भी आ जाना बिल्कुल स्वाभाविक है। और अगर हम जो भी इंतजाम करेंगे चरित्रवान बनने के वे सफल होने वाले नहीं हैं। वे सफल इसलिए नहीं होंगे कि हम फिर वही इंतजाम करेंगे, जो हमने सदा से किया था। जैसे, एक तो चरित्र से हम जो मतलब लेते रहे इस देश में, वो मतलब भी बड़ा भ्र्रांत है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-08)

आठवां-प्रवचन-(ओशो)

दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ेगी

मैं मानता ही ऐसा हूं कि पूंजीवाद का काम ही यह है कि इतनी संपत्ति पैदा कर जाए कि समाजवाद संभव हो सके।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
नहीं ऐसा नहीं है क्योंकि माक्र्स के ख्याल में ऐसा है, कि पूंजीवाद समाजवाद नहीं लाएगा। पूंजीवाद अपने अंतर्कलह पैदा करेगा। और अंतर्कलह समाजवाद लाएंगे। मेरी ऐसी धारणा नहीं है। माक्र्स का ख्याल यह है पूंजीवाद ऐसी स्थिति पैदा कर देगा कि अभी जो तीन वर्ग हैं समाज में, पूंजीपति का वर्ग, पूंजीहीन का वर्ग और मध्यम-वर्ग, पूंजीवाद का शोषण मध्यम-वर्ग को नष्ट कर देगा। मध्यमवर्ग का बड़ा हिस्सा सर्वाहारा हो जाएगा। छोटा सा हिस्सा पूंजीवादी हो जाएगा और समाज सीधा दो हिस्सों में कट जाएगा। जिस दिन समाज दो वर्गाें में सीधा कट जाएगा, उस दिन पूंजीवाद की अन्तर्कलह ही पूंजीवाद की मृत्यु बन जाएगी।

मेरी दृष्टि बिलकुल भिन्न है, मेरी समझ ऐसी है कि जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होगा, मघ्यमवर्ग नष्ट नहीं होता, जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता, मजदूर का वर्ग नष्ट होता है। और अन्ततः एक ऐसी समाज स्थिति बनती है जहां, वह मध्यमवर्ग ही रह जाता, जिसके एक छोर पर धनी रहता है, दूसरे छोर पर निर्धन रहता है, लेकिन मध्यवर्ग अकेला वर्ग रह जाता है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-07)

सातवां-प्रवचन-(ओशो)
 

देश धन के लिए बीमार हो गया

जब कोई सभ्यता सड़ती है, तो उसकी दुर्गंध, उसके व्यापारी वर्ग से सबसे ज्यादा आनी शुरू होती है। ये स्वाभाविक है। इसके पीछे कारण है। समाज का खून है धन, धन समाज की नसों में दौड़ता है, खून की तरह। और जब खून सड़ जाए, तो सारे समाज के शरीर पर फोड़े-फुंसियां और बीमारियां, प्रकट होनी शुरू हो जाती हैं। या अगर कभी ऐसा हो, कि किसी आदमी के पूरे शरीर पर फोड़े-फुंसियां और मवाद फैले लगे, तो जान लेना चाहिए कि भीतर खून सड़ गया होगा। व्यापारी समाज की रीढ़ है। और धन समाज का खून, और जब सभ्यता पुरानी होती चली जाती है, तो खून सड़ जाता है। और सारी दुर्गंध व्यापारी से निकलनी शुरू हो जाती है। भारत यी सभ्यता की सड़ांद, भारत की जो अर्थव्यवस्था है उससे पूरी तरह निकलनी शुरू हो गई है। और आज ही निकल रही है ऐसा नहीं है। सैकड़ो वर्षाें से निकल रही है। क्योंकि हमने नए को पैदा करने की क्षमता खो दी है। पुरानों को दफनाने की क्षमता भी खो दी है। न हम पुराने को मरघट तक पहुंचा सकते हैं, और न नए को जन्म देने के लिए प्रसव की पीड़ा, झेलने की हमारी हिम्मत है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-06)

छठवां-प्रवचन-(ओशो) 

क्रांति का आधार सूत्र हैः विचार

हजारों लोग उस आदमी के पीछे थे। औरंगजेब ने अपने महल की खिड़की से झांक कर देखा और पूछा कौन मर गया? नीचे से लोगों ने कहा कौन पूछते हैं, भलीभांति पता होगा आपको, संगीत की मृत्यु हो गई। औरंगजेब हंसा और उसने कहाः बहुत अच्छा हुआ कि संगीत की मृत्यु हो गई। अब जरा मरे हुए संगीत को गहराई से गाड़ देना, ताकि वह वापस न निकल आए। यह घटना आपने सुनी होगी। आज ऐसा लगता है कि फिर दिल्ली में अरथी निकालनी चाहिए और जब आज के औरंगजेब पूछे बाहर झांक कर, तो कहना चाहिए कि विचार की मृत्यु हो गई। पक्का है कि आज के औरंगजेब भी यहीं कहेंगे कि थोड़ा ठीक से गाड़ देना, यह विचार कहीं निकल न आएं।
विचार की हत्या के प्रयास बहुत पुराने हैं। और इस देश में, इस देश में तो विचार को ठीक से जन्म ही नहीं मिल पाया। और जिस देश में विचार का जन्म न हो, उस देश में क्रांति की कोई भी उम्मीद नहीं है। क्योंकि क्रांति का मौलिक सूत्र है विचार। क्रांति का आधार सूत्र है विचार। विचार के खिलाफ क्यों हैं औरंगजेब? चाहे किसी जमाने के हों। और ऐसा ही नहीं है कि इस दुनिया के औरंगजेब ही, सारी दुनिया के औरंगजेब विचार के क्यों खिलाफ हैं? फिर चाहे वे चीन के औरंगजेब हों, चाहे रूस के, और चाहे भारत के, और चाहे अमेरिका के। औरंगजेब हमेशा ही विचार के खिलाफ क्यों है?

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-05)

पांचवां-प्रवचन-(ओशो)

अहंकारी समाज सदा पीछे देखता है

एक काफिला रास्ता भटक गया था। आधी रात गए, एक रेगिस्तानी सराय में, उस काफिले को शरण मिली। बड़ा था काफिला, बहुत सौदागर थे। सौ ऊंटों पर लदा हुआ सामान था। थक गए थे, रात थक गए थे। शीघ्र उन्होंने खूटियां गाड़ कर ऊंटों को बांधा, विश्राम करने की तैयारी करने लगे, तभी पता चला कि एक ऊंट की खूंटी और रस्सी कहीं रास्ते में गिर गई। निन्यानबे ऊंट बंध गए, एक ऊंट अनबंधा रह गया। ऊंट को अनबंधा छोड़ना खतरनाक था। रात कहीं भटक सकता था। उन्होंने सराय के बूढ़े मालिक को जाकर काफिले के सरदार ने कहा, अगर एक खूंटी और रस्सी मिल जाए, तो बड़ी कृपा हो, हमारा एक ऊंट अनबंधा रह गया है। उस सराय के बूढ़े मालिक ने कहा, खूंटी और रस्सी की क्या जरूरत है, तुम तो खूंटी गाड़ दो और रस्सी बांध दो। वे लोग बहुत हैरान हुए, उन्होंने कहा, खूंटी हमारे पास होती तो, हम खुद ही गाड़ देते, कौन सी खूंटी दें? उस बूढ़े ने कहा झूठी खंूंटी गाड़ दो और झूठी रस्सी बांध दो। वह लोग कहने लगे आप भी पागलपन की बातें कर रहे हैं, झूठी खूंटी से कहीं ऊंट बांधे गए हैं?
झूठी रस्सी से कभी ऊंट बंधे हैं? उस बूढ़े ने कहा कि मैंने आदमियों और सबको झूठी खूंटियों से बंधा देखा है, ऊंट का क्या हिसाब है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-04)

प्रवचन-चौथा-(ओशो)

किनारों से जंजीर भी छूट जाना जरूरी है

और कुछ लड़के एक मौजूदा आलम में इकट्ठे हुए। आधी रात गए तक उन्होंने शराब पी, फिर बाहर गए, चांद को देख कर मन में खयाल आया कि चलें नदी तक, नौका विहार करें। वे नदी पर गए, मछुए अपनी नावें बांध कर घर जा चुके थे। उन्होंने देखा एक बड़ी नाव थी, पतवारें खोली, नाव को खेना शुरू किया, नशे में धुत थे, चांदनी रात थी, मौज में थे, गीत गाने लगे। पतवार चलाने लगे। जोर से उन्होंने पतवार चलाईं, नाव खेई। पता नहीं कितनी देर तक नाव खेते रहे, कितनी दूर तक। जब सुबह की हवाएं बहने लगीं, और नशा कुछ उतरा तो खयाल आया। न मालूम कितनी दूर निकल आए वह। अब वापस लौट चलना चाहिए।
कहा किसी एक ने कि नाव को देख लो, कि वह किस दिशा में चले आए हैं। क्योंकि नशे में थे हम, हवाओं की दिशा का कोई हिसाब नहीं, कोई ठिकाना नहीं।
हम पूरब आए कि पश्चिम, हम अपने गांव से कितनी दूर हैं, कुछ पता नहीं। एक मित्र नाव से उतरा और जमीन पे खड़ा होकर हंसने लगा, दूसरे मित्रों ने पूछा हंस रहे हो क्या हुआ? तो उसने कहाः तुम भी उतरो।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-03)

तीसरा-प्रवचन-(ओशो)

वैज्ञानिक चिंतन आना चाहिए

मैं तो अधिनायकशाही के पक्ष में ही नहीं हूं। वह सिर्फ मजाक में कही बात को...। कहा मैंने कुल इतना था कि जैसा लोकतंत्र चल रहा है, इस देश में इससे तो अच्छा होगा कि देश में तानाशाही हो जाए। वो तानाशाही भी इससे ज्यादा विनिवलेंट होगी। और ये सिर्फ मजाक में कहा कि इस लोकतंत्र से तो तानाशाही भी बेहतर हेागी। तानाशाही बेहतर होती है, यह मैंने कहा नहीं। लेकिन समझ यह लिया गया कि मैं तानाशाही को बेहतर मानता हूं। बिलकुल ही नासमझी है। मुझसे ज्यादा विरोध में तानाशाही के शायद ही कोई आदमी हो। और पाकिस्तान में असफल हो गई ऐसा नहीं। सारे इतिहास में, हमेशा असफल होती रही है। और कभी भी सफल नहीं होगी।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, हां, मेरी आप बात समझे न। दुनिया में परतंत्रता सफल नहीं हो सकती है, उसका चाहे कोई भी रूप हो। परतंत्रता को असफल होना ही पड़ेगा। क्योंकि मनुष्य की आत्मा किसी तरह की परतंत्रता को स्वीकार करने को राजी नहीं है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-02)

दूसरा-प्रवचन-(जगत बहुत यथार्थ है)

मेरे प्रिय आत्मन्!
रोम के एक चैराहे पर बारह भिखारी लेटे हुए थे। एक परदेसी यात्री उस चैराहे से गुजरता था। वे बारह भिखारी ही हाथ फैला कर भीख मांगने लगे। उस यात्री ने खड़े होकर कहा कि तुममें जो सबसे ज्यादा अलाल हो, उसी को मैं भीख दे सकता हूं। उन बारह भिखारियों में से ग्यारह भिखारी दौड़ कर उसके सामने खड़े हो गए। और प्रत्येक दावा करने लगा कि मुझसे ज्यादा अलाल और कोई भी नहीं है। भीख मुझे मिलनी चाहिए। लेकिन वह यात्री हंसा और उसने कहा कि तुम ग्यारह ही हार गए। बारहवां आदमी अपनी जगह ही लेटा हुआ था और वहीं से पुकार कर रहा था कि मैं अलाल हूं, भीख मुझे मिलनी चाहिए। वह रूपया जो उसे देना था, बारहवें आदमी को दे दिया उसने। वही अलाल सबसे ज्यादा था। उसने उठने की भी मेहनत नहीं ली थी।

मैं सोचता हूं यह घटना भारत के भी किसी गांव में घट सकती है, बंबई में या दिल्ली में। लेकिन एक फर्क पड़ेगा, यहां ग्यारह आदमी लेटे रहेंगे और एक आदमी उठेगा। और वह यात्री मुश्किल में पड़ जाएगा। एक आदमी को तो भीख देनी आसान है, ग्यारह आदमियों को भीख देनी बहुत मुश्किल हो जाएगी। यह फर्क क्यों पड़ेगा? यह फर्क इसलिए पड़ेगा कि भारत से ज्यादा अलाल, भारत से ज्यादा आलस्य से भरा हुआ मनुष्य खोजना पृथ्वी पे मुश्किल है।

नये भारत का जन्म-(प्रवचन-01)

नये भारत का जन्म-(राष्ट्रीय-सामाजिक) -ओशो 

पहला-प्रवचन-(झूठे शब्दों से सावधान) 

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात शुरू करना चाहूंगा।
ऐसा ही एक स्कूल था तुम्हारे स्कूल जैसा। बहुत छोटे-छोटे बच्चे थे उस स्कूल में। ऐसी ही एक सुबह होगी, स्कूल खुला होगा और एक इंस्पेक्टर स्कूल के निरीक्षण के लिए आया। उसे स्कूल की बड़ी कक्षा में ले जाया गया। उसने उस स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों से कहा कि तुम्हारी कक्षा में जो तीन बच्चे सबसे ज्यादा आगे हैं, जो पहला हो, दूसरा हो, तीसरा हो, उन तीनों बच्चों को मैं एक के बाद एक बुलाऊंगा, वह आकर बोर्ड पर सवाल हल करे।
पहला बच्चा उठ कर आया और उसने सवाल हल किया। फिर दूसरा बच्चा भी उठ कर आया, उसने भी सवाल हल किया। फिर तीसरा बच्चा उठ कर आया, लेकिन उठते समय वह थोड़ा झिझका, डरा, बोर्ड के पास आकर भी ऐसा लगा जैसे भयभीत है।
फिर उसने बोर्ड पर सवाल शुरू किया। इंस्पेक्टर उसे देख कर थोड़ा हैरान हुआ। और उसे शक हुआ कि शायद यह तो पहला ही बच्चा है जो पहले भी आ चुका और अब फिर आ गया। उसने उस बच्चे को रोका और पूछा कि मुझे तुम्हारा चेहरा पहचाना हुआ मालूम पड़ता है। लगता है तुमने पहली बार भी आकर सवाल हल किया था।