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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

ओशो मंडल ध्‍यान - (OSHO Mandala Meditation)

 OSHO Mandala Meditation-(ओशो मंडल ध्‍यान)

मंडल ध्‍यान और बुढ़ापा-  हां  कुछ सालों पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिस में कहां था की बुढ़ापा मनुष्‍य के पैरों से शुरू होता है और उसकी प्रक्रिया सर पर महसूस होती है। यानि की आप के मस्‍तिष्‍क  में उर्जा की गति कम से कम तर होती चली  जाती है।

मंडल ध्‍यान एक चमत्कारी ध्‍यान है। इस खास कर जिनके पैरों में या घूटनों  में दर्द रहता है जो चलने में कठिनाई महसूस करते है उन्‍हें तो जरूर करना चाहिए। मेरी समझ में ये ओशो को सम्पूर्ण  ध्‍यान है। सक्रिय ध्‍यान से शुरू करते  है, ये एक पुरूष उर्जा ध्‍यान है  जो आपकी सेक्‍स उर्जा  को  रूपांतरित करे ने में अति सहयोगी वा मददगार है, दूसरा  कुंडली  ध्‍यान ये  एक स्‍त्रेण ध्‍यान है जो आपकी नाभि  चक्र को अति संवदेनशील करने में आपको भय मुक्‍त करने में सहयोगी होगा। एक ध्‍यान है गोरी शंकर जो तीसरी आंख के लिए अति उत्तम है।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें—

धीरे-धीरे ध्‍यान तुम्‍हारे संपूर्ण जीवन में व्‍याप्‍त हो जाना चाहिए। यहां तक की सोने के लिए जाते समय भी।
बिस्‍तर पर लेटने पर कुछ ही मिनटों में तुम नींद की गोद में चले जाओगे। इन कुछ मिनटों में मौन, अँधेरा और विश्रांत शरीर इनके संबंध में सजग रहो। जब तक पूरी तरह से नींद न आ जाए तब तक ऊँघते समय सजग रहो और तुमको आश्‍चर्य होगा। जब तक पूरी तरह नींद आती है तब तक के अंतिम क्षण तक यदि तुम ऐसा अभ्‍यास जारी रखते हो तो फिर सुबह में भी पहला विचार सजगता के संबंध में ही होगा। सोते समय जो तुम्‍हारा अंतिम विचार होगा वही सुबह में जागने पर पहला विचार होगा क्‍योंकि तुम्‍हारी नींद के दौरान यह अंतर-प्रवह के रूप में जारी रहता है।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

हर चक्र की अपनी नींद—ओशो

सहस्‍त्रार को छोड़ कर प्रत्‍येक चक्र की अपनी नींद है। सातवें चक्र में बोध समग्र होता है। यह विशुद्ध जागरण की अवस्‍था है। इसीलिए कृष्‍ण गीता में कहते है कि योगी सोता नहीं। ‘योगी’ का अर्थ है जो अपने अंतिम केंद्र पर पहुंच गया। अपनी परम खिलावट पर जो कमल की भांति खिल गया। वह कभी नहीं सोता। उसका शरीर सोता है। मन सोता है। वह कभी नहीं सोता। बुद्ध जब सो भी रहे होते है तो अंतस में कहीं गहरे में प्रकाश आलोकित रहता है। सातवें चक्र में निद्रा का कोई स्‍थान नहीं होता। बाकी छ: चक्रों में यिन और यैंग, शिव और शक्‍ति, दोनों है। कभी वे जाग्रत होते है और कभी सुषुप्‍ति में—उनके दोनों पहलू है।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

तीसरी आँख को विकसित करने लिए कुछ महत्‍वपूर्ण ध्‍यान: ओशो

(3)नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो
लाओत्‍से ने कहा: व्‍यक्‍ति नासाग्र की और  देखे।
क्‍यों—क्‍योंकि इससे मदद मिलती है, यह प्रयोग तुम्‍हें तृतीय नेत्र की रेखा पर ले आता है। जब तुम्‍हारी दोनों आंखें नासाग्र पर केंद्रित होती है तो उससे कई बातें होती है। मूल बात यह है कि तुम्‍हारा तृतीय नेत्र नासाग्र की रेखा पर है—कुछ इंच ऊपर, लेकिन उसी रेखा में। और एक बार तुम तृतीय नेत्र की रेखा में आ जाओ तो तृतीय नेत्र का आकर्षण उसका खिंचाव, उसका चुम्‍बकत्‍व रतना शक्‍तिशाली है कि तुम उसकी रेखा में पड़ जाओं तो अपने बावजूद भी तुम उसकी और खींचे चले आओगे। तुम बस ठीक उसकी रेखा में आ जाना है, ताकि तृतीय नेत्र का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण सक्रिय हो जाए। एक बार तुम ठीक उसकी रेखा में आ जाओं तो किसी प्रयास की जरूरत नहीं है।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—

ध्‍यान के अंतर्यात्रा पर जो भी चल पड़ता है वह अक्‍सर, अध्‍यात्‍म-जगत के गुह्म विज्ञान से बेहद आकर्षित हो जाता है। इससे पहले कि उसके पैर पार्थिव शरीर की भूमि में दृढ़ता से जम जाएं, वह तीसरे-चौथे-पांचवें सूक्ष्‍म शरीरों की खोजबीन करने लगता है। सुदूर आकाश के ये रहस्‍यपूर्ण टिमटिमाते सितारे उसे बुलाने लगते है। इन सितारों में सर्वाधिक आकर्षक सितारा अगर कोई मालूम होता है तो वह है: ‘’तीसरी आँख का।‘’

तीसरी आँख को विकसित करने लिए कुछ महत्‍वपूर्ण ध्‍यान: ओशो

(2) पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो
    
शिव ने कहा: आँख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से उसके बीच का हलका पन ह्रदय में खुलता है।
ओशो--अपनी दोनों हथेलियों का उपयोग करो, उन्‍हें अपनी बंद आँखो पर रखो, और हथेलियों को पुतलियों पर छू जाने दो—लेकिन पंख के जैसे, बिना कोई दबाव डाले। यदि दबाव डाला तो तुम चूक गए, तुम पूरी विधि से ही चूक गए। दबाव मत डालों; बस पंख की भांति छुओ। तुम्‍हें थोड़ा समायोजन करना होगा क्‍योंकि शुरू में तो तुम दबाब डालोगे। दबाव का कम से कम करते जाओ जब तक कि दबाब बिलकुल समाप्‍त न हो जाए—बस तुम्‍हारी हथैलियां पुतलियों को छुएँ। बस एक स्‍पर्श, बाना दबाव का एक मिलन क्‍योंकि यदि दबाव रहा तो यह विधि कार्य नहीं करेगी। तो बस एक पंख की भांति।

तीसरी आँख को विकसित करने लिए कुछ महत्‍वपूर्ण ध्‍यान: --ओशो

(1) साक्षी को खोजना—ओशो

      शिव ने कहा: होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ और मन को विचार के समक्ष आने दो। देह को पैर से सिर तक प्राण तत्‍व से भर जाने दो, ओर वहां वह प्रकाश की भांति बरस जाए।
      वह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस वह विधि लेकर ग्रीस गया। और वास्‍तव में यह पश्‍चिम में सारे रहस्‍यवाद का उद्गम बन गया। स्‍त्रोत बन गया। वह पश्‍चिम में पूरे रहस्‍यवाद का जनक है।
      यह विधि बहुत गहन पद्धतियों में से है। इसे समझने का प्रयास करो: ‘’होश को दोनों भौहों के मध्‍य में लाओ।‘’

तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है: भाग-2 (ओशो)

तो ये बात बहुत विरोधा भाषी है, लेकिन ऐसा है। यदि कोई स्‍त्री ब्रह्मचर्य धारण करना चाहे और अपने शरीर से पृथक रहना चाहे तो वह यह पुरूष की उपेक्षा अधिक आसानी से कर सकती है। एक बार शरीर से अनासक्ति सध जाए तो वह अपने शरीर को पूरी तरह भूल सकती है।
      पुरूष बहुत सरलता से नियंत्रण कर सकता है; लेकिन उसका चित उसके शरीर से ज्‍यादा बंधा है। इसी कारण से नियंत्रण उसके लिए संभव है; लेकिन यह नियंत्रण उसे रोज-रोज करना होगा। सतत करना होगा। और चूंकि स्‍त्री की कामवासना अनाक्रामक है, इसलिए वह इस दिशा में अधिक विश्राम पूर्ण हो सकती है। अधिक अनासक्‍त हो सकती है। लेकिन अनासक्‍ति कठिन है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है: भाग-1 (ओशो)

पहले तो दो बातें समझ लेने की है। एक, तीसरी आँख की ऊर्जा वही है जो ऊर्जा दो सामान्‍य आंखों को चलाती है। ऊर्जा वही है, सिर्फ वह नई दिशा में नए केंद्र की और गति करने लगती है। तीसरी आँख है; लेकिन निष्‍क्रिय है। और जब तक सामान्‍य आंखे देखना बंद नहीं करती, तीसरी आँख सक्रिय नहीं हो सकती है। देख नहीं सकती।
      उसी उर्जा को यहां भी बहना है। जब उर्जा सामान्‍य आँखो में बहना बंद कर देती है तो वह तीसरी आँख में बहने लगती है। और जब ऊर्जा तीसरी आँख में बहती है तो सामान्‍य आंखों में देखना बंद कर देती है। वब उनके रहते हुए भी तुम उनके द्वारा कुछ नहीं देखते हो। जो ऊर्जा उनमें बहती थी वह वहां से हट कर नये केंद्र पर गतिमान हो जाती है। यह केंद्र दो आँखो के बीच में स्‍थित है। तीसरी आँख बिलकुल तैयार है; वह किसी भी क्षण सक्रिय हो सकती है। लेकिन इसे सक्रिय होने के लिए ऊर्जा चाहिए। और सामान्‍य आंखों की ऊर्जा को यहां लाना होगा।

रविवार, 1 जनवरी 2012

ओशो गौरी शंकर ध्‍यान--

निर्देश:
     इस विधि में पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण है। पहले दो चरण साधक को तीसरे चरण में सहज लाती हान के लिए तैयार कर देते है।
      ओशो ने बताया है कि यदि पहले चरण में श्‍वास-प्रश्‍वास को ठीक से कर लिया जाए तो रक्‍त प्रवाह में निर्मित कार्बनडाइऑक्साइड के कारण आप स्‍वयं को गौरी शंकर जितना ऊँचा अनुभव करेंगे।

पहला चरण: पंद्रह मिनट
      आंखे बंद करके बैठ जाएं। नाक से गहरी श्‍वास लेकर फेफड़ों को भर लें। श्‍वास को जितनी देर बन पड़े रोके रखें, तब धीमे-धीमे मुख के द्वारा श्‍वास को बाहर छोड़ दे और जितनी देर संभव हो सके फेफड़ों को खाली रखें। फिर नाक से श्‍वास भीतर लें और पूरी प्रक्रिया को दोहराते रहे।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

प्रार्थना ध्‍यान—ओशो

अच्‍छा हो कि यह प्रार्थना ध्‍यान आप रात में करो। कमरे में अंधकार कर ले। और ध्‍यान खत्‍म होने के तुरंत बाद सो जाओ। या सुबह भी इसे किया जा सकता है, परंतु उसके बाद पंद्रह मिनट का विश्राम जरूर करना चाहिए। वह विश्राम अनिवार्य है, अन्‍यथा तुम्‍हें लगेगा कि तुम नशे में हो, तंद्रा में हो।

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

ओस कण और सागर: (ओशो--ध्‍यान विधि)

(यह विधि इस बात का बोध कराने का एक उपाय है कि हम किस प्रकार स्‍वयं को दूसरों से पृथक करते है। और होश पूर्वक उस पृथकता को विलीन करते है।)

कब:
      प्रात: स्‍नान के पश्‍चात और रात्रि सोने से पूर्व अविधि; तीस मिनट
निर्देश:
      फर्श पर या कुर्सी पर बैठ जाएं, अपने शरीर को बिना किसी प्रयत्‍न या तनाव के यथासंभव सीधा रखें ताकि आपकी रीढ़ की हड्डी 90 डिग्री के कोण पर हो। आँखों को जोर से बंद न करे, लेकिन सहज स्फुरणा से दोनों पलकों को आराम से बंद होने दे।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

सुरक्षा प्रभा मंडल ध्‍यान: (काया कल्‍प करने के लिए)

क्‍या आप जानते है कि सप्ताहांत में आप इतना थक जाते है कि खड़े भी नहीं हो पाते। एक विधि प्रस्‍तुत है—कायाकल्‍प करने के लिए नहीं, अपितु आपकी क्‍लांति को यथासंभव कम करने के लिए। हमारी थकावट के कई कारण हो सकते है—चारों और का शोर, हलचल, गंध दूसरों की भावनाएं, उनके विचार—सभी आपको प्रभावित कर सकते है। हम निरंतर एक दूसरे को भला बुरा कहते रहते है। एक दूसरे को डाँटते-फटकारते रहते है। निरंतर अपने नकारात्‍मक भाव व विचार क्रोध-आक्रोश भय चिंता, विवशता आदि-आदि दूसरों को संप्रेषित करते रहते है। यदि हम स्‍वयं को इनके आक्रमणों से बचाना नहीं जानते तो यह बात समझ में आती है कि हम क्‍यों थक जाते है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

ओशो--( चक्रा साउंड ध्‍यान)

चक्रा साउंड ध्‍यान:


     इस ध्‍यान में चक्रों को लयवद्ध करने व उसके प्रति एक चेतना जाग्रत करने के लिए ध्‍वनियों का उपयोग किया जाता है। स्‍वयं घ्वनियां पैदा करते हुए अथवा केवल संगीत को सुन कर अपने भीतर ध्‍वनियों को महसूस करते हुए, इस ध्‍यान में आप एक गहरे शांत अंतर मौन में उतर सकते है। यह ध्‍यान किसी भी समय किया जा सकता है। पृष्‍टभूमि का संगीत आपको ऊर्जा गत रूप से इस ध्‍यान में सहयोगी होता है। व हर चरण के प्रारंभ का संकेत देता है।
पहला चरण: (45 मिनट)

      खड़े होना चाहें, आराम से बैठाना चाहें, या लेटना—आपको जो भी सुविधाजनक हो करें।( परन्‍तु मेरे खुद के अनुभव से आपको एक बात कहना चाहता हूं की आप क्‍यों न तीनों अवस्‍थाओं में ध्‍यान प्रयोग करें—इस ध्‍यान की तीन शृंखला है, पहले में खड़े हो, दूसरी में बैठ जाये और तीसरी में लेट जाये, तीसरी और आखरी में आप इतने गहरे विश्राम में चले जायेगे, जो बहुत सहज होगा) अपनी पीठ को सीधा करें व शरीर को ढीला छोड़ दे। श्‍वास को छाती की बजाय पेट से आने दे। जो भी घ्वनियां आप करेंगे वह खुले मुंह व जबड़े को ढीला छोड़ कर करें। अपनी आंखें बंद कर लें और संगीत को सुनें; यदि आप चाहें तो पहले चक्र में घ्वनियां पैदा करना शुरू कर दे। आप चाहे तो एक ही सूर निकाल सकते है या सूर बदल भी सकते है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

सात-सात साल का वर्तुल—(ओशो)

एक से सात साल तक--
     बच्‍चा बहुत मासूम होता है, बिलकुल संत जैसा। वह अपनी जननेंद्रियों से खेलता है लेकिन उसे पता नहीं होता कि वह गलत है। वह नैसर्गिक ढ़ंग से जीता है।

सात से चौदह साल तक--
      सात साल में बच्‍चा बचपन से बहार आ जाता है। एक नया अध्‍याय खुलता है। अब तक वह निर्दोष था, अब दुनियादारी और दुनिया की चालाकियां सीखने लगता है। झूठ बोलने लगता है, मुखौटे पहनने लगता है। झूठ की पहली पर्त उसे घेर लेती है।

मंगलवार, 24 मई 2011

ओशो नटराज ध्‍यान--

ओशो नटराज ध्‍यान--

ओशो नटराज ध्‍यान ओशो के निर्देशन में तैयार किए गए संगीत के साथ किया जा सकता है। यह संगीत ऊर्जा गत रूप से ध्‍यान में सहयोगी होता है। और ध्‍यान विधि के हर चरण की शुरूआत को इंगित करता है। इस संगीत की सीड़ीज़ (http://www.oshoba.org/osho_audio_discourses.php ) आप यहां से फ्री में डाउन लोड कर सकते है।

सोमवार, 23 मई 2011

ओशो कुंडलिनी ध्‍यान--

ओशो कुंडलिनी ध्‍यान--
      यह सक्रिय ध्‍यान का अति प्रिय सहयोगी ध्‍यान है। इसमें पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चारण है। यह ध्‍यान ओशो के निर्देशन में तैयार किए गए संगीत के साथ किया जा सकता है। यह संगीत ऊर्जा गत रूप से ध्‍यान में सहयोगी होता है और ध्‍यान विधि के हर चरण की शुरूआत को इंगित करता है संगीत की सीड़ीज़ ( ) से डाउनलोड कर सकते है।

शनिवार, 21 मई 2011

ओशो डाइनैमिक ध्‍यान--

ओशो डाइनैमिक ध्‍यान--
      ओशो डाइनैमिक ध्‍यान ओशो के निर्देशन में तैयार किए गए संगीत के साथ किया जाता है। यह संगीत ऊर्जा गत रूप से ध्‍यान में सहयोगी होता है और ध्‍यान विधि के हर चरण की शुरूआत को इंगित करता है। इस संगीत की सीड़ीज़ व डाउनलोड( http://www.oshoba.org/ )करने सुविधा है।
निर्देश—
      डायनमिक ध्‍यान आधुनिक मनुष्‍य को ध्‍यान अपलब्‍ध करवाने के लिए ओशो के प्रमुख योगदानों में से एक है।

मंगलवार, 17 मई 2011

ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान—

ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान—


नाद ब्रह्म एक प्राचीन तिब्‍बती विधि है जिसे सुबह ब्रह्ममुहूर्त में किया जाता रहा है। अब इसे दिन में किसी भी समय अकेले या अन्‍य लोगों के साथ किया जा सकता है। पेट खाली होना चाहिए और इस ध्‍यान के बाद पंद्रह मिनट तक विश्राम करना जरूरी है। यह ध्‍यान एक घंटे का है और इसके तीन चरण है।

पहला चरण: तीस मिनट
     एक विश्राम पूर्ण मुद्रा में आँख और मुंह बंद करके बैठे। अब भौंरे की तरह गुंजार की ध्‍वनि निकालना शुरू करें। गुंजार इतना तीव्र हो की तुम्‍हारे आस पास बैठे लोगों को यह सुनाई पड़ सकें और गुंजार की ध्‍वनि के कंपन तुम्‍हारे पूरे शरीर में फैल सकें। स्‍वयं को एक खाली पात्र या खोखले टयूब की तरह कल्‍पना करो जो गुंजार की ध्वनि से भर गई हो। एक स्‍थिति ऐसी आती है जब गुंजार अपने आप जारी रहता है और तुम एक श्रोता मात्र हो जाते हो। इस विधि में किसी विशेष श्‍वसन प्रक्रिया की जरूरत नहीं है, और तुम गुंजार की लय को बदल भी सकते हो, तथा लगे तो शरीर को धीरे-धीरे झूमने दे सकते हो।