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शुक्रवार, 13 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--31

याद घर बुलाने लगी—प्रवचन—इकतीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

ण वि दुक्‍खं ण वि सुक्‍खं, ण वि पीडा णेव विज्‍जदे बाहा।
णवि मरणं ण वि जणणं,तत्‍थेव य होई णिव्‍वाणं।। 156।।

ण वि इंदिय उवसग्‍गा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं
ण य तिण्‍हा णेछुहा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 157।।

ण वि कम्‍मं णोकम्‍मं, ण वि चिंता णेव अट्टरूद्दाणि
ण वि धम्‍मसुक्‍कझाणे, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 158।।


णिव्‍वाणं ति अवाहंति,सिद्धीलोगाग्‍गमेव य।
खेमं सिवं अणाबाहं, जं चरंति महेसिणो।। 159।।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--30

एक दीप से कोटि दीप हों—प्रवचन—तीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2) 
प्रश्‍नसार:

1—जिन—धारा अनेकांत—भाव और स्‍यातवाद से भरी है, फिर भी प्रेमशून्‍य क्‍यों हो गई?

2—जीसस अपने शिष्‍यों से कहते थे कि यदि मेरे साथ चलने से कोई तुम्‍हें रोके तो उसे मार डालो और मेरे साथ चल पड़ो। प्रेमपुजारी जीसस की ऐसी आज्ञा?

3—अतीत में गुरु के पास एक ही मार्ग के साधक इकट्ठे होते थे। और आपके आश्रम में सभी विपरीत मार्गों का मेला लगा हुआ है—यह कैसे?

4—त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव, त्‍वमेव, बंधुश्‍च सखा त्‍वमेव
   त्‍वमेव विद्या द्रविणं तवमेव, तवमेव सर्वं मम देव देवा


5—सीमार माझे असीम तुमी बाजाओ आपन सूर
   आमार मध्‍ये तोमार प्रकाश ताई एतो मधुर

6—एक पागल द्वार पर आया था, कुछ गुनगुनाकर चला गया; यह कौन था?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--29

त्रिगुप्‍ति और मुक्‍ति—प्रवचन—उनतीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

जहा महातलायस्‍स सन्‍निरूद्धे जलागमे
उस्‍सिंचणाए तवणाए, कमेण सोसणा भवे।वे।।
एवं तु संजयस्‍सावि पावकम्‍मनिरासवे
भवकोडीसंचियं कम्‍मं,तवसा निज्‍जारिज्‍जइ।। 152।।

तवसा चेवमोक्‍खो संवरहीणस्‍स होई जिणवयणे
ण हु सोते पविसंते, किसिणं परिसुस्‍सदि तलायं।। 153।।


अन्‍नाणी कम्‍मं खवेइ बहुआहिं बासकोडिहिं
तं नाणी तिहिं गुत्‍तो, खवेइ ऊसासमित्‍तेणं।।
सेणावइम्‍मि णिहए, जहां सेणा पणस्‍सई
एवं कम्‍माणि णस्‍संति,मोहणिज्‍जे खयं गए।। 154।।

सव्‍वे सरा नियट्टंति, तक्‍का जत्‍थविज्‍जइ
मई तत्‍थगाहिया, ओए अप्‍पइट्ठाणस्‍स खेयन्‍ने।। 155।।

गुरुवार, 12 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--28

रसमयता और एकाग्रता— प्रवचन—अट्ठाइसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
प्रश्‍नसार:

1—कुछ दिन ध्‍यान में जी लगता है, कुछ दिन भजन में; लेकिन एकाग्रता कहीं नहीं होती।

2—आकस्‍मिक रूप से भगवान से मिलना हुआ और संन्‍यास भी ले लिया, क्‍या यह ध्‍यान कायम रहेगा?

3—भगवान श्री कृष्‍ण के सिर र्दद के लिए ज्ञानियों ने पैर की धूल देने से इंकार कर दिया लेकिन गोपियों ने दे दी—इसका रहस्‍य क्‍या है?

4—क्‍या ध्‍यान की मृत्‍यु और प्रेम की मृत्‍यु भिन्‍न होती है?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--27

पंडितमरण सुमरण है—प्रवचन—सत्‍ताईसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

सरीमाहु नाव त्‍ति, जीवो वुच्‍चइ नाविओ
संसारो अण्‍णवो वुत्‍तो, जं तरंति महेसिणो।। 146।।

धीरेण वि मरियव्‍वं, काउरिसेण वि अवस्‍समरियव्‍वं
तम्‍हा अवस्‍समरणे, वरं खु धीरत्‍तणे मरिउं।। 147।।

इक्‍कं पंडियमरणं, छिंदइ जाईसयाणि बहुयाणि
तं मरणं मरियव्‍वं, जेण मओ सुम्‍मओ होई।। 148।।

इक्‍कं पंडियमरणं, पडिवज्‍जइ सुपुरिसो असंभंतो
खिप्‍पं सो मरणाणं, काहिइ अंतं अणंताणं।। 149।।

बुधवार, 11 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--26

प्रेम के कोई गुणस्‍थान नहीं—प्रवचन छब्बीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
प्रश्‍नसार:

1— बारहवें और तेरहवें गुणस्थान: क्षीणमोह और सयोगिकेवलीजिन में क्या भिन्नता है इसे स्पष्ट करने की कृपा करें।

2—क्‍या तेरहवें गुणस्‍थान को उपलब्‍ध होकर भी उससे च्‍युत हुआ जा सकता है?

3—क्‍या प्रेम के मार्ग पर भी कोई सीढ़ियां होती है?

4—रजनीश एशो आमी तोमार बोइसागी
   आमी पूना गेलाम, आमी काशी गेलाम
   लाओ री लाओ संगे डुगडुगी।

मंगलवार, 10 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--25

चौदह गुणस्‍थान—प्रवचन—पच्‍चीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

जेहिं दु लक्‍खिज्‍जंते, उदयादिसुसंभवेहिं भावेहिं
जीवा ते गुणसण्‍णा, णिद्दिट्ठा, सव्‍वदरिसीहिं।। 144।।

मिच्‍छो सासण मिस्‍सो, अविरदसम्‍मोदेसविरदो य।
विरदो पमत्‍त इयरो, अपुत्‍व अणियट्टि सुहुमो य।
उवसंत खीणमोहो, सजोगिकेवलिजिणो अजोगी य।
चोद्दस गुणट्ठाणाणि, कमेण सिद्धा य णायव्‍वा।।145।।

ज के सूत्र महावीर की साधना-पद्धति में अत्यंत विशिष्ट हैं। साधक की यात्रा में जैसा सूक्ष्म पड़ावों का विभाजन महावीर ने किया है, वैसा किसी और ने कभी नहीं किया। राह का पूरा नक्शा, रास्ते पर पड़नेवाले पड़ाव, मील के किनारे लगे पत्थर, सभी की ठीक-ठीक सूचना दी है।

सोमवार, 9 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--24

आज लहरों में निमंत्रण—प्रवचन—चौबीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2) 
प्रश्‍नसार:

1— जैन मानते हैं कि जिन-शासन के अतिरिक्त सभी शासन मिथ्या हैं, जाग्रत व सिद्ध पुरुषों के बाबत बताए जाने पर भी वे उनकी ओर उन्मुख नहीं होते। क्या उन्हें सन्मार्ग पर लाना संभव नहीं है?

2—आपका विरोध करने वाले लोग यदि आपमें उत्‍सुकता लेने लगें तो हम संन्‍यासियों को क्‍या करना चाहिए?

3—महावीर की तरह आप भी अंधविश्‍वासों पर प्रहार करके सदधर्म का तीर्थबना रहे है; फिर भी अंधश्रद्धालुओं में जाग क्‍यों नहीं आती?

शनिवार, 7 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--23

षट पर्दों की ओट में—प्रवचन—तेईसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

चंडोमुंचइ बेरं, भंडणसीलोधरमदयरहिओ
दुट्ठो ण य एदि वसं, लक्‍खणमेयं तु किणहस्‍स।। 138।।

मंदो बुद्धिविहीणो, णिव्विणाणीविसयलोलो य।
लक्‍खणमेयं भणियं, समासदो णीललेस्‍सस्‍स।। 139।।

रूसइ णिंदइ अन्‍ने, दूसइ बहुइ बहुसोसोयभयबहुलो
गणइ कज्‍जाकज्‍जं, लक्‍खणमेंयं तु काउस्‍स।। 140।।


जाणइ कज्‍जाकज्‍जं, सेयमसेयंसव्‍वसमपासी
दयदाणरदोमिदू, लक्‍खणमेयं तु तेउस्‍स।। 141।।

चागी भद्दो चोक्‍खो, अज्‍जवकम्‍मोखमदि बहुगं पि
साहुगुरूपूजणरदो, लक्खणमेयं तु पम्‍मस्‍स।। 142।।

ण य कुणइ पक्‍खवायं, ण वि य णिदाणं समोसव्‍वेसिं
णत्‍थिरायद्दोसा, णेहो वि य सुक्‍कलेस्‍सस्‍स।। 143।।

शुक्रवार, 6 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--22

पिया का गांव—प्रवचन—बाईसवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
प्रश्‍न सार:

1— न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे
कोई कहे यहां चली, कोई कहे वहां चली
मैंने कहा पिया के गांव चली रे

2—जैन दर्शन कहता है कि इस आरे में मोक्ष संभव नहीं है। तो फिर मोक्ष यहीं और अभी है, इस धारणा को पकड़ लेना क्‍या आत्‍म वंचना नहीं है?


पहला प्रश्न:

मैं जब प्रथम-प्रथम आपको मिली थी तब कुछ भी तो पता नहीं था। न मालूम आपने कहां से कहां चला दिया! एकांत अब प्रीतिकर लगता है। अब तो न कहीं जाना है, न आना। न कुछ होना है और न कुछ जानना है। बहुत कुछ पाया, जिसके योग्य न थी। बस, अब तो अलविदा और प्रणाम।
न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे
कोई कहे यहां चली, कोई कहे वहां चली
मैंने कहा पिया के गांव चली रे

गुरुवार, 5 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--21

छह पथिक और छह लेश्‍याएं—प्रवचन—इक्‍कीसवां
जिन सूत्र--(भाग--2) 
सारसूूूूत्र::
कीण्‍हा णीला काऊ, तेऊ पम्‍मा या सुक्‍कलेस्‍सा य।
लेस्‍साणं णिद्देसा, छच्‍चेव हवंति णियमेण।। 134।।

कीण्‍हा णीला काऊ, तिण्‍णि वि एयाओ अहम्‍मलेसाओ
एयाहि तिहि वि जीवो, दुग्‍गइं उववज्‍जई बहुसो।। 135।।

तेऊ पम्‍हा सुक्‍का, तिण्‍णिवि एयाओ धम्‍मलेसाओ
एयाहि तिहि वि जीवो, सुग्‍गइं उववज्‍जई बहुसो।। 136।।


पहिया जे छ प्‍पुरिसा, परिभट्टारण्‍णमज्‍झदेसम्‍हि
फलभरियरूक्‍खमेगं, पेक्‍खित्‍ता ते विचिंतंति।।
णिम्‍मूललखंधसाहूबसाहं छितुं चिणितुपडिदाइं
खाउं फलाइं इदि, जं मणेण वयणं हवे कम्‍मं।। 137।।

बुधवार, 4 जून 2014

जिन सूत्र (भाग--2) प्रवचन--20

गोशालक: एक अस्‍वीकृत तीर्थंकर—प्रवचन—बीसवां
जिन सूत्र (भाग--2) 
प्रश्‍न सार:

1—मक्‍खनी गोशालक के जीवन पर प्रकाश डालने  की कृपा करें।

2—महावीर का अशरण—उपदेश और उनका शिष्‍यों को दीक्षा देना—इनमें क्‍या अंतर्विरोध नहीं है?

3—अशरण भाव और असहाय भाव में क्‍या भेद है?

मंगलवार, 3 जून 2014

जिन सूत्र (भाग--2) प्रवचन--19

ध्‍यानाग्‍नि से कर्म भस्‍मिभूत—प्रवचन—उन्‍नीसवां
जिन सूत्र (भाग--2)
सूत्र:

जह चिरसंचयमिंधणमनलो पवणसहिओ दुयं दहइ
तह कम्‍मेंधममियं, खणेण झाणानलो डहइ।। 131।।

झाणोवरमेउवि मुणी, णिच्‍वमणिच्‍चइभावणापरमो
होइ सुभावियचित्‍तो, धम्‍मझाणेण जो पुव्विं।। 132।।

अद्धुवमसरणमेगत्त मन्‍नत्‍तसंसारलोयमसुइत्‍तं
आसवसंवरणिज्‍जर, धम्‍मं बोधि च चिंतिज्‍ज।। 133।।

सोमवार, 2 जून 2014

जिन सूत्र (भाग--2) पवचन--18

मूक्‍ति द्वंद्वातीत है—प्रवचन—अठारहवां
जिन सूत्र (भाग--2)
प्रश्‍न सार:

1—राग और द्वेष के दो पहिये से संसार निर्मित होता है। क्‍या मोक्ष के भी ऐसे ही दो पहिये होते है?

2—गुरु मृत्‍यु है या ब्रह्म है, या एक साथ दोनों है?

3—सूली ऊपर सेज पिया की, किस विद्य मिलना होय?

4—आपका स्‍मरण मुझे प्रगाढ़ रसमयता और आनंद से भर देता है। मेरी चाल में आपकी धुन के धूंधर बजते है, तो अब मैं ध्‍यान को कहां रखूं?


5—वहां तक आया हूं, जहां लगता है कि अब कुछ हो सकता है।

6—मन एकदम शांत होगा तो सांसारिक कार्य कैसे होंगे?

रविवार, 1 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--17

ध्‍यान है आत्‍मरमण—प्रवचन—सत्रहवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सारसूत्र::
जे इंदियाणं विसया मणुण्‍णा,तेसु भावं निसिरे कयाई
याउमणुण्‍णेसु मणं पि कुज्जा,समाहिकामें समणे तवस्‍सी।। 123।।

सुविदियजगस्‍सभावो, निस्‍संगो निब्‍भओ निराओ य।
वेरग्‍गभाविणमणो, झााणंमिसुनिच्‍चलो होई।। 124।।

देहविवितं पेच्‍छइ, अप्‍पपाणं तह य बव्‍वसंजोगे
देहोवहिवोसग्‍गं निस्‍संगो सव्‍वहा कुणइ।। 125।।

णाहं होमि परेसिं ण में परे संति णाणमहमेक्‍को
इदि जो झायदि झाणे, सो अप्‍पाणं हवादि झादा।। 126।।

शनिवार, 31 मई 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--16

गुरु है द्वार—प्रवचन—सोलहवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
प्रश्‍न सार:

1—नानकदेव भी जाग्रतपुरूष थे, लेकिन उन्‍होंने स्‍वयं को भगवान नहीं कहा। आप........?

2—ध्‍यान के एक गहन अनुभव पर भगवान से मार्ग दर्शन की प्रार्थाना

3—अफसोस, दिल का हाल कोई पूछता नहीं। और सब कहते है तेरी सूरत बदल गई।
और सब कुछ लूटा के होश में आये तो क्‍या किया।  मैं क्‍या करूं...... ?

4—आप उत्‍तर न देंगे तो मैं पागल हो जाऊंगा

शुक्रवार, 30 मई 2014

जिन सूत्र--(भाग-2) प्रवचन--15

त्‍वरा से जीना ध्‍यान है—प्रवचन—पंद्रहवां
जिन सूत्र--(भाग-2)
सूत्र:

सीसं जहा सरीरस्‍स, जहा मूलस दुमस्‍स य।
सव्‍वस्‍स साधुधम्‍मस्‍स, तहा झाणं विधीयते।। 117।।

लवण व्‍व सलिजजोए, झाणे चितं विलीयए जस्‍स
तस्‍स सुहासुहडहणो, अप्‍पाउणलो पयासेइ।। 118।।

जस्‍सविज्‍जदि रागो, दोसो मोहो व जोग परिक्‍कमो
तस्‍स सुहासुहडहाणो, झाणमओ जायए अग्‍गी।। 119।।

पलियंकं बंधेउं, निसिद्धमणवयणकायवावारो
नासग्‍गनिमियनयणो, मन्‍दीकयसासनीसासो।। 120।।


गरहियनियदुच्‍चरिओ,  खामियसत्‍तो नियत्‍तियपमाओ
निच्‍चलचित्‍तो तास झाहि, जाव पुरओव्‍व पडिहाइ।। 121।।

थिरकयजोगाणं पुण, मुणीणझाने सुनिच्‍चलमणाणं
गामम्‍मि जणाइण्‍णे, सुण्‍णे रण्‍णे व ण विसेसो।। 122।।