छठवां प्रवचन-संन्यास की दिशा
मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल हैं, उनके संबंध में कुछ बातें समझ लेनी उपयोगी हैं।एक मित्र ने पूछा है कि कुछ साधक कुंडलिनी साधना का पूर्व से ही प्रयोग कर रहे हैं। उनको इस प्रयोग से बहुत गति मिल रही है। तो वे इसको आगे जारी रखें या न रखें? उन्हें कोई हानि तो नहीं होगी?
हानि का कोई सवाल नहीं है। यदि पहले से कुछ जारी रखा है और इससे गति मिल रही है, तो तीव्र गति से जारी रखें। लाभ ही होगा। परमात्मा के मार्ग पर ऐसे भी हानि नहीं है।
दूसरे मित्र ने पूछा है--और और भी दो-तीन मित्रों ने वही बात पूछी है--कि यह रोना, चिल्लाना, हंसना, नाचना कब तक जारी रहेगा?
यह तीन सप्ताह से तीन महीने तक जारी रह सकता है। जो ठीक से प्रयोग को कर लेंगे, तीन सप्ताह में रोना, हंसना, चिल्लाना विलीन हो लाएगा और पहले चरण से ठीक चौथे चरण में प्रवेश हो जाएगा, बीच के दो चरण अपने आप गिर जाएंगे। जो ठीक से नहीं करेंगे, धीमे-धीमे करेंगे, उन्हें तीन सप्ताह से लेकर तीन महीने तक का समय लग सकता है। लेकिन यह कोई सदा चलने वाली बात नहीं है, यह तो मन के विकार जब गिर जाएंगे तो अपने आप विलीन हो जाएगा। अब कितनी तीव्रता से आप विकारों को गिराते हैं,

