दिनांक 7 अगस्त,
1978;
श्री रजनीश
आश्रम पूना।
सारसूूूूत्र::
नाम
सुमिर मन
बावरे, कहा
फिरत भुलाना
हो।।
मट्टी
का बना पूतला, पानी संग साना
हो।
इक
दिन हंसा चलि
बसै, घर
बार बिराना
हो।।
निसि
अंधियारी
कोठरी, दूजे
दिया न बाती
हो।
बांह
पकरि जम लै चलै, कोउ संग न
साथी हो।।
गज
रथ घोड़ा पालकी, अरु सकल समाजा
हो।
इक
दिन तजि जल
जाएंगे रानी औ
राजा हो।।
सेमर
पर बैठा सुवना, लाल फर देख
भुलाना हो।
भारत
टोंट मुआ उधिराना, फिरि पाछे पछिताना
हो।।
गूलर
कै तू भुनगा, तू का आव
समाना हो।
जगजीवनदास बिचारि कहत, सबको वहं
जाना हो।।
नाम
बिनु नहिं कोउकै
निस्तारा।
जान
परतु है
ज्ञान तत्त
तें, मैं मन समुझि
बिचारा।
कहा
भए जल
प्रात अन्हाए, का भए
किए अचारा।।
कहा
भए माला पहिरे तें, का दिए तिलक लिलारा।
कहा
भए व्रत अन्नहिं त्यागे, का किए दूध-अहारा।।
कहा
भए पंचअगिन
के तापे, कहा लगाए छारा।
कहा
उर्धमुख धूमहिं घोंटें, कहा लोन किए
न्यारा।।