सफलता नहीं --प्रवचन सोहलवां
सुफलताएक मित्र पूछ रहे हैं: मेरे एक वक्तव्य में मैंने कहा है कि शादी जैसी आज है, विवाह जैसा आज है, वह विवाह इतना विकृत है कि उस विवाह से गुजर कर मनुष्य के चित्त में विकृति ही आती है, सुकृति नहीं।
यह बात सच है कि विवाह एक अति सामान्य, अति जरूरी स्थिति है। और साधारणतः अगर विवाह वैज्ञानिक हो तो व्यक्ति विवाह के बाद ज्यादा सरल, ज्यादा शांत और सुव्यवस्थित होगा। लेकिन विवाह अगर गलत हो--जैसा कि गलत है--तो विवाह के पहले से भी ज्यादा परेशानियां, अशांतियां और चित्त की रुग्णताएं बढ़ेंगी।
जैसे मेरा कहना है, जो विवाह प्रेम से फलीभूत नहीं हुआ है, ज्योतिषी से पूछ कर हुआ है, जो विवाह मां-बाप ने तय किया है, स्वयं विवाह करने वालों के प्रेम से नहीं निकला है--वह विवाह विकृत करेगा, सुकृत नहीं करेगा। वह विवाह नई परेशानियों में ले जाएगा बजाय पुरानी परेशानियां हल करने के।
और इसलिए सारी दुनिया में विवाह की पूरी की पूरी व्यवस्था रुग्ण हो गई है, बीमार हो गई है, सड़ गई है। और जब तक हम विवाह की व्यवस्था नहीं बदलते...और भी बहुत बातें हैं, समाज को जो सड़ा रही हैं और पागलपन पैदा कर रही हैं। लेकिन उनमें से बहुत बुनियादी बातों में से एक विवाह है। जब तक हम उसे नहीं बदलते, तब तक परिवार का वह रूप प्रकट नहीं हो सकेगा जो व्यक्ति को शांति देता हो, प्रेम देता हो, आनंद देता हो, गति देता हो, बल देता हो--और सबसे बड़ी बात--जो व्यक्ति के जीवन में अध्यात्म देता हो।


