दिनांक
18 सितंबर,1974;
प्रात:काल, श्री ओशो
आश्रम,पूना।
सूत्र:
त्रिषु चतुर्थं
तैलवदासेव्यम्
मग्न: स्वचित्ते
प्रविशेत्।
प्राणसमाचारे समदर्शनम्।
शिवतुल्यो जायते।
तीनों
अवस्थाओं में
चौथी अवस्था
का तेल की तरह
सिंचन करना
चाहिए ऐसा मग्न
हुआ स्व—चित्त
में प्रवेश
करे। प्राणसमाचार
(अर्थात
सर्वत्र
परमात्म—ऊर्जा
का प्रस्फुरण
है—ऐसा अनुभव
कर) से
समदर्शन को
उपलब्ध होता
है। और वह शिवतुल्य
हो जाता है!
जाग्रत, स्वप्न,
सुषुप्ति—इन
तीनों
अवस्थाओं में
भी चौथी तुरीय
ऐसी ही पिरोई
हुई है जैसे
माला के मनकों
में धागा।
सोये हुए भी
तुम्हारे
भीतर कोई जागा
हुआ है। स्वप्न
देखते हुए भी
तुम्हारे
भीतर कोई
देखनेवाला
रूप के बाहर
है। जागते, दिन के काम
करते समय भी, दैनंदिन
जागरण में भी,
तुम्हारे
भीतर कोई
साक्षी मौजूद
है।

