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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--022

लाओत्से सर्वाधिक सार्थक--वर्तमान विश्व-स्थिति में—(प्रवचन—बाईसवां)


प्रश्न-सार

01-लाओत्से पर बोलने के पीछे प्रेरणा क्या है?

02-लाओत्से ऊर्ध्वगमन के विपरीत निम्नगमन की बात क्यों करते हैं?

03-अहंकार भी यदि प्राकृतिक है तो उसे हटाएं क्यों?

04-कोई स्त्री अब तक धर्म-प्रणेता क्यों नहीं हुई?

05-यदि ज्ञानी स्त्रैण-चित्त हैं तो मोहम्मद और कृष्ण युद्ध में क्यों गए?

06-क्या साधारण आदमी भी निरहंकार को प्राप्त हो सकता है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--021

जल का स्वभाव ताओ के निकट है—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)


अध्याय 8 : सूत्र 1, 2 व 3

जल

1. सर्वोत्कृष्टता जल के सदृश होती है।
जल की महानता पर-हितैषणा में निहित होती है,
और उस विनम्रता में होती है,
जिसके कारण वह अनायास ही ऐसे
निम्नतम स्थान ग्रहण करती है,
जिनकी हम निंदा करते हैं।
इसीलिए तो जल का स्वभाव ताओ के निकट है।

2. आवास की श्रेष्ठता स्थान की उपयुक्तता में होती है,
मन की श्रेष्ठता उसकी अतल निस्तब्धता में,
संसर्ग की श्रेष्ठता पुण्यात्माओं के साथ रहने में,
शासन की श्रेष्ठता अमन-चैन की स्थापना में,
कार्य-पद्धति की श्रेष्ठता कर्म की कुशलता में,
और किसी आंदोलन के सूत्रपात की श्रेष्ठता उसकी सामयिकता में है।

3. और जब तक कोई श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी निम्न
स्थिति के संबंध में कोई वितंडा खड़ा नहीं करता,
तब तक वह समादृत होता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--020

धन्य हैं वे जो अंतिम होने को राजी हैं—(प्रवचन—बीसवां)


अध्याय 7 : सूत्र 12

सर्व-मंगल हेतु जीना

1. स्वर्ग और पृथ्वी दोनों ही नित्य हैं।
इनकी नित्यता का कारण है
कि ये स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त नहीं जीते;
इसलिए इनका सातत्य संभव होता है।

2. इसलिए तत्वविद (संत) अपने व्यक्तित्व
को पीछे रखते हैं;
फिर भी वे सबसे आगे पाए जाते हैं।
वे निज की सत्ता की उपेक्षा करते हैं,
फिर भी उनकी सत्ता सुरक्षित रहती है।
चूंकि उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता,
इसलिए उनके लक्ष्यों की पूर्ति होती है।

जीवन दो प्रकार का हो सकता है। एक, इस भांति जीना, जैसे मैं ही सारे जगत का केंद्र हूं। इस भांति, जैसे सारा जगत मेरे निमित्त ही बनाया गया है। इस भांति कि जैसे मैं परमात्मा हूं और सारा जगत मेरा सेवक है। एक जीने का ढंग यह है। एक जीने का ढंग इससे बिलकुल विपरीत है। ऐसे जीना, जैसे मैं कभी भी जगत का केंद्र नहीं हूं, जगत की परिधि हूं। ऐसे जीना, जैसे जगत परमात्मा है और मैं केवल उसका एक सेवक हूं।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--019

स्त्रैण-चित्त के अन्य आयाम: श्रद्धा, स्वीकार और समर्पण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)


प्रश्न-सार

अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

प्रश्न: भगवान श्री, कल आपने अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर चर्चा की है। इस विषय में कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

स्तित्व के सभी आयाम स्त्रैण और पुरुष में बांटे जा सकते हैं।
स्त्री और पुरुष का विभाजन केवल यौन-विभाजन, सेक्स डिवीजन नहीं है। लाओत्से के हिसाब से स्त्री और पुरुष का विभाजन जीवन की डाइलेक्टिक्स है, जीवन का जो द्वंद्वात्मक विकास है, जो डाइलेक्टिकल एवोल्यूशन है, उसका अनिवार्य हिस्सा है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--018

घाटी-सदृश, स्त्रैण व रहस्यमयी परम सत्ता—(प्रवचन—अठाहरवां)


अध्याय 6 : सूत्र 12

घाटी की आत्मा

1. घाटी की आत्मा कभी नहीं मरती, नित्य है।
इसे हम स्त्रैण रहस्य, ऐसा नाम देते हैं।
इस स्त्रैण रहस्यमयी का द्वार
स्वर्ग और पृथ्वी का मूल स्रोत है।
2. यह सर्वथा अविच्छिन्न है;
इसकी शक्ति अखंड है;
इसका उपयोग करो,
और इसकी सेवा सहज उपलब्ध होती है।

जिसका जन्म है, उसकी मृत्यु भी होगी। जो प्रारंभ होगा, वह अंत भी होगा। वही केवल मृत्यु के पार हो सकता है, जिसका जन्म न हो। और वही केवल अनंत हो सकता है, जो अनादि हो।
प्रकाश जन्मता है, मिट जाता है। अंधकार सदा है। शायद इस भांति कभी न सोचा हो। सूर्य निकलता है, सांझ ढल जाता है। दीया जलता है, बाती चुक जाती है, बुझ जाती है। जब दीया नहीं जला था, तब भी अंधकार था। जब दीया जला, अंधकार हमें दिखाई नहीं पड़ा।

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--017

विरोधों में एकता और शून्य में प्रतिष्ठा—(प्रवचन—सतहरवां)


अध्याय 5 : सूत्र 2

स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का आकाश कैसा धौंकनी की तरह है!
इसे रिक्त कर दो, फिर भी इसकी शक्ति अखंडित रहती है;
इसे जितना ही चलाओ, उतनी ही हवा निकलती है।
शब्द-बाहुल्य से बुद्धि निःशेष होती है।
इसलिए अपने केंद्र में स्थापित होना ही श्रेयस्कर है।

जीवन बहुत से विरोधी आधारों पर निर्मित होता है। जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा ही नहीं; दिखाई पड़ने वाले तत्वों के पीछे न दिखाई पड़ने वाले तत्व होते हैं, जो बिलकुल ही विपरीत होते हैं।
विपरीत का हमें स्मरण भी नहीं आता। यदि हम जन्म देखते हैं, तो मृत्यु की हमें कोई सूचना नहीं मिलती। और अगर जन्म के क्षण में कोई मृत्यु का खयाल करे, तो हम उसे पागल कहेंगे। लेकिन जन्म के पीछे मृत्यु छिपी रहती है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--016


निष्पक्ष हैं तीनों--स्वर्ग, पृथ्वी और संत—(प्रवचन—सौहलवां)

अध्याय 5 : सूत्र 1

प्रकृति

स्वर्ग और पृथ्वी को सदय होने की
कामना उत्प्रेरित नहीं करती;
वे सभी प्राणियों के साथ वैसा ही
व्यवहार करते हैं, जैसे कोई घास-निर्मित कुत्तों
से व्यवहार करता है।
तत्वविद (संत) भी सदय नहीं होते।
वे सभी मनुष्यों के साथ वैसा ही व्यवहार
करते हैं, जैसा घास-निर्मित कुत्तों से किया जाता है।
पृथ्वी पर जितने जानने वाले लोग हुए हैं, उन सब में लाओत्से बहुत अद्वितीय है।
कृष्ण की गीता में कोई साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी कुछ जोड़ना चाहे तो जोड़ सकता है। महावीर के वचनों में या बुद्ध और क्राइस्ट के वक्तव्यों में कुछ भी मिश्रित किया जा सकता है। और पता लगाना बहुत कठिन होगा। क्योंकि उनके वक्तव्य ऐसे हैं कि साधारण मनुष्य की नीति और समझ के प्रतिकूल नहीं पड़ते। और इसलिए दुनिया के सभी शास्त्र प्रक्षिप्त हो जाते हैं; इंटरपोलेशन हो जाता है। दूसरी पीढ़ियां उनमें बहुत कुछ जोड़ देती हैं। उन शास्त्रों को शुद्ध रखना असंभव है।

सोमवार, 22 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--015


समझ, शून्यता, समर्पण व पुरुषार्थ—(प्रवचन—प्रंदहवां)

प्रश्न-सार:

01-समझ के बाद भी क्रांति क्यों घटती नहीं?

02-अक्रिया साधेंगे तो पुरुषार्थ का क्या होगा?

03-शून्य की पूर्णता कैसे मिलेगी?

04-घड़ा शून्य होगा तो घड़ा भी मिट जाएगा न?

05-मन को खाली कैसे किया जाए?

प्रश्न:

लाओत्से कहते हैं कि समझ, अंडरस्टैंडिंग, काफी है; समझ के साथ ही क्रांति घटित हो जाती है। हमें ऐसा लगता है कि कोई बात पूरी समझ में आती तो है, लेकिन कोई क्रांति उससे घटित नहीं होती। इसका कारण क्या है, कृपया समझाइए!

लाओत्से कहता है, बात समझ में आ जाए, तो करने को कुछ बाकी नहीं रह जाता। समझ ही फिर करवा देती है, जो करने योग्य है। और जो करने योग्य नहीं है, वह गिर जाता है, झड़ जाता है, जैसे सूखे पत्ते वृक्ष से गिर जाएं। जो न करने योग्य है, उसे रोकने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता; जो करने योग्य है, उसे करने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। जो करने योग्य है, वह होने लगता है; जो न करने योग्य है, वह नहीं होना शुरू हो जाता है।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--014

प्रतिबिंब उसका, जो कि परमात्मा के भी पहले था—(प्रवचन—चौहदवां)


अध्याय 4 : सूत्र 3

नहीं जानता मैं कि किसका पुत्र है यह,

शायद यह प्रतिबिंब है उसका,


जो कि परमात्मा के भी पहले था।


शून्य हो जाने पर, घड़े की भांति रिक्त हो जाने पर--चित्त की सारी नोकें झड़ जाएं, सारी ग्रंथियां सुलझ जाएं, व्यक्ति स्वयं को पूरा उघाड़ ले और जान ले--फिर भी, जो आधारभूत है, आत्यंतिक है, अल्टिमेट है, वह अनजाना ही रह जाता है। वह रहस्य में ही छिपा रह जाता है।

इस अंतिम सूत्र में लाओत्से उसकी तरफ इशारा करता है और कहता है, "नहीं जानता मैं, किसका पुत्र है यह।'

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--013


अहंकार—विसर्जन और रहस्य में प्रवेश—(प्रवचन—तैरहवां) 



अध्याय 4 : सूत्र 2

इसकी तेज नोकों को घिस दें;
इसकी ग्रंथियों को सुलझा दें;
इसकी जगमगाहट मृदु हो जाए;
इसकी उद्वेलित तरंगें जलमग्न हो जाएं;
फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।

र्म है रिक्त चेतना की अवस्था, खाली घड़े की भांति।
लेकिन कोई खाली घड़ा कैसे हो पाए? शून्य कोई होना भी चाहे तो कैसे शून्य हो? मिटना कोई चाहे भी तो मिटने की प्रक्रिया क्या है?
कल हमने समझने की कोशिश की कि पूर्ण होने की चेष्टा से ज्यादा कोई नासमझी की बात नहीं। लेकिन पूर्ण होने का विज्ञान उपलब्ध है। एक-एक कदम पूर्ण होने की सीढ़ियां उपलब्ध हैं। पूर्ण होने का शास्त्र है। और जिन्हें पूर्ण होना है, उनके लिए विद्यापीठ हैं,

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--012


वह परम शून्य, परम उदगम, परम आधार—ताओ—(प्रवचन—बाहरवां)


अध्याय 4 : सूत्र 1

ताओ का स्वरूप

ताओ घड़े की रिक्तता की भांति है।
इसके उपयोग में सभी प्रकार की पूर्णताओं से
सावधान रहना अपेक्षित है। यह कितना
गंभीर है, कितना अथाह, मानो यह सभी
पदार्थों का उदगम या उनका सम्मानित पूर्वज हो!

ताओ है शून्य, रिक्तता; घड़े की रिक्तता की भांति।
कुछ भी भरा हुआ न हो, तो ही ताओ उपलब्ध होता है। शून्य हो चित्त, तो ही धर्म की प्रतीति होती है। व्यक्ति मिट जाए इतना, कि कह पाए कि मैं नहीं हूं, तो ही जान पाता है परमात्मा को। ऐसा समझें। व्यक्ति होगा जितना पूर्ण, परमात्मा होगा उतना शून्य; व्यक्ति होगा जितना शून्य, परमात्मा अपनी पूर्णता में प्रकट होता है।

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--011

कोरे ज्ञान से इच्छा-मुक्ति व अक्रिय व्यवस्था की और—(ग्‍यहरवां—प्रवचन)



अध्याय 3 : सूत्र 3

वे उन्हें कोरे ज्ञान और इच्छादि से
मुक्त रखने का प्रयास करते हैं।
और जहां ऐसे लोग हैं, जो
निपट जानकारी से भरे हैं,
उन्हें ऐसी जानकारी के उपयोग से
बचाने की यथाशक्य चेष्टा करते हैं।
जब अक्रियता की ऐसी अवस्था उपलब्ध हो जाए,
तब जो सुव्यवस्था बनती है, वह सार्वभौम होती है।

जो जानते हैं, वे लोगों को कोरे ज्ञान से मुक्त रखने का प्रयास करते हैं।
साधारणतः हम सोचते हैं कि अज्ञान बुरा है, अशुभ है; और ज्ञान अपने आप में शुभ है। लाओत्से ऐसा नहीं सोचता। न ही उपनिषद के ऋषि ऐसा सोचते हैं। और न ही पृथ्वी पर जिन लोगों ने भी परम ज्ञान को पाया है, उनकी ऐसी धारणा है।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--010

भरे पेट और खाली मन का राज—ताओ—(प्रवचन—दसवां)


अध्याय 3 : सूत्र 2

इसलिए संत और प्रबुद्ध अपनी
शासन व्यवस्था में उनके
उदरों को भरते हैं, किंतु
उनके मनों को शून्य करते हैं।
वे उनकी हड्डियों को दृढ़तर बनाते हैं, परंतु उनकी
इच्छा-शक्ति को निर्बल करते हैं।

लाओत्से की सभी बातें उलटी हैं। उलटी हमें दिखाई पड़ती हैं। और कारण ऐसा नहीं है कि लाओत्से की बात उलटी है, कारण ऐसा है कि हम सब उलटे खड़े हैं।
लाओत्से का एक शिष्य च्वांगत्से मरने के करीब था। अंतिम क्षणों में उसके मित्रों ने पूछा, तुम्हारी कोई इच्छा है? तो उसने कहा, एक ही इच्छा है मेरी कि इस पृथ्वी पर मैं पैरों के बल खड़ा था, उस परलोक में मैं सिर के बल खड़ा होना चाहता हूं। शिष्य बहुत परेशान हुए। और उन्होंने कहा, हमारी कुछ समझ में नहीं आता। क्या आप परलोक में उलटे खड़े होना चाहते हैं? तो च्वांगत्से ने कहा, जिसे तुम सीधा खड़ा होना कहते हो, उसे इतना उलटा पाया कि आने वाले जीवन में उलटा खड़े होकर प्रयोग करना चाहता हूं, शायद वही सीधा हो।

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--008

स्वामित्व और श्रेय की आकांक्षा से मुक्त कर्म–प्रवचन—आठवां


 अध्याय 2: सूत्र 4

सभी बातें अपने आप घटित होती हैं,
परंतु वे उनसे विमुख नहीं होते;
उन्हें वे जीवन प्रदान करते हैं,
किंतु अधिकृत नहीं करते।
वे इन समस्त प्रक्रियाओं से गुजरते हैं,
परंतु इनके स्वामी नहीं बनते;
कर्तव्य निभाते हैं, पर श्रेय नहीं लेते।
चूंकि वे श्रेय का दावा नहीं करते,
इसलिए उन्हें श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता।

सलिए ज्ञानी निष्क्रिय भाव से अपने कार्यों की व्यवस्था तथा निःशब्द द्वारा अपने सिद्धांतों का संप्रेषण करते हैं। इसके बाद के सूत्र में लाओत्से कहता है, "सभी बातें अपने आप घटित होती हैं।'

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--009

महत्वाकांक्षा का जहर व जीवन की व्यवस्था—प्रवचन—नौवां

अध्याय 3 : सूत्र 1

निष्क्रिय कर्म

यदि योग्यता को पद-मर्यादा न मिले, तो न तो विग्रह हो
और न संघर्ष। यदि दुर्लभ पदार्थों को महत्व नहीं दिया जाए,
तो लोग दस्यु-वृत्ति से भी मुक्त रहें।
यदि उसकी ओर, जो स्पृहणीय है, उनका ध्यान आकर्षित
न किया जाए, तो उनके हृदय अनुद्विग्न रहें।

नुष्य की चिंता क्या है? मनुष्य की पीड़ा क्या है? मनुष्य का संताप क्या है?
एक मनुष्य चिंतित हो, थोड़े से लोग परेशान हों, तो समझा जा सकता है, उनकी भूल होगी। लेकिन होता उलटा है। कभी कोई एक मनुष्य निश्चिंत होता है, कभी कोई एक मनुष्य स्वस्थ होता है; बाकी सारे लोग अस्वस्थ, अशांत और पीड़ित होते हैं।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--007


निष्क्रिय कर्म व निःशब्द संवाद--ज्ञानी का—प्रवचन—सातवां

अध्याय 2 : सूत्र 3

इसलिए ज्ञानी निष्क्रिय भाव से अपने कार्यों
की व्यवस्था करते हैं तथा निःशब्द द्वारा अपने
सिद्धांतों का संप्रेषण करते हैं।

स्तित्व द्वंद्व है। जो भी किया जाए, उसके साथ ही उससे विपरीत भी होना शुरू हो जाता है।
लाओत्से ने पहले दो सूत्रों में अस्तित्व की इस द्वंद्वात्मकता की बात की है। और अब तीसरे सूत्र में लाओत्से कहता है, "इसलिए--देयरफोर दि सेज मैनेजेज अफेयर्स विदाउट एक्शन--इसलिए ज्ञानी निष्क्रिय भाव से अपने कार्यों की व्यवस्था करता है।'
इसे समझना, थोड़े गहरे में जाना पड़े। अगर ज्ञानी किसी से कहे कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूं, तो वह साथ ही घृणा को जन्म दे रहा है। अगर ज्ञानी कहे कि मैं लोगों के हित के लिए काम करता हूं, तो वह अहित को जन्म दे रहा है। अगर ज्ञानी कहे कि मैं तुम्हें जो देता हूं, यह सत्य है, तो वह असत्य को जन्म दे रहा है। लाओत्से ने पहले कहा कि प्रत्येक चीज द्वंद्व से भरी है। यहां हम कुछ भी करेंगे, तो उससे विपरीत तत्काल हो जाता है। विपरीत बचेगा नहीं। विपरीत से बचने का उपाय नहीं है। हमने कुछ किया कि हम विपरीत के जन्मदाता हो जाते हैं। हमने किसी की रक्षा की, तो हम किसी को नुकसान पहुंचा देते हैं। और हमने किसी को बचाया, तो हम किसी को मिटाने का कारण बन जाते हैं।

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--006


विपरीत स्वरों का संगीत—प्रवचन—छठवां


अध्याय 2 : सूत्र 2

इस प्रकार अस्तित्व और अनस्तित्व मिल कर एक-दूसरे के
भाव को जन्म देते हैं; असरल और सरल एक-दूसरे के भाव
की सृष्टि करते हैं; विस्तार और संक्षेप एक-दूसरे की आकृति
का निर्माण करते हैं; उच्चता और नीचता का भाव एक-दूसरे
के विरोध पर अवलंबित हैं; संगीत के स्वर और ध्वनियां
परस्पर संबद्ध होकर ही समस्वर बनती हैं, और पूर्वगमन एवं
अनुगमन से ही क्रम के भाव की उत्पत्ति होती है।

जो विरोधी है, जो विपरीत है, वही संगी भी है, वही साथी भी। जो शत्रु है, जो दुश्मन है, वही मित्र भी है, वही सगा भी।
लाओत्से विरोधी को विरोधी नहीं देखता, दूर को दूर नहीं मानता, विपरीत को विपरीत नहीं। लाओत्से का कहना है, सब दूरियां निकटता से ही तौली जाती हैं। और सब निकटताएं दूरियों का ही छोटा रूप हैं। शुभ्र रेखा खींचनी हो, तो अंधेरी, काली पृष्ठभूमि की जरूरत पड़ती है।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--005


सापेक्ष विरोधों से मुक्त--सुंदर और शुभ—प्रवचन—पांचवां

अध्याय 2 : सूत्र 1

सापेक्ष विरोधों की उत्पत्ति

जब पृथ्वी के प्राणी सुंदर के सौंदर्य से परिचित होते हैं,
तभी से कुरूप की पहचान शुरू होती है।
और जब वे शुभ से परिचित होते हैं,
तभी उन्हें इस बात का बोध होता है कि अशुभ क्या है।


सौंदर्य से परिचित होते ही, सौंदर्य की प्रतीति होते ही, इस बात की खबर मिलती है कि कुरूप का परिचय हो गया। शुभ का बोध अशुभ के बोध के बिना असंभव है।
लाओत्से ने अपने प्रथम सूत्रों में जो बात कही है, उसे एक नए आयाम से पुनः दोहराया है। लाओत्से यह कह रहा है, जो व्यक्ति सुंदर को अनुभव करता है, वह बिना कुरूप का अनुभव किए सुंदर को अनुभव न कर सकेगा। जिस व्यक्ति के मन में सौंदर्य की प्रतीति होती है,

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--004

अज्ञान और ज्ञान के पार--वह रहस्य भरा ताओ—चौथा प्रवचन

अध्याय 1 : सूत्र 4

इन दोनों पक्षों में यह एक ही है; किंतु ज्यों-ज्यों इसकी प्रगति होती है, लोग इसे भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित करते हैं। इन नामों के समूह को ही हम रहस्य कहते हैं। जहां रहस्य की सघनता सर्वोपरि हो, वहीं उस सूक्ष्म और चमत्कारी का प्रवेश-द्वार है।

दो के भीतर एक का ही निवास है। जहां-जहां दो दिखाई पड़ता है बुद्धि को, वहां-वहां अस्तित्व तो एक ही है। ऐसा कहें, बुद्धि का देखने का ढंग चीजों को दो में तोड़ लेने का है। जैसे ही बुद्धि किसी चीज को देखने जाती है, वैसे ही दो में तोड़े बिना नहीं रह सकती।

रविवार, 14 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--003


ताओ की निष्काम गहराइयों में—प्रवचन—तीसरा

अध्याय 1 : सूत्र 3

इसलिए यदि जीवन के रहस्य की अतुल गहराइयों
को मापना हो तो निष्काम जीवन
ही उपयोगी है। कामयुक्त मन को
इसकी बाह्य परिधि ही दिखती है।

जिस पथ पर विचरण किया जा सके, वह पथ नहीं; जिस सत्य की निर्वचना हो सके, वह सत्य नहीं।
अनाम है अस्तित्व का जन्मदाता और नाम है वस्तुओं की जननी।
ऐसे दो सूत्रों के बाद लाओत्से का तीसरा सूत्र है: देयरफोर, इसलिए। तो सबसे पहले तो इस इसलिए को समझ लेना जरूरी है, फिर हम सूत्र को समझ पाएंगे। आश्चर्यजनक लगता है एकदम से, क्योंकि पहली दो बातों से तीसरे सूत्र का ऐसा कोई संबंध नहीं है, जिसे देयरफोर से जोड़ा जा सके।
सत्य नहीं कहा जा सकता। ऐसा मार्ग नहीं, जिस पर चला जा सके।