संबोधि के क्षण-ओशे
प्रवचन-आठवां -मेरा विकल्प
प्रश्न--अस्पष्ट है।ओशो--चित्रकला में चित्रकार, चित्र बनाने वाला अलग होता है, और जैसे-जैसे चित्र बनता जाता है, वैसे-वैसे चित्र अलग होता जाता है। जब तब नहीं बना, तब तक बनानेवाला चित्र एक है। जब तक चित्र नहीं बना, तब तक चित्रकार ही है, और वही चित्र भी है। फिर उसने बनाया, तो चित्र अलग हो गया और चित्रकार अलग हो गया।
तो एक ऐसा सृजन है कि जहां सृष्टा से अलग हो जाता है। लेकिन दूसरा उदाहरण लें--नृत्यकार है, वह नाचता है। लेकिन नृत्य अलग नहीं होता है। लेकिन नृत्य और नृत्यकार एक ही रह जाते हैं। जब नहीं नाच रहा था, तब भी एक थे। अब जब नाच रहा है, तब भी एक हैं और नाच बंद हो जाएगा, तो नृत्यकार ही मिलेगा, नृत्य कहीं खोजने से मिलनेवाले नहीं है। यानी वहां क्रिएटर और क्रिएशन एक ही है। ये दो उदाहरण इसलिए लेता हूं कि जब तक आमतौर से परमात्मा को इस तरह सोचा गया है कि जैसे वह बनाकर अलग हो जाता है। वह गलत दृष्टि है। परमात्मा क्रिएटर नहीं है, सृष्टा नहीं है; क्योंकि सृष्टा हमेशा सृष्टि से अलग हो जाता है।

