सजग,शांत और
संतुलित बने रहो--प्रवचन-ग्याहरवां
मनुष्य
होने की कला--(The
bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से
हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)
कथा:
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भिक्षु
जुईगन अपना प्रत्येक दिन स्वयं अपने आप मैं जोर-जोर से-
यह
कहते हुए ही शुरू करता था- ''मास्टर! क्या तुम हो वहां?’’
और
वह स्वयं ही उसका उत्तर भी देता था- '' जी हां श्रीमान? मैं हूं। ''
तब
वाह कहता- ''
अच्छा यही है- सजग, शांत और संतुलित बने रहो।''
और
वह लौट कर जवाब देता—‘’जी श्रीमान? मैं यही करूंगा
''
तब
वह कहता- ''और अब देखो वे कहीं तुझे बेवकूक न बना दें।‘’
और
वह ही उसका उत्तर देता- ''अरे नहीं श्रीमान? मैं नहीं
बगूंगा
मैं
हरगिज नहीं बनूंगा?
ध्यान
टुकड़ों में करने वाली चीज नहीं हो सकती, वह एक सतत प्रयास होना चाहिए।
प्रत्येक को हर क्षण सचेत, सजग और ध्यानपूर्ण होना चाहिए।
लेकिन मन एक चालबाजी करता है, तुम सुबह ध्यान करते हो और तब
उसे उठाकर बगल में रख देते हो अथवा तुम मंदिर जाकर प्रार्थना करते हो और तब भूल
जाते हो। तब तुम पूरी तरह बिना ध्यान इस संसार में वापस लौटते हरे, लगभग अचेत से जैसे तुम सम्मोहित निद्रा में चल रहे हो।
