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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-11)

फिर पत्तों की पाजेब बजी -प्रश्नोंत्तर 

प्रवचन-ग्याहरवां 

धर्म नितांत वैयक्तिक है

 भगवान, गौतम बुद्ध के साथ धर्म ने एक बहुत बड़ी छलांग, ‘क्वांटम लीप’ ली; परमात्मा निरर्थक हो गया, ध्यान सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। अब बुद्ध के पश्चात, पच्चीस सदियों के बाद, धर्म पुनः एक बार आपकी उपस्थिति में वैसी ही छलांग ले रहा है, और धार्मिकता बन रहा है।   इस घटना को समझाने की अनुकंपा करें।
धर्म की छलांग, यह ‘क्वांटम लीप’ गौतम बुद्ध से भी पच्चीस सदियों पहले एक बार लगी थी, और उसका श्रेय आदिनाथ को मिलता है। उन्होंने पहली बार अनीश्वरवादी धर्म की देशना दी। यह एक बहुत बड़ी क्रंाति थी क्योंकि पूरे जगत में इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी कि ईश्वर के बिना भी धर्म हो सकता है। ईश्वर सभी धर्मों का आवश्यक अंग, एक केंद्रीय तत्व रहा है- ईसाइयत, यहूदी धर्म, इस्लाम सभी का।  लेकिन ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाने से मनुष्य सिर्फ एक परिधि हो जाता है। ईश्वर को यदि इस सृष्टि का स्रष्टा माना जाए तो मनुष्य सिर्फ एक कठपुतली हो जाता है। इसलिए हिबू्र भाषा में, जो कि यहूदी धर्म की भाषा है, मनुष्य को आदम कहा जाता है। अदम यानी कीचड़। इस्लाम धर्म की जो अरेबिक भाषा है, उसमें मनुष्य को आदमी कहा जाता है, जो कि आदम शब्द से बना है। उसका अर्थ फिर कीचड़ होता है। अंगरेजी में जो कि ईसाई धर्म की भाषा बनी, जो शब्द है ‘ह्यूमन’ वह ह्यूमस से आता है; और ह्यूमस यानी मिट्टी।  स्वभावतः परमात्मा अगर स्रष्टा है, तो उसे कुछ तो बनाना चाहिए। जैसे मूर्ति बनाते हैं वैसे उसे मनुष्य को बनाना चाहिए।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-10)

प्रवचन-दसवां

18 दिसंबर, 1985, प्रातः, कुल्लू-मनाली

कम्यून अर्थात आध्यात्मिक विश्वविद्यालय

भगवान, ओरेगान के कम्यून के निर्माण-काल में आपने मौन व्रत लिया हुआ था; फिर कम्यून के निर्माण कार्य में आप सहभागी कैसे हुए? और इस किस्म का कम्यून किसकी जरूरत है- आपकी, आपके शिष्यों की, या बृहत समाज की? 
पहली बात, मैं उसमें किसी भी तरह भागीदार नहीं था। इसे समझाना जरा कठिन होगा कि बिना भाग लिए भी चीजें संभव हैं।  उदाहरण के लिए, सुबह सूरज उगता है, पक्षी गीत गाने लगते हैं- सूरज उसमें सहभागी नहीं है। वह किसी भांति कोई कृत्य नहीं कर रहा है, पक्षियों को गाने के लिए प्रवृत्ति नहीं कर रहा है। फूल खिलते हैं- सूरज सहभागी नहीं है।  तो मैं कहूंगा कि मैं जरा भी सहभागी नहीं था, वह समक्रमिकता थी। मैं वहां उपस्थित था। और मेरे मौन में तो यह उपस्थिति और भी सघन थी। और मेरी उपस्थिति ने कम्यून निर्मित करने में मेरे लोगों की मदद की।  कम्यून के बारे में मैं वर्षों चर्चा करता रहा हूं। उसको मैंने पूरी दृष्टि दी है, लेकिन जब वह निर्मित हो रहा था तब मैं उसमें कोई सक्रिय भाग नहीं लिया। मैं सिर्फ एक उपस्थिति था।  तो मैं सहभागिता शब्द का उपयोग नहीं कर सकता, लेकिन मैं समक्रमिकता शब्द का उपयोग कर सकता हूं।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-09)

प्रवचन-नौवां

17 दिसंबर 1985, कुल्लू-मनाली

इस खेल में गुरु ही जीतता है

प्यारे भगवान, रजनीश टाइम्स परिवार तथा रजनीशधाम नव संन्यास कम्यून के प्रत्येक सदस्य की ओर से बधाई। भारत तथा विदेश में बहुत से संन्यासी ऐसे हैं जिन्होंने आपको कभी नहीं देखा परंतु आपके प्रति उनका प्रेम एवं आपकी दृष्टि के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रेरणा दायक है। यह कैसे घटित होता है, इतना प्रेम, इतनी श्रद्धा? 
वस्तुतः यह आसान है अगर तुमने मुझे न देखा हो और फिर भी प्रेम घटित हुआ हो। यह प्रतिबद्धता कहीं ज्यादा शुद्ध, ज्यादा बेशर्त, ज्यादा अवैयक्तिक होगी। मुझे देखना, मेरे साथ होना और फिर भी मुझसे प्रेम करना कठिन बात है।  कारण यह है कि हमारे मन का इस ढंग से पालन-पोष्ण हुआ है कि हम हमेशा आकांक्षाओं से भरे हैं। अगर मैं तुम्हारी आकांक्षाओं की पूर्ति करता हूं। तुम्हारी श्रद्धा डावांडोल होने लगती है। और जहां तक मेरा संबंध है, मैं तुम्हारी आकांक्षाओं के पूरा नहीं कर सकता। यदि मैं तुम्हारी आकांक्षाओं को पूरा करता चलूं, तब मैं तुम्हारे विकास में मदद करने वाला न रहा। कोई द्वार नहीं खुलता। मैं यहां तुम्हारे मन को सहारा देने के लिए नहीं हूं। इसे आत्यंतिक ऊंचाई तक ले चलने के लिए मैं यहां हूं। लेकिन तुम्हारी आकांक्षाएं ही समस्या है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-08)

प्रवचन-आठवां

16 दिसंबर 1985, अपराह्म, कुल्लू-मनाली

जीवन सदा अनिश्चित है

रजनीशपुरम के कम्यून के असफल हो जाने के बाद अब कम्यून के भविष्य के संबंध में आपके क्या विचार हैं? 
पहली बात, वह असफल नहीं हुआ। क्या तुम सोचते हो कि सुकरात को जहर देकर मार डालना सुकरात और उसके दर्शन की असफलता थी? वस्तुतः वह तो उस आदमी की परम विजय थी। उसने सिद्ध कर दिया, एक अकेला आदमी और उसका सत्य, समाज और उसकी ताकत, उसकी संपदा, जनसंख्या, फौजें- इन सबसे शक्तिशाली है। वे लोग उस आदमी के साथ सिर्फ एक बात कर सकेः वे उसकी हत्या कर सके। लेकिन मनुष्य की हत्या करने से सत्य की हत्या नहीं होती। वस्तुतः उल्टे सुकरात को मारकर उन्होंने उसके सत्य को अमर कर दिया है।  क्या तुम सोचते हो कि जीसस की सूली उनकी असफलता था? यदि जिस को सूली नहीं दी जाती तो ईसाइयत पैदा ही नहीं होती। उनको दी गई सूली ही, उनकी महिमा को उच्चतम शिखर पर ले जाती है।  तो मैं नहीं मानता कि अमेरिका में कम्यून का नष्ट होना उसकी असफलता है; वह सफल हुआ है। हम कई चीजें सिद्ध करने मग सफल रहे हैं।  हम यह सिद्ध करने में सफल हुए कि विश्व की सब से बड़ी रा य-सत्ता भी एक छोटे से कम्यून से डरती है, जिसके पास प्रेम के अलावा और कोई ताकत नहीं है। इसका मतलब हुआ, प्रेम ताकत से अधिक ताकतवर है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-07)

प्रवचन-सातवां

14 दिसंबर 1985, अपराह्म, कुल्लू-मनाली 

मेरी निंदाः मेरी प्रशंसा

भगवान, लंबे अनुभव से यही दिखाई देता है कि ऋषियों का तथा बुद्धपुरुषों का संदेश हमेशा गलत समझा जाता है या उपेक्षित रह जाता है। क्या इसका यह अर्थ है कि अपनी भूलों के कारण मनुष्यता अनंत काल तक दुख झेले, यही उसकी नियति है?

 मैं निराशावादी नहीं हूं। मैं आशा के विपरीत आशा करता हूं। और यह प्रश्न भी कुछ उसी प्रकार का है।  प्रज्ञापुरुष के, बुद्धपुरुष के रास्ते में अपरिसीम कठिनाइयां होती हैं।  पहलीः उसकी अनुभव मन की निर्विचार स्थिति में घटता है। तो जब वह उसे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करता है, तो मजबूरन उसे शब्दों का उपयोग करना पड़ता है। सौ बुद्धपुरुषों में से निन्यानबे चुप रहे हैं; क्योंकि जैसे ही तुम निःशब्द अनुभव को शब्दों में ढालते हो, तो उसकी आत्मा खो जाती है। फर्क यह है कि तुम एक सुंदर पक्षी को खुले आकाश में उड़ते हुए देखते हो; वह इतना सुंदर दृश्य होता है- उसकी स्वतंत्रता वह खुला आकाश, वह अनंतता! और फिर तुम उस पक्षी को पकड़कर सोने के पिंजरे में रखते हो, जो कि बेशकीमती होता है। एक तरह से वह वही पक्षी है, लेकिन फिर भी वही नहीं है। उसका आकाश कहां गया? उसके पंख कहां है? उसकी स्वतंत्रता कहां गई?

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-05)

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-पांचवां)

5 दिसंबर 1985, प्रातः कुल्लू-मनाली 

अपनी वास्तविकता को पा लेना स्वर्ग है

आज के मनुष्य के लिए आपका क्या संदेश है?  मनुष्य-जाति का इतिहास हजारों वर्षों का है और मनुष्य ने कुछ गलत विचार, कुछ गलत किस्म की धारणाएं, अंधविश्वास बना लिए हैंः और वही बातें उसकी हड्डी, रक्त मांस-म जा बन गयी हैं।  यह बात बिल्कुल भुला ही दी गयी है कि एक बच्चा न तो हिंदू के रूप में पैदा होता है, न ही मुसलमान के रूप मग पैदा होता है, न ही भारतीय के रूप में और न ही अमेरीकी के रूप में। हम हजारों वर्षों की जानकारियां बच्चों में भर देते हैं, उन्हें उन में संस्कारित कर देते हैं, और नष्ट कर देते हैं उनकी निर्दोष्तिा। और जिस क्षण कोई बच्चा अपनी निर्दोष्तिा खो देता है, वह अर्थहीन जीवन जीने लगता है। वह स्वयं नहीं हो सकता, वह बिल्कुल भूल ही जाता है कि वह कौन है, और वह ऐसी विचारधाराओं द्वारा भर दिया जाता है, जो उसकी अपनी होती ही नहीं।  सह स्कीजोफ्रेनिया, यह खंडित होने की स्थिति ही मनुष्य-जाति की मौलिक समस्या हैः और मेरा मौलिक संदेश यही हो सकता है कि इस स्थिति के स्वरूप को, इसके पूरे वातावरण को मिटा दो। प्रत्येक बच्चे को अपनी निर्दोष्तिा में ही विकसित होने देना है।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-04)

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-चौथा)

सब प्रश्नों का एक उत्तरः ध्यान भगवान, विश्व भर में आपके संन्यासी और प्रेमी आपके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। अब आप कैसे हैं।  मेरा स्वास्थ्य ठीक है। उन्होंने मुझे नुकसान पहुंचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्हें इसमें सफलता न मिल सकी। दो कारण से; पहला कारण तो यह रहा कि जिन लोगों को उन्होंने नियुक्त किया था मुझे तकलीफ देने के लिए, छिपे-छिपे ढंग से ऐसी स्थितियां बनाने के लिए जिनके द्वारा मुझे पीड़ित किया जाए, वे लोग जल्दी ही मेरे प्रेम में पड़ गये। वे मुझसे कहने लगे, इस तरह का काम तो हम नहीं कर सकते।  एक जेल में तो खास तौर से ऐसा हुआ, उसे जेल का शेरिफ, उप शेरिफ, डॉक्टर, नर्सें और सारे कैदी व वहां नियुक्त तमाम व्यक्ति- तीन सौ साठ व्यक्ति- वह तो करीब-करीब कम्यून बन गया। छः दिन तक मैं वहां था, और जेल का सारा वातावरण ही बदल गया।  वे शेरिफ वृद्ध था, और वह मुझसे कहने लगा, ‘ऐसा पहली बार हुआ है और शायद अंतिम बार ही होगा कि आप जैसा व्यक्ति इस जेल में आया।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-03)

फिर पत्तों की पाजेब बजी-तीसरा 

एक पृथ्वी, एक मनुष्यता टेप में प्रश्न सुना नहीं जा सकता।  मैं झंझावात का केंद्र बिन्दु हूं, इसलिए मेरे आसपास जो भी घटता है उससे मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता- फिर चाहे वह तूफान हो या किसी झरने का कल-कल निनाद हो; मैं दोनों का साक्षी हूं। और यह साक्षित्व निश्चल बना रहता है। जहां तक मेरे अंतरतम अस्तित्व का सवाल है, हर परिस्थिति में मैं केवल साक्षी होता हूं।  और यही मेरी सारी देशना है कि चीजें बदलती रहेंगी लेकिन तुम्हारी चेतना बिल्कुल अचल बनी रहे। चीजों की बदलाहट अनिवार्य है, वह उनका स्वभाव है। एक दिन तुम सफल होते हो, एक दिन तुम असफल होते हो। एक दिन तुम शिखर पर होते हो, दूसरे दिन तुम खाई में होते हो; लेकिन तुम्हारे भीतर कुछ तत्व हमेशा बिल्कुल अचल होता है। वही कुछ तत्व तुम्हारी वास्तविकता है। और मैं अपनी वास्तविकता में जीता हूं, उन स्वप्नों और दुःस्वप्नों में नहीं, जो वास्तविकता को घेरे रहते हैं।  क्या आप यहां रहने की योजना बना रहे हैं?  मैं कभी कोई योजना नहीं बनाता।  टेप में प्रश्न सुना नहीं जा सकता।

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-02)

27 अक्टूबर 1986 संध्या, सुमिला जुहू बंबई  

  फिर पत्तों की पाजेब बजी-प्रवचन-दूसरा

मैं केवल एक मित्र हूं आपके अमेरिका के अनुभव के बाद, अब आप शारीरिक और मानसिक रूप से कैसा अनुभव करते हैं?  यह सवाल बड़ा जटिल है; हालांकि सरल दिखाई देता है।  मनुष्य को तीन तलों पर विभाजित किया जा सकता हैः शारीरिक, मानसिक, आत्मिक। और एक और भी तल है, जिसे युगों-युगों से रहस्यदर्शियों ने कोई नाम नहीं दिया। भारत में उसको कहते हैं, ‘तुरीय’। अंग्रेजी में हम उसको ‘द फोर्थ’ कह सकते हैं।  और मैं अपने मार्ग को तुरीय का, ‘द फोर्थ का मार्ग कह सकता हूं। मैं तुरीय हूं। तुम भी तुरीय हो। कोई जानता हो या न जानता हो, लेकिन तुरीय उसकी वास्तविकता है। वह हमारी चेतना है। वह अस्तित्व का परम विकास है। एक बार तुमने तुरीय को जान लिया, तो बाकी तीन तुमसे अलग हो जाते हैं। मैं देखता हूं कि मेरे शरीर को सताया जा रहा है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं सताया जा रहा हूं। मैं अपनी भूख देख सकता हूं, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं भूखा हूं- शरीर भूखा है और मैं देख रहा हूं।  ये बारह दिन मेरे लिए अत्यंत अर्थपूर्ण थे। मैं अमेरिका के फासिस्ट शासन के प्रति अनुगृहीत हूं कि उन्होंने मुझे यह अवसर दिया। उन्होंने हर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ढंग से मुझे उत्पीड़ित किया,

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रवचन-01)

फिर पत्तों की पाजेब बजी-(प्रश्नोत्तर)

प्रवचन-पहला 

भारतः एक सनातन यात्रा

प्यारे भगवान, वह कौन-सा सपना है, जिसे साकार करने के लिए आप तमाम रुकावटों और बाधाओं को नजरअंदाज करते हुए पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से निरंतर क्रियाशील हैं? 
हर्षिदा, सपना तो एक है, मेरा अपना नहीं, सदियों पुराना है, कहें कि सनातन है। पृथ्वी के इस भू-भाग में मनुष्य की चेतना की पहली किरण के साथ उस सपने को देखना शुरू किया था। उस सपने की माला में कितने फूल पिरोये हैं- कितने गौतम बुद्ध, कितने महावीर, कितने कबीर, कितने नानक, उस सपने के लिए अपने प्राणों को निछावर कर गये। उस सपने के मैं अपना कैसे कहूं? वह सपना मनुष्य का, मनुष्य की अंतरात्मा का सपना है। इस सपने को हमने एक नाम दे रखा है। हम इस सपने को भारत कहते हैं। भारत कोई भूखंड नहीं है। न ही कोई राजनैतिक इकाई है, न ऐतिहासिक तथ्यों का कोई टुकड़ा है। न धन, न पद, न प्रतिष्ठा की पागल दौड़ है।  भारत है एक अभीप्सा, एक प्यास- सत्य को पा लेने की।  उस सत्य को, जो हमारे हृदय की धड़कन-धड़क में बसा है। उस सत्य को, जो हमारी चेतना की तहों में सोया है। वह जो हमारा होकर भी हमें भूल गया है।