फिर पत्तों की पाजेब बजी -प्रश्नोंत्तर
प्रवचन-ग्याहरवां
धर्म नितांत वैयक्तिक है
भगवान, गौतम बुद्ध के साथ धर्म ने एक बहुत बड़ी छलांग, ‘क्वांटम लीप’ ली; परमात्मा निरर्थक हो गया, ध्यान सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। अब बुद्ध के पश्चात, पच्चीस सदियों के बाद, धर्म पुनः एक बार आपकी उपस्थिति में वैसी ही छलांग ले रहा है, और धार्मिकता बन रहा है। इस घटना को समझाने की अनुकंपा करें।धर्म की छलांग, यह ‘क्वांटम लीप’ गौतम बुद्ध से भी पच्चीस सदियों पहले एक बार लगी थी, और उसका श्रेय आदिनाथ को मिलता है। उन्होंने पहली बार अनीश्वरवादी धर्म की देशना दी। यह एक बहुत बड़ी क्रंाति थी क्योंकि पूरे जगत में इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी कि ईश्वर के बिना भी धर्म हो सकता है। ईश्वर सभी धर्मों का आवश्यक अंग, एक केंद्रीय तत्व रहा है- ईसाइयत, यहूदी धर्म, इस्लाम सभी का। लेकिन ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाने से मनुष्य सिर्फ एक परिधि हो जाता है। ईश्वर को यदि इस सृष्टि का स्रष्टा माना जाए तो मनुष्य सिर्फ एक कठपुतली हो जाता है। इसलिए हिबू्र भाषा में, जो कि यहूदी धर्म की भाषा है, मनुष्य को आदम कहा जाता है। अदम यानी कीचड़। इस्लाम धर्म की जो अरेबिक भाषा है, उसमें मनुष्य को आदमी कहा जाता है, जो कि आदम शब्द से बना है। उसका अर्थ फिर कीचड़ होता है। अंगरेजी में जो कि ईसाई धर्म की भाषा बनी, जो शब्द है ‘ह्यूमन’ वह ह्यूमस से आता है; और ह्यूमस यानी मिट्टी। स्वभावतः परमात्मा अगर स्रष्टा है, तो उसे कुछ तो बनाना चाहिए। जैसे मूर्ति बनाते हैं वैसे उसे मनुष्य को बनाना चाहिए।

