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रविवार, 22 सितंबर 2013

संभोग से समाधि की और--ओशो (अठहरवां-प्रवचन)

न भोग, न दमन—वरण जागरण—अठहरवां प्रवचन



      मेरे प्रिय आत्‍मन,
      तीन सूत्रों पर हमने बात की है।
      जीवन क्रांति की दिशा में पहला सूत्र था- 'सिद्धांतों से, शास्त्रों से मुक्ति।'
      जो व्यक्ति किसी भी तरह के मानसिक कारागृह में बंद है, वह जीवन ' की सत्य की, खोज नहीं कर सकता है। और वे लोग, जिनके हाथों में जंजीरें है उतने बड़े गुलाम नहीं हैं, जितने वे लोग, जिनकी आस्था पर विचारों की जंजीरें हैं; वादों, सिद्धांतों, संप्रदायों की जंजीरें हैं। आदमी की गुलामी मानसिक है।
      दूसरा सूत्र था: ' भीड़ से मुक्ति। '
      भीड़ की आंखों में अपने प्रतिबिंब से बचिये, पब्लिक ओपीनियन से बचिये। वह दूसरी जंजीर है।

संभोग से समाधि की ओर--ओशो (सत्‍तहरवां-प्रवचन)

दमन से मुक्‍ति—सत्‍तरवां प्रवचन


मेरे प्रिय आत्मन

      'जीवन क्रांति के सूत्र' -इस परिचर्चा के तीसरे सूत्र पर आज चर्चा करनी है।
      पहला सूत्र था : सिद्धांत शाख और वाद से मुक्ति।
      दूसरा सूत्र था भीड़ से, समाज से-दूसरों से मुक्ति।
      और आज तीसरे सूत्र पर चर्चा करनी है। इस तीसरे सूत्र को समझने वो लिए मन का एक अद्भुत राज समझ लेना आवश्यक है। मन की वह बड़ी अद्भुत प्रक्रिया है, जो साधारणत: पहचान में नहीं आती।
      और वह प्रक्रिया यह है कि मन को जिस ओर से बचाने की कोशिश की जाये, मन उसी ओर जाना शुरू हो जाता है; जहां से मन को हटाया जाये, मन वहीं पहुंच जाता है; जिस तरफ से पीठ की जाये, मन उसी ओर उपस्थित हो जाता है।
      'निषेध' मन के लिए निमंत्रण है, 'विरोध' मन के लिए बुलावा है। और मनुष्य जाति इस मन को बिना समझे आज तक जीने की कोशिश करती रही है!

शनिवार, 21 सितंबर 2013

संभोग से समाधि की ओर--ओशो (सोलहवां प्रवचन)

भीड़ से, समाज से-दूसरों से मुक्ति—सोलहवां प्रवचन


 मेरे प्रिय आत्मन,
       मनुष्य का जीवन जैसा हो सकता है, मनुष्य जीवन में जो पा सकता है। मनुष्य जिसे पाने के लिये पैदा होता है-वही उससे छूट जाता है। वह उसे नही मिल पाता है कभी किसी एक मनुष्य के जीवन मे-किसी कृष्‍ण, किसी राम, किसी बुद्ध, किसी गांधी के जीवन में सौदर्य के फूल खिलते है। और सत्य की सुगंध फैलती है। लेकिन, शेष सारी मनुष्यता ऐसे ही मुरझा जाती है और नष्ट हो जाती है।
      कौन-सा दुर्भाग्य है मनुष्य के ऊपर...कौन-सी कठिनाई है? करोड़ो बीजों में से अगर एक बीज में अंकुर आये और शेष बीज, बीज ही रह कर सड़ जायें और समाप्त हो जायें, तो यह कोई सुखद स्थिति नहीं हो सकती। और अगर मनुष्य जाति के पूरे इतिहास को उठा कर देखें, तो अंगुलियों पर गिने जा सकें, ऐसे थोडे-से मनुष्य पैदा होते है, जिनकी कथा इतिहास में शेष है। शेष सारी मनुष्यता की कोई कथा इतिहास में शेष नहीं है! शेष सारे मनुष्य बिना किसी सत्य को जाने, बिना किसी सौदर्य को जाने ही मर जाते हैं! क्या ऐसे जीवन को हम जीवन कहें?

संभोग से समाधि की ओर--ओशो (प्रन्‍द्रहवां प्रवचन)

सिद्धन, शास्त्र और वाद से मुक्ति—पन्‍द्रंहवां प्रवचन


 मेरे प्रिय आत्‍मन
      अभी-अभी सूरज निकला। सूरज के दर्शन कर रहा था। देखा आकाश में दो पक्षी उड़े जा रहे हैं। आकाश में न तो कोई रास्ता है, न कोई सीमा है, न कोई दीवाल है, उड़नेवाले पक्षियों के कोई चरण-चिन्ह बनते हैं। खुले आकाश में जिनकी कोई सीमाएं नहीं, उन पक्षियों को उड़ता देखकर मेरे मन में एक सवाल उठा : क्या आदमी की आत्मा भी इतने ही खुले आकाश में उड़ने की गण नहीं करती? क्या आदमी के प्राण भी नहीं तड़पते हैं सारी सीमाओं के ऊपर उठ जाने के लिये-सारे बंधन तोड़ देने के लिये? सारी दीवालों के पार-वहां, जहां कोई दीवाल नहीं; वहां, जहां कोई फासले नहीं; वहां, जहां कोई रास्ते नहीं; वहां, जहां कोई चरण-चिन्ह नहीं बनते-उस खुले आकाश में उठ जाने को मनुष्य की आत्मा की भी क्या प्यास नहीं है?
      उस खुले आकाश का नाम है, परमात्‍मा। लेकिन अभी तो पैदा होते ही बंधनों में बंधने लगता है। चाहे पैदा कोई स्वतंत्र होता हो, लेकिन बहुत कम सौभाग्यशाली लोग हैं, जो स्वतंत्र जीते हैं; और बहुत कम सौभाग्यशाली लोग हैं, जो स्वतंत्र होकर मर पाते हैं। आदमी पैदा तो स्वतंत्र होता है, और फिर निरंतर परतंत्र होता चला जाता है। किसी आदमी की आत्मा परतंत्र न ही होना चाहती; फिर भी आदमी परतंत्र होता चला जाता है!

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

संभोग से समाधि की ओर--ओशो ( चौदहवां-प्रवचन)

नारी एक और आयामप्रवचन चौदहवां



      स्‍त्री और पुरुष के इतिहास में भेद की, भिन्नता की, लम्बी कहानी जुड़ी हुई है। बहुत प्रकार के वर्ग हमने निर्मित किये हैं। गरीब का, अमीर का; धन के आधार पर, पद के आधार पर। और सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि हमने स्‍त्री पुरुष के बीच भी वर्गोंका निर्माण किया है! शायद हमारे और सारे वर्ग जल्दी मिट जायेंगे, स्‍त्री पुरुष के बीच खड़ी की गयी दीवाल को मिटाने में बहुत समय लग सकता है। बहुत कारण हैं।
      स्‍त्री और पुरुष भिन्न हैं, यह तो निशित है, लेकिन असमान नहीं।
      भिन्नता और असमानता दो अलग बातें हैं। भिन्न होना एक बात है। सच में एक आदमी दूसरे आदमी से भिन्न है ही। कोई आदमी समान नहीं है।। कोई पुरुष भी समान नहीं है। स्‍त्री और पुरुष भी भिन्न हैं। लेकिन भिन्नता तो वर्ग बनाना, ऊंचा—नीचा बनाना, मनुष्य का पुराना षड्यंत्र और शैतानी रही है। 

संभोग से समाधि की ओर--ओशो (प्रवचन तैरहवां)

नारी और क्रांतिप्रवचन तैरहवां


      मेरे प्रिय आत्मन

      व्यक्तियों में ही, मनुष्य में ही सी और पुरुष नहीं होते हैं—पशुओं में भी पक्षियों में भी। लेकिन एक और भी नयी बात आपसे कहना चाहता हू : देशों में भी सी और पुरुष देश होते हैं।
      भारत एक सी देश है और सी देश रहा है। भारत की पूरी मनःस्‍थ्‍ति स्त्रैण है। ठीक उसके उलटे जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों को पुरुष देश कहा जाता है। भारत की पूरी आत्मा नारी है। इसलिए ही भारत कभी? आक्रामक नहीं हो पाया। पूरे इतिहास में आक्रामक नहीं हो पाया!
      इसलिए भारत में हिंसा का कोई प्रभाव पैदा नहीं हो सका। भारत की पूरे विचार की कथा अहिंसा की कथा है। भारत के पूरे इतिहास को देखने से एक? आश्रर्यजनक घटना मालूम पड़ती है। दुनिया का कोई भी देश उस अर्थों में स्त्रैण नहीं है, जिस अर्थों में भारत। यही भारत का दुर्भाग्य भी सिद्ध हुआ। सारा जगत पुरुषों का, सारा जगत पुरुष—वृत्तियों का, सारा आक्रामक, सारा जगत हिंसात्मक भारत अकेला आक्रामक नहीं, हिंसात्‍मक नहीं!

बुधवार, 18 सितंबर 2013

संभोग से समाधि की और--ओशो (बाहरवां प्रवचन)

युवा चित्त का जन्‍मबाहरवां प्रवचन


      मेरे प्रिय आत्मन
      सोरवान विश्वविद्यालय की दीवालों पर जगह—जगह एक नया ही वाक्य लिखा हुआ दिखायी पड़ता है। जगह—जगह दीवालों पर, द्वारों पर लिखा है :  ' 'प्रोफेसर्स, यू आर ओल्ड' ' — अध्यापकगण, आप बूढ़े हो गये हैं!
      सोरवान विश्वविद्यालय की दीवालों पर जो लिखा है, वह मनुष्य की पूरी संस्कृति, पूरी सभ्यता की दीवालों पर लिखा जा सकता है। सब कुछ बूढ़ा हो गया है, अध्यापक ही नहीं। मनुष्य का मन भी बूढ़ा हो गया है।
      मैंने सुना है कि लाओत्से के संबंध में एक कहानी है कि वह बूढ़ा ही पैदा हुआ है। यह कहानी कैसे सच होगी? कहना मुश्‍किल है। सुना नहीं कि कभी कोई आदमी बूढ़ा ही पैदा हुआ हो! शरीर से तो कभी नहीं सुना है कि कोई आदमी बूढ़ा पैदा हुआ हो! लेकिन ऐसा हो सकता है कि मन से आदमी पैदा होते ही बूढ़ा हो जाये।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

संभोग से समाधि कि ओर--ओशो (ग्‍याहरवां प्रवचन)

युवक कौनग्‍याहरवां प्रवचन



      युवकों के लिए कुछ भी बोलने के पहले यह ठीक से समझ लेना जरूरी है कि युवक का अर्थ क्या है?
      युवक का कोई भी संबंध शरीर की अवस्था से नहीं है। उम्र से युवा है। उम्र का कोई भी संबंध नहीं है। बूढ़े भी युवा हो सकते हैं, और युवा भी बूढ़ा हो सकते हैं। लेकिन ऐसा कभी—कभी ही होता है कि बूढ़े युवा हो, ऐसा अकसर होता है कि युवा बूढ़े होते हैं। और इस देश में तो युवक पैदा होते हैं यह संदिग्ध बात है।
      युवा होने का अर्थ है—चित्त की एक दशा, चित्त की एक जीवंत दशा, लिविंग स्टेट ऑफ माइंड। बूढ़े होने का अर्थ है—चित्त की मरी हुई दशा।

संभोग से समाधि की और--ओशो (प्रवचन दसवां)

विद्रोह क्या हैप्रवचन दसवां

 

     हिप्‍पी वाद मैं कुछ कहूं ऐसा छात्रों ने अनुरोध किया है।  
      इस संबंध में पहली बात, बर्नार्ड शॉ ने एक किताब लिखी है: मैक्‍सिम्‍प फॉर ए रेव्‍होल्‍यूशनरी, क्रांतिकारी के लिए कुछ स्‍वर्ण-सूत्र। और उसमें पहला स्‍वर्ण बहुत अद्भुत लिखा है। और एक ढंग से पहले स्‍वर्ण सूत्र लिखा है: दि फार्स्‍ट गोल्‍डन रूल इज़ दैट देयर आर नौ गोल्‍डन रूल्‍स पहला स्‍वर्ण नियम यही है कि कोई भी स्‍वर्ण-नियम नहीं है।
      हिप्‍पी वाद के संबंध में जो पहली बात कहना चाहूंगा, वह यह कि हिप्‍पी वाद कोई वाद नहीं है, समस्‍त वादों का विरोध है। पहली पहले इस वाद को ठीक से समझ ले।
      पाँच हजार वर्षों से मनुष्‍य को जिस चीज ने सर्वाधिक पीड़ित किया है वह है वाद—वह चाहे इस्‍लाम हो, चाहे ईसाइयत हो, चाहे हिन्‍दू हो, चाहे कम्यूनिज़म हो, सोशलिज्‍म हो, फासिस्ट, या गांधी-इज्‍म हो। वादों ने मनुष्‍य को बहुत ज्‍यादा पीड़ित किया है।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक—ओशो (भाग दो)

हास्‍य और सेक्‍स के बीच क्‍या संबंध है--
     इनमें निश्‍चित संबंध है; संबंध बहुत सामान्‍य है। सेक्‍स का चरमोत्कर्ष और हंसी एक ही ढंग से होता है; उनकी प्रक्रिया एक जैसी है। सेक्‍स के चरमोत्कर्ष में भी तुम तनाव के शिखर तक जाते हो। तुम विस्‍फोट के करीब और करीब आ रहे हो। और तब शिखर पर अचानक चरम सुख घटता है। तनाव के पास शिखर पर अचानक सब कुछ शिथिल हो जाता है। तनाव के शिखर और शिथिलता के बीच इतना बड़ा विरोध है कि तुम्‍हें ऐसा लगता है कि तुम शांत, स्‍थिर सागर में गिर गये—गहन विश्रांति, सधन समर्पण।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक: ओशो (भाग-1)

सेक्‍स से संबंधित किसी नैतिकता का कोई भविष्‍य नहीं है। सच तो यह है कि सेक्‍स और नैतिकता के संयोजन ने नैतिकता के सारे अतीत को विषैला कर दिया है। नैतिकता इतनी सेक्‍स केंद्रित हो गई कि उसके दूसरे सभी आयाम खो गये—जो अधिक महत्‍वपूर्ण है। असल में सेक्‍स नैतिकता से इतना संबंधित नहीं होना चाहिए।

शनिवार, 14 मई 2011

संभोग से समाधि की और—38

विद्रोह क्‍या है?
    दूसरा सूत्र है—सहज जीवन—जैसे हैं, है।
लेकिन सहज होना बहुत कठिन है। सहज होना सच में ही बहुत कठिन बात है। क्‍योंकि हम इतने असहज हो गए है कि हमने इतनी यात्रा कर ली है। अभिनय की कि वहां लौट जाना, जहां हमारी सच्‍चाई प्रकट हो जाये, बहुत मुश्‍किल है।

मंगलवार, 3 मई 2011

संभोग से समाधि की और—37 ( विद्रोह क्‍या है?)

हिप्‍पी वाद मैं कुछ कहूं ऐसा छात्रों ने अनुरोध किया है।   
      इस संबंध में पहली बात, बर्नार्ड शॉ ने एक किताब लिखी है: मैक्‍सिम्‍प फॉर ए रेव्‍होल्‍यूशनरी, क्रांतिकारी के लिए कुछ स्‍वर्ण-सूत्र। और उसमें पहला स्‍वर्ण बहुत अद्भुत लिखा है। और एक ढंग से पहले स्‍वर्ण सूत्र लिखा है: दि फार्स्‍ट गोल्‍डन रूल इज़ दैट देयर आर नौ गोल्‍डन रूल्‍स पहला स्‍वर्ण नियम यही है कि कोई भी स्‍वर्ण-नियम नहीं है।
      हिप्‍पी वाद के संबंध में जो पहली बात कहना चाहूंगा, वह यह कि हिप्‍पी वाद कोई वाद नहीं है, समस्‍त वादों का विरोध है। पहली पहले इस वाद को ठीक से समझ ले।

सोमवार, 2 मई 2011

संभोग से समाधि की और—36(जनसंख्‍या विस्‍फोट)

जनसंख्‍या विस्‍फोट

प्रश्‍न कर्ता: भगवान श्री, एक और प्रश्‍न है कि परिवार नियोजन जैसा अभी चल रहा है उसमें हम देखते है कि हिन्‍दू ही उसका प्रयोग कर रहे है, और बाकी और धर्मों के लोग ईसाई, मुस्‍लिम, ये सब कम ही उपयोग कर रहे है। तो ऐसा हो सकता है कि उनकी संख्‍या थोड़े वर्षों के बाद इतनी बढ़ जाये कि एक और पाकिस्‍तान मांग लें और तुर्किस्‍तान मांग लें और कुछ ऐसी मुश्‍किलें खड़ी हो जायें। फिर पाकिस्‍तान या चीन है, जहां जनसंख्‍या पर रूकावट नहीं है। तो उसमें  अधिक लोग हो जायेंगे और पर हमला करने की चेष्‍टा रखते है। तो हमारी जनसंख्‍या कम होने से हमारी ताकत कम हो जाय। तो इसके बारे में आपके क्‍या ख्‍याल है?
    
भगवान श्री: इस संबंध में दो तीन बातें ख्‍याल में रखने की है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—35

जनसंख्‍या विस्‍फोट
    
प्रश्‍नकर्ता: भगवान श्री, परिवार नियोजन के बारे में अनेक लोग प्रश्‍न करते है कि परिवार द्वारा अपने बच्‍चों की संख्‍या कम करना धर्म के खिलाफ है। क्‍योंकि उनका कहना है कि बच्‍चे तो ईश्‍वर की देन है, और खिलाने वाला परमात्‍मा है। हम कौन है? हम तो सिर्फ जरिया है, इंस्टूरूमेंट है। हम तो सिर्फ बीच में इंस्‍टुमेंट है, जिसके ज़रिये ईश्‍वर खिलाता है। देने वाला वह, करने वाला वह, फिर हम क्‍यों रोक डालें? अगर हमको ईश्‍वर ने दस बच्‍चे दिये तो दसों को खिलाने का प्रबंध भी तो वहीं करेगा। इस संबंध में आपका क्‍या विचार है?    

     भगवान श्री: सबसे पहले तो धर्म क्‍या है इस संबंध में थोड़ा सी बात समझ लेनी चाहिए।
      धर्म है मनुष्‍य को अधिकतम आनंद, मंगल और सुख देने की कला।
      मनुष्‍य कैसे अधिकतम रूप में मंगल और सुख को उपलब्‍ध हो, इसका विज्ञान ही धर्म है।

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—34

जनसंख्‍या विस्‍फोट
    
कुछ प्रश्‍न उठाये जाते है। यहां उनके उत्‍तर देना पसंद करूंगा:--

     एक मित्र ने पूछा है कि अगर यह बात समझायी जाये तो जो समझदार है, बुद्धिजीवी है, इंटेलिजेन्‍सिया है, मुल्‍क का जो अभिजात वर्ग है, बुद्धिमान और समझदार है, वह तो संतति नियमन कर लेगा, परिवार नियोजन कर लेगा। लेकिन जो गरीब है, दीन-हीन है, वे पढ़े लिखे ग्रामीण है, जो कुछ समझते ही नही, वह बच्‍चे पैदा करते ही चले जायेंगे और लम्‍बे अरसे में परिणाम यह होगा कि बुद्धि मानों के बच्‍चे कम हो जायेगे और गैर-बुद्धि मानों के बच्‍चों की संख्‍या बढ़ती जायेगी।

रविवार, 24 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—33

जनसंख्‍या विस्‍फोट

     जीने का क्‍या अर्थ?
      जीने का इतना ही अर्थ है कि ईग्जस्ट करते है। हम दो रोटी खा लेते है, पानी पी लेते है। और कल तक के लिए जी लेते है। लेकिन जीना ठीक अर्थों में तभी उपलब्‍ध होता है जब हम एफ्ल्‍युसन्‍स को, समृद्धि को उपलब्‍ध हो।
      जीवन का अर्थ है ओवर फ्लोइंग जीने का अर्थ है, कोई चीज हमारे ऊपर से बहने लगे।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—32

जनसंख्‍या विस्‍फोट
     और बहुत से अनजाने मानसिक दबाब भी है। गुरुत्वाकर्षण तो भौतिक दबाव हे; लेकिन चारों तरफ से लोगों की मोजूदगी भी हमको दबा रही है। वे भी हमें भीतर की तरफ प्रेस कर रहे है। सिर्फ उनकी मौजूदगी भी हमें परेशान किये हुए है। अगर यह भीड़ बढ़ती चली जाती है। तो एक सीमा पर पूरी मनुष्‍यता के ‘’न्‍यूरोटिक’’ विक्षिप्‍त हो जाने का डर है।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—31

जनसंख्‍या का विस्‍फोट-
    पृथ्‍वी के नीचे दबे हुए, पहाड़ों की कंदराओं में छिपे हुए, समुद्र की सतह में खोजें गये बहुत से ऐसे पशुओ के अस्‍थिर पंजर मिले है, जिनका अब कोई नामों निशान नहीं रह गया है। वे कभी थे। आज से दस लाख साल पहले पृथ्‍वी बहुत से सरीसृप प्राणियों से भरी थी। लेकिन, आज हमारे घर में छिपकली के अतिरिक्‍त उनका कोई प्रतिनिधि नहीं है। छिपकली भी बहुत छोटा प्रतिनिधि है। दस लाख साल पहले उसके पूर्वज हाथियों से भी पाँच गुना बड़े होते थे। वे सब कहां खो गये, इतने शक्‍तिशाली पशु पृथ्‍वी से कैसे विलुप्‍त हो गये। किसी ने उन पर हमला किया?  किसी ने उन पर एटम बम, हाइड्रोजन बम गिराया? नहीं उनके खत्‍म होने की अद्भुत कथा है।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

संभोग से समाधि की और—30

प्रेम ओर विवाह-- 
     
      अगर मनुष्‍य जाति को परमात्‍मा के निकट लाना है, तो पहला काम परमात्‍मा की बात मत करिये। मनुष्‍य जाति को प्रेम के निकट ले आइये। जीवन जोखिम भरा है। न मालूम कितने खतरे हो सकते है। जीवन की बनी-बनाई व्‍यवस्‍था में न मालूम कितने परिवर्तन करने पड़ सकते है। लेकिन न पर करेंगे परिवर्तन तो यह समाज अपने ही हाथ मौत के किनारे पहुंच गया है। इसलिए मर जाएगा। यह बच नहीं सकता। प्रेम से रिक्‍त लोग ही युद्धों को पैदा करते है। प्रेम से रिक्‍त लोग ही अपराधी बनते है। प्रेम से रिक्‍त ही अपराध, क्रिमीनलिटी की जड़ है और सारी दुनियां में अपराधी फैलते चले जाते है।