ग्यारहवां प्रवचन--गांठ परी पिया बोले न हमसे
सारसूत्र:
गांठ परी पिया बोले न हमसे।माल मुलुक कछु संग न जैहे, नाहक बैर कियो है जग से।।
जो मैं जनितिउं पिया रिसियैहे, नाहक प्रीति लगाती न जग से।।
निसुवासर पिया संग मैं सूतिऊं, नैन अलसानी निकरि गए घर से।।
जस पनिहार धरे सिर गागर, सुरति न टरे बतरावत सब से।।
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर को पावै भाग से।।



