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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-11)

ग्यारहवां प्रवचन--गांठ परी पिया बोले न हमसे

सारसूत्र:

गांठ परी पिया बोले न हमसे।
माल मुलुक कछु संग न जैहे, नाहक बैर कियो है जग से।।
जो मैं जनितिउं पिया रिसियैहे, नाहक प्रीति लगाती न जग से।।
निसुवासर पिया संग मैं सूतिऊं, नैन अलसानी निकरि गए घर से।।
जस पनिहार धरे सिर गागर, सुरति न टरे बतरावत सब से।।
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर को पावै भाग से।।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-10)

दसवां प्रवचन--तुम मेरे पास रहो खुशबू की तरह

प्रश्न-सार

॰ परमात्मा की चाह और परमात्मा की प्यास में क्या फर्क है?
॰ न सोचा न समझा न सीखा न जाना
मुझे आ गया खुद-ब-खुद दिल लगाना
॰ आप कहते हैं, प्रार्थना मांग नहीं, अहोभाव प्रकट करना है। और धरमदास कहते हैं, ‘अर्जी सुनो, कर दो भव पार।’ क्या यह प्रार्थना मांग नहीं है?
॰ मैं आपकी हो गई हूं और आपकी विशाल आंखों में डूब जाने को आतुर हो उठी हूं।
॰ आप इस कदर मेरे भीतर उतर गए हैं कि किन शब्दों में कहूं?
॰ भजन क्या होता है?

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन--बिन दरसन भई बावरी

सारसूत्र:

बिन दरसन भई बावरी, गुरु द्धौ दीदार।।
ठाढ़ि जोहों तोरी बाट मैं, साहैब चलि आवो।
इतनी दया हम पर करौ, निज छवि दरसावो।।
कोठरी रतन जड़ाव की, हीरा लागे किवार।
ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो।।
बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार।
धरमदास अरजी सुनो, कर द्यो भवपार।।

बुधवार, 15 अगस्त 2018

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन--परमात्मा सबरंग है

प्रश्न-सार

॰ क्या हम वासना करने और नहीं करने के लिए स्वतंत्र हैं?
॰ कबीर और धरमदास को लाल रंग पसंद था, मोहम्मद को हरा और नानक को नीला रंग पसंद था। कृपा कर इसका रहस्य समझाएं।
॰ कबीर और धरमदास जैसे परम भक्त भी रोने-धोने के गीत लिखें, यह समझ में नहीं आता।
॰ दस साल से शराब पीना, धूम्रपान, जुआ खेलना, आदि व्यसन जुड़े थे। संन्यास लेते ही सब तिरोहित हो गए। अब तो बिना पीए नशा चढ़ा रहता है।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन--पिया बिन नींद न आवै

सारसूत्र:

साहेब, तेरी देखौं सेजरिया हो।
लाल महल के लाल कंगूरा, लालिनि लागि किवरिया हो।।
लाल पलंग के लाल बिछौना, लालिनि लागि झलरिया हो।।
लाल साहेब की लालिनि मूरत, लालि लालि अनुहरिया हो।।
धरमदास बिनवै कर जोरी, गुरु के चरन बलिहरिया हो।।

पिया बिन मोहि नींद न आवै।।
खन गरजे खन बिजुली चमके, ऊपर से मोहि झांकि दिखावै।
सासु ननद घर दारूनि आहैं, नित मोहि बिरह सतावै।
जोगिन व्हैके मैं बन-बन ढूंढूं, कोऊ न सुधि बतलावै।
धरमदास बिनवै कर जोरी, कोई नेरे कोई दूर बतावै।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन--धर्म आग्नेय होता है

प्रश्न-सार

॰ धर्म की परिभाषा के अनुसार धर्म परम नियम है। और आप कहते हैं धर्म विद्रोह है। यह परम नियम विद्रोही कैसे हो सकता है?
॰ मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा आदमी हूं, फिर भी आप मुझे पंडित की डिग्री क्यों देते हैं?
॰ सदगुरु से आंतरिक निकटता का क्या अर्थ होता है?
॰ अतीत तूफान बन कर घेर लेता है; आगे नहीं जाने देता। इससे छुटकारा कैसे हो?
॰ क्या प्रेम को दूसरे के सहारे की जरूरत होती ही है?
॰ आपके चरणों में बैठना ही इतना मधुर लगता है कि मोक्ष जाने की इच्छा नहीं होती।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन--का करत गुमान!

सारसूत्र:

कहो केते दिन जियबो हो, का करत गुमान।।
कच्चे बांसन का पिंजरा हो, जा में पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उड़ि जान।।
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस-बूंदन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान।।
कागद की नइया बनी, डोरी साहब हाथ।
जौने नाच नचैहें हो, नाचब वोही नाच।।

धरमदास एक बनिया हो करे झूठी बाजार।
साहब कबीर बंजारा हो करै सत्त व्यापार।।
सतगुरु आवो हमरे देस निहारौं बाट खड़ी।
वाही देस की बतिया रे लावै संत सुजान।।
उन संतन के चरण पखारूं तन-मन करि कुर्बान।
वाही देस की बतिया हमसे सतगुरु आन कही।।
आठ पहर के निरखत हमरे नैन की नींद गई।
भूल गई तन-मन-धन सारा व्याकुल भया शरीर।।
विरह पुकारै विरहिनी ढरकत नैनन नीर।
धरमदास के दाता सतगुरु पल में कियो निहाल।।
आवागमन की डोरी कट गई मिटे भरम जंजाल।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-04)

प्रवचन चौथा--दर पे जमी यह नजर

प्रश्न-सार

॰ आप कभी कहते हैं कि परमात्मा के समक्ष भिखारी की तरह जाओ और कभी कहते हैं, सम्राट की तरह जाओ। इस विरोधाभास को समझाने की कृपा करें।
॰ ध्यान की अंतर्यात्रा और भक्ति की अंतर्यात्रा में आधारभूत भिन्नता क्या है?
॰ हम तो साधारण जन हैं और नाटक-सिनेमा, आदि सामान्य सुखों के भी पार नहीं उठ पाते, तो हम श्रद्धा कैसे कर सकेंगे?
॰ दूसरे गुरु के पास जाने पर आपने हमारी जो आलोचना की, उसमें आपका प्रेम तो प्रकट हुआ लेकिन हमारी स्वतंत्रता खंडित हुई।
॰ मैं प्रेम के संबंध में बहुत सोचता हूं। आपकी बातें कभी ठीक लगती हैं, कभी ठीक नहीं भी लगतीं।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--हम सतनाम के वैपारी

सारसूत्र:

हम सतनाम के वैपारी।
कोई कोई लादे कांसा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी।
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी।।
पूंजी न टूटे नफा चैगुना, बनिज किया हम भारी।
हाट जगाती रोक न सकिहै, निर्भय गैल हमारी।।
मोती बूंद घटहिं में उपजे, सुकिरत भरत कोठारी।
नाम-पदारथ लाद चला है, धरमदास वैपारी।।

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन--माधव जन्म तुम्हारे लेखे!

प्रश्न-सार

॰ शिष्यों का चोरी-छिपे दूसरे गुरु को सुनने जाना क्या है--जिज्ञासा, अवज्ञा या और अधिक खोज?
॰ आपकी बातें सीधी और साफ होने के बावजूद भी शिक्षाशास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों की समझ में क्यों नहीं आतीं?
॰ भगवान, मैं कितना भाग्यवान हूं कि मुझे आप मिले!
॰ सभी भक्त अपने-अपने धर्मगुरु की प्रशंसा में अतिशयोक्ति क्यों करते हैं?

जस पनिहार धरे सिर गागर-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन--गुरु मिले अगम के बासी

(दिनांक 31 जनवरी 1978 से 10 फरवरी 1979 तक ओशो आश्रम पूना)

सूत्र:

गुरु मिले अगम के बासी।।
उनके चरणकमल चित दीजै सतगुरु मिले अविनासी।
उनकी सीत प्रसादी लीजै छुटि जाए चैरासी।।
अमृत बूंद झरै घट भीतर साध संत जन लासी।
धरमदास बिनवे कर जोरी सार सबद मन बासी।।
वो नामरस ऐसा है भाई।।