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बुधवार, 11 मार्च 2015

एक विश्‍वव्‍यापी खतरा—(प्रवचन—6)

एक विश्‍वव्‍यापी खतरा(प्रवचनछ:)

हिमालय में बसने के ख्याल से भगवान ने मध्य—नवम्बर में अमरीका छोड़ा। लेकिन लगा कि। भारत सरकार के इरादे कुछ और ही थे। तीन ही दिनों में, भगवान के साथ—साथ आए और आठ से पंद्रह वर्षों तक से उनकी देखभाल करते आ रहे उनके पश्‍चात्‍य शिष्यों को—उनका डाक्टर, परिचारिका और कुछ गृहकार्य करनेवाले—तीन सप्ताह के लिए प्राप्त उनके वीसाओं की अवधि बढ़ाने से इनकार कर दिया गया और उन्हें देश छोड़ देने के आदेश दे दिये गये। ठीक उसी समय, एक इटालियन टी.वी दल को भी वीसा देने से मना कर दिया गया, जो भारत आकर भगवान का इंटरब्यू लेना चाहता था।
भारत सरकार ने शीघ्र और प्रभावशाली रूप से इन्हें अलग— थलग कर दिया था। ऐसा लगा कि अमरीकी अटर्नी—जनरल एड मीज की इच्छा (उनका यह कथन प्रकाशित हुआ था: कि ‘‘मैं उस व्यक्ति को सीधे भारत वापिस देखना चाहता हूं ताकि वह फिर कभी दुबारा सुनने या देखने में न आए’‘), भारत का आदेश थी। क्रिसमस के एक दिन पहले भगवान की निजी—सचिव का तीन महीने का वीसा अलंघनीय रूप से रद्द करके उन्हें संध्या से पहले—पहले देश छोड़ देने के आदेश दिये गये। इसके कुछ ही दिनों के भीतर भगवान उत्तर की ओर उड़े जहां वे काठमांडू (नेपाल) में इन निष्काषित लोगों के साथ रह सकें।

सोमवार, 9 मार्च 2015

समकक्षता का निर्णय—एक खतरनाक मूल्यांकन—(प्रवचन--5)

समकक्षता का निर्णयएक खतरनाक मूल्यांकन(अध्यायपांच)


1983 में, अमरीकी सरकार द्वारा भगवान श्री रजनीश के धार्मिक नेता न होने का निर्णय लिये जाने से सारी दुनियां के धार्मिक तथा अन्य पेशेवरों की ओर से विरोध का एक तूफान उठ खड़ा हुआ। प्रत्येक ईसाई अवधारणा (केथॅलिक, बेपिटस्ट, चर्च ऑफ इंग्लैण्‍ड, प्रेस्बिटेरियन, केकर  लूथरन और ऑर्थाडॉक्स) के विद्वानों,यहूदी रबाइयों, झेन मंदिर के क्रियों, बौद्ध विद्वानों, और सारी दुनियां से धर्म के प्राध्यापकों ने इनके पक्ष में लिखा। ऐसा ही विज्ञान, औषधि, मनोविज्ञान, समाज—विज्ञान, व्यापार एवं कला—लोक की प्रमुख हस्तियों ने भी किया।
उनके संदेश का सार संभवत: सुप्रसिद्ध अमरीकी कवि, लेखक एवं फिल्म निर्माता जेम्स ब्रॉटन के इन शब्दों में सवोंत्तमरूपेण प्रगट हुआ है। उन्होंने लिखा: '' भगवान श्री रजनीश इस सदी के इन अंतिम दशकों के सर्वाधिक असाधारण व्यक्ति है। इतिहास एवं धार्मिक समझ में एक उर्वर नव अंतर्दृष्टि व प्रकाश लानेवाले वे असामान्य योग्यताशील शिक्षक एवं लेखक है।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

खतरा अमरीका में उभरा—(प्रवचन--4)

(अध्‍यायचार)

(1981—1985)
सा लगा कि अमरीकनों ने तो नहीं चाहा। 1981 में चिकित्सा के लिए उन्हें अपने देश में प्रवेश देने के बाद (जिस अधिकारी ने इनको पर्यटक-वीसा प्रदान किया था, पीछे पता चला कि उसका तबादला कहीं और कर दिया गया) उन्होंने अपनी शक्ति भर सब कुछ कर डाला इनसे
छुटकारा पाने के लिए।
स्थायी-आवास के लिए इनका आवेदन नामंजूर कर दिया गया- अमरीकी सरकार ने यह मान्यता देने से इन्कार कर दिया था कि ये धार्मिक शिक्षक थे, जो बात आवास प्राप्त करने के लिए इन्हें योग्यता प्रदान करती थी। सारी दुनिया से धार्मिकों तथा अन्य तमाम व्यवसायों के प्रतिष्ठित लोगों ने जब विरोध का एक मोर्चा खड़ा कर दिया ( अध्याय पांच देखें) तो सरकार को अपना वह फैसला बदलना पड़ा, किंतु तब उसने इनके आवास-आवेदन पर फैसला देना स्थगित कर दिया। उसके बजाय इनके खिलाफ गहनतम खोजबीन का एक ऐसा अभियान प्रारंभ किया जैसा किसी एक व्यक्ति के खिलाफ पहले कभी नहीं किया गया था।

मंगलवार, 3 मार्च 2015

खतरा पूना में पकता रहा--(प्रवचन--3)

खतरा पूना में पकता रहा(अध्‍याय—तीन)
(1974—1981)

पूना में जो घटा उसने पश्रिम का ध्यान तुरंत आकर्षित किया। इतना ज्यादा कि 1978 तक भगवान श्री रजनीश के आश्रम में पूरी दुनिया से प्रतिदिन कोई 2,००० से अधिक आगंतुक आते थे, जिनमें, स्वभावत:, पत्रकार भी शामिल थे।
मुख्य आकर्षण भगवान स्वयं थे। जैसा कि बर्नार्ड लेविन ने कहा है, वे एक '' असाधारण चुंबक’‘ थे। उन सात सालों में उन्होंने रोज सुबह प्रवचन दिये केवल उन किन्हीं-कभार अवसरों को छोड्कर जबकि उनका शरीर अस्वस्थ रहा हो। 1978 में मार्सेल मियर ने लिखा: ‘‘वे एक विशाल, खुले सभागृह में बैठते है और रोज सुबह दो घंटों तक लगभग दो हजार लोगों के सामने बिना किसी लिखित टिप्पणी का सहारा लिये बोलते है। उनके प्रवचनों के विषय होते है-झेन, बौद्धधर्म, सूफीवाद, हिंदू धर्म, बाइबिल, फ्रॉयड, हां, एडलर के सिद्धान्त, आधुनिक आणविक भौतिकी, प्रतिष्ठित दार्शनिक तथा पूर्वीय सद्गुरु।’’ पूना के प्रवचनों का जिन लोगों ने भी वर्णन किया है, निरपवाद रूप से उन सबने भगवान की ‘‘विद्वता तथा विषयों के असाधारण विस्तार’‘ का जिक्र किया है।

सोमवार, 2 मार्च 2015

बचपन से उपद्रव--(प्रवचन--2)

बचपन से उपद्रव—(अध्‍याय—दो)

पीछे जो कुछ होना था उसे देखते हुए, किसी को यह जानकर आश्वर्य न होगा कि भगवान 'श्री रजनीश बचपन से ही उपद्रवी कहलाए जाते थे। हम अतीत के सिंहावलोकन में न जाएं तो भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये बड़े नटखट बालक थे, और इनके मशहूर विनोदप्रिय स्वभाव के साथ-साथ इनमें बड़ों के प्रति अनावश्यक व अकारण आदर- भावना की महती कमी तथा सही-गलत, उचित-अनुइचत का दूसरों से निदेंश लेने के बजाय हर चीज का अन्वेषण स्वयं करने की उत्कट कटिबद्धता ने इन्हें एक डरावनी निष्पत्ति बना दिया था, खासकर उन लोगों के लिए जौ इन्हें सामान्य करना अथवा नियंत्रित करना चाहते थे।

एक प्रश्‍न खतरे का--(प्रवचन--1)

ईसामसीह के पश्‍चात सर्वाधिक विद्रोही व्‍यक्‍ति—ओशो

सू एपलटन
(अध्‍याय--एक)
‘’भगवान श्री रजनीश ईसा मसीह के बाद सर्वाधिक खतरनाक व्‍यक्‍ति है।‘’ ये भविष्‍यसूचक शब्‍द इस वर्ष के प्रारंभ में कहे थे टॉम राबिन्स ने जो अमरीका के सर्वश्रेष्‍ठ जीवित साहित्‍यिक लेखकों में से एक ‘’गिने जाते है। उस समय उन्‍हें इस बात का पता नहीं था लेकिन भविष्‍य में कुछ ऐसी घटनाएं घटने वाली थीं कि विश्‍व का हर प्रमुख शासक भगवान श्री रजनीश से भयभीत था।
क्‍या?
भगवान श्री रजनीश कौन है?
और वे इतने असामान्‍य रूप से अंतर्राष्ट्रीय विवादास्‍पद व्‍यक्‍ति किस तरह बन गए?