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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-19)

चल उड़ जा रे पंछी—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)
दिनांक 9 जुलाई 1974(प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना
भगवान!

नित्य की तरह शिष्यों को उपदेश देने के निमित्त,
भगवान बुद्ध सुबह-सुबह सभागृह में पधारे। श्रोताओं की भीड़ इकट्ठी थी पहले से ही।
इसके पहले कि वे बोलने के लिये अपना मौन तोड़ दें,
एक पक्षी कक्ष के वातायन पर आ बैठा;
परों को फड़फड़ाया, चहका, और फिर उड़ गया।
भगवान बुद्ध ने वातायन की तरफ नजर उठाकर कहा,
'आज का प्रवचन समाप्त हुआ!' और वे सभा से चले गए।
भगवान! कृपापूर्वक बतायें कि यह कैसा प्रवचन था और इसमें क्या कहा गया?

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-18)

वासना-रहितता और विशुद्ध इंद्रियां—(प्रवचन—अट्ठारहवां)
दिनांक 8 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

संत उत्झूगेन ने एक दिन अपने शिष्यों से कहा,
'तुम में से प्रत्येक के पास एक जोड़ा कान है,
लेकिन उनसे तुमने क्या कभी कुछ सुना?
प्रत्येक के पास मुंह हैं, लेकिन उससे तुमने क्या कभी कुछ कहा?
और प्रत्येक के पास आंखें हैं, उनसे क्या कभी कुछ देखा?'
'नहीं-नहीं। तुमने न कभी सुना है, न कभी कहा है, न कभी देखा है, न कभी सूंघा है।
लेकिन ऐसी हालत में ये रंग, रूप, स्वर और सुगंध आते कहां से हैं?'

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-17)

अहंकार की उलझी पूंछ—(प्रवचन—सत्रहवां)
दिनांक 7 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

एक दिन गोसो ने अपने शिष्यों से कहा,
'एक भैंस उस आंगन से बाहर निकल गयी है, जिसमें कि वह कैद थी।
उसने आंगन की दीवार तोड़ डाली है।
उसका पूरा शरीर ही दीवार से बाहर निकल गया--सींग, सिर, पैर, धड़, सब;
लेकिन पूंछ बाहर नहीं निकल पा रही है। और पूंछ कहीं उलझी हुई भी नहीं है।
और पूंछ को किसी ने पकड़ भी नहीं रखा है।
मैं पूछता हूं, फिर भी पूंछ बाहर क्यों नहीं निकल पा रही है?'
शिष्य सोचने लगे और गोसो हंसने लगा।
फिर उसने कहा, 'जिसने सोचा, उसकी पूंछ भी उलझी।'
शिष्य और भी विचार में खो गए।
फिर गोसो ने कहा, 'जिसकी समझ में न आये, वह पीछे लौटकर अपनी पूंछ देखे।'
भगवान! कृपया इस कहानी का अर्थ समझायें।

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-16)

साधु, असाधु और संत—(प्रवचन—सोलहवां)
दिनांक 6 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

एक धनाढय बुढ़िया बीस वर्षों से एक साधु को आश्रय दिये थी।

उसके लिये एक झोपड़ा बनवा दिया था और भोजन देती थी।

एक दिन उसने साधु की जांच लेने की सोची। इसके लिये एक वेश्या की मदद ली।

उससे उसने कहा, 'जाओ और साधु का आलिंगन करो।' और फिर पूछो, 'अब क्या हो?'

वेश्या साधु के पास गयी, उस पर प्रेम प्रगट किया और

फिर पूछा कि अब क्या होना चाहिये?

साधु ने उत्तर दिया, 'जाड़े में ठंडी चट्टान पर जैसे पुराना वृक्ष लगा हो;

कहीं कोई गरमी नहीं।

वेश्या ने लौटकर सारी बात बुढ़िया को बताई।

बुढ़िया बहुत नाराज हुई और उसने जाकर झट साधु का झोपड़ा जला डाला।

भगवान! इस बुढ़िया के व्यवहार को आप क्या कहेंगे?

रविवार, 28 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-15)

आखिरी भोजन हो गया?—(प्रवचन—पंद्रहवां)
दिनांक 5 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

एक नया-नया शिष्य, गुरु जोशू के पास आकर बोला,

'मैं हाल ही धर्मसंघ में सम्मिलित हुआ हूं और ध्यान का पहला सूत्र सीखना चाहता हूं।

क्या आप मुझे वह सिखाने की कृपा करेंगे?'

जोशू ने पूछा, 'क्या तुमने शाम का भोजन कर लिया?'

शिष्य ने कहा, 'जी, मैंने कर लिया।'

गुरु ने तब कहा, 'अब जाकर अपनी थाली धो लो।'

भगवान! कृपा कर इस लघुवार्ता का अभिप्राय बतायें।

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-14)

जो जगाये, वही गुरु--(प्रवचन--चौदहवां)
दिनांक 4 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

गुरु पूर्णिमा के इस पवित्र अवसर पर हमारे शत-शत नमन स्वीकार करें।
भगवान! एक सद्गुरु ने अपने शिष्य को आवाज दी, 'होशिन!'
गुरु का नाम था कोकुशी
गुरु की आवाज पर शिष्य ने कहा, 'जी।'
कोकुशी ने दुबारा पुकारा, 'होशिन!'
और शिष्य ने फिर कहा, 'जी।'
लेकिन गुरु ने तीसरी बार भी आवाज दी, 'होशिन!'
और होशिन फिर बोला, 'जी।'
कोकुशी ने तब होशिन से कहा, 'इस भांति बार-बार पुकारने के लिये
मुझे तुमसे क्षमा मांगनी चाहिये, लेकिन
वस्तुतः तो तुम्हीं मुझसे क्षमा मांगो तो ठीक है।'
भगवान! इस कथा का मर्म बताने की कृपा करें।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-13)

प्रयास नहीं, प्रसाद—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 3 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

यह सुनकर कि अब आप चुने हुए साधकों के बीच ही बोलते हैं
और उन पर ही काम करते हैं, हमारे बीच तरहत्तरह की प्रतिक्रियाएं हुई हैं।
एक संन्यासी मित्र ने कहा, 'इससे एक ओर,
जहां मेरे अहंकार को रस मिला कि मैं चुना गया,
वहां दूसरी ओर यह डर भी लगा कि अब शायद
भगवान के प्रवचनों में रोज सम्मिलित होना ऐच्छिक न रहकर अनिवार्य हो जाए।
एक दूसरे संन्यासी मित्र ने कहा, 'भगवान तो परम करुणावान हैं,
फिर करुणा बांटने में यह भेद क्यों कि कुछ चुने हुए लोग ही,
उनकी अमृतवाणी का प्रसाद पायें?'
और वही बात सुनकर, मुझे मेरी अयोग्यता और पिछड़ापन याद हो आया।
और डर होने लगा कि कहीं इसी कारण भगवान मुझे अपने ढंग से निकाल न दें।
भगवान! कृपापूर्वक हमारे संशय और भय को दूर करने की कृपा करें।

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-12)

पृथ्वी में जड़ें, आकाश में पंख—(प्रवचन—बारहवां)
दिनांक 2 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

जीवन का गंतव्य क्या है, इस संबंध में प्राचीन हिंदू मनीषी चार चीजें बताते हैं:
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
और आप कहते हैं, मैं तुम्हें एक साथ जीवन में जड़ें देना चाहता हूं
और जीवन के महाआकाश में उड़ने के पंख भी।
कृपाकर बताएं कि दोनों बातों में मेल क्या है और फर्क क्या है?
साथ ही यह भी बताने का कष्ट करें कि प्रज्ञा और तर्क; अमृत और प्रकाश;
आनंद और प्रेम; तथा मोक्ष और निर्वाण एक ही लक्ष्य के अलग-अलग नाम हैं,
अथवा उनमें भेद भी है?

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-11)

मृत्यु : जीवन का द्वार—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)
दिनांक 1 जुलाई 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!

किसी सौदागर के पास एक हिंदुस्तानी पक्षी था। उसे उसने पिंजरे में बंद रखा था।
जब वह सौदागर दुबारा भारत जाने लगा, तब उसने पक्षी से पूछा
कि तुम्हारे देश से तुम्हारे लिये क्या लाऊं?
पक्षी ने कहा, 'लाना कुछ नहीं, केवल हिंदुस्तान के किसी जंगल में जाना
और वहां के आजाद परिंदों से मेरी कैद का हाल सुनाना।'
सौदागर ने वही किया। लेकिन जैसे ही वह बोला,
एक जंगली पक्षी मूर्च्छित होकर जमीन पर आ गिरा।
सौदागर ने सोचा कि मेरे कारण यह पक्षी मर गया।
जब वह देश लौटा तब उसके पक्षी ने अपने देश की खबर उससे पूछी।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-10)

भक्त की पहचान: शिकायत-शून्य हृदय—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 30 जून 1974(प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

एक बार मूसा ने भगवान से कहा, 'मुझे आपके किसी भक्त को देखने की इच्छा है।'
इस पर एक आवाज आई कि फलां घाटी में चले जाओ, वहां तुम्हें वह मिलेगा
जो भगवान को प्यारा है, जो भगवान को प्रेम करता है और जो सत्पथ पर चलता है।
मूसा वहां गये और उन्होंने देखा कि वह आदमी तो चीथड़ों से लिपटा पड़ा है।
और तरहत्तरह के कीड़े-मकोड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हैं।
मू्सा ने पूछा, 'क्या मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकता हूं?'
उस आदमी ने कहा, 'एक प्याला पानी ला दो, मैं बहुत प्यासा हूं।'
जब मूसा पानी लेकर वापस मुड़े तब उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति मरा पड़ा है।
वे फिर गये कि उसके कफन के लिये कुछ कपड़े ले आएं,
लेकिन लौटे तब शेर उसके शरीर को खा चुका था। मू्सा बेहद दुखी हुए और चीख उठे,

रविवार, 21 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-09)

जहां वासना, वहां विवाद—(प्रवचन—नौवां)
 दिनांक 29 जून 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!
 एक आदमी था, जो जानवरों की भाषा समझता था।
वह एक दिन किसी रास्ते से जा रहा था।
वहां एक गधा और एक कुत्ता आपस में बड़े जोर-जोर से झगड़ रहे थे।
कुत्ता कह रहा था, 'बंद करो ये घास और चारागाह की बातें!
कुछ खरगोश या हड्डियों के संबंध में कहो। मैं तो उकता गया हूं।'
उस आदमी से न रहा गया और वह बोला,
'सूखी घास का उपयोग भी तो किया जा सकता है; जो गोश्त जैसा ही होगा।'
वे दोनों जानवर उसकी ओर मुड़े; उसके शब्द न सुनाई पड़े
इसलिये कुत्ता पूरी ताकत से भोंकने लगा, और गधे ने जोर से लात मारकर
उस आदमी को बेहोश कर दिया। और फिर वे अपने झगड़े में उलझ गये।
भगवान! मजनू कलंदर की इस बेबूझ कहानी का अर्थ क्या है?

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-08)

बेईमानी : संसार के मालकियत की कुंजी—(प्रवचन—आठवां)
दिनांक 28 जून 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

एक बदमाश था, जिसे गांव के लोगों ने पकड़ा और एक पेड़ से बांध लिया।
और उससे कहा कि तुम्हें आज शाम तक हम समुद्र में डुबो देंगे।
यह कहकर वे लोग अपने काम पर चले गये। इस बीच एक गड़रिया आया
और उसने बदमाश से पूछा कि क्यों यहां बंधे पड़े हो?
चालाक बदमाश ने कहा, 'कुछ लोगों ने मुझे इसलिये बांध दिया कि
मैंने उनके रुपये लेने से इनकार कर दिया।'
हैरत में आकर गड़रिये ने पूछा, 'वे तुम्हें रुपये क्यों देना चाहते थे?
और तुमने रुपये लेने से इनकार क्यों किया?'
बदमाश बोला, 'मैं धार्मिक आदमी हूं और वे लोग हैं अधार्मिक;
और वे मुझे पथ-भ्रष्ट करना चाहते हैं।'
गड़रिये ने कहा कि 'मैं तुम्हारी जगह यहां बैठता हूं; तुम मुक्त हुए।'
दोनों ने जगह बदल ली। शाम के समय गांव के लोग आये,
उन्होंने गड़रिये को बोरे में बंद किया और उसे जाकर समुद्र में डुबो दिया।
दूसरे दिन प्रातःकाल गांव वाले यह देखकर हैरान हुए कि
वही बदमाश भेड़ों का एक झुंड लिये गांव में हंसता प्रवेश कर रहा है।
उनके पूछने पर बदमाश ने बताया, 'समुद्र में बड़े दयावान जीव रहते हैं,
वे उन सबको पुरस्कृत करते हैं, जो समुद्र में कूदकर डूब जाते हैं।'
फिर क्या था, गांव के लोग भागे और समुद्र में जा डूबे।
और वह बदमाश गांव का अब मालिक बन बैठा।
हम आपसे यह कहानी समझना चाहते हैं।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-07)

मनुष्य की जड़: परमात्मा—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 जून 1974(प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

किसी आदमी ने एक दिन एक पेड़ को काट लिया।
एक सूफी फकीर ने, जो यह सब देख रहे थे, कहा, '
इस ताजा डाल को तो देखो!
वह रस से भरा है और खुश है।
क्योंकि वह अभी नहीं जानता है कि काट डाला गया है।
हो सकता है यह इस भारी घाव से अनजान हो,
जो अभी-अभी इसे लगा है।
लेकिन थोड़े ही समय में वह जान जायेगा।
इस बीच तुम इसके साथ तर्क भी नहीं कर सकते।'

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-06)

प्रेम मृत्यु से महान है—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जून 1974 (प्रातः),
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

किसी जमाने में एक शरीफ की बेटी थी--सौंदर्य में अप्रतिम।
रूप में ही नहीं, गुण-शील में भी उसका जोड़ नहीं था।
वह ब्याहने के योग्य हुई तब रूप-गुण में श्रेष्ठ
तीन युवकों ने उससे ब्याह का प्रस्ताव रखा।
यह देखकर कि तीनों युवक समान योग्यता के हैं,
पिता ने लड़की पर ही चुनाव का भार छोड़ दिया।
लेकिन महीनों तक लड़की कुछ तय नहीं कर पाई।
 इस बीच वह अचानक बीमार पड़ी और मर गई।
बहुत शोकपूर्वक तीनों युवकों ने अपनी प्रेमिका को दफनाया।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-05)

   जीवन एक वर्तुल है—(प्रवचन—पांचवां)
दिनांक 25 जून 1974 (प्रातः), 
श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

आज एक लोककथा जैसी दिखने वाली सूफी कहानी का अर्थ
आप हमें समझाने की कृपा करें।
एक चोर चोरी के इरादे से खिड़की की राह, एक महल में घुस रहा था।
खिड़की की चौखट के टूटने से वह जमीन पर गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गई।
चोर ने इसके लिए महल के मालिक पर अदालत में मुकदमा कर दिया।
गृहपति ने कहा, 'इसके लिए तो चौखट बनाने वाले बढ़ई पर मुकदमा होना चाहिए।'
बढ़ई जब बुलाया गया, तब उसने कहा, 'राज ने खिड़की का द्वार ठीक से नहीं बनाया
इसलिये दोषी राज है।' और राज ने अपनी सफाई में कहा कि मेरे दोष के लिए
वह सुंदर स्त्री जुम्मेवार है, जो उसी वक्त उधर से निकली थी;
जब मैं खिड़की पर काम करता था। और उस स्त्री ने अपनी सफाई में कहा,
'उस समय मैं एक बहुत खूबसूरत दुपट्टा ओढ़े थी। साधारणतः

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

बिन बाती बिन तेल-(प्रवचन-04)

मृत शब्दों से जीवित सत्य की प्राप्ति असंभव—(प्रवचन—चौथा)
दिनांक २४ सितंबर, १९७४.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!
एक घुमक्कड़ साधु ने एक बूढ़ी स्त्री से तैजान का रास्ता पूछा। तैजान एक प्रसिद्ध मंदिर है और समझा जाता है कि वहां पूजा करने से विवेक की उपलब्धि होती है।
बूढ़ी स्त्री ने कहा: 'सीधे आगे चले जाओ।'
जब साधु कुछ दूर गया था तो बुढ़िया ने स्वयं से कहा: 'यह भी एक साधारण मंदिर जाने वाला है।'
किसी ने यह बात जोशू से कह दी।
जोशू ने कहा: 'रुको, जब तक मैं जांच-पड़ताल न कर लूं।'
दूसरे दिन जोशू गया, उसने वही सवाल पूछा और बुढ़िया ने वही उत्तर दिया।
जोशू ने कहा: 'मैंने उस बुढ़िया की जांच कर ली।'
 भगवान! इस पहेली जैसी झेन-कथा का अभिप्राय क्या है?