बेईमानी
: संसार के
मालकियत की
कुंजी—(प्रवचन—आठवां)
दिनांक
28 जून 1974 (प्रातः),
श्री
रजनीश आश्रम; पूना.
भगवान!
एक
बदमाश था, जिसे गांव
के लोगों ने
पकड़ा और एक
पेड़ से बांध लिया।
और
उससे कहा कि
तुम्हें आज
शाम तक हम
समुद्र में
डुबो देंगे।
यह
कहकर वे लोग
अपने काम पर
चले गये। इस
बीच एक गड़रिया
आया
और
उसने बदमाश से
पूछा कि क्यों
यहां बंधे पड़े
हो?
चालाक
बदमाश ने कहा, 'कुछ लोगों
ने मुझे
इसलिये बांध
दिया कि
मैंने
उनके रुपये
लेने से इनकार
कर दिया।'
हैरत
में आकर गड़रिये
ने पूछा, 'वे तुम्हें
रुपये क्यों
देना चाहते थे?
और
तुमने रुपये
लेने से इनकार
क्यों किया?'
बदमाश
बोला, 'मैं
धार्मिक आदमी
हूं और वे लोग
हैं अधार्मिक;
और
वे मुझे
पथ-भ्रष्ट
करना चाहते
हैं।'
गड़रिये
ने कहा कि 'मैं
तुम्हारी जगह
यहां बैठता
हूं; तुम
मुक्त हुए।'
दोनों
ने जगह बदल
ली। शाम के
समय गांव के
लोग आये,
उन्होंने
गड़रिये
को बोरे में
बंद किया और
उसे जाकर
समुद्र में डुबो
दिया।
दूसरे
दिन
प्रातःकाल
गांव वाले यह
देखकर हैरान
हुए कि
वही
बदमाश भेड़ों
का एक झुंड
लिये गांव में
हंसता प्रवेश
कर रहा है।
उनके
पूछने पर
बदमाश ने
बताया, 'समुद्र
में बड़े
दयावान जीव
रहते हैं,
वे
उन सबको
पुरस्कृत
करते हैं, जो समुद्र
में कूदकर डूब
जाते हैं।'
फिर
क्या था, गांव के लोग
भागे और
समुद्र में जा
डूबे।
और
वह बदमाश गांव
का अब मालिक
बन बैठा।
हम
आपसे यह कहानी
समझना चाहते
हैं।