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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन-80

जाना कहां है—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 20 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न–सार:
1--मैं स्वयं को खोया—खोया महसूस करता हूं। पुराने जीवन में वापस लौटने के लिए कोई मार्ग नहीं बचा है और आगे भी कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ रहा है।
2--पतंजलि ने यह सब क्यों लिखा और आपने योग—सूत्र पर बोलना क्यों चुना, जबकि दोनों में से कोई भी हमें साधना की मूलभूत कुंजियां देने को तैयार नहीं हैं?
3--कई वर्षों से मैं साक्षी— भाव में जी रहा हूं। पर वह मुझे रोग जैसा क्यों लगता है?
4--आपके साथ मेरा अंतरंग संबंध है, फिर भी मुझे कुछ घट क्‍यों नहीं रहा है?
5--आपके वक्‍तव्‍य में यह विरोधाभास क्‍यों है?
6--मेरा मन पुराने से कैसे नाता तोड़े, ताकि नये के साथ सके?
7--अगर किसी ने लोओत्‍सु से संन्‍यास लेने के लिए पूछा होता तो उनका उत्‍तर होता.....
8--मेरा आपके साथ ठीक—ठीक संबंध क्‍या है?
9--क्‍या मैं ठीक मार्ग पर हूं?
10--आपके आश्रम की व्‍यवस्‍था तीन धूर्तो के हाथ में है, जो सुंदर और सरल स्त्रियों के भेषं में हैं।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--79

बंधन के कारण की शिथिलता—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)


दिनांक 19 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  

योग—सत्र:

बंधकारणशैथिल्‍यात्‍प्रचारसंवेदनाच्‍च चित्‍तस्‍य परिशरीरावेश:।। 39।।
बंधन के कारण का शिथिल पड़ना और संवेदन—ऊर्जा भरी प्रवाहिनियों को जानना
मन को पर—शरीर में प्रवेश करने देता है।

उदानजयाज्‍जलपड्ककण्‍टकादिष्‍वसड्ग उत्‍क्रांतिश्‍च।। 40।।
उदना—उर्जा प्रवाहिनी को सिद्ध करने से, योगी पृथ्‍वी से ऊपर उठ पाता है। और किसी
आधार, किसी संपर्क के बिना पानी, कीचड़, कांटों को पार कर लेता है।

समानजयाज्‍ज्वलनम्।। 41।।
समान ऊर्जा प्रवाहिनी को सिद्ध करने से,
योगी अपनी जठर अग्‍नि को प्रदीप्‍त कर सकता है।

श्रोत्राकाशयों: संबंधसंयमाद्दिव्‍यं श्रोत्रम्।। 42।।
आकाश और कान के बीच के संबंध पर संयम ले आने से
परा—भौतिक श्रवण उपलब्‍ध हो पाता है।

कायाकाशयो: संबंधसंयमाल्‍लधुलूलसमापत्‍तेश्‍चाकाशगमनम्।। 43।।
शरीर और आकाश के संबंध पर संयम ले आने से और साथ ही भार—विहीन चीजों—
जैसे रूई आदि से अपना तादात्‍म्य बना लेने से योगी आकाशगामी हो सकता है।

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--78

जागरूकता की कोई विधि नहीं है—(प्रवचन—अट्ठारहवां)


दिनांक 18 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  

प्रश्‍न—सार:

1—कृपया समझाएं कि मन और शरीर के साथ तादात्म्य कैसे न बने?

 2—मेरी स्वयं के साथ और आपके साथ एकात्मकता बनते ही मन
अहंकार की यात्रा पर निकल पड़ता है। कि मेरा कितना अच्‍छा विकास हो रहा है।
कृपया आप मुझे सहारा देंगे?

3—झेन संत जो कि प्रत्‍येक सुबह एक ध्‍यान की भांति हंसते है—
क्‍या आपको नहीं लगता है कि वे अपने हंसने को कुछ ज्‍यादा ही
गंभीरता से लेते है।

4—भगवान, ऐसा लगता है कि मैं आपके द्वारा सम्‍मोहित हो गया हूं।

शनिवार, 31 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--77

परमात्‍मा की भेंट ही अंतिम भेंट—(प्रवचन—सतहरवां)


दिनांक 17 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  

योग—सूत्र:

सत्‍वपुरूषयोरत्‍यन्‍तासंकीर्णयों: प्रत्‍यायविशेषो भोग:
परार्थत्‍वात् स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम्।। 36।।
पुरुष, सद चेतना और सत्व, सदबुद्धि के बीच अंतर कर पाने की अयोग्यता के परिणामस्वरूप अनुभव के भोग का उदभव होता है. यद्यपि ये तत्व नितांत भिन्न हैं। स्वार्थ पर संयम संपन्‍न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्न पुरूष ज्ञान उपलब्‍ध होता है।

            तत: प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।। 37।।
इसके पश्‍चात अंतर्बोधयुक्‍त श्रवण, स्‍पर्श, दृष्‍टि, आस्‍वाद और आध्राण की उपलब्‍धि चली आती है।

            ते समाधावुपसर्गाव्‍युत्‍थाने सिद्धय:।। 38।।
ये वे शक्‍तियां है जो मन के बाहर होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--76

धन्‍यवाद की कोई आवश्‍यकता नहीं—(प्रवचन—सौहलवां)


दिनांक 16 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  


प्रश्‍न—सार:



1. क्या आप भी कभी किसी दुविधा में पड़े हैं?



      2. बुद्धि, अंतर्बोध और प्रतिभा के प्रासंगिक महत्व को समझाएं।



      3. इस शइक्त को,क्ष्मैं'j'. समझाएं—'योगियों और सार्धुंक्ती बुरी संगत में।'



      4 अहंकार सभी परिस्‍थितियों में पोषित होता मालूम पड़ता है। तो ऐसे में क्या करें?



5. हम अपने मन को कैसे गिरा सकते है, जबकि आप प्रवचनों में दिलचस्‍प बातें सुनाकर मन में खलबली मचाते रहते हैं!



      6 मेरे प्‍यारे—प्‍यारे भगवान, जब मैं बुद्धत्‍व का अनुभव करूं;

क: क्‍या मैं आपसे कहूं?

ख: क्‍या आप मुझसे कहेंगे?

ग: क्‍या यह प्रश्‍न मेरा अहंकार पूछ रहा है?

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--75

अंतर—ब्रह्मांड के साक्षी हो जाओ—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 15 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  


योग—सूत्र:

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम।। 33।।
सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केंद्रित करने से समस्‍त सिद्धों के अस्तित्व से जुड्ने की क्षमता मिल जाती है।

            प्रातिभाद्वा सर्वम्।। 34।।
प्रतिभा के द्वारा समस्‍त वस्‍तुओं का बोध मिल जाता है।

            ह्रदये चित्‍तसंवित्।। 35।।
ह्रदय पर संयम संपन्‍न करने से मन की प्रकृति, उसके स्‍वभाव के प्रति जागरूकता आ बनती है।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--74

अहंकार अटकाने को खूँटा नहीं—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 14 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  

प्रश्‍न–सार:
1—क्या संबुद्ध होना और साथ ही संबोधि के प्रति चैतन्‍य होना संभव है? क्या संबुद्ध का विचार स्वय में अहंकार उत्पन्न नहीं कर देता है?
2—मैं अक्‍सर दो मन में रहता हूं—सूर्य और चंद्र मन में। कृपया कुछ कहें।
3—आप कहते है कि बुद्ध पुरूष कभी स्‍वप्‍न नहीं देखते। फिर च्वांगत्‍सु ने कैसे स्‍वप्‍न देखा कि वह तितली है?
4—स्व—निर्भर होने के लिए पतंजलि की विधि या आपकी विधि क्या है?
अध्‍यात्‍मिक व्‍यक्‍ति ठीक—ठीक वर्तमान के क्षणों में कैसे जी सकता है?
रोज के व्‍यावहारिक जीवन में क्षण—क्षण, वर्तमान में जीने की आदत कैसे बनायी जाए?
 5—क्‍या राम संबोधि को उपलब्‍ध हो गया है?

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--73

अंतर—ब्रह्मांड के साक्षीहो जाओ—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 13 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  
योग—सूत्र:

चंद्रे ताराव्‍यूहज्ञानम् ।। 28।।
चंद्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की समेग्र व्‍यवस्‍था का ज्ञान प्राप्त होता है।

धुवे तद्गतिज्ञानम्।। 29।।
ध्रुव—नक्षत्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्त होता है।

नाभिचक्रै कायव्‍यूहज्ञानम् ।। 30।।
नाभि चक्र पर संयम संपन्‍न करने से शरीर की संपूर्ण संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है।

      कण्‍ठकूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति: ।। 31।।
कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अवभूतियां क्षीण हो जाती है।

      कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्।। 32।।
कूर्म—नाड़ी नामक नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से, योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है।

सोमवार, 26 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--72

मैं एक पूर्ण झूठ हूं—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 12 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  

प्रश्‍न—सार:



1—आपके शिष्य अचानक संबोधि को उपलब्ध होंगे, या चरण दर चरण विकास के द्वारा संबुद्ध होंगे?



 2—क्या अज्ञान के कारण किए कर्मों के लिए भी व्यक्ति उत्‍तरदायी होता है?



3—रामकृष्ण ने भोजन का उपयोग शरीर में रहने के लिए खूंटी की भांति किया। आप शरीर में बने रहने के लिए किस खूंटी का उपयोग करते हैं?



4—आपने कहा कि काम—वृत्‍ति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति संबुद्ध हो सकता है। लेकिन क्‍या काम—वृति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति का अहंकार नहीं बढ़ता?



5—कृपा करके संयम और संबोधि के भेद को हमें समझाएं।



6—एक शराबी की दूसरे से गुफ्तगू: आपकी शराब सबसे मधुर और मीठी है।



7—क्‍या कभी आप झूठ बोलते है?

रविवार, 25 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--71

मृत्‍यु और कर्म का रहस्‍य—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

दिनांक 11 अप्रेेेल  1976 ओशो आश्रम पूूूूना।  
योग—सूत्र:

सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपरान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभयो वा।। 23।।
सक्रिय व निष्किय या लक्षणात्मक व विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्यु की ठीक—ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।

 मैत्र्यादिषु बलानि।। 24।।
मैत्री पर संयम संपन्‍न करने से या किसी अन्य सहज गुण पर संयम करने से उस गुणवत्‍ता विशेष में बड़ी सक्षमता आ मिलती है।

बलेषु हस्‍तिबलादीनि।। 25।।
हाथी के बल पर संयम निष्‍पादित करने से हाथी की सी शक्‍ति प्राप्‍त होती है।

प्रवृत्‍यालोकन्‍यासात्‍सूक्ष्‍मव्‍यवहितविप्रकृष्‍टज्ञानम्।। 26।।
पराभौतिक मनीषा के प्रकाश को प्रवर्तित करने से सूक्ष्‍म का बोध होता है। प्रच्‍छन्न का अोर दूरस्‍थ तत्‍वों का ज्ञान प्राप्‍त होता है।

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्।। 27।।
सूर्य पर संयम संपन्‍न करने से संपूर्ण सौर—ज्ञान की उपलब्‍धि होती है।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--70

खतरे में जीओ—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 10 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 

प्रश्‍न—सार:  



1—मेरी अधिक बैचेनी अपने महा— अहंकार को लेकर है,

जो इस झूठे अहंकार पर इतने वर्षों तक निगाह रखता रहा है।



      2—भगवान, मैं चाहता हूं कि आप एक—एक ही बार में सदा—सदा के लिए मिटा दें।



      3—जब मैं निर्णय लेने का प्रयत्‍न करता हूं तो चिंतित हो जाता हूं,

कि मैं कहीं गलत चुनाव न कर लूं। यह कैसा पागलपन है?

     

      4—ध्‍यान के दौरान मैं आपकी शून्‍यता को पुकारता हूं।

क्‍या इस विधि के द्वारा मैं आपके समग्र अस्‍तित्‍व को

आत्‍म सात कर सकता हूं?

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--69

अनूठा अस्‍तित्‍व में—(प्रवचन—नौंवा)

दिनांक 9 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सूत्र :

प्रत्ययस्य परिचित्‍तज्ञानम्।। 19।।
जो प्रतिछवि दूसरों के मन को घेरे रहती है, उसे संयम द्वारा जाना जा सकता है।

            न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्।। 20।।
लेकिन संयम द्वारा आया बोध उन मानसिक तथ्यों का ज्ञान नहीं करवा सकता जो कि दूसरे के मन की छवि—प्रतिछवि को आधार देते है, क्‍योंकि वह बात संयम की विषय—वस्‍तु नहीं होती है।

            कायरूपसंयमत्‍तद्ग्राह्मशक्‍तिस्‍तम्‍भे चक्षु: प्रकाशसंप्रयोगेउन्‍तर्धानम्।। 21।।
ग्राह्म—शक्‍ति को हटा देने के लिए, शरीर के स्‍वरूप पर संयम संपन्‍न करने से द्रष्‍टा की आँख और शरीर से उठती प्रकाश—किरणों के बीच संबंध टूट जाता है, और तब शरीर अदृश्‍य हो जाता है।

            एतन शब्‍दद्यन्‍तर्धानमुक्‍तम्।। 22।।
यही नियम शब्‍द के तिरोहित हो जाने की बात को भी स्‍पष्‍ट कर देता है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--68

नहीं और हां के गहनतम तल—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 8 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
प्रश्‍नसार:
 1—क्‍या सार्त्र में झेन—चेतना है?

2. हरमन हेस के सिद्धार्थ ने बुद्ध से कहा : मुझे अपने ही ढंग से चलते जाना है—या मर जाना है। इस पर आप कुछ कहेंगे?

3—अगर कहीं कोई व्‍यक्‍ति रूप परमात्‍मा नहीं है, तो आप हर सुबह मेरे मनोविचारों का उत्‍तर क्‍यों देते है?

4—उस करीब—करीब योगी ह्रदय के विषय में आपके उत्‍तर न मुझे निम्‍नलिखित संवाद की याद दिला दी है:
पत्‍नी: प्रिय, जब से हमारा विवाह हुआ तुम मुझे ज्‍यादा प्‍यार करते हो या कम?
पति: ज्‍यादा या कम।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--67

उदासीन ब्रह्मांड में—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 7 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सूत्र:

कमान्यत्वं परिणामन्‍यत्‍वे हेतु:।। 15।।
आधारभूत प्रक्रिया में छिपी अनेकरूपता द्वारा रूपांतरण में
कई रूपांतरण घटित होते हैं।

      परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।। 16।।
निराध, समाधि, एकाग्रता—इन तीन प्रकार के रूपांतरणों में
संयम उपलब्‍ध करने से—अतीत और भविष्य का ज्ञान उपलब्‍ध, होता है।

शब्‍दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्‍यासात्।। 17।।
शब्द और अर्थ और उसमें अंतर्निहित विचार, ये सब उलझाव पूर्ण स्‍थिति में,
मन में एक साथ चले आते है। शब्‍द पर संयम पा लेने से पृथकता घटित होती है
और तब किसी भी जीव द्वारा नि:सृत ध्‍वनियों के अर्थ का व्‍यापक बोध घटित होता है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--66

तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 6 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
प्रश्‍नसार:

1—मैं हमेशा एक ही जैसे प्रश्‍न बार—बार क्यों पूछती हूं?

2. मुझे आपके प्रवचनों में आज तक एक भी विरोधाभास नहीं मिला। क्या मुझमें कुछ गलत है?

 3—तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते।

4—क्‍या स्वच्छ होने की प्रक्रिया मन की झलकी को नए रूप देगी?

5. मेरा शरीर रोगी है, मेरा मन भोगी है, और मेरा ह्रदय करीब—करीब योगी है। क्‍या मेरे इस जन्‍म में संबुद्ध होने की कोई संभावना है?

6 जब आप शरीर छोड़ें, तो मैं भी आपके साथ मर जाना चाहता हूं।

7—जब भी आपके निकट होता हूं तो तनाव महसूस करता हूं।

8—अनुग्रह प्रकट करने के लिए मैं आपके लिए क्‍या कर सकता हूं?

9—कृप्‍या संगीत और ध्‍यान के विषय में कुछ कहें।

10—आप कुर्सी पर इतने आराम से बैठे होते है कि एकदम भारविहीन मालूम पड़ते है।
आप गुरूत्‍वाकर्षण के नियम के साथ क्‍या करते है?