ज्योत से ज्योत जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-इक्कीसवां
सारसूत्र-(तुम्ही ठाकुर तुमही दासा)
संत चले दिस ब्रह्म की, तजि जगव्यवहारा।
सीधै मारग चालतैं, निंदै संसारा।।
संत कहै सांची कथा, मिथ्या नहिं बौलें।
जगत् डिगावैं आइकैं, तो कबहूं ना डोलैं।।
जे-जे कृत संसार के, ते संतनि छांड़।
ताकौ जगत् कहा करै, पग आगै मांड़े।।
जे मरजादा बेद की, ते संतनि भेंटी।
जैसे गोपी कृष्ण कौं, सब तजिकरि भेंटी।।
एक भरोसे राम कै, कछ शंक न आनै।।
जन सुंदर सांचै मतै, जग की नहिं मानैं।।




