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मंगलवार, 7 मार्च 2017

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंंदर दास)--प्रवचन-21



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)

प्रवचन-इक्‍कीसवां

सारसूत्र-(तुम्ही ठाकुर तुमही दासा)


संत चले दिस ब्रह्म की, तजि जगव्यवहारा।
सीधै मारग चालतैं, निंदै संसारा।।
संत कहै सांची कथा, मिथ्या नहिं बौलें।
जगत् डिगावैं आइकैं, तो कबहूं ना डोलैं।।
जे-जे कृत संसार के, ते संतनि छांड़।
ताकौ जगत् कहा करै, पग आगै मांड़े।।
जे मरजादा बेद की, ते संतनि भेंटी।
जैसे गोपी कृष्ण कौं, सब तजिकरि भेंटी।।
एक भरोसे राम कै, कछ शंक न आनै।।
जन सुंदर सांचै मतै, जग की नहिं मानैं।।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंंदर दास)--प्रवचन-20



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-बीसवां

प्रश्‍नसार: रीते घर पाहुन पग धारे

1--जीवंत गुरु सामने होते हुए भी हमारे देश में मुर्दों की पूजा होती है। क्या यह हमारा दुर्भाग्य है या नासमझी या अधोगति?

2--मैं स्वयं परमात्मा पर श्रद्धा नहीं कर पाता हूं। फिर मेरे लिए क्या उपाय है?  

3--आप नित नयी-नयी बातें कहे चले जाते हैं। इससे बड़ी उलझन होती है--क्या मानें और क्या न मानें?

4--भगवान्, ऐसी कौन-सी शक्ति या प्रेरणा है जो मनुष्य को भगवान् के करीब लाने में सहायक होती है?

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)--प्रवचन-19



ज्‍योत से ज्‍योत जले-(सूंदर दास)

प्रवचन-उन्‍नीसवां

सारसूत्र—(हमारे गुरु दीनी एक जरी)

 हमारैं गुरु दीनी एक जरी
कहा कहौ कछ कहत न आवै, अंमृतरसहि भरी।
ताकौ मरम संतजन जानत, वस्तु अमोल परी।।
यातें मोहि पियारी लागति, लैकरि सीस धरी।
मन-भुजंग अरन पंच नागनी सूंघत तुरंत मरी।।
डायनि एक खात सब जग कौं, सो भी देस डरी।।
विविधि बिकार ताप तानि भागी, दुरमति सकल हरी।
ताकौ गुन सुनि मीच पलाई, और कवन बपुरी।।
निसबासर नाहिं ताहि बिसारत, पल छिन आध घरी।
सुंदरदास भयो घट निरविष, सबही व्याधि टरी।।
देखौ माई, आज भलौ दिन लागत।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)--प्रवचन-18



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-अट्ठहरवां

प्रश्‍नसार: (क्रांति मेरा नारा है)


1--आपकी आवाज मात्र सुन कर मेरे आंसू
झरने लगते हैं। फिर क्यों नहीं ऐसी प्रार्थना
का जन्म होता कि प्रार्थना ही बचे, मैं
नहीं? संसार फिर भी क्यों उतना ही
लुभाता है और अपनी ओर बुलाता है?
क्या ये आंसू मगरमच्छ के ही आंसू हैं?

2--विज्ञान के इस युग में, कहते हैं, कविता
अपने आखिरी दिन गिन रही है। लेकिन
आपके प्रवचनों में प्रवाहित काव्य-गंगा को
देखकर लगता है कि आप धर्म के साथ
कविता को भी पुनर्जीवन देने पर तुले हैं।
बताने की कृपा करें कि धर्म, कविता और
विज्ञान क्या साथ-साथ चल सकते हैं?

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-17



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-सत्रहवां

सार-सूत्र--मिटी न दरस पियास


जा घट की उनहारि है, तेसौ दीसत आहि।
सुंदर भूलौ आपुही, सो अब कहिए काहि।।
सुंदर पावन दार कै, भीतरि रहयौ समाइ।
दीरघ मैं दीरघ लगै, चौरे मैं चौराइ।।
सुंदर चेतनि आप यह, चालत जड़ की चाल।
ज्यौं लकरी के अश्व चढ़ि, कूदत डोलै बाल।।
काहू सौं बांभन कहै, काहूं सौं चंडाल।
सुंदर ऐसौ भ्रम भयौं, योंही मारै गाल।।
देह पुष्ट है दूबरी, लगै देह कौं घाव।
चेतनि मानै आपुकौ, सुंदर कौन सुभाव।।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-16



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)

प्रवचन-सौहलवां

प्रश्नसार:-आत्मा ही परमात्मा है

जीवन खत्म हुआ तो जीने का ढंग आया।
जब शमा बुझ गयी तो महफिल पर रंग आया।।
बुढ़ापे में तन अस्वस्थ परंतु मन स्वस्थ। स्वर्ग,
मोक्ष, निर्वाण की इच्छा से दूर . . .। परंतु इसी पृथ्वी पर
श्री रजनीश आश्रम, स्वर्ग की तस्वीर, यह उत्सव-लीला
देखने की प्रबल इच्छा क्यों और किसलिए?

तू मेरी जन्म-क्षण की तलाश है
गहनतम में मृत्यु-क्षण की प्यास है
उसी का परिणाम है कि तेरे पास हूं
एक ओर, चारों ओर तेरी सुवास हूं
फिर भी भीतर से एक पीड़ा प्रतिपल

सोमवार, 6 मार्च 2017

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)--प्रवचन-15



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-पंद्रहवां
सारसूत्र-

हारो और पुकारो
करै हरै पालै सदा, सुंदर समरथ राम।
सबही तैं न्यारौ रहै, सब मैं जिन कौ धाम।।
अंजन यह माया करी, आपु निरंजन राइ।
सुंदर उपजत देखिए, बहुरयौ जाइ बिलाइ।।
सूरति तेरी खूब है कौ करि सकै बखान।
बानी सुनि सुनि मोहिया, सुंदर सकल जिहान।।
प्रीतम मेरा एक तूं, सुंदर और न कोइ।
गुप्त भया किस कारनै, काहि न परगट होइ।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूूंदर दास)--प्रवचन-14



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-चौदहवां
प्रश्‍नसार:


1--एकांत मधुर है
भगवान्!

मेरी निंदिया में तुम, मेरे ख्वाबों में तुम

हो गए हम तुम्हारी मुहब्बत में गुम

मन की वीणा की धुन गा रही है सुन

हो गए हम तेरी मुहब्बत में गुम!

2-भगवान्! कभी आप कहते हैं कि सपने
          सच नहीं होते और कभी कहा है कि स्वप्न
          की अवस्था बहुत ग्राहक होती है और स्वप्न
          में कभी संदेह नहीं उठता। और मैं आपके
          साथ उन नौ सालों में स्वप्न से ही जुड़ी
          रही हूं, और कोई कड़ी आपसे जुड़ी नहीं
          थी। और अब भी जो बातें आपसे कहनी
          होती हैं या आप मुझे कुछ कहना चाहते हैं,
          वह सब स्वप्नों में ही होता रहता है। तो
          यह कैसी अवस्था है? इसमें सच क्या है?
          इस पर मार्गदर्शन की कृपा करें।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूूंदर दास)--प्रवचन-13



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-तैहरवां
सारसूत्र:

संत समागम कीजिए
संत समागम कीजिए तजिए और उपाइ।
सुंदर बहुते उद्धरे सतसंगती मैं आइ।।
संत मुक्ति के पौरिया तिनसौं करिए प्यार।
कुंजी उनके हाथ है सुंदर खोलहिं द्वार।।
मात पिता सबही मिलैं भइया बंधु प्रहसंग। 
सुंदर सुत दारा मिलैं दुर्लभ है सतसंग।।
मद मत्सर अहंकार की दीन्हीं ठौर उठाइ।
सुंदर ऐसे संतजन ग्रंथनि कहे सुनाइ।।

रविवार, 5 मार्च 2017

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-12



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-बाहरवां
प्रश्‍नसार:

1-प्रेम जादू है

2-मैं न सत्य को देखता हूं न सौंदर्य को।
प्रभु का भी मुझे कुछ आभास नहीं होता
है। आपकी बातें न समझ पाता हूं, न पचा
पाता हूं। मैं क्या करूं?

3-आप हमें अकसर समझाते हैं कि मन
की बजाय हृदय की सुनो। लेकिन कोई
कैसे जाने कि उसके मन की आवाज कौन
है और उसके हृदय की आवाज कौन 
है? कुछ समझाने की अनुकंपा करें।
जगत् में सर्वाधिक मूल्यवान क्या है?

4-भगवान्! अब दुल्हन हूं अपने पिया की! आपका आशीर्वाद!

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-11



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-ग्‍याहरवां

सारसूत्र:

मन ही बड़ौ कपूत है
मन कौं राखत हटकि करि, सटकि चहूं दिसि जाइ।
सुंदर लटकि स लालची गटकि बिषैफल खाइ।।
सुंदर क्यौंकरि धीजिए मन कौ बुरौ सुभाव।
आइ बनै गुदरै नहीं, खेलै अपनौं दाव।।
सुंदर यहु मन भांड है, सदा भंडायौ देत।
रूप धरै बहु भांति कै, राते पीरे सेत।।
सुंदर आसन मारिकै, साधि रहे मुख मौन।
तन कौं राखै पकरिकै, मन पकरै कहि कौन।।

ज्‍योति से ज्योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-10



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-

प्रवचन-दसवां
प्रश्‍नसार-  

1--प्रभु! मैं बिरहन बौराई, पियरवा रूप जो तेरो निरखों!

2--न गुरु की खोज थी, न परमात्मा की प्यास थी न जन्मों-जन्मों का बोध।
कौन-सी पुकार आपके पास ले आयी?तेरा मिलना, तेरा आना, तेरा बैठना, तेरा जाना, आपकी बात आप जानें, लेकिन अब--गुरुबिन आवत नाहीं चैन। गुरु मिलो आनंद भयो। हमारे लिए तो आप ही सर्वस्व, आप ही परमात्मा!
गुरुर् ब्रह्मा, गुरुर् विष्णु, गुरुर् देवो महेश्वरः।
गुरु : साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः।
--गुरु-समर्पण के इस महोत्सव पर इस शास्त्रोक्त कथन को समझाने की अनुकंपा करें।


3--श्रद्धा क्या है? श्रद्धा बनानी पड़ती है या हो जाती है? श्रद्धेय के निकट आने से श्रद्धा पर क्या असर होता है? कृपा कर समझाइए।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-09



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)

प्रवचन-नौवां
सारसूत्र-

सुंदर मनुषा देह यह, पायौ रतन अमोल।

कौड़ी सटै न खोइए, मानि हमारौ बोल।।

सुंदर सांची कहत है, मति आनै कछु रोस।

जौं तैं खोयो रतन यह, तौ तोही कौ दोस।।

बार-बार नहिं पाइए, सुंदर मनुषा देह।

रामभजन सेवा सुकृत, यह सौदो करि लेह।।

सुंदर सांचि कहतु है, जौ मानै तो मानि।

यहै देह अति निंद्य है, यहै रतन की खानि।।

शनिवार, 4 मार्च 2017

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-08



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)
प्रवचन-आठवां
प्रश्‍नसार-

1--एक बार आप स्वप्न में आए। कभी मूसलाधार बारिश में लगा-- आप आ रहे हैं। कभी आपकी तस्वीर में मुस्कराहट ऐसी लगती है कि सच में आए। प्रभु! यह मेरा भ्रम है अथवा आप आए?
कृपया बताएं।
एक नज़र मेरे वल वी उठा देख ले
जो मैं कीते गुनाह, वो गुनाह बख्श दे!

2--आपके चरणों में अपने को समर्पित कर निर्भार हो जाने को लोग ढौंग कह रहे हैं। मैं उनको क्या अभिव्यक्त करूं?


3--भक्त विरह-अवस्था में दुःखी होता है या सुखी?

4--भक्ति-भाव का वास्तविक अर्थ क्या है?

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-07



ज्‍योति से ज्‍योति जले-
(सूंदर दास)-प्रवचन-सातवां

सारसूत्र-

मारग जोवै बिरहनी, चितवे पिय की वोर।

सुंदर जियरे जक नहीं, कल न परत निस भोर।।

सुंदर बिरहिनी मरि रही, कहूं न पइए जीव।

अमृत पान कराइकै, फेरी जिवावै पीव।।

बिरह-बघूरा ले गयौ, चित्तहि कहूं उड़ाय।

सुंदर आवै ठौर तब, पिय मिलै जब आए।।

बिरहा दुःख दाई लग्यौ, मारै ऐंठी मरोरि।

सुंदर बिरहनि क्यों जिवै, सब तन लियो निचोरि।।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन-06



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)

प्रवचन-छठवां
प्रश्‍नसार:
1--भगवान्! आप दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हैं?

2--आग में जल गई यह दीवानी,
भस्म हुई अब फिरती है
सिंदूरी मेघा बरसे,
रिमझिम बरसे रुनझुन बरसे
जितने भीगे उतने तरसे । . . .
मंजिल का भी होश नहीं
राहों का भी ज्ञान नहीं
अतंरघट में किरणें उतरीं
हृदय कंवल है खिलता जाता

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)-प्रवचन--05



ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)

प्रवचन—पांचवां


है दिल मैं दिलदार सही अंखियां उलटि करि ताहि चितइए।

आब मैं खाक मैं बाद मैं आतस जान मैं सुंदर जानि जनइए।।

नूर में नूर है तेज में तेज है ज्योति मैं ज्योति मिलें मिलि जइए।

क्या कहिए कहते न बनै कछु जो कहिए कहते ही लजइए।।


जासौं कहूं "सब में वह एक' तौ सो कहै कैसो है, आंखि दिखइए।

जौ कहूं "रूप न रेख तिसै कछु' तौ सब झूछ कैं मानें कहइए।।

जौ कहूं सुंदर "नैननि मांझि' तौ नैनहूं बैंन गए पुनि हइए।

क्या कहिए कहते न बनै कछु जो कहिए कहते ही लजइए।।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)--प्रवचन-04



ज्‍योति से ज्‍योत जले-

प्रवचन—चौथा
पहला प्रश्नः त्याग क्या है?

जीवन का परमभोग है त्याग। जीवन के रस में डूबना है त्याग। रस-विमुग्ध होना है त्याग।
"त्याग' शब्द से उलझन में मत पड़ जाना। वह भोग का परम रूप है-- भोग की पराकाष्ठा। त्याग इसलिए कहते हैं ताकि जिसे तुमने भोग समझ लिया, उस में उलझे न रह जाओ। तुम्हारे तथाकथित भोग को भिन्न करने की दृष्टि से, भेद करने की दृष्टि से त्याग को त्याग कहते हैं, अन्यथा कहना तो चाहिए परम भोग।
तुमने भोगा क्या है? तुमने सिर्फ दुःख भोगा है। तुमने जाना क्या है? --सिवाय चिंताओं के, सिवाय संतापों के। तुमने पहचाना क्या है?