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संतो मगन भया मन मेरा--(रज्‍जब--वाणी) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 16 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--20)

प्रभु की खोज को एक लपट बनाओ—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 31 मई 1976;  श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—सत्संग क्या है? सत्संग की महिमा क्या है?
2—बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी
..............................................................
उनकी आँखों ने खुदा जाने क्या जादू किया
कि तबियत मेरी मायल कभी............
3—कब तक उलझना होगा मुझे इन कीचड़ों में? मुक्ति के द्वार तक ले जाने में मुझे आप सहाय नहीं करेंगे क्या?.........
4—संन्यासी जीवन के लक्षण क्या है? कृपया समझाएँ।
5प्रभु को पाना चाहता हूँ, लेकिन मार्ग में हजार बाधाएँ खडी है। एक पार करते ही दूसरी आ खड़ी होती है। मुझे आदेश दें!

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--19)

रज्‍जब आपा अरपिदे—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

दिनांक 30 मई 1976,  श्री ओशो आश्रम पूना।
सारसूत्र:
नामरदां भगती नहीं, मरद गये करि त्याग।
रज्जब रिधि क्वाँरी रही, पुरुष—पाणि नहि लाग।।
छाजन भोजन दे भगवंत, अधिक न बाछैं साधू—संत।
रज्जब यह संतोषी चाल, माँगहि नाहिं मुलक औ माल।।
जबलगि तुझमें तू रहै, तबलगि वह रस नाहिं।
रज्जब आपा अरपिदे, तो आवै हरि माहिं।।
करणी कठिन रे बन्दगी, कहनी सब आसान।
जन रज्जब रहणी बिना, कहाँ मिलै रहिमान।।
हाथघडे कूँ पूजता, मोललिये का मान।
रज्जब अघडु अमोल की, खलक खबर नहिं जान।।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--18)

मैं स्‍वागत हूं—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

दिनांक 29 मई 1976;  श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान के सायंकालीन दर्शन के समय धटी एक विशिष्ट घटना पर प्रश्न।
2—बार—बार ऐसा लगने लगा है कि कुछ भी तो नहीं पाना है, कहीं भी तो नहीं जाना है; जीवन है, जीना है। हे सद्गुरु, हे परमगुरु! यह मन का छलावा है या...?
3—तीसरी आजादी के संबंध में कुछ और कहे।
4—यदि दुख है और दुख रहेगा, क्योंकि संसार के होने में ही दुख निहित है, तो यह प्रार्थना—
सर्वे भवन्तु सुखिन
सर्वे सन्तु निरामय
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुखभाग्य भवेत्
क्या मात्र शुभेच्छा है?
5—एक संन्‍यासिनी का आखिरी सवाल?
मैं स्वागत हूँ ?

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--17)

परमात्‍मा के बिना कोई भराव नहीं—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 28 मई, 1976;  श्री रजनीश आश्रम पूना।
सारसूत्र:
जे तुम राम बुलायल्यौ, तो रज्जब मिलसी आय।
जथा पवन परसगि ते गुडी गगन कूँ जाय।।
भला बुरा जैसा किया, तैसा निपज्या जीव।
यह तुम्हरा तुमकूँ मिल्या, तुम क्यूँ मिते न पीव।।
जैसे छाया कूप की, बाहरि निकसै नाहिं।
जन रज्जब यूँ राखिये, मन मनसा हरि माहि।।
साध, सबूरी स्वान की, लीजै करि सुविवेक।
वै घर बैठचा एक कै, तू घर घर फिरहि अनेक।।
साबुन सुमिरण जल सतसंग। सकल सुकृत करि निर्मल अंग।।
रज्जब रज उतरै इहि रूप। आतम अंबर होइ अनूप।।

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--16)

गुरु दर्पण है—(प्रवचन—सोहलवां)

दिनांक 27 मई 197,  श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
1—आपके बिना जिंदगी से कुछ शिकवा तो न था, लेकिन आपके बिना यह जिंदगी जिंदगी भी तो न थी!...
2—गुरु कब तक मारनहार रहता है और कब तारनहार बन जाता है? यह बात शिष्य पर निर्भर या गुरु पर?
3—'इस दुनिया से जाने के पहले’, या,’ जब मैं नहीं रहूँगा’ जैसे कलेजे को चीर देनेवाले शब्दों का अपने तईं न प्रयोग करने के लिए भगवान से एक प्रेमी का अनुरोध!


पहला प्रश्न :
आपके बिना इस जिंदगी से कोई शिकवा तो न था, लेकिन आपके बिना यह जिंदगी जिंदगी भी तो न थी। अब जी में आता है, तेरे दामन में सिर छुपाकर रोता रहूँ, रोता रहूँ!

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--15)

बिरहिण बिहरे रैनदिन—(प्रवचन—पंद्रहवाँ)

दिनांक 26 मई 1976,  श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
सिला सँवारी राजनै, ताहि नवै सब कोइ।
रज्जब सिष—सिल गुरु गढै सोइ पूजि किन होइ।।
गुरु ज्ञाता परजापती, सेवक माटी रूप।
रज्जब रज सूँ फेरकै, घरिले कुंभ अनूप।।
ज्यूँ धोबी की धमस सहि, ऊजल होइ कुचीर।
त्यूँ सिव तालिब निरमला, मार सहे गुरु पीर।।
बिरहिण बिहरे रैनदिन, बिन देखे दीदार।
जन रज्जब जलती रहै, जाग्या बिरह अपार।।
बिरहा—पावक उर बसे, नखसिख जालै देह।
रज्जब ऊपरि रहम करि, बरसहु मोहन मेह।।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--14)

उपासना चेष्टारहित चेष्टा है—(प्रवचन—चौदहवाँ)

25 मई 1979श्री रजनीश आश्रम, पूना
      प्रशनसार—
1—पूजा—पाठ, योग—ध्यान, व्रत—उपवास, साधुता, ये सब मैने किया; इतने अनुभवों से गुजरा, कुछ हुआ नहीं; और आप अनुभव पर जोर देते हैं। अब मैं क्या करूँ?
2—उपासना यानी क्या?
3—आँख को निर्मल करने का उपाय बताएँ। चारों ओर राम कैसे दिखायी पड़े? क्या ध्यान के जैसे ही संन्यास का भी विश्वव्यापी प्रचार व प्रसार आवश्यक है?


पहला प्रश्न :
आप सदा अनुभव पर जोर देते हैं। मैं सब कर चुका हूँ——पूजा—पाठ, योग—ध्यान, व्रत—उपवास! और कुछ वर्षों तक पुराने ढब का साधु भी रह चुका हूँ। मगर इस सब अनुभव से कुछ मिला नहीं। अब मैं क्या करूँ?

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

संतो मगन भय मन मेरा--(प्रवचन--13)

गुरु की याद में रंग भी बहुत, नूर भी बहुत—(प्रवचन—तेरहवां)

24 मई 1976; श्री  रजनीश आश्रम।पूना
सूत्र:
मार भली जो सतगुरु देहि। फेरि—बदल औरे करि लेहि।।
ज्यूँ माटी कूँ कुटे कुँभार। त्यूँ सतगुरु की मार विचार।।
भाव भिन्न कछु औरे होइ। ताते रे मन मार न जोइ।।
जैसा लोहा घड्रै लुहार। कूटि—काटि करि लैवै सार।।
मारै मारि मिहरि करि लेहि। तो निपजै फिरि मार न देहि।।
ज्यूँ साँटी संपुट में आनि। सूधी करै तीरगर पानि।।
मन तोड़न का नाहीं भाव। जे तुछ तूटि जाय तो जाव।।
ज्यूँ कपड़ा दरजी के जाय। टूक—टूक करि लेहि बनाय।।
त्यँ रज्जब सतगरु का खेल। ताले समझि मार सब खेल।।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--12)

       नीड़—निर्माण का मजा : जब आंधी हो—(प्रवचन—बाहरवां)

    दिनांक 23 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम, पूना।

     प्रश्‍नसार:

1—आप कृष्‍ण, क्राइस्‍ट, कबीर, सभी पर क्‍यों बोल रहे है?
2—जंजीर टूटी नहीं, नुपुर बन गई है।
3—भगवान को किडनेप करने का इरादा।
4—संसार संन्‍यास में बाधाएं डाल रहा है.....
5—संन्‍यास मेरे भाग्‍य में है या नहीं?
6—समाधि की अंतर्दशा के संबंध में कुछ कहें।


पहला प्रश्न : आप कृष्ण, क्राइस्ट, कबीर, सभी पर क्यों बोल रहे हैं?
मैं सभी हूँ! तुम भी सभी हो। मुझे याद है, तुम्हें याद नहीं। इतना ही भेद है। मनुष्य की सारी वसीयत तुम्हारी है। मनुष्य की ही क्यों, अस्तित्व की सारी वसीयत तुम्हारी है। जो भी आज तक हुआ है, सब तुम्हारा है। और जो कल भी होगा, वह भी तुम्हारा है।

रविवार, 3 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--11)

       राम बिन सावन सह्यो न जाइ—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

       दिनांक 22 मई 1979श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र:
रामबिन सावन सह्यो न जाइ।
काली घटा काल होइ आई, कामनि दगधै माइ।।
कनक—अवास—वास सब फीके, बिन पिय के परसंग।
महाबिपत बेहाल लाल बिन, लागै बिरह—भुअंग।।
सूनी सेज बिथा कहूँ कासूँ, अबला धरै न धीर।
दादुर मोर पपीहा बोलैं, ते मारत तन तीर।।
सकल सिंगार भार ज्यूँ लागैं, मन भावै कछु नाहीं।
रज्जब रंग कौन सू कीजै, जे पीव नाहीं माहीं।।
भजन बिन भूलि पर्यो संसार।

चाहै' पछिम जात पूरब दिस, हिरदै नहीं बिचार।।
बाछै ऊरध अरध सं लागै, भूले मुगंध गँवार।
खाइ हलाहल जीयो चाई, मरत न लागै बार।।
बेठे सिला समुद्र तिरन कूँ, सो सब बूडनहार।
नाम बिना नाहीं निसतारा, कबहूँ न पहुँचै पार।।
सुख के काज धसे दीरध दुख, बहे काल की धार।
जन रज्जब यूँ जगत बिगूच्यो, इस माया की लार।।
बिन सावन सधो न जाइ:

गुरुवार, 31 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--10)

ठहर जाना पा लेना है—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 21 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्न सार:
1—आपके हिंदी प्रवचनों में भी सत्तर—अस्सी प्रतिशत वे पाश्चात्य संन्यासी होते हैं जिन्हें हिंदी—भाषा बिल्कुल नहीं आती। आप फिर भी उसी तत्परता, सहजता और गहनता से बोलते हैं मानो पूरी मंडली भाषा समझ रही हो। क्या आपको इस बात से कोई अड़चन नहीं आती?
2— इस सदी का मनुष्य अधार्मिक क्यों हो गया है?
3—बहुत दिनों से बड़ी बेचैन और गुमसुम हो रही हूँ। पहले की तरह खुलकर हँस भी नहीं सकती हूँ। दो दिन के दर्शन से अपूर्व आनंदित हुई। लेकिन चार रात से सो नहीं पाती और ऐसी हालत बहुत दिनों से है।
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा. ....
4—परमात्मा से वियोग क्यों?

बुधवार, 30 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--09)

राम रेगीले के रंग राती—(प्रवचन—नौवां)
दिनांक 20 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम पूना
सूत्र:

गुरु गरवा दादू मिल्या, दीरघ दिल दरिया।
तत छन परसन होत हीं भजन भाव भरिया।। 
श्रवण कथा साँची सुणी, संगति सतगुरु की।
दूजा दिल आवै नहिं, जब धारी धुर की।।
भरमजाल भव काटिया, संका सब तोड़ी।
साँचा सगा जे राम का, ल्यौ तासूँ जोड़ी।।
भौजल माहीं काढ़िकै, जिन जीव जिलाया।
सहज सजीवन कर लिया साँचे संगि लाया।।
जनम सफल तब का भया, चरपौ चित लाया।
रज्जब राम दया करी, दादू गुर पाया।।

राम रंगीले के रंग राती।
परम पुरुष संगि प्राण हमारों, मगन गलित मद-माती।। 
लाग्यो नेह नाम निर्मल सूँ, गिनत न सीली ताती 
डगमग नहीं अडिग होई बैठी, सिर धरि करवत काती।।
सब विधि सुख राम ज्यूँ राखै, यहु रसरीति सुहाती।
जन रज्जब धन ध्यान तिहारो, बेरबेर बलि जाती।।

सोमवार, 28 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--08)

अहेतुक प्रेम भक्‍ति है—(प्रवचन—08)
दिनांक 19 मई 1979श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—आपसे आंख मिली तबसे अविरत गुंजन हो गयी थी। कल संध्या आपके चरणों में गिरते ही धुन विदा हो गयी, शब्द निःशब्द हो गए। यह कैसी पुकार!
2—यहाँ आने का कोई कारण नजर नहीं आता, मगर न जाने आपकी कशिश मुझे यहाँ क्यों खींच लाती है। किसी को उत्तर देने में असमर्थ मगर अब जिंदगी में जीने का मजा आने लगा है। क्यों? साथ ही मैं बिल्कुल पत्थर हो गयी हूँ। रोना तो जैसे सूख ही गया है।
3—मनुष्य क्यों व्यर्थ की बातों में उलझा रहता है?
4—मेरी जिंदगी के "जिग्सा पज़ल' का अब तक न मिल रहा एक टुकड़ा कल संतोष पर हुए आपके प्रवचन में अचानक मेरे हाथ आ गया। भगवान, आशिष दें कि फिर न खो जाए।
5—संन्यासी होने के पश्चात हमने जो पाया है, वह सभी को प्राप्त हो, ऐसा हृदय में बार—बार उठता है। क्या यह संभव है?
6—संसार में ही परमात्मा छिपा है, या कि संसार ही परमात्मा है?

रविवार, 27 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--07)

मन रे, करू संतोष सनेही—(प्रवचन—सातवां)
दिनांक 18 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सारसूत्र:
मन रे, करु संतोष सनेही।   
तृस्ना तपति मिटै जुग—जुग की, दुख पावै नहिं देही।।
मिल्या सुत्याग माहिंजे सिरज्या, गह्या अधिक नहिं आवै
तामें फेर सार कछू नाहीं राम रच्या सोइ पावै।।
बाछै सरग सरग नहिं पहुँचै, और पताल न जाई।
ऐसे जानि मनोरथ मेटहु, समझि सुखी रहु भाई।।
रे मन, मानि सीख सतगुरु की, हिरदै धरि विस्वासा
जन रज्जब यूँ जानि भजन करु, गोबिंद है घर वासा।।

हरिनाम मैं नहिं लीनां
पाँच सखी पाँचू दिसि खेलै, मन मायारस भीनां।।
कौन कुमति लागी मन मेरे, प्रेम अकारज कीनां
देख्या उरझि सुरझि नहिं जान्यूँ, विषम विषयरस पीनां।।
कहिए कथा कौन विधी अपनी, बहु बैरनि मन खीनां
आतमराम सनेही अपने, सो सुपिनै नहिं चीनां।।
आन अनेक आनि उर अंतरि, पग पग भया अधीनां
जन रज्जब क्यूँ मिलै सतगुरु, जगत माहिं जी दीनां।।

गुरुवार, 24 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--06)

प्रेम परमात्‍मा है—(प्रवचन—छठवां)
दिनांक 17 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रश्‍न सार:
1—आपसे कोई प्रश्न पूछती हूँ तो मुझे लगता है—मेरी गर्दन आपकी तलवार के नीचे आ गयी ऐसा क्यों?
2—आप ऑंख खोलने के लिए कहते हैं, मगर ऑंख खोलने में इतना भय क्यों लगता है?
3—मनुष्य जीवन सहज की ओर मुड़ेगा या नहीं? हमारा कर्तव्य क्या है?
4—कआदमी से प्रेम करता हूँ। लेकिन परमात्मा से किसी लगाव का मुझे पता नहीं। क्या मैं पाप के रास्ते पर हूँ?


पहला प्रश्न : जब भी मैं आपसे कोई प्रश्न पूछती हूँ, तो मुझे लगता है मेरी गर्दन आपकी तलवार के नीचे आ गयी। इस प्रश्न के प्रसंग में भी मेरा वही भाव है। ऐसा क्यों है?
शीला! भय तो बिल्कुल स्वाभाविक है। हर प्रश्न एक उत्तर की तलाश है। उत्तर तुम्हारे अहंकार को भरेगा, या तोड़ेगा, कुछ निश्चित नहीं है। मेरा उत्तर तो निश्चित ही तुम्हारे अहंकार को भरेगा नहीं, तोड़ेगा ही। तुम्हारे प्रश्न से ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि तुम्हारे प्रश्न के बहाने तुम्हारे अहंकार को तोड़ा जाए।