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गुरुवार, 21 नवंबर 2024

भगवान रजनीश, बुद्ध भगवान मैत्रेय-का शरीर ओशो में प्रवेश -कथा यात्रा

अध्याय शीर्षक: भगवान रजनीश, बुद्ध भगवान मैत्रेय

23 सितम्बर 1986 अपराह्न

 

प्रश्न -01

प्रिय ओशो,

क्या यह एक प्रश्न है, एक अनुभूति है, या एक घोषणा है?

कुछ परे मुझे इसे कागज पर लिखने के लिए मजबूर कर रहा है; हालांकि मैं इसे लिख रहा हूं, लेकिन शब्द मेरे नहीं हैं।

आधी रात के बाद का समय है, भारतीय माह की पूर्णिमा की रात के लगभग पाँच बजे हैं, जिसे "भद्रा गुरुवार" के नाम से जाना जाता है, जो भारतीय भाषा में गुरुवर मास्टर का दिन है।

मैं विपश्यना ध्यान में हूँ। जैसे ही मेरी आँखें खुलती हैं, एक चमकदार रोशनी कमरे को रोशन कर देती है। मैं अपनी आँखें खुली नहीं रख सकता, क्योंकि रोशनी बहुत ज़्यादा चमकदार है। कुछ मिनटों के बाद, मैं अपनी आँखें खोलता हूँ और मैं पूरी तरह से जागरूक हो जाता हूँ।

गुरुवार, 16 मई 2024

बोधभिक्षु नेंगसेन और डायमंड सूत्र की चार पंक्‍तियां-

 नेंगसेन और डायमंड सूत्र की चार पंक्‍तियां-

ऐसा कहा जाता है कि हुई नेंग, महानतम ज़ेन गुरुओं में से एक, ज़ेन परंपरा के छठे कुलपति, द डायमंड सूत्र की चार पंक्तियों को सुनकर प्रबुद्ध हो गए। और वह बस एक बाज़ार से गुज़र रहा था। वह कुछ खरीदने गया था, वह आत्मज्ञान के बारे में सोच भी नहीं रहा था, और सड़क के किनारे कोई डायमंड सूत्र पढ़ रहा था। वह आदमी अपने पूरे जीवन से डायमंड सूत्र पढ़ रहा था - वह निश्चित रूप से एक प्रकार का विद्वान, या तोता रहा होगा - और यह उसकी सामान्य बात थी, उसका अनुष्ठान था, हर सुबह, हर शाम सूत्र को पढ़ना।

बुधवार, 15 मई 2024

दीपांकर और गौतम बुद्ध कथा-ओशो

दीपांकर और गौतम बुद्ध

 प्रभु ने पूछा:

आप क्या सोचते हैं, सुभूति,

क्या कोई ऐसा धम्म है जो तथागत ने दीपांकर से सीखा है?'

सुभूति ने उत्तर दिया: 'ऐसा नहीं है, हे भगवान, ऐसा नहीं है।'

प्रभु ने कहा:

यदि कोई बोधिसत्व कहेगा,

"मैं सामंजस्यपूर्ण बुद्धक्षेत्रों का निर्माण करूंगा,"

तो वह झूठ बोलेगा। और क्यों?

बुद्धफील्ड्स, सुभूति के सामंजस्य,

बिना किसी सामंजस्य के,

तथागत द्वारा सिखाए गए हैं।

प्रभु ने पूछा:

तुम क्या सोचते हो, सुभूति?

क्या सच ही कोई धम्म है?

तथागत ने दीपांकर से क्या सीखा है?'

बुधवार, 8 मई 2024

असंगर-(एक बौद्ध कथा)

असंगर-(एक बौद्ध कथा)

बौद्ध धर्मग्रंथों में एक बहुत महान प्रबुद्ध व्यक्ति आर्य असंगर का नाम आता है। वह बुद्ध के बाद सबसे महान बौद्ध गुरुओं में से एक हैं। तीन वर्ष तक उन्होंने हिमालय की गुफा में तपस्या की। उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा जागरूक होने में लगा दी। तीन साल तक, दिन-ब-दिन, उसने और कुछ नहीं किया; बस वह हर प्रयास जो वह जागरूक होने के लिए कर सकता था। वह जागरूक हो गया लेकिन अंदर ही अंदर कुछ असंतुष्ट रह गया। यह महसूस करना बहुत मुश्किल था कि यह असंतोष कहाँ से आ रहा था, क्योंकि वह बिल्कुल चुप था, शांत था, सतर्क था, लेकिन कुछ जम गया था। गर्मी वहां नहीं थी, यह आरामदायक नहीं था। यह पराया था, मानो कोई रेगिस्तान में खो गया हो।

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

कौशल नरेश प्रसेनजित की हार और बुद्ध का उपदेश—(कथा—113)

कौशल नरेश प्रसेनजित की हार और बुद्ध का उपदेश-(एस धम्‍मो सनंतनो)


कौशलनरेश प्रसेनजित काशी के लिए अजातशत्रु से युद्ध करने में तीन बार हार गया। वह बहुत चिंतित रहने लगा। उसके पास कुछ कमी न थी बड़ा राज्य था उसके पास कौशल का पूरा राज्य उसके पास था लेकिन काशी खटकती थी। काशी पर किसी और का कब्जा यह खटकता था। उसके अपने कब्जे में बहुत था लेकिन जो दूसरे के कब्जे में था वह खटकता था। तीन बार उसने हमला किया काशी पर और तीनों बार हार गया। बहुत चिंतित रहने लगा। जब तीसरी बार भी हार हुई तो बात जरा सीमा के बाहर हो गयी उसके दर्प को बड़ा आघात पहुंचा। वह सोचने लगा मैं दुग्धमुख लड़के को भी न हरा सका ऐसे मेरे जीने से क्या! और अजातशत्रु अभी लड़का ही था अभी उसकी कोई खास उम्र भी न थी। और उस लड़के से बार— बार हार जाना पीड़ादायी हो गया

रविवार, 14 दिसंबर 2014

भगवान का भिक्षाटन और शैतान—(कथा यात्रा—112)


भगवान का पंचशाला में भिक्षाटन और शैतान का जाल-(एस धम्‍मो सनंतनो)


एक दिन भगवान पंचशाला नामक ब्राह्मणों के गांव में भिक्षाटन के लिए गए। मार ने— शैतान ने— पहले ही ग्रामवासियों में आवेश कर ऐसा किया कि भगवान को किसी ने कलछी मात्र भी भिक्षा न दी। फिर जब भगवान खाली पात्र गांव के बाहर आने लगे तब मार आया और बोला क्या श्रमण! कुछ भी भिक्षा नहीं मिली? बुद्ध ने कहा नहीं तू सफल रहा और मैं भी सफल हूं मार समझा नहीं। बोला यह कैसे? या तो मैं सफल या आप सफल। दोनों साथ— साथ कैसे सफल हो सकते हैं! यह तो आप बड़ी तर्कहीन बात कर रहे हैं। बुद्ध ने हंसकर कहा नहीं तर्कहीन नहीं है। तू सफल हुआ लोगों को भ्रष्ट करने में भ्रमित करने में मैं सफल हुआ अप्रभावित रहने में। और यह भोजन से भी ज्यादा पुष्टिदायी है।

मार ने एक जाल और फेंका। मार ने कहा तो भंते फिर प्रवेश करें शायद भिक्षा मिल ही जाए। दिनभर भूखे रहने में क्या सार! परेशानी होगी पीड़ा होगी दिनभर के थके— मांदे आप दूर यात्रा करके आए हैं शायद कोई दया खा ही जाए। मार ने सोचा कि इस तरह शायद बुद्ध दुबारा अपमानित हो क्योंकि गांव के लोगों पर तो उसे भरोसा था। शायद बुद्ध दुबारा अपमानित हों तो क्रोधित हो जाएं।

रोहिणी नदी पर विवाद—(कथा—111)

 रोहिणी नदी पर विवाद-(एस धम्‍मो सनंतनो)


शाक्य और कोलीय राज्यों के बीच रोहिणी नामक नदी के पानी को रोककर दोनों जनपदवासी खेतों की सिंचाई करते थे। एक बार ज्येष्ठ मास में फसल के सूखने को देखकर दोनों जनपदवासी शाक्य और कोलियों के नौकर अपने—अपने खेतों की सिंचाई करने के लिए रोहिणी नदी पर आए। दोनों ही पहले अपने खेतों को सींचना चाहते हैं अत: दोनों में झगड़ा हो चला। यह समाचार उनके मालिक शाक्य और कोलियों को मिला। क्षत्रिय तो क्षत्रिय! तलवारें निकल गयीं। वे सेना को साथ लेकर तैयार होकर युद्ध करने के लिए निकल पड़े भगवान बुद्ध रोहिणी तट पर ही ध्यान करते थे। उन्हें यह खबर मिली। वे आकर युद्ध को तत्पर दोनों सेनाओं के मध्य मे खड़े हो गए। शाक्य और कोलियों ने भगवान को देखकर हथियार फेंक वंदना की।

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

संसार में सुख क्‍या है, भिक्षुओं की चर्चा का विषय—(कथा—110)

संसार में सुख क्‍या है, भिक्षुओं की चर्चा का विषय-(एस धम्‍मो सनंतनो)

 'बुद्धों का उत्पन्न होना सुखदायी है, सद्धर्म का उपदेश सुखदायी है, संघ में एकता सुखदायी है, एकतायुक्त तप सुखदायी है।'

दूसरे सूत्र की परिस्थिति—कब बुद्ध ने यह गाथा कही?
 एक दिन बहुत से भिक्षु बैठे बातें कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय था संसार में सुख क्या है? किसी ने कहा राज्य— सुख के समान दूसरा सुख नहीं। और किसी ने कहा कामसुख के सामने राजसुख में क्या रखा है! कामसुख की बड़ी प्रशंसा की। और किसी और ने यश की प्रशंसा की और किसी और ने पद की फिर कोई भोजनभट्ट था उसने भोजन की खूब चर्चा की। फिर कोई वस्त्रों का दीवाना था तो उसने वस्त्रों की खूब प्रशंसा की। ऐसे विवाद छिड़ गया और तभी बुद्ध अचानक वहां आ गए। पीछे खड़े होकर भिक्षुओं की यह सब चर्चा और विवाद सुनते रहे। फिर उन्होंने कहा भिक्षुओ भिक्षु होकर भी यह सब तुम क्या कह रहे हो।

बुद्ध ने श्रेष्‍ठ और अश्रेष्‍ठ घोड़ो की बात कही—(कथा—109)

बुद्ध ने श्रेष्‍ठ और अश्रेष्‍ठ घोड़ो की बात कही-(एस धम्‍मो सनंतनो)


 पहला सूत्र—

            दुल्लभो पुरिसाजज्जो न सो सचत्य जायति ।
            यत्थ सो जायति धीरो तं कुलं सुखमेधति ।।

'पुरुष श्रेष्ठ दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता। वह धीर जहा उत्पन्न होता है, उस कुल में सुख बढ़ता है।'

            सुखो बुद्धानं उयादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
            सुखा संघस्स सामग्री समग्गानं तपो सुखो ।। 

'बुद्धों का उत्पन्न होना सुखदायी है। सद्धर्म का उपदेश सुखदायी है। संघ में एकता सुखदायी है। एकतायुक्त तप सुखदायी है।'

            पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके ।
            पपज्वसमतिक्कंते तिण्‍णसोकपरिद्दवे ।।
            ने तादिसे पूजयतो निब्‍बुते अकुतोभये ।
            न सक्का पुज्‍जं संखातुं इमेतंपि केतचि ।। 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

अग्‍निदत्‍त का पांडित्‍य—(कथा यात्रा—108)

अग्‍निदत्‍त का पांडित्‍य-(एस धम्‍मो सनंतनो)


दूसरा सूत्र—
'मनुष्य भय के मारे पर्वत, वन, उद्यान, वृक्ष और चैत्य आदि की शरण में जाता है। लेकिन यह शरण मंगलदायी नहीं है, यह शरण उत्तम नहीं है, क्योंकि इन शरणों में जाकर सब दुखों से मुक्ति नहीं मिलती।'

            वहुं के सरण यति पब्बतानि वनानि च ।
            आरामरुक्सचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ।।

आदमी भय के कारण ही भगवानों की पूजा कर रहा है। भय के कारण उसने मंदिर बनाए, भय के कारण प्रार्थनाएं खोजीं।

            वहुं के सरण यति पब्बतानि वनानि च।


कभी वृक्ष की पूजा करता है, कभी पत्थर की पूजा करता है, लेकिन गौर से देखना! कभी मंदिर में मुर्ति रखकर पूजा करता है, कभी मस्जिद में बिना मूर्ति के पूजा करता है, लेकिन गौर से देखना! मंदिर में, कि मस्जिद में, कि गुरुद्वारे में, कि चैत्यालय में, कि शिवालय में, कि गिरजे में, आदमी भय के कारण ही घुटने टेके खड़ा है। और बुद्ध कहते हैं, जो भय के कारण घुटने टेके खड़ा है, वह सत्य को कभी भी न जान पाएगा।

बुद्ध का एक भिक्षु ‘दहर’—(कथा यात्रा—107)

बुद्ध का एक भिक्षु ‘दहर’-(एस धम्‍मो सनंतनो)



पहले सूत्र—

            क कहापणवस्सेन तिति कामेसु विज्जति ।
            अप्पस्सादा दुखाकामा इति विज्जाय पंडितो ।।
            अपि दिब्बेसु कामेसु रति सो नाधिगच्छति।
            तण्हक्सयरतो होति सम्मासंबुद्धसावको ।।

'यदि रुपयों की वर्षा भी हो तो भी मनुष्य की कामों से तृप्ति नहीं होती। सभी काम अल्पस्वाद और दुखदायी हैं, ऐसा जानकर पंडित देवलोक के भोगों में भी रति नहीं करता है। और सम्यक संबुद्ध का श्रावक तृष्णा का क्षय करने में लगता है।’ इसके पहले कि हम सूत्र समझें, सूत्र की पृष्ठभूमि समझ लेनी चाहिए—कब बुद्ध ने यह सूत्र कहा, कब यह गाथा कही?

एक भिक्षु था बुद्ध का उसका नाम था, दहर। उस भिक्षु का पिता मरते समय अपने बेटे को देखना चाहता था लेकिन दहर गांव के बाहर गया था। तो देखना चाहते हुए भी पिता देख नहीं पाया। मरते— मरते इस बेटे का नाम ही उसकी जबान पर उसके मन उसके चित्त में था।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

बुद्ध और सर्पराज—(कथा यात्रा—106)

 बुद्ध और सर्पराज-(एस धम्‍मो सनंतनो) 


यह सूत्र भी—यह अंतिम सूत्र बुद्ध ने एक परिस्थिति में कहे थे, वह मैं आपको दोहरा दूं।

जंगल में बुद्ध बैठे हैं ध्यान करने और एक सर्पराज— सर्पों का राजा— फन फैलाकर खड़ा हो गया। उसने झुककर बुद्ध के चरणों में प्रणाम किए। बुद्ध ने आंख खोली उन्होंने कहा महाराज— क्योंकि देखा उसके माथे पर अदभुत मणि है जो सिर्फ नागों में सम्राटों के माथे पर होती है— तो बुद्ध ने कहा महाराज क्या चाहते हैं?  तो उस नाग ने कहा मैं जन्मों— जन्मों से भटक रहा हूं। जो भी किया सब उलटा चला गया। कब तक सरकता रहूंगा जमीन पर? कब तक सरकता रहूंगा खाई— खंदकों में अंधेरी गलियों में? कब तक सरकता रहूंगा? कब उठूंगा? कब उड़ सकूंगा? तुम्हें मैने उड़ते देखा। तुम्हारे प्राणों की ऊर्जा को कहीं जाते देखा। इसलिए पूछता हूं मुझे कुछ उपदेश है?
ये जो सूत्र हैं :
'सभी पापों का न करना, पुण्यों का संचय करना और अपने चित्त का शोधन करते रहना—यही बुद्धों का शासन है। '

बुद्ध का श्रावस्‍ती में तीन माह का वर्षा वास—(कथा—105)

 बुद्ध का श्रावस्‍ती में तीन माह का वर्षा वास-(एस धम्‍मो सनंतनो)


ये ज्ञानपसुता धीरा नेक्खम्‍मूपसमे रता ।
      देवापि तेसं पिह्यंति संबुद्धानं सतीमतं ।।

'जो धीर ध्यान में लगे हैं..। '
ज्ञानी बुद्ध उसी को कहते हैं जो ध्यान में लगा है। वही है धीरपुरुष, जो ध्यान में लगा है। जो जान का अर्जन कर रहा है, वह जानी नहीं है, विद्वान होगा। जो ध्यान का अर्जन कर रहा है, वही ज्ञानी है, वही धीर है। क्योंकि ज्ञान तो बासा है और उधार है। ध्यान से अपनी अनुभूति संगृहीत होती है। जो ध्यान में लगे, वे धीर।
'जो परम शात निर्वाण में रत हैं।'
और निर्वाण का अर्थ है, बुद्ध की भाषा में, परम शाति की खोज। जहा कोई तरंग न रह जाए। जहा चित्त की सारी तरंगें शात हो जाएं, झील मौन हो जाए। जहा कोई लहर न आए, न जाए। तृष्णा न हो, वासना न हो, कामना न हो, वहीं आत्मा है।  'ऐसे शांत निर्वाण में रत जो धीर हैं, ध्यान में जो लगे हैं, उन स्मृतिवान संबुद्धों की स्पृहा देवता भी करते हैं।'

रविवार, 7 दिसंबर 2014

बुद्ध की तपश्‍चर्या और मार की तीन कन्‍याएं—(कथा—104)

बुद्ध की तपश्‍चर्या और मार की तीन कन्‍याएं-(एस धम्‍मो सनंतनो)


आज के सूत्र जिस कथा से संबंधित हैं, वह मैं पहले कह दूं, जिस परिस्थिति में बुद्ध ने ये सूत्र, आज के पहले दो सूत्र कहे। पहले दो सूत्र—

      यस्स जित नावजीयति जितमस्स नौ याति कोचि लोके ।
      तं बुद्धमनंतगोचर अपदं केन पदेन नेस्सथ ।।
      यस्स जालिनी विसत्तिका तन्हा नत्थि कुहिन्चि नेतवे ।
      त बुद्धमनंतगोचरं अपद केन पदेन नेस्मथ ।।

'जिसका जीता कोई अनजीता नहीं कर सकता, और जिसके जीते को कोई दूसरा नहीं पहुंच सकता, उस अनंतद्रष्टा और अपद बुद्ध को किस पथ से ले जाओगे?'  'अपने जाल में सबको फंसाने वाली तृष्णा जिसे नहीं डिगा सकती, उस अनंतद्रष्टा और अपद बुद्ध को किस पथ से ले जाओगे?'
ये पहले दो सूत्र एक खास स्थिति में कहे गए थे, वह स्थिति बड़ी समझने जैसी है। क्योंकि उस स्थिति से तुम्हें कभी न कभी गुजरना होगा। स्थिति यह थी—

अनाथपिंडक का दान और काल—(कथा—103)

 अनाथपिंडक का दान और काल-(एस धम्‍मो सनंतनो)


यह गाथा बुद्ध ने एक विशेष अवसर पर कही।  
ये सारे अवसर बड़े प्यारे हैं, इसलिए मैं कह रहा हूं।

एक बड़ा दानी था उसका नाम था, अनाथपिंडक। वह अनाथों का बड़ा सहारा था। देता लोगों को दिल खोलकर देता। उसके घर काल नाम का एक पुत्र था। उानाथपिंडक बुद्ध को सुनने जाता लेकिन काल कभी बुद्ध को सुनने न जाता था। काल शब्द भी बड़ा अच्छा! अनाथपिडक का मतलब होता है, देने वाला, दान दे ने वाला, अनाथों को सनाथ कर दे जो। और काल का अर्थ होता है, समय, या मौत। न तो समय बुद्ध को सुनने जाना चाहता है और न मौत, क्योंकि दोनों बुद्ध से डरते हैं।

तीस बौद्ध—भिक्षु परमहंस हो गए—(कथा—102)

 तीस बौद्ध—भिक्षु परमहंस हो गये-( धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 एक दिन तीस खोजी बुद्ध के पास आए। तीसों बुद्ध के भिक्षु हैं बहुत लंबा पाटन करके आए हैं। भिक्षु आनंद द्वार पर पहरा दे रहा है और वे तीस खोजी बुद्ध के कमरे के भीतर बात कर रहे हैं। आनंद को बड़ी देर लग रही है कि बहुत देर हो गयी, बहुत देर हो गयी बात चलती ही जा रही है बुद्ध को वे सताए ही चले जा रहे हैं, अब निकलें भी अब निकलें भी समय मांगा था, उससे दुगुना समय हो गया ! आखिर सीमा आ गयी उसके धैर्य की वह उठा उसने दरवाजे से झांककर देखा, बड़ा हैरान हुआ वहां बुद्ध अकेले बैठे हैं। वे तीस आदमी वहां हैं ही नहीं। उसको तो—अपनी आंखें मीड़ीं—उसको भरोसा न आया क्योंकि दरवाजा एक है, वह दरवाजे पर बैठा है वे जा तो सकते नहीं गए कहां?

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

नरोपा का स्‍वप्‍न--(कथा- यात्रा-101)

नरोपा का स्वपन-(एस धम्मो सनंतनो)

अज्ञान ज्ञान के द्वारा नहीं मिट सकता है। वह मिट सकता है केवल होश के द्वारा। ज्ञान तो तुम स्वप्न में भी इकट्ठा किए जा सकते हो; लेकिन वह स्वप्न का हिस्सा ही है, और स्वप्न हिस्सा है तुम्हारी नींद का। कोई चाहिए जो तुम्हें झकझोर दे। कोई चाहिए जो तुम्हें धक्का दे दे। कोई चाहिए जो तुम्हें तुम्हारी नींद से जगा दे। अन्यथा तुम तो ऐसे ही चलते चले जा सकते हो। नींद मादक होती है। अज्ञान मादक होता है, वह एक प्रकार का नशा है। तुम्हें उससे बाहर आना है।
मैं तुम से एक कहानी कहूंगा, जो मुझे सदा प्रीतिकर रही है। वह तिलोपा के शिष्य, सिद्ध नरोपा के विषय में है। नरोपा के अपने गुरु तिलोपा से मिलने के पहले की घटना है। उसके बुद्धत्व को उपलब्ध होने से पहले की घटना है। और यह बहुत जरूरी है प्रत्येक खोजी के लिए, सब के साथ ऐसा ही होगा।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

जुलाहे की बेटी द्वारा बुद्ध के दर्शन—(कथा—100)

 जुलाहे की बेटी द्वारा बुद्ध के दर्शन—(एस धम्‍मो सनंतनो) 

एक जुलाहे की बेटी गौतम बुद्ध के दर्शन को आयी। अत्यंत आनंद और अहोभाव से उसने बुद्ध के चरणों में सिर रखा। बुद्ध ने उससे पूछा बेटी कहां से आती हो? भंते नहीं जानती हूं वह बोली उसकी अभी ज्यादा उम्र भी न थी। अठारह वर्ष की केवल। बुद्ध ने कहा कहां जाओगी बेटी? भंते, उसने कहा, नहीं जानती हूं। क्या नहीं जानती हो बुद्ध ने पूछा वह बोली भंते जानती हूं। जानती हो बुद्ध ने कहा? वह बोली कहां भगवान जरा भी नहीं जानती हूं।

ऐसी बातचीत सुनकर अन्य उपस्थित लोग बहुत नाराज हुए। गांव के लोग जुलाहे की बेटी को भलीभांति जानते हैं कि यह क्या बकवास कर रही है! और यह कोई ढंग है भगवान से बात करने का? यह कोई शिष्टाचार है? गांव के लोगों ने कहा कि सुन पागल यह तू किस तरह की बात कर रही है होश में है? किससे बात कर रही है? डांटा— डपटा भी

समंजनी का सफाई के प्रति पागलपन—(कथा यात्रा—99)

 समंजनी का सफाई के प्रति पागलपन-(एस धम्‍मो सनंतनो)


यह सूत्र बुद्ध ने एक विशेष घटना के समय कहा था, वह घटना भी समझ लेने जैसी है।

बुद्ध के शिष्यों में एक भिक्षु थे उनका नाम था समंजनी। उन्हें सफाई का पागलपन था। क्योंकि बुद्ध ने कहा स्वच्छ रहो साफ— सुथरे रहो। वह उनको धुन पकड़ गयी पागल तो पागल वह ठीक बात में से भी गलत बात निकाल लेते। उनको ऐसी धुन पकड़ गयी कि चौबीस घंटे वह झाडू ही लिए रहते। इधर जाला दिखायी पड़ गया उधर कचड़ा दिखायी पड़ गया सफाई ही सफाई।

कई स्त्रियों को यह रोग रहता है, सफाई ही सफाई। किसके लिए सफाई कर रही हैं, यह भी कुछ पक्का नहीं।
मैं एक घर में कुछ दिन तक रहता था, बड़ा साफ—सुथरा घर था, ऐसा साथ— सुथरा घर मैंने देखा ही नहीं। घर कहना ही नहीं चाहिए उसको, इतना साफ—सुथरा था। उसमें रहने की सुविधा ही नहीं थी। वह महिला अपने पति को भी अपने बैठकखाने में नहीं बैठने देती थी,

कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा—(कथा यात्रा—98)

 कुशीनाला के शालवन में बुद्ध की अंतिम विदा-(एस धम्‍मो सनंतनो)


भगवान की इस पृथ्वी पर अंतिम घड़ी। भगवान कुसीनाला के शालवन उप्पवतन में अपने भिक्षुको से अंतिम विदा लेकर लेट गए हैं! दो शालवृक्षों के नीचे उन्होंने अपनी मृत्यु का स्वागत करने का आयोजन किया है।
मौत आ रही है। तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा, तुम्हें कुछ पूछना हो तो पूछ लो। कुछ कहना हो तो कह लो, अब मैं चला। अब यह देह जाती है। मैं तो चला गया था बयालीस साल पहले ही, देह भर रह गयी थी, अब देह भी जाती है। तो बौद्ध दो शब्दों का उपयोग करते हैं—निर्वाण और महापरिनिर्वाण। निर्वाण तो उस दिन उपलब्ध हो गया जिस दिन बुद्ध को शान हुआ। फिर महापरिनिर्वाण उस दिन हुआ जिस दिन देह विसर्जित हो गयी। उस दिन वे महाशून्य में खो गए, महाकाश के साथ एक हो गए। आकाश हो गए।