कैवल्य उपनिषद--ओशो
ओशो से अनंत—अनंत फूल झरे है,
ओशो से अनंत—अनंत फूल झरे है,
झरते
ही जा रहे है,
झरते
ही जा रहे
है.....उनका एक—एक
शब्द
परम
सुगंध का एक
जगत है।
माउंट
आबू की सुरम्य
पहाड़ियों
में
ऐसे
ही एक अनुठे
फूल के रूप
में प्रगटा
कैवल्य
उपनिषद,
जिसमें शाश्वत
की सत्रह
पंखुड़ियां
है।
अपूर्व
था ओशो की
भगवता का यह
आयाम,
जो
माउंट आबू के
विभिन्न ध्यान—योग
शिविरों
के रूप
में देखने—सुनने
को मिला।

