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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--15)

जीवन की एक मात्र दीनता: वासना—प्रवचन—पंद्रहवां

25 सितंबर, 1976;
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

अष्टावक्र उवाब।

            अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्वत:।
            तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रति: ।।46।।
            आत्माउज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
            शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ।।47।।
            विश्व स्फुरति यत्रेदं तरंग इव सागरे।
            सोउहमस्मीति विज्ञाय किं दीन हव धावसि ।।48।।
            श्रुत्वाउयि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम् ।
            उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ।।49।।
            सर्वभतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
            मनेजनित आश्चर्य ममत्वमनवर्तंते ।।50।।
            आस्थित: परमाद्वैतं मोक्षार्थेउयि व्यवस्थित:।
            आश्चर्य कामवशगो विकल: केलिशिक्षया ।।51।।
            उद्भूतं ज्ञात्तर्मित्रभवधार्याति दुर्बल:।
            आश्चर्य काममाकाक्षेत् कालमंतमनुश्रित ।।52।।

रविवार, 5 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--14)

उद्देश्‍य—उसे जो भावे—प्रवचन—चौदहवां

24 सितंबर, 1976;
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

पहला प्रश्न :

मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड ने मृत्यु—एषणा, थानाटोस की चर्चा की। आपने कल जीवेषणा, ईरोस की चर्चा की। फ्रायड की धारणा को क्या आप आधुनिक युग की आध्यात्मिक विकृति कहते हैं? कृपा करके हमें समझाएं।

जीवन द्वंद्व है। और जो भी यहां है उससे विपरीत भी जरूर होगा, पता हो न पता हो। जहां प्रेम है वहां घृणा है। और जहां प्रकाश है वहां अंधकार है। और जहां परमात्मा है वहां पदार्थ है। तो जीवेषणा के भीतर भी छिपी हुई मृत्यु—एषणा भी होनी ही चाहिए।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--13)

    जब जागो तभी सवेरा—प्रवचन—तैरहवां

23 सितंबर,1976 ओशो आश्रम कोरेगांव पार्क, पूना।

जनक उवाच।

अहो जनसमूहेउयि न द्वैत यश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्त क्य रति करवाण्यहम् ।।41।।
नाहं देहो न मे देहरे जीवो नाहमहं हि चित्!
अयमेव हि मे बंध आसीधा जीविते स्‍पृहा ।।42।।
अहो भुवन कल्लोलैर्विचित्रैद्रकि समुन्धितम्।
मयनतमहाम्भोधौ चित्तवाते समुझते ।।43।।
मयनंतमहाम्मोधरै चित्तवाते प्रशाम्यति।
अभाग्याजीववणिजो जगतयोतो विनश्वर: ।।44।।
मयनंतमहाम्मोधावाश्चर्य जीववीचय:।
उद्यन्ति ध्यन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावत: ।।45।।

ज्ञान और ज्ञान में बड़ा भेद है। एक तो ज्ञान है, जो बांझ होता है, जिसमें फल नहीं लगते, न फूल लगते। एक ज्ञान है, जिसमें मुक्ति के फल लगते हैं, सच्चिदानंद के फूल लगते, फल लगते, सुगंध उठती समाधि की। जिस ज्ञान से समाधि की सुगंध न उठे, उसे थोथा और व्यर्थ जानना। उससे जितनी जल्दी छुटकारा हो जाए, उतना अच्छा। क्योंकि मुक्ति के मार्ग में वह बाधा बनेगा। मुक्ति के मार्ग में जो साधक नहीं है, वही बाधक हो जाता है। धन भी इतनी बड़ी बाधा नहीं है, जितनी बड़ी बाधा थोथा ज्ञान हो जाता है। धन इसलिए बाधा नहीं है कि धन से कोई साधन ही नहीं बनता, धन से कोई साथ ही नहीं मिलता मोक्ष की तरफ जाने में, तो धन के कारण बाधा नहीं हो सकती।

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--12)

प्रभु प्रसाद—परिपूर्ण प्रयत्‍न से—प्रवचन—बारहवां

 22 सितंबर,1976
ओशो आश्रम
कोरेगांव पार्क, पूना।

पहला प्रश्न :

मेरे इस प्रश्न का उत्तर अवश्य दें, ऐसी प्रार्थना है। गुरु—दर्शन को कैसे आऊं? जब शिष्य गुरु के पास जाए तो कैसे जाए? गुरु के पास शिष्य किस तरह रहे, क्या—क्या करे और क्या—क्या न करे?

पूछा है 'विष्णु चैतन्य' ने
शिष्य का अर्थ होता है, जिसे सीखने की दुष्‍पूर आकांक्षा उत्पन्न हुई है; जिसके भीतर सीखने की प्यास जगी है। सीखने की प्यास साधारण नहीं होती; सिखाने का मन बड़ा साधारण है। सीखने की प्यास बड़ी असाधारण है।
गुरु तो कोई भी होना चाहता है, शिष्य होना दुर्लभ है। जो तुम नहीं जानते, वह भी तुम दावा करते हो जानने का, क्योंकि जानने के दावे में अहंकार की तृप्ति है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--11)

दुःख का मूल द्वैत है—प्रवचन—ग्‍यारहवां

20 सितंबर, 1976 ,ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

जनक उवाच।

            ज्ञानं ज्ञेनं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्‍ति वास्‍तवम्।
            अज्ञानाभाति यत्रेदं सोsहमस्‍मि निरंजन:।।35।।
            द्वैतमूलमहो दु:खं नान्‍यत्‍तस्‍यास्‍ति भेषजम्।
            दृश्‍यमेतन्‍मृषा सर्वमेकोsहं चिद्रसोsमल:।।36।।
            बोधमात्रोउहमज्ञानदुपाधि: कल्‍पितो मया ।
            एवं विमृश्‍यतो नित्‍य निर्विकल्‍पे स्‍थितिर्मम ।।37।।
            न में बंधोउस्‍ति मोक्षो व भ्रंति: शांता निराश्रया ।
            अहो मयि स्‍थितं विश्‍वं वस्‍तुतो न मयि स्‍थितम् ।।38।।
            सशरीरमिदं विश्‍वं न किंचितदिति निश्‍चितम् ।
            शुद्ध निन्‍मात्र आत्‍मा न तत्‍कस्‍मिन् कल्‍पनाधुना ।।39।।
            शरीरं स्‍वर्गनरकौ बंध्‍मोक्षौ भयं तथा ।
            कल्‍पनामात्रमेवैतत किं कार्यं चिदात्‍मन: ।।40।।
जनक ने कहा. 'ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीनों यथार्थ नहीं हैं। जिसमें ये तीनों भासते हैं, मैं वही निरंजन हूं।
'ज्ञान ज्ञेय तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
जो भी दिखाई पड़ रहा है, जिसे दिखाई पड़ रहा है, और इन दोनों के बीच जो संबंध है—शान का या दर्शन का—जनक कहते हैं, आज मैं जागा, और मैंने देखा, यह सब स्वप्न है। जो जागा है और जिसने इन तीनों को देखा, स्वप्न की भांति तिरोहित होते, वही केवल सत्य है।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: महागीता--प्रवचन--10

हरि ओम तत्‍सत्—प्रवचन—दसवां

20 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

पहला प्रश्न : आपने कल बताया कि तप्क्षण संबोधि, सडन एनलाइटेनमेंट किसी भी कार्य— कारण के नियम से बंधा हुआ नहीं है; लेकिन यदि अस्तित्व में कुछ भी अकस्मात, दुर्धटना की तरह नहीं घटता, तो संबोधि जैसी महानतम घटना कैसे इस तरह घट सकती है?

अस्तित्व में कुछ भी अकारण नहीं घटता,
यह सच है, लेकिन अस्तित्व स्वयं अकारण है। परमात्मा स्वयं अकारण है, उसका कोई कारण नहीं है। संबोधि यानी परमात्मा। संबोधि यानी अस्तित्व। फिर और सब घटता है, परमात्मा घटता नहीं—है। ऐसा कोई क्षण न था, जब नहीं था; ऐसा कोई क्षण नहीं होगा, जब नहीं होगा। और सब घटता है—आदमी घटता है, वृक्ष घटते हैं, पशु—पक्षी घटते हैं; परमात्मा घटता नहीं—परमात्मा है। संबोधि घटती नहीं। संबोधि घटना नहीं है; अन्यथा अकारण घटती, तो दुर्घटना हो जाती। संबोधि घटती नहीं है, संबोधि तुम्हारा स्वभाव है; संबोधि तुम हो। इसलिए तत्क्षण घट सकती है, और अकारण घट सकती है।

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--09)

मेरा मुझको नमस्‍कार—प्रवचन—नौवां

19 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।जनक उवाज।

प्रकाशो में निज रूपं नातिरिक्तोऽस्थ्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्व तदाउउहंभास एव हि।।28।।
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्ययि भासते ।
रूप्‍यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सर्यकरे यथा ।।29।।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचि: कनके कटकं यथा।।30।।
अहो अहं नमो मझं विनाशो यस्य नास्ति में ।
ब्रह्मादिस्तम्बयर्यन्तं जगन्नाशेउपि तिष्ठत:।।31।।
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानयि ।
क्वचिन्‍नगन्ता नागन्ता व्याप्त विश्वम्वास्थित:।।32।।
अहो अहं नमो मखं दक्षो नास्तीह मत्सम:।
असंस्थृश्य शरीरेण येन विश्व चिर धृतम्।।33।।
अहो अहं नमो मखं यस्य मे नास्ति किंचन।
अथवा यस्य में सर्वं यब्दाङमनसगोचरम्।।34।।

रविवार, 29 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--08)

नियंता नहीं—साक्षी बनो—प्रवचन—आठवां

18 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

पहला प्रश्न :

मुझे लगता है कि मेरा शरीर एक पिंजड़े या बोतल जैसा है, जिसमें एक बड़ा शक्तिशाली सिंह कैद है, और वह जन्मों— जन्मों से सोया हुआ था, लेकिन आपके छेड़ने से वह जाग गया है। वह भूखा है और पिंजरे से मुक्त होने के लिए बड़ा बेचैन है। दिन में अनेक बार वह बौखला कर हुंकार मारता, गर्जन करता, और ऊपर की ओर उछलता है। उसकी हुंकार, गर्जन, और ऊपर की ओर उछलने के धक्के से मेरा रोआं—रोआं कैप जाता है, और माथे व सिर का ऊपरी हिस्सा ऊर्जा से फटने लगता है। इसके बाद मैं एक अजीब नशे व मस्ती में डूब जाता हूं। फिर वह सिंह जरा शांत होकर कसमसाता, चहलकदमी करता व गुर्राता रहता है। और फिर कीर्तन में या आपके स्मरण से वह मस्त हो कर नाचता भी है! अनुकंपा करके समझायें कि यह क्या हो रहा है?

पूछा है 'योग चिन्मय' ने। शुभ हो रहा है! जैसा होना चाहिए, वैसा हो रहा है। इससे भयभीत मत होना। इसे होने देना। इसके साथ सहयोग करना। एक अनूठी प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसका अंतिम परिणाम मुक्ति है।

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र:महागीता--(प्रवचन--07)

जागरण महामंत्र है—प्रवचन—सातवां

17 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम
कोरेगांव पार्क, पूना।

जनक उवाच।

अहो निरंजन: शांतो बोधोउहं प्रकृते पर: ।
एतावंतमहं कालं मोहेनैव विडंबित: ।।21।।  
यथा प्रकाशाम्मेको देहमेनं तथा जगत् ।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न ब किंचन ।।22।।
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाउउधुना !
कुतश्चित् कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ।।23।।
यथा न तोयतो भिन्‍नस्तरंगा फेनबुखदा: ।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ।।24।।
तंतुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारत ।
आत्यतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ।।25।।
यथैवेमुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तेव शर्करा ।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरतरम् ।।26।।
आत्माउउज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्नभासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्‍ज्ञनादभासते न हि ।।27।।

अंधेरे में जैसे अनायास किरण उतरे, या जैसे अंधे को अचानक आंखें मिल जाएं—ऐसा ही जनक को हुआ। जो नहीं देखा था कभी, वह दिखाई पड़ा। जो नहीं सुना था कभी, वह सुनाई पड़ा। हृदय एक नई तरंग, एक नई उमंग से भर गया। प्राणों ने एक नया दर्शन किया। निश्चित ही जनक सुपात्र थे!
वर्षा होती है, पहाड़ों पर होती है, पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहले से ही भरे हैं। झीलों में होती है, खाली झीलें भर जाती हैं।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--06)

जागो और भोगो—प्रवचन—छटवां

16 सितंबर, 1976
कोरेगांव पार्क,
ओशो आश्रम पूना।


पहला प्रश्न :

वेदांत तथा अष्टावक्र—गीता जैसे ग्रंथों द्वारा स्वाध्याय करके यह जाना कि जो पाने योग्य है वह पाया हुआ ही है! उसके लिए प्रयास करना भटकन है। इस निष्ठा को गहन भी किया, तो भी आत्मज्ञान क्यों नहीं हुआ? कृपया मार्गदर्शन करें।

शास्त्र से जो समझ में आया वह तुम्हें समझ में आया र ऐसा नहीं है। शब्द से जो समझ में आया, वह तुम्हारी प्रतीति हो गई, ऐसा नहीं है। अष्टावक्र को सुनकर बहुतों को ऐसा लगेगा कि अरे, तो सब पाया ही हुआ है! लेकिन इससे मिल न जायेगा।
अष्टावक्र को सुनकर ही लगने से मिलने का क्या संबंध हो सकता है? यह प्रतीति तुम्हारी हो कि मिला ही हुआ है। यह अहसास तुम्हें हो, यह अनुभूति तुम्हारी हो; यह बौद्धिक निष्कर्ष न हो। बुद्धि तो बड़ी जल्दी राजी हो जाती है। इससे सरल बात और क्या होगी कि मिला ही हुआ है। चलो, झंझट मिटी! अब कुछ खोजने की जरूरत नहीं, ध्यान की जरूरत नहीं; पूजा—प्रार्थना की जरूरत नहीं—मिला ही हुआ है!

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--05)

साधना नहीं—निष्‍ठा, श्रद्धा—प्रवचन—पांचवां

15 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम पूना।

अष्टावक्र उवाच।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोsसि पत्रक ।
बोधोsहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव ।।14।।
नि:संगो निष्‍क्रियोउसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजन:?
अयमेव हि ले बंध: समाधिमनुतिष्ठसि ।।15।।
त्वया व्याप्तमिदं विश्व त्वयि प्रोतं यथार्थत: ।
शुद्धबुद्ध स्वरूपस्‍त्‍वं मागम: क्षुद्रचित्तताम् ।।16।।
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भर: शीतलाशय:।
अगाध बुद्धिरक्षुब्‍धो भव चिन्यात्रवासन: ।।17।।
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् ।
एतत्तत्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव ।।18।।
यथैवादर्शमध्‍यस्थे रूपेन्त: परितस्तम: ।
यथैवास्थिन् शरीरेsन्तः परित परमेश्वर: ।।19।।
एकं सर्वगतं व्योम बहिरंतर्यथा घटे ।
नित्यं निरंतरं ब्रह्म सर्व भूतगणे तथा ।।20।।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र:महागीता--(प्रवचन--04)

कर्म, विचार, भाव—और साक्षी—(प्रवचन—चौथा)

14 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, पूना।
पहला प्रश्न :

ध्यान और साक्षित्व में क्या संबंध है? उनसे चित्तवृत्तियां और अहंकार किस प्रकार विसर्जित होता है? पूर्ण निरहंकार को उपलब्ध हुए बिना क्या समर्पण संभव है? गैरिक वस्त्र और माला, ध्यान और साक्षी—साधना में कहां तक सहयोगी है? और कृपया यह भी समझाएं कि साक्षित्व, जागरूकता और सम्यक स्मृति में क्या अंतर है? 

मनुष्य के जीवन को हम चार हिस्सों में बांट सकते हैं। सबसे पहली परिधि तो कर्म की है। करने का जगत है सबसे बाहर। थोड़े भीतर चलें तो फिर विचार का जगत है। और थोड़े भीतर चलें तो फिर भाव का जगत है, भक्ति का, प्रेम का। और थोड़े भीतर चलें, केंद्र पर पहुंचें, तो साक्षी का।
साक्षी हमारा स्वभाव है, क्योंकि उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं—कभी कोई नहीं गया, कभी कोई जा भी नहीं सकता। साक्षी का साक्षी होना असंभव है। साक्षी तो बस साक्षी है। उससे पीछे नहीं हटा जा सकता। वहां हमारी बुनियाद आ गयी। साक्षी की बुनियाद पर यह हमारा भवन है— भाव का, विचार का, कर्म का।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--03)

जैसी मति, वैसी गति—(तीसरा—प्रवचन)

13 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, पूना।

अष्टावक्र उवाच।

एको द्रष्टाsसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं यश्यसीतरम्।।7।।
अहं कतेत्यहंमानमहाकृष्णहि दंशित।
नाहं कत्तेंति विश्वासामृत पीत्वा सुखी भव।। 8।।
एको विशुद्धबोधोउहमिति निश्चवह्रिना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोक: सुखी भव।। 9।।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पित रज्जुसर्यवत्!
आनंदपरमानद स बोधक्ल सुखं चर।। 10।।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्ययि।
किंवदतीह सत्येयं या मति: स गतिर्भवेत।। 11।।
आत्मा साक्षी विभु: पूर्ण एको मुक्तश्चिद क्रिय:।
असंगो निस्पृह: शांतो भ्रमात संसारवानिव!! 12।।
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मान परिभावय।
आभासोsहं भ्रमं मुक्त्‍वा भावं बाह्यमथांतरम्।।13।।