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तंत्र--सूत्र--(भाग--4) ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 12 दिसंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--64

आनंद है अचुनाव में—(प्रवचन—चौसठवां)

प्रश्‍नसार:
1—अधिक लोग दुःख और पीड़ा का जीवन ही क्‍यों चुनते है?
2—हम एक प्रबुद्ध की आशा कैसे कर सकते है?

पहला प्रश्न :

आनंद है क्या मनुष्य के सामने दो ही विकल्प हैं : सतत दुख और पीड़ा का जीवन या भगवत्ता और आनंद का जीवन? और क्‍या चुनाव उनके हाथ में है? फिर ऐसा क्‍यों है कि सर्वाधिक लोग दुख और पीड़ा का ही जीवन बनते हैं?

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--63

परमात्‍मा को जन्‍म देना है—(प्रवचन—तेरष्‍ठवां)

सूत्र:
90—आँख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से
उनके बीच का हलकापन ह्रदय में खुलता है।
और वहां ब्रह्मांड व्‍याप जाता है।
      91—हे दयामयी, अपने रूप के बहुत ऊपर और बहुत
            नींचे, आकाशीय उपस्‍थिति में प्रवेश करो।


एक बार एक चर्च में ऐसा हुआ कि एक बहुत लंबे और उबाऊ व्याख्यान के बाद पादरी ने सूचना दी कि मंगलकामना के तुरंत बाद बोर्ड की एक संक्षिप्त बैठक होगी। सभा समाप्त होने पर जो पहला आदमी पादरी के पास पहुंचा वह एक अजनबी था।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--62

आरंभ से आरंभ करो—(प्रवचन—बाष्‍ठवां)

      प्रश्‍नसार:
      1—मंजिल को पाने की जल्‍दी और प्रयत्‍न—रहित खेल में संगति कैसे बिठाएं?
      2—अपने शत्रु को भी अपने में समाविष्‍ट करने की शिक्षा क्‍या दमन पर नहीं ले जाती है?

पहला प्रश्न :

आरंभ से आरंभ आपने कल कहा कि हमें अपनी मंजिल की तरफ शीघ्रता से कदम रखने चहिए, क्यौंकि हमारे पास समय बहुत थोड़े है। लेकिन कुछ समय पहले आपने कहा था कि मंजिल की तरफ चलने की पूरी प्रक्रिया प्रयत्न— रहित खेल होना चाहिए आप इन दो शब्दों के बीच, जल्दी और खेल के बीच संगीत कैसे बिठाएंगे? क्योंकि जो जल्‍दी करता है वह खेल के सुख को कभी नहीं पाता है।।

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--61

तुम्‍हारा घर जल रहा है—(प्रवचन—इकसठवां)

सूत्र:
88—प्रत्‍येक वस्‍तु ज्ञान के द्वारा ही देखी जाती है। ज्ञान के द्वारा ही आत्‍मा
क्षेत्र में प्रकाशित होती है। उस एक को ज्ञाता और ज्ञेय की भांति देखो।
89—है प्रिये, इस क्षण में मन, ज्ञान, प्राण, रूप, सब को समाविष्‍ट होने दो।


मैंने एक किस्सा सुना है। अनुदार दल की एक जन—सभा में लॉर्ड मैनक्राफ्ट को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। वे ठीक समय पर आए और मंच पर चढ़े—वें थोड़े घबराए हुए लग रहे थे—उन्होंने लोगों को कहा. 'अपना भाषण जल्दी खतम करने के लिए मुझे क्षमा करें, लेकिन तथ्य यह है कि मेरे घर में आग लगी है।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--60

डरने से मत डरो—(प्रवचन—साठवां)

प्रश्‍नसार:
      1—क्‍या स्‍वतंत्रता और समर्पण परस्‍पर विरोधी नहीं है?
      2—सूत्र का सिर्फ यह यह है पर इतना जोर क्‍यों है?
      3—क्‍या भगवता या परमात्‍मा संसार का ही हिस्‍सा है?
            और वह क्‍या है जो दोनों के पार जाता है?
      4—तंत्र के अनुसार भय से कैसे मुक्‍त हुआ जाए?
      5—ऐसी ध्‍वनियां सुनने लगा हूं जो बहती नदी या झरने
            की घ्‍वनियों जैसी है। यह ध्‍वनि क्‍या है?

सोमवार, 23 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--59

स्‍वयं को असीमत: अनुभव करो—(प्रवचन—उन्‍नसठवां)

सूत्र:
86—भाव करो कि मैं किसी ऐसी चीज की चिंतना करता हूं,
जो दृष्‍टि के परे है, जो पकड़ के परे है, जो अनास्तिव के,
न होने के परे है—मैं।
      87—मैं हूं, यह मेरा है। यह यह है। हे प्रिय,ऐसे भाव में ही असीमत: उतरो।

नुष्‍य द्विमुखी है—पशु और देवता दोनों है। पशु उसका अतीत है और देवता उसका भविष्य। और इससे ही कठिनाई पैदा होती है। अतीत बीत चुका है, वह है नहीं, उसकी स्मृति भर शेष है। और भविष्य अभी भी भविष्य है, वह आया नहीं है, वह एक स्‍वप्‍न भर है, एक संभावना मात्र है।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

तंत्र-सूत्र--(भाग-4) प्रवचन--58

अपनी नियति अपने हाथ में लो—(प्रवचन—अट्ठावनवां)

प्रश्‍नसार:
1—क्‍या त्‍वरित विधियां स्‍वभाव के, ताओ के विपरीत नहीं है?
2—हम अब तक बुद्धत्‍व को प्राप्‍त क्‍यों नहीं हुए?
3—यदि समग्र बोध और समग्र स्‍वतंत्रता को उपलब्‍ध होकर प्राकृतिक
      विकास के करोड़ो जन्‍मों का टाला जा सकता है, तो क्‍या यह
      तर्क नहीं किया जा सकता है क ऐसा हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहिए?
4—क्‍या अकर्म और विस्‍तृत बोध पर्यायवाची है?

सोमवार, 16 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--57

स्‍वतंत्रता : शरीर—मन के पार——(प्रवचन—सत्‍तावनवां)

सूत्र:
84—शरीर के प्रति आसक्‍ति को दूर हटाओ और यह भाव करो
कि में सर्वत्र हूं। जो सर्वत्र है वह आनंदित है।
85—ना—कुछ का विचार करने से सीमित आत्‍मा हो जाती है।
मैंने एक बूढ़े डाक्टर के संबंध में एक कहानी सुनी है। एक दिन उसके सहायक ने उसे फोन किया, क्योंकि वह बड़ी कठिनाई में पड़ गया था। एक रोगी का दम घुट रहा था; रोगी के गले में बिलियर्ड की गेंद अटक गई थी। सहायक को समझ नहीं पड़ रहा था कि क्या करे। तो उसने बूढ़े डाक्टर से पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए?

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--56

अहंकार की यात्रा और अध्‍यात्‍म(प्रवचनछप्‍पनवां)

प्रश्‍नसार:
1—कृपया बताएं कि कोई शून्‍यता के साथ जीना कैसे सीखे?
2—क्‍या सारा आध्‍यात्‍मिक प्रयोग झूठे अहंकार के सच्‍चे
      रूपांतरण के लिए है?
3—अगर अहंकार झूठ है तो क्‍या अचेतन मन, स्‍मृतियों
      का संग्रह और रूपांतरण की प्रक्रिया, यह सब भी झूठ है?
4—कोई कैसे जाने कि उसकी आध्‍यात्‍मिक खोज अहंकार की
यात्रा न होकर एक प्रामाणिक धार्मिक खोज है?

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--55

दो विचारों के अंतराल में झांको(प्रवचनपच्‍चपनवां)

सुत्र—
82—अनुभव करो: मेरा विचार, मैं—पन, आंतरिक इंद्रियां—मुझ।
83—कामना के पहले और जानने के पहले मैं कैसे कह सकता हूं,
कि मैं हूं? विमर्श करो। सौंदर्य में विलीन हो जाओ।

क बार किसी छोटे शहर में एक आगंतुक ने अनेक लोगों से वहां के नगर—प्रमुख के संबंध में पूछताछ की : 'आपका महापौर कैसा आदमी है?'
पुरोहित ने कहा : 'वह किसी काम का नहीं है।
पेट्रोल—डिपो के मिस्त्री ने कहा. 'वह बिलकुल निकम्मा आदमी है।

सोमवार, 9 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--54

समग्र मनुष्‍य : संतुलित संस्‍कृति—(प्रवचन—चव्‍वनवां)

प्रश्‍नसार:
1—ध्‍यानी व्‍यक्‍ति नकारात्‍म तरंगों से अपना बचाव कैसे करे?
2—बोधपूर्ण होने पर भी जो मैं—भाव बना रहता है, उसे कैसे विलीन किया जाए?
3—क्‍या ऐसी संस्‍कृति संभव है जो मनुष्‍य को समग्रता से स्‍वीकार करे?


पहला प्रश्न :

जो ध्यानी व्‍यक्‍ति खुला, निष्‍क्रिय, ग्राहक और संवेदनशील है उसे अपने चारों ओर फैली नकारात्‍मक और तनावग्रस्‍त तरंगों के प्रभाव के कारण दुःख सहना पड़ता है। कृपा करके समझाएं कि वह हानिप्रद तरंगों से अपना बचाव कैसे करे?

शनिवार, 7 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--53

जब हरि हैं मैं नाहिं(प्रवचनतैरपनवां)

सूत्र:
79—भाव करो कि एक आग तुम्‍हारे पाँव के अंगूठे से शुरू होकर पूरे शरिर
      में ऊपर उठ रही है। और अंतत: शरीर जलाकर राख हो जाता है;
      लेकिन तुम नहीं।
80—यह काल्‍पनिक जगत जलकर राख हो रहा है, यह भाव करो;
      और मनुष्‍य से श्रेष्‍ठतर प्राणी बनो।
81—जैसे विषयीगत रूप से अक्षर शब्‍दों में और शब्‍द वाक्‍यों में जाकर
      मिलते है और विषयगत रूप से वर्तुल चक्रों में और चक्र मूल
      तत्‍व में जाकर मिलते है, वैसे ही अंतत: इन्‍हें भी हमारे
अस्‍तित्‍व में आकर मिलते हुए पाओ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--52

ध्‍यान को हंसीखेल बना लो--(प्रवचनबावनवो(प्रवचनबावनवां)

प्रश्‍नसार:
1—यदि सभी फिलासफी ध्‍यान—विरोधी है तो क्‍यों बुद्ध पुरूष
      दार्शीनिक मीमांसा की मजबूत शृंखला अपने पीछे छोड़ जाते है?
2—क्‍या विचार से समस्‍याएं हल हो सकती है?
3—खुले, निर्मल आकाश को एकटक देखने, प्रज्ञावान सदगुरू के फोटो
      पर त्राटक करने और अंधकार को अपलक देखने में क्‍या फर्क है?
4—क्‍या विज्ञान और धर्म का कहीं मिलन हो सकता है?
5—हम अपने अधैर्य को कैसे वश में करें?
6—आधुनिक विज्ञान को ध्‍यान में रखकर कृपया अंधकार
      एवं प्रकाश के संबंध में कुछ और कहें।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--51

अंधकार की साधना(प्रवचनइक्‍यावनवां)

सूत्र:
76—वर्षा की अंधेरी रात में प्रवेश करो, जो रूपों का रूप है।
77—जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात उपलब्‍ध न हो तो आंखें
      बंद करो और अपने सामने अंधकार को देखो,
      फिर आँख खोल कर अंधकार को देखा।
78—जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव।

एक बार एक गांव में एक सज्जन आकर टिके, उन्हें लोग डाक्टर कहते थे। वे प्रसिद्ध इतिहासविद थे, विद्वान थे। उस गाव का पोस्ट मास्टर, का पोस्ट मास्टर इस के व्यक्ति के प्रति बहुत कुतूहल से भर गया, वह जानना चाहता था कि यह किस तरह का डाक्टर है। तो एक दिन उसने पूछ ही लिया. 'महाशय, आप किस चीज के डाक्टर हैं?'

बुधवार, 4 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--50

तुम अपने भाग्‍य के मालिक हो(प्रवचनपचासवां)

प्रश्‍नसार:
1—क्‍या अंतस के रूपांतरण के लिए बाह्य की बिलकुल उपेक्षा भूल नहीं है?
2—क्‍या सभी ध्‍यान—विधियां भी कृत्य नहीं है?
3—सुस्‍पष्‍टता के लिए क्‍या मन का परिपक्‍व होना जरूरी नहीं है?
4—हम क्‍यों दुःख निर्मित करना जारी रखते है?


पहला प्रश्न :
कल रात आपने कहा कि बक्र को बदलने से अंतत नहीं बदलता है? नही रूपांतरित होता है। लेकिन क्या यह अब नहीं है कि आंतरिक रूपांतरण के लिए सम्यक आहार, सम्‍यक श्रम, सम्‍यक नींद, और सम्यक आचार— विचार भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। क्या बाह्य की बिलकुल उपेक्षा करना भूल नहीं है?

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--4) प्रवचन--49

कृत्‍य नहीं, होना महत्‍वपूर्ण है(प्रवचनउन्‍नचासवां)

सूत्र:
73—ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन
निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।
      74—हे शक्‍ति, समस्‍त तेजोमय अंतरिक्ष मेरे सिर में ही
            समाहित है, ऐसा भाव करो।
      75—जागते हुए, सोते हुए, स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को
            प्रकाश समझो।

जब मैं तुम्हारी आंखों में झांकता हूं तो मैं तुम्हें वहा कभी नहीं पाता हूं तुम मानो अनुपस्थित हो। तुम अनुपस्थित होकर जीते हो। और तुम्हारी सारी पीड़ा का स्रोत यही है। बिलकुल उपस्थित न रहकर भी तुम जीवित बने रह सकते हो। और अगर तुम उपस्थित नहीं हो तो तुम्हारा जीवन एक ऊब हो जाएगा। और यही हुआ है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

तंत्र—सूत्र—(भाग—4) ओशो


तंत्र-सूत्र-4 ओशो

(ओशो द्वारा भगवान शिव के ‘’विज्ञान भैरव तंत्र’’ पर दिए गये 80 अमृत प्रवचनों में से 49 से 64 प्रवचनों का संकलन।)
भूमिका:

 एक और क्रांति—दर्शन
द्वैतवादी है तंत्र—दर्शन—आकाश और धरती दोनों को एक साथ स्वीकार करता है वह!. और यहीं से शुरू होता है एक जागरूक आंदोलन, विद्युत —किरणों का ऐसा प्रस्फुटन जो भारत के भक्तों, प्रेमियों, बौद्धिकों के दिलों को ही नहीं बल्कि विश्व भर के ग्राह्य—हृदयों को भी तरंगायित, आलोड़ित कर गया। ओशो ने समग्र भगवत्ता को जगत में उड़ेलते हुए उपलब्ध होने के सभी मार्गों को खोला। हिंदू जैन, बौद्ध, यहूदी, हसीद, ईसाई आदि सभी की धर्म —विधियों की व्याख्या द्वारा।
और योग, तंत्र के सूत्रों, सतवाणियो को फिर से उजागर कर के नए मनुष्य को अपना मार्ग अपनाने के लिए एक ऐसी हिम्मत दे दी जो द्वंद्ववादी युग में कहीं खो रही थी—आत्मविहीनता के बौनेपन में जिसकी ऊंचाई ढूंढे न मिल रही थी दिशाहीन मनुष्य को।