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मंगलवार, 14 अगस्त 2018

उपासना के क्षण-(प्रवचन-11)

ग्यारहवां प्रवचन--(अलोभ की दृष्टि)

 लाभ की दृष्टि से जाना ही छोटी चीज के लिए जाना है। यह बड़ा सवाल नहीं है कि आप किस लाभ की दृष्टि से जाते हैं। आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से जाना भी लोभ ही ले जा रहा है।
प्रश्नः थोड़ा लोभ ही है।
हां। और इसलिए साधु के पास आप पहुंच न पाएंगे। साधु के पास तो आप जब अत्यंत सहज, बिना किसी कारण के जाते हैं, तभी आप लाभांवित होते हैं। लाभ का कारण भी मन में हो, तो भी बाधा पड़ जाती है। असल में, जैसे हम किसी को प्रेम करते हैं, तो कोई भी दृष्टि नहीं होती, लाभ की दृष्टि भी नहीं होती। लाभ मिलता है, यह दूसरी बात है। हम प्रार्थना करते हैं, तो लाभ की दृष्टि हो, तो प्रार्थना नहीं हो पाएगी।
साधु के पास हम जाते हैं, पहुंच नहीं पाते। वह लाभ चाहे धन का हो, चाहे स्वास्थ्य का हो, चाहे अध्यात्म का हो। इतना ही मैं कहूंगा कि आप छोटे लाभ को इनकार कर रहे हैं बड़े लाभ को इनकार नहीं कर रहे हैं। लेकिन छोटा लाभ अगर लोभ है तो बड़ा लाभ बड़ा लोभ है।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-10)

दसवां प्रवचन--(सफलता नहीं, सुफलता)

मैं सीढ़ियां चढ़ रहा हूं, तो मुझे एक सीढ़ी पर पैर रखना पड़ता है ताकि मैं वहां रहा आऊं कम से कम जहां था। और एक पैर उठाता हूं वहां पहुंचने के लिए जहां मुझे पहुंचना है। जब मैं वहां पहुंच जाता हूं तब मैं दूसरा उठाता हूं, क्योंकि यह पैर अब आश्वस्त हो गया है, एक जगह मिल गई है। अब मैं दूसरा उठा लेता हूं, नहीं तो अधर में हो जाऊंगा। अधर का डर इतना ज्यादा है कि दोनों एक साथ नहीं उठा सकता, नहीं तो गिर जाऊंगा। और दोनों एक साथ उठाऊंगा, तो यह भी डर है कि जहां था हो सकता है उससे भी पीछे गिर जाऊं। इसलिए उसको तो मैं पकड़े रहता हूं।
अगर मेरे पास दस हजार हैं तो दस हजार को मैं बचाता हूं और मुझे बीस हजार चाहिए तो मैं बीस हजार के लिए कदम उठाता हूं। दोहरे काम करता हूं। दस हजार को प्रिजर्व करता हूं और बीस हजार की आकांक्षा करता हूं। यह दोनों एक साथ चलेगा।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-09)

नौवां प्रवचन--(प्रयास रहित प्रयास)

हमारा व्यक्तित्व कोई एकदम सरल चीज नहीं है, बहुत जटिल है। बहुत हिस्से हैं, बहुत पहलू हैं। और एक पहलू देखता रहे और दूसरा पहलू रोता रहे, यह भी संभव है। जैसे हम लोग कहते हैं तो ऐसा नहीं है--सजग है पूरी तरह से, साक्षी है पूरी तरह से। उसका अर्थ यह है कि उसकी पूरी चेतना जागी हुई है। लेकिन उसमें फियर रहेगा। वह मन का हिस्सा है। पुराने अनुभव हैं वे मिट गए। मिट नहीं गया, वह मौजूद है। सिर्फ वह हावी नहीं रह गया साक्षी के ऊपर। जैसे कि कल तुझे चोट लगी थी हाथ में और घाव बन गया। उसमें दर्द हो रहा है। और तू साक्षी है। इसका यह मतलब नहीं कि दर्द मिट जाएगा साक्षी होने से। साक्षी होने से दर्द और तेरे बीच में एक फासला हो जाएगा। तो ही तू यह जानेगी कि दर्द हो रहा है, लेकिन कहीं, समव्हेयर। मैं दर्द से घिरा हूं ऐसा नहीं, मैं दर्द हूं ऐसा नहीं, दर्द कहीं हो रहा है, किसी बाउंडरी लाइन पर दर्द हो रहा है।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-08)

आठवां प्रवचन--(जीते-जी मरने की कला)  

प्रश्नः शरीर में कुछ सूक्ष्म शरीर जैसा भी है या नहीं?
एक ही रास्ता है कि जीते-जी शरीर और शरीर की चेतना अलग हो सके। मरने पर तो होती ही है। लेकिन फिर, फिर कोई, फिर कुछ हमारे पास जानने का उपाय नहीं रह जाता। हमारे पास तो एक ही उपाय है कि उसके पीछे केंद्र हैं। और कोई व्यक्ति भावुक...शरीर के बाहर होने को अनुभव कर सके। यह जो अनुभव है, बहुत बार आकस्मिक रूप से हो जाता है, और बहुत लोगों को। सामान्य अनुभव हैं ऐसे ही ये। बहुत असामान्य नहीं हैं। बहुत लोगों को कभी आकस्मिक रूप से हो जाता है--किसी गहरी बीमारी में, कभी कोई गहरी चोट लगने पर, कभी कोई एक्सीडेंट में, कभी कोई बहुत गहरे आघात में, कई बार अनायास यह घटना घट जाती है। प्रयास से भी घट सकती है। और रास्ते भी हैं उस प्रयोग को कर लेने के।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-07)

सातवां प्रवचन--(उपासना का मतलबः पास बैठना)

उपासना का मतलब होता हैः उसके पास बैठना। और जितना द्वैत होगा उतनी आसन से दूरी रहेगी। उतनी उपासना कम होगी। जितना अभेद होगा उतने ही उसके निकट हम बैठ पाएंगे। उपवास का भी वही अर्थ होता है, उपासना का भी वही अर्थ होता है। उपवास का मतलब होता हैः उसके निकट रहना। उसका मतलब भी भूखे मरना नहीं होता।
तो उसके निकट हम कैसे पहुंच जाएं?
और अगर उसकी निकटता में थोड़ी भी दूरी रही तो दूरी रही। तो उसके निकट तो हम वही होकर ही हो सकते हैं। कितनी भी निकटता रही, तो भी दूरी रही। निकटता भी दूरी का ही नाम है। या कम दूरी का नाम ज्यादा दूरी का नाम। तो ठीक निकट तो हम तभी हो सकते हैं जब हम वही हो जाएं। तो यह तो हम जितना साक्षीभाव में जाएंगे, उतना ही हम वह जो द्वैत है उसको छोड़ते हैं और वह तो एक है, वह जो मैं ही हूं, उसमें बैठते हैं।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन --(मन के पार)

न सुख है, न इतना दुख है और जितना है वह बहुत ध्यान देने योग्य नहीं है। लेकिन हम उसे बहुत बड़ा करके देखते हैं। दोनों को जाग कर देखिए तो दोनों खत्म हो जाते हैं।
प्रश्नः जागना ही सबसे बड़ी चीज है।
हूं।
प्रश्नः पहला ही आपका प्रवचन मैंने सुना, वह राजकुमार वाली बात थी, तलवार से, लकड़ी की तलवार से। बहुत बढ़िया इंट्रेस है। वह पहला प्रवचन। गुरु से किसी भी वक्त मार पड़ सकती है। हर वक्त चैतन्य रूप है, हर वक्त चेतन है। आज भी यही बात का और सिलसिला था, लेकिन यही बात थी।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन--(निर्विचार परिपूर्ण शक्ति हेेे)

 (प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
बीस साल में आप रुपया कमा पाए उतना जिससे आप सुख और शांति से रह सकते हैं। लेकिन बीस साल मन का तनाव और चिंता इस हालत में आपको ला दिया कि अब आपके पास कितना ही रुपया हो आप सुख और शांति से नहीं रह सकते। बीस साल में मन को इतना श्रम करना पड़ा, इतनी चिंता करनी पड़ी, उसकी वह आदत हो गई।
प्रश्नः चिंता करने की?
चिंता करने की, बेचैन होने की। वे रूट्स बन गईं चिंता की। जैसे बैलगाड़ी चलती है तो एक रास्ता बन गया। अब बैलगाड़ी के चकों को उसी में फंस कर चलना पड़ेगा। अब इधर-उधर थोड़ी-बहुत देर चलेगी फिर उसी में आ जाएगी। रट बन गई।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-04)

प्रवचन --चौथा --जीवन क्या है?

 प्रश्नः जीवन क्या है?
जब भी कोई पूछता है, जीवन क्या है? तो वह ऐसी बात पूछ रहा है जैसे अंधा आदमी पूछे, प्रकाश क्या है? या कोई आदमी पूछे, स्वाद क्या है? या कोई आदमी पूछे सुगंध क्या है? अगर तुमसे कोई पूछे स्वाद क्या है, तो क्या कहोगे? पूछे सुगंध क्या है, तो क्या कहोगे? जब कोई पूछे, स्वाद क्या है, तो तुम ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हो कि लिया जा सकता है लेकिन कहा नहीं जा सकता। स्वाद चखा जा सकता है, जीया जा सकता है, जाना जा सकता है, लेकिन कहा नहीं जा सकता। और स्वाद तो जीवन का एक अनुभव है, सुगंध जीवन का दूसरा अनुभव है, प्रेम जीवन का तीसरा अनुभव है, पीड़ा जीवन का चैथा अनुभव है, आनंद पांचवां अनुभव है। जीवन के हजार-हजार अनुभव हैं। एक अनुभव को भी नहीं कहा जा सकता और जीवन समग्र अनुभव का जोड़ है। तो एक अनुभव को भी नहीं कहा जा सकता कि क्या है तो समग्र जोड़ को तो कहने का कोई उपाय नहीं रह जाता कि क्या है।

सोमवार, 13 अगस्त 2018

उपासना के क्षण-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन--(श्रद्धा, अश्रद्धा और विश्वास)

अचानक, और कोई बात भी नहीं करता है, आकर हिलाया, आंख खोली तो पूछा कि ईश्वर को जानते हैं? थोड़े झिझक गए। वे झिझके, विवेकानंद वापस कूद गए। उन्होंने चिल्ला कर कहा कि रुको जरा, बात क्या है? विवेकानंद ने कहाः आपकी झिझक ने सब कुछ कह दिया, अब पूछने को मुझे कुछ है नहीं। आपकी झिझक ने सब कह दिया।
रामकृष्ण के पास गए, तो रामकृष्ण से भी वही पूछाः ईश्वर को जानते हैं? तो रामकृष्ण ने कहा कि तुझे जानना है? तू जानेगा?
इसमें, यह जो फर्क है। एक महर्षि देवेंद्रनाथ हैं। रामकृष्ण कुछ भी नहीं जानते देवेंद्रनाथ के मुकाबले। कुछ भी नहीं जानते हैं। जहां शब्द और शास्त्र के जानने का संबंध है। लेकिन यह आदमी है जो शब्द और शास्त्र को नहीं जानता, लेकिन कुछ जानता है। जो एक अलग आयाम है, एक अलग दिशा है चित्त के जानने की।

उपासना के क्षण-(प्रवचन-02)

 दूसरा प्रवचन--विसर्जन की कला

प्रश्नः आज सबेरे जो आपने बात किया, उस ईश्वर ने का योग जो गीता का मूल-मंत्र जो है उसमें इनसे पहली यही बात बताई है कि जिसका यह सुख और दुख इससे जो ‘पर’ होने की बुद्धि है वह ‘पर’ से जो आसक्ति उठा सकता है और जो उसमें भी समान भाव रख सकता है वही बड़ा पात्र बनता है, यह तत्व-ज्ञान है। यह आत्मा का पात्र ही वहां से शुरू होता है।
ये जो मन में विचारते हैं वही बात आती है। हमारे मन में जो मंथन चल रहा है वही बात आपके लेक्चर में आती है।
हूं, आपके प्रश्न भी दोहरा लें, हां।...
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, आप भी बोलिए।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
ठीक।
हूं, और कोई प्रश्न हों तो वे सब पूछिए।...
हूं, पूछिए, पूछिए।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

हूं-हूं, और कुछ तो नहीं है न अब बात?

उपासना के क्षण-(प्रवचन-01)

पहला प्रवचन -(उपासना के क्षण)
आध्यात्मिक भौतिकवाद
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
इतने चिंतायुक्त हैं कि जो अंतरधारा चिंता की चल रही है वह दिखाई नहीं पड़ रही है। और जब हम इस ऊपर की सतह पर शांत हो जाएंगे, तो अंतरधारा बड़ी चिंता की चलती हुई मालूम होगी, उससे घबड़ाहट होगी और लगेगा यह क्या हो रहा है। उस वक्त भी बिलकुल शिथिल होकर, उस वक्त भी चुपचाप साक्षीभाव रखना चाहिए। उस वक्त भी देखते रहना चाहिए, कुछ नहीं करना चाहिए। कुछ किया कि गड़बड़ शुरू हुई।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
नहीं, कुछ भी मत करिए। वह जो मैंने आज किया, नाॅन-कोआपरेशन करिए। किसी तरह का भी सहयोग मत दीजिए विचार को, चुपचाप बैठे देखें और चले जाएंगे।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं ।)
असल योग ही समझने जैसी बात है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, विचार तो हैं, चल रहे हैं, लेकिन विचार अपने में शक्तिहीन हैं जब तक कि मेरा उसे सहयोग न मिले। जब तक कि मैं उसको शक्ति न दूं। उसमें अपनी कोई शक्ति नहीं है। तो मुझे विचार से कुछ नहीं करना है, मैं जो शक्ति उसे देता हूं, वह भर नहीं देनी है। अभ्यास कुल इतना ही है कि मैं अपनी तरफ से शक्ति न दूं। वे आएं, आने दें; जाएं, जाने दें।