ग्यारहवां प्रवचन--(अलोभ की दृष्टि)
लाभ की दृष्टि से जाना ही छोटी चीज के लिए जाना है। यह बड़ा सवाल नहीं है कि आप किस लाभ की दृष्टि से जाते हैं। आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से जाना भी लोभ ही ले जा रहा है।प्रश्नः थोड़ा लोभ ही है।
हां। और इसलिए साधु के पास आप पहुंच न पाएंगे। साधु के पास तो आप जब अत्यंत सहज, बिना किसी कारण के जाते हैं, तभी आप लाभांवित होते हैं। लाभ का कारण भी मन में हो, तो भी बाधा पड़ जाती है। असल में, जैसे हम किसी को प्रेम करते हैं, तो कोई भी दृष्टि नहीं होती, लाभ की दृष्टि भी नहीं होती। लाभ मिलता है, यह दूसरी बात है। हम प्रार्थना करते हैं, तो लाभ की दृष्टि हो, तो प्रार्थना नहीं हो पाएगी।
साधु के पास हम जाते हैं, पहुंच नहीं पाते। वह लाभ चाहे धन का हो, चाहे स्वास्थ्य का हो, चाहे अध्यात्म का हो। इतना ही मैं कहूंगा कि आप छोटे लाभ को इनकार कर रहे हैं बड़े लाभ को इनकार नहीं कर रहे हैं। लेकिन छोटा लाभ अगर लोभ है तो बड़ा लाभ बड़ा लोभ है।

