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बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--139

आंतरिक सौंदर्य(प्रवचनबारहवां)


अध्‍याय—11

सूत्र—



श्रीभगवानुवाच:



गर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्यम।

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाक्षिण:।। 52।।

नाहं वेदैर्न तयसा न दानेन न चेज्यया।

शक्य एवंविधो दृष्‍टुं दृष्टवानसि मां यथा।। 53।।

भक्त्‍या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोउर्जुन।

ज्ञातुं दृष्‍टुं च तत्वेन प्रवेष्‍टुं च परंतप।। 54।।

मत्कर्मकृन्मत्यरमो मइभक्त: संगवर्जित:।

निर्वैर: सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।। 55।।



इस प्रकार अर्जुन के वचन को सुनकर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन मेरा यह चतुर्भुज रूप देखने को अति दुर्लभ है कि जिसको तुमने देखा है क्योंकि देवता भी सदा इस रूप के दर्शन करने की इच्छा वाले हैं।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--138

मांग और प्रार्थना(प्रवचनग्‍यारहवां)

भाग-पांचवां 
अध्‍याय—11
सूत्र-

मा ते व्‍यथा मा च विमूढभावो दृष्‍ट्वा रूपं घोरमीदृड्ममेदम्।
व्‍यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्‍त्‍वं तदेव मे रूपमिद प्रयश्य।। 49।।

संजय उवाच:

ड़त्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्ला स्वकं रूयं दर्शयामास भूय:।
आश्वासयामास व भीतमेनं भूत्वा पुन: सौम्यवगुर्महात्मा।। 50।।

अर्जुन उवाच:

दृष्ट्रवेदं मानुष रूपं तव सौम्य जनार्दन।
हदानीमस्थि संवृत: सचेता: प्रकृतिं गत:।। 5।।

इस प्रकार के मेरे हस विकराल रूप को देखकर तेरे को व्याकुलता न होवे और मूलभाव भी न होवे और भयरहित प्रीतियुक्त मन वाला तू उस ही मेरे हम शंख चक्र गदा पद्य सहित चतुर्भुज रूप को फिर देख।

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--137

मनुष्‍य बीज है परमात्‍मा का(प्रवचनदसवां)

अध्‍याय—11
सूत्र—

            अदृष्‍टपूर्व हषितोउस्‍मि दष्टवा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूयं प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 45।।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रकुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहसबाहो भव विश्वमूर्ते।। 46।।

श्रीभगवानुवाच:

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमय विश्वमनन्तमाद्य यन्धे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।। 47।।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न न क्रियाभिर्न तयोभिरुग्रै।
एवंरूक शक्य अहं नृलोके द्रझुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।। 48।।

हे विश्वमूर्ते मैं पहले न देखे हुए आश्चर्यमय आपके इस रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूं और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। हसलिए हे देव आय उस अपने चतुर्भुज रूप को ही मेरे लिए दिखाइए। हे देवेश हे जगन्निवास प्रसन्न होइए।
और हे विष्णो मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूं। इसलिए हे विश्वरूप हे सहस्त्रबाहो आप उस ही चतुर्भुज रूप से युक्त होइए।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--136

चरणस्‍पर्श का विज्ञान(प्रवचननौवां)

अध्‍याय—11
सूत्र—

      सखेति मत्वा प्रसभं क्ट्रूम्क्तंक हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्‍प्रणयेन वापि।। 41।।
यच्चावहासार्थमसरूतोउसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोउथवाध्यम्हत तत्समक्षं तकामये त्वामहमप्रमेयम्।। 42।
पितासि लोकस्य चराचरस्थ त्वमस्य यूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोउस्लथ्यधिक: कुतोउन्यो लोकत्रयेउध्यप्रतिमप्रभाव।। 43।।
तस्माह्मणम्य प्रणिधाय काय प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव युत्रस्य सखेव सखु: प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोहुम।। 44।।

हे परमेश्वर सखा ऐसे मानकर आपके इस प्रभाव को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रेम से अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ हठपूर्वक कहा गया है; और हे अच्‍युतू जो आप हंसी के लिए विहार शय्या आसन और भोजनादिको में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं, वे सब अपराध अप्रमेयस्वरूय अर्थात अचिंत्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा कराता हूं।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--135

बेशर्त स्‍वीकार(प्रवचनआठवां)

अध्‍याय—11
सूत्र—

 सजय उवाच:

एतच्‍छुत्वा वचनं केशवस्थ कृताज्जलिर्वेयमान किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीत प्रणम्य।। 35।।

अर्जुन उवाच:

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्यहृष्यगुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा।। 36।।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोउध्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्यरं यत्।। 37।।
त्वमादिदेव: पुरूष पुराणस्‍त्‍वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तामि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। 38।।
वायुर्यमोउग्निर्वरुण: शशाड्क: प्रजापतिस्व प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेस्‍तु सहस्रकृत्व: गुनश्च भूयोउपि नमो नमस्ते।। 39।।
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोउख ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्वं सर्वं समाम्नोषि ततोउमि सर्व:।। 40।।

इसके उपरांत संजय बोला कि हे राजन— केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपता हुआ नमस्कार करके फिर भी भयभीत हुआ प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोला— हे अंतर्यामिन् यह योग्य ही है कि जो आपके नाम और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है तथा भयभीत हुए राक्षस लोग दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार करते हैं।

सोमवार, 26 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--134

साधना के चार चरण—(प्रवचन—सांतवां)
अध्‍याय—11
सूत्र—

श्रीभगवागुवाच:

कालोउस्थि लोकक्षयकृत्यवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।
ऋतेउयि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येउवस्थिता प्राचनीकेषु ।। 32।।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुड्क्ष्‍व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।। 33।।
द्रोणं च भीष्म च जयद्रथ च कर्ण तथान्यानयि योधवीरान्।
मया हतांस्त्‍वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।। 34।।

इस प्रकार अर्जुन के क्रने पर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन मैं लोकों का नाश करने वाला बडा हुआ महाकाल हूं। इस समय हन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिए जो प्रतियक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने मे भी सबका नाश हो जाएगा।

रविवार, 25 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--133

पूरब और पश्‍चिम: नियति और पुरूषार्थ(प्रवचनछठवां)


अध्‍याय—11

सूत्र—



यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवायि वक्ताणि समृद्धवेगाः।। 29।।

लेलिह्यमे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान्त्रदनैर्ज्वलदभि:।

तेजोभिरायर्य जगत्ममग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतयन्ति विष्णो।। 3०।।

आख्याहि मे को भवागुग्ररूपो नमोउख ते देववर प्रसीद।

विज्ञखमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। 3।।



अथवा जैसे पतंग मोह के वश होकर नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं।

और आप उन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रसन करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपायमान करता है।

हे भगवन— कृपा करके मेरे प्रति कहिए कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं! हे देवों में श्रेष्ठ आपको नमस्कार होवे। आय प्रसन्‍न होड़ए। आदिस्वरूप आपको मैं तत्व से जानना चाहता हूं क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं नहीं जानता

शनिवार, 24 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--132

अचुनाव अतिक्रमण है(प्रवचनपांचवां)

अध्‍याय—11
सूत्र:

      रूपंमहत्ते कवक्तनेत्रं महाबाहो बहुबाक्रयादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं हूड़वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्।। 23।।
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्रवा हि त्वां प्रव्यखितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। 24।।
दंष्ट्राकरालानि व ते मुखानि दृष्ट्रवैव कालानलसब्रिभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 25।।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्थ युत्रा: सर्वे सहैवावनियालसंघै:।
भीष्मो द्रोण: सूतमुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरयि योधमुख्यै।। 26।।
वक्वाणि ते स्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेपु संदृश्यन्ते चूर्णितेरुत्तमाङ्गै।। 27।।
यथा नदीनां बहवोउखुवेगा समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्ताण्यभिविज्वलन्ति।। 28।।

और हे महाबाहो आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले तथा कत हाथ जंघा और पैरों वाले और बहुत उदरों वाले तथा बहुत— सी विकराल जाडों वाले महान रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूं।
क्योंकि हे विष्णो आकाश के साथ स्पर्श किए हुए, देदीप्यमान अनेक रूपों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अंत—करण वाला मैं धीरज और शांति को नहीं प्राप्त होता हूं।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--131

परमात्‍मा का भयावह रूप(प्रवचनचौथा)

अध्‍याय—11

सूत्र: 

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम।
त्वमध्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्ल पुरुषो मतो मे।।। 18।।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्तं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। 19।।
द्यावायृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्त स्वयैकेन दिशश्च सर्वा:।
दृष्ट्वाइभुतं रूयमुग्रं तवेदं लोकत्रय प्रव्यथितं महात्मन्।। 20।।
अमी हि त्वां सुरसंधा विशन्ति केचिद्रभीता प्राज्जत्नयो ग्दाणन्ति।
स्वस्तीत्युक्ता महर्षिसिद्धसंधा: स्तुवन्ति ना खतिभि पुष्कलाभि।। 21।।
रुद्रादित्या वसवो ये व साध्या विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। 22।।

इसलिए हे भगवन— आय ही जानने योग्य परम अक्षर हैं अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं और आय ही हल जगत के परम आश्रय हैं तथा आय ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आय ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है।
हे परमेश्वर मैं आपको आदि अंत और मध्य से रहित तथा अनंत सामर्थ्य से युक्त और अनंत हाथों वाला तथा चंद्र— सूर्य रूप नेत्रों वाला और प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से हम जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

गीता दशर्न--(भाग--5) प्रवचन--130

धर्म है आश्‍चर्य की खोज(प्रवचनतीसरा)

अध्‍याय—11
सूत्र—

दिवि सूर्यसहसस्थ भवेह्यगफत्सिता।
यदि भा: सदृशी सा स्यादृभासस्तस्थ महात्मन:।। 12।।
तत्रैकस्थं जगकृत्‍स्‍नं प्रविभक्तमनेकधा।
अयश्यद्देवदेवस्थ शरीरे पाण्डवस्तदा।। 13।।
तत: छ विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजय:।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताज्जलिरभाषत।। 14।।

अर्जुन उवाच:

पश्यामि देवास्तव देव देहे सर्वास्तंथा भूतविशेषसंघान्।
ब्रह्माणमीश कमलासनस्थमृषीश्च सर्वागुरगांश्ब दिव्यान्।। 15।।
अनेकबाहूदरवक्तनेत्र यश्यामि त्वां सर्वतोउनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न गुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूय।। 16।।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्य      समन्ताद्दीप्तानलार्कह्यतिमप्रमेयम्।। 17।।

और हे राजन् आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्‍न हुआ जो प्रकाश हो वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--129

दिव्‍यचक्षु की पूर्वभूमिका(प्रवचनदूसरा)

अध्‍याय—11
सार—सूत्र

            न तु मां शक्यसे द्रष्‍टुमनेनैव स्वच्रुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम।। 8।।

संजय उवाच:

श्वमुक्ला ततो राजन्यहायोगेश्वरो हरि:।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।। 9।।
अनेकवक्तनयनमनेकादूभुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतामुधम्।। 10।।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धागुलेयनम्।
सर्वाश्चर्यमय देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।। 11।।

परंतु मेरे को इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने को तू निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तेरे लिए दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूं, उससे तू मेरे प्रभाव को और योगशक्ति को देख।
संजय बोले हे राजन— महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके उपरांत अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूय दिखाया।
और उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अदभुत दर्शनों वाले एवं बहुत— से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत— से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाए हुए तथा दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का अगुलेपन किए हुए एवं सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त सीमारहित विराटस्वरूय परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--128

विराट से साक्षात की तैयारी—(प्रवचन—पहला)

      श्रीमद्रभगवद्रगीता
अथ एकादशोउध्‍याय:

      अर्जुन उवाच:

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोउयं विगतो मम।। 1।।
भवाध्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत: कमलयत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।। 2।।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्ट्रमिच्छामि ते रूपमैश्वरं गुरुषोत्तम।। 3।।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रछमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्‍वं दर्शयात्मानमव्ययम्।। 4।।

श्रीभगवानुवान:

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोउथ सहस्रश:।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।। 5।।

यश्यादित्यान्वसून्क्रद्रानश्विनौ मरूतस्तथा।
बहून्यदृष्टयूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।। 6।।
ड़हैकस्थं जगत्कृत्‍स्‍नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्दष्ट्रमिच्छसि।। 7।।