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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

अहंकार—

अहंकार आत्‍मबोध का आभाव है। आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्‍योति को जला लो। ध्‍यान का दीया बन जाओ। भीतर एक जागरण को उठा लो। भीतर सोए-सोए न रहो। भीतर होश को उठा लो। और जैसे ही होश आया, चकित होओगे, हंसोगे—अपने पर हंसोगे। हैरान होओगे। एक क्षण को तो भरोसा भी न आएगा कि जैसे ही भीतर होश आया वैसे ही अहंकार नहीं पाया जाता है। न तो मिटाया,न मिटा,पाया ही नहीं जाता है।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

धर्मों की चट्टानें—

जिसे लोग धर्म समझते है,  वह धर्म नहीं है। ईसाइयत, इसलाम और हिंदू धर्म, ये धर्म नहीं है। लोग जिन्‍हें धर्म कहते है, वे मृत चट्टानें हे। मैं तुम्‍हें धर्म नहीं धार्मिकता सिखाता हूं—एक बहती हुई सरिता, पग-पग पर मोड़ लेती है, निरंतर अपना मार्ग बदलती है। लेकिन अंतत: सागर तक पहुंच जाती है।

रविवार, 1 नवंबर 2009

संदेह

संदेह पैदा क्योंन होता है दुनिया में, संदेह पैदा होता है, झूठी श्रद्धा थोप देने के कारण। छोटा बच्चा है, तुम कहते हो मंदिर चलो। छोटा बच्चाट पुछता है किस लिए?
अभी मैं खेल रहा हूं, तुम कहते हो, मंदिर में और ज्या दा आनंद आएगा।
और छोटे बच्चेह को वह आनंद नहीं आता, तुम तो श्रद्धा सिखा रहे हो और बच्चाह सोचता है, ये कैसा आनंद, यहां बड़े-बड़े बैठे है उदास,
यहां दोड भी नहीं सकता, खेल भी नहीं सकता। नाच भी नहीं सकता, चीख पुकार नहीं कर सकता, यह कैसा आनंद। फिर बाप कहता है, झुको, यह भगवान की मूर्ति है। बच्चाा कहता है भगवान यह तो पत्थहर की मूर्ति को कपड़े पहना रखे है। झुको अभी, तुम छोटे हो अभी तुम्हा री बात समझ में नहीं आएगी। ध्या न रखना तुम सोचते हो तुम श्रद्धा पैदा कर रहे हो, वह बच्चा‍ सर तो झुका लेगा लेकिन जानता है, कि यह पत्थेर की मूर्ति है। उसे न केवल इस मूर्ति पर संदेह आ रहा है। अब तुम पर भी संदेह आ रहा है, तुम्हाेरी बुद्धि पर भी संदेह आ रहा है। अब वह सोचता है ये बाप भी कुछ मूढ़ मालूम होता है। कह नहीं सकता, कहेगा, जबत तुम बूढे हो जाओगे, मां-बाप पीछे परेशान होते है, वे कहते है कि क्यास मामला है।
बच्चेी हम पर श्रद्धा क्योंह नहीं रखते, तुम्हींा ने नष्टू करवा दी श्रद्धा। तुम ने ऐसी-ऐसी बातें बच्चेह पर थोपी, बच्चोम का सरल ह्रदय तो टुट गया। उसके पीछे संदेह पैदा हो गया, झूठी श्रद्धा कभी संदेह से मुक्तं होती ही नहीं। संदेह की जन्मेदात्री है। झूठी श्रद्धा के पीछे आता है संदेह, मुझे पहली दफा मंदिर ले जाया गया, और कहा की झुको, मैंने कहा, मुझे झुका दो, क्योंाकि मुझे झुकने जैसा कुछ नजर आ नहीं रहा।
पर मैं कहता हूं, मुझे अच्छे बड़े बूढे मिले, मुझे झुकाया नहीं गया। कहा, ठीक है जब तेरा मन करे तब झुकना,
उसके कारण अब भी मेरे मन मैं अब भी अपने बड़े-बूढ़ो के प्रति श्रद्धा है। ख्या ल रखना, किसी पर जबर्दस्ती़ थोपना मत, थोपने का प्रतिकार है संदेह। जिसका अपने मां-बाप पर भरोसा खो गया, उसका अस्तित्व़ पर भरोसा खो गया। श्रद्धा का बीज तुम्हामरी झूठे संदेह के नीचे सुख गया।
--एस धम्मो सनंतनो

परंपरा और धर्म

परंपरा और धर्म
       


धर्म विद्रोह है।
धर्म का और कोई रूप होता ही नहीं।
धम्र कभी परंपरा बनता ही नहीं,
जो बन जाता है, परंपरा वह धर्म है ही नहीं।
परंपरा तो ऐसे है जैसे आदमी गुजर गया,
उसके जूते के चिन्‍ह रेत पर पड़े रह गए।
वे चिन्‍ह जीवित आदमी तो है ही नहीं,
आदमी के जूते भी नहीं है।
जीवित आदमी तो छोड़ो,
मुर्दा जूते भी उन चिन्‍हों में नहीं है,
छाया की भी छाया है।
धर्म खतरनाक है,
धर्म से ज्‍यादा खतरनाक और को चीज़ पृथ्‍वी पर नहीं है।
लेकिन अक्‍सर देखोगे भीरूओं को धार्मिक बने।
घुटने टेके, प्रार्थनाएं-स्‍तुति करते हुए, भयाक्रांत।
उनका भगवन उनके भय का निचोड़ है।
धर्म तो खतरनाक ढंग से जीने का नाम है।
धर्म का अर्थ है निरंतर अभियान।
धर्म का अर्थ ही है पुराने और पीटे-पिटाए से राज़ी न हो जाना।
नए की, मौलिक की खोज।
धर्म का अर्थ है, अन्‍वेषण।
धर्म का अर्थ है, जिज्ञासा, मुमुक्षा।
धर्म का अर्थ है, उधार और बासे से तृप्‍त न हो जाना,
धर्म वेद से राज़ी नहीं होता,
जब तक अपना वेद निर्मित न हो जाए।
धर्म स्‍मृति में नहीं है। धर्म अनुभूति में है।
श्रुति और स्‍मृति। या तो सुना, या याद रखा।
लेकिन धम्र तो है, अनुभूति, न श्रुति, न स्मृति

--एस धम्‍मो सनंतनो

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

अमृत कण


संक्रांति की घड़ी---

आज जितनी शुभ घड़ी है इतनी कभी न थी, क्‍योंकि सामूहिक नींद टूट गर्इ है,
अब सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद तोड़ने का सवाल है। पहले तो व्‍यक्तिगत नींद तो थी ही।
सामूहिक नींद भी थी। अब कम से कम सामूहिक नींद का बोझ हट गया है।
अब ता सिर्फ व्‍यक्तिगत नींद है, तुम जरा करवट ले सकते हो,
जरी झकझोर सकते हो अपने को, तो उठ आने में देर न लगेगी।
इधर मैं अनेक लोगों पर ध्‍यान के प्रयोग करके कहता हूं तुमसे,
यह कोई सैद्धांतिक बात बात नहीं कह रहा हूं, समय बहुत अनुकूल है।                      सच हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद समय अनुकूल होता है।
जैसे एक साल में पृथ्‍वी का एक चक्‍कर पूरा होता है, सूरज का।
ऐसे पच्‍चीस सौ सालों में हमार सूर्य किसी एक महा सूर्य का एक चक्र पूरा करता है।
हर पच्‍चीस सौ सालों के बाद संक्रमण की घड़ी आती है।
पच्‍चीस सौ साल पहले बुद्ध हुए, महावीर हुए, लाओत्से, कनफयूशियस,
च्‍वांगत्‍सु, लीहत्‍सु, जरथुस्‍त्र, साक्रेटीज, सारी दुनियां बुद्धो से भर गई,
उसके भी पच्‍चीस सौ साल पहले कृष्‍ण, मोजेज, भीष्‍म पितामह, पतंजलि जैसे
बुद्ध पुरूष देखे, ये संक्रांति की घड़ी  करीब है।
और संक्रांति की घड़ी का अर्थ होता है, जब सामूहिक नशा टूट जाता है।
सिर्फ व्यक्तिगत नशे के तोड़ने की जरूरत रहती है,
उसे तोड़ना बहुत कठिन नहीं है, आसान है।
इससे ज्‍यादा आसान कभी भी नहीं होगा।
कभी ऐसा होता है कि नाव ले जानी हो उस पार तो
पतवार चलानी पड़ती है, और ऐसा होता है,
कि पतवार नहीं चलानी पड़ती सिर्फ पाल खोल दो,
हवा अपने आप नाव को उस तरफ ले जाती है।

----ओशो  


बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

नमस्काकर का अदभुत ढ़ंग—

इस देश ने नमस्‍कार का एक अद्भुत ढंग निकाल।‍
दुनिया मैं वैसा कहीं भी नहीं है।
इसे देश ने कुछ दान दिया है मनुष्‍य की चेतना को, अपूर्व।
यह देश केला है जब दो व्‍यक्ति नमस्‍कार करते है,
तो दो काम करते है।
एक तो दोनों हाथ जोड़ते है।
दो हाथ जोड़ने का मतलब होता है: दो नहीं एक।
दो हाथ दुई के प्रतीक है, द्वैत के प्रतीक है।
उन दोनों को हाथ जोड़ने का मतलब होता है, दो नहीं एक है।
उस एक का ही स्‍मरण दिलाने के लिए
दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्‍कार करते है।
और, दोनों को जोड़ कर जो शब्‍द उपयोग करते है।
वह परमात्‍मा का स्‍मरण होता है।
कहते है: राम-राम, जयराम, या कुछ भी,
लेकिन वह परमात्‍मा का नाम होता है।
दो को जोड़ा कि परमात्‍मा का नाम उठा।
दुई गई कि परमात्‍मा आया।
दो हाथ जुड़े और एक हुए कि फिर बचा क्‍या: हे राम।
 --ओशो

सत्यी का अवतरण--


सत्‍य जब भी अवतरित होता है,
तब व्‍यक्ति के प्राणों पर अवतरित होता है।
सत्‍य भीड़ के ऊपर अवतरित नहीं होता।
सत्‍य को पकड़ने के लिए व्‍यक्ति का प्राण ही बीणा बनता है।
वही से झंकृत होता है सत्‍य।
भीड़ के पास उधार बातें होती है, जो कि असत्‍य हो गई है।
भीड़ के पास किताबें है, जो कि मर चुकी है।
भीड़ के पास महात्‍माओं, तीर्थंकरों, अवतारों के नाम है।
जो सिर्फ नाम है, जिनके पीछे अब कुछ भी नहीं बचा,
सब राख हो गया है।
भीड़ के पास परंपराएं है, भीड़ के पास याददाश्‍तें है।
भीड़ के पास हजारों-लाखों साल की आदतें है।
लेकिन भीड़ के पास वह चित नहीं है।
जो मुक्‍त होकर सत्‍य को जान सकता है,

जो भी काई उस चित को उपलब्‍ध करता है, तो अकेले में,

व्‍यक्ति की तरह उस चित को उपलब्‍ध करना पड़ता है।

--ओशो

देह का सम्मांन करो--

मैं चाहता हूं कि तुम इस सत्‍य को ठीक-ठीक

अपने अंतस्‍तल की गहराई में उतार लो।
देह का सम्‍मान करे, अपमान न करना।
देह को गर्हित न कहना: निंदा न करना।
देह तुम्‍हारा मंदिर है।
मंदिर के भीतर देवता भी विराजमान है।
मगर मंदिर के बिना देवता भी अधूरा होगा।
दोनों साथ है, दोनों समवेत,
एक स्‍वर में आबद्ध, एक लय में लीन।
यह अपूर्व आनंद का अवसर है।
इस अवसर को तूम खँड़ सत्‍यों में तोड़ो।



--ओशो

प्रेम को जानने का उपाय---


पत्थर  को सुंदर मूर्ति में निर्मित कर लेना,

प्रेम को जानने का एक उपाय है।

साधारण शब्‍दों को जाड़ कर एक गीत रच लेना,

प्रेम को जानने का एक उपाय है।

नाचना, कि सितार बजाना, कि बांसुरी पर एक तान छेड़ना,

--ये सब प्रेम के ही रूप है।

--ओशो

सत्यू के मार्ग पर---

ध्‍यान रहे—असत्‍य के मार्ग पर,
सफलता मिल जाए तो व्‍यर्थ है,
असफलता भी मिले तो सार्थक है।
सवाल मंजिल का नहीं,
सवाल कहीं पहुंचने का नहीं,
कुछ पाने का नही—
दिशा का नहीं, आयाम का नहीं।
कंकड़-पत्‍थर इकट्ठे भी कर लिए किसी ने,
तो क्‍या पाया।
और हीरों की तलाश में खो भी गए,
तो भी बहुत कुछ पा लिया जाता है—
उस खोने में भी,
अंनत की यात्रा पर जो निकलता है,
वे डूबने को भी उबरना समझते है।




--ओशो

पृथ्वी् पर क्रांति--

पृथ्‍वी के दूर-दूर देशों से आए हुए ये लोग,
आने वाली पूरी पृथ्‍वी पर क्रांति के पहले प्रतीक है।
यह छोटी घटना नही है, बीज तो छोटा ही होता है।
जब वृक्ष बनेगा और बादलों को छुएगा,
तब तुम पहचान पाओगें, कितनी क्षमता छिपी थी एक बीज में,
एक बीज पुरी पृथ्‍वी को हरियाली से भर सकता है।
क्‍योंकि एक बीज में वृक्ष, फिर एक वृक्ष में अनंत बीज,
फिर एक-एक बीज में अनंत बीज।
एक बीज सारी पृथ्‍वी को फूलों से रंग सकता है।
और एक संन्‍यासी सारी पृथ्‍वी को गैरिक कर सकता है।
एक बुद्ध सारी पृथ्‍वी को बुद्धत्‍व की और अनुप्राणित कर सकता है। 

--ओशो

सृजन कठिन है—विध्वंस आसान

इस दुनिया में जो लोग बना नहीं सकते,
वे मिटाने में लग जाते है,
जो कविता नहीं रच सकते, वे आलोचक हो जाते है।
जो धर्म का अनुभव नहीं कर सकते, वे नास्तिक हो जाते है।
जो ईश्‍वर की खोज नहीं कर सकते, वे कहते है—ईश्‍वर है ही नहीं।
अंगूर खट्टे है,
इनकार करना आसान है, स्‍वीकार करना कठिन।
जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते है—समर्पित होए क्यों।
मनुष्‍य की गरिमा उसके संकल्‍प में है, समर्पण में नहीं।
जो समर्पित नहीं हो सकते, वे कहते है--,
कायर समर्पित होते है, बहादुर, वीर तो लड़ते है।
ध्‍यान रखान, सृजन कठिन है, विध्‍वंस आसान है।
जो माइकलएंजलो नहीं हो सकता
वह अडोल्‍फ हिटलर हो सकता है।
जो कालिदास नहीं हो सकता,
वह जौसेफ़ स्‍टैलिन हो सकता है।
जो बानगाग नहीं हो सकता, वह माओत्‍से तुंग हो सकता है।
विध्‍वंस आसान है। 
--ओशो


ध्यातन है अंतर्यात्रा।

और जिसकी अंतर् याता सफल है,
उसकी बहिर्यात्रा भी सफल हो जाती है।
क्‍योंकि फिर वे ही आंखे,
भीतर के रस को लेकर बाहर देखती है।
वो उस पाम रस का अनुभव होने लगता है।
जिस दिन तुम्‍हें अपनी पत्‍नी में परमात्‍मा दिखाई पड़े,
अपने पति में परमात्‍मा दिखाई पड़े
अपने बच्‍चें में परमात्‍मा दिखाई पड़े।
उस दिन जानना कि धम्र का जन्‍म हुआ है।
उस दिन जानना कि संन्‍यास हुआ, इससे पहले नहीं।
उससे पहले सब पलायन है,
कायता है, भगोड़ा पन है।




--ओशो

धर्म नहीं—धार्मिकता

धर्म सिद्धांत नहीं है।
धर्म फिर क्‍या है?
धर्म ध्‍यान है, बोध है, बुद्धत्‍व है।

इसलिए मैं धार्मिकता की बात नहीं करता हूं।

चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है।

इस लिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए,

मुसलमान पैदा हो गए।

अगर धर्म की जगह धार्मिकता की बात फैले,

तो फिर ये भेद अपने आप गिर जाएंगे।

धार्मिकता कहीं हिंदू होती है,

कि मुसलमान या ईसाई होती है।

धार्मिकता तो बस धार्मिकता होती है।

स्‍वास्‍थ्‍य हिंदू होता है, कि मुसलमान, कि ईसाई।

प्रेम जैन होता है, बौद्ध होता है, कि सिक्‍ख ।

जीवन, अस्तित्‍व इन संकीर्ण धारणाओं में नहीं बंधता।

जीवन सभी संकीर्ण धारणाओं का अतिक्रमण करता है।

उनके पार जाता है।
 - 
--ओशो

भगवान नहीं--भगवत्‍ता




भगवान पर जोर नहीं देता हूं,
भगवता पर जोर देता हूं।
भग वत्ता का अर्थ हुआ,
नहीं कोई पूजा करनी है,
नहीं कोई प्रार्थना,
नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है,
न पूजा के थाल सजाने है,
न अर्चना, न विधि-विधान, यज्ञ-हवन,
वरन अपने भीतर वह जो जीवन की सतत धारा है।
उस धारा का अनुभव करना है,
वह जो चेतना है, चैतन्‍य है।
वह जो प्रकाश है स्‍वयं के भीतर,
जो बोध की छिपी हुई दुनियां है,
वह जो बोध का रहस्‍यमय संसार है,
उसका साक्षात्‍कार करना है,
उसके साक्षात्‍कार से जीवन सुगंध से भर जाता है।
ऐसी सुगंध से जो फिर कभी चुकती नहीं।
उस सुगंध का नाम भग वत्ता है।
परम रस का अनुभव--

--ओशो

भगवान नहीं—भगवत्‍ता



भगवान पर जोर नहीं देता हूं,
भगवता पर जोर देता हूं।
भग वत्ता का अर्थ हुआ,
नहीं कोई पूजा करनी है,
नहीं कोई प्रार्थना,
नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है,
न पूजा के थाल सजाने है,
न अर्चना, न विधि-विधान, यज्ञ-हवन,
वरन अपने भीतर वह जो जीवन की सतत धारा है।
उस धारा का अनुभव करना है,
वह जो चेतना है, चैतन्‍य है।
वह जो प्रकाश है स्‍वयं के भीतर,
जो बोध की छिपी हुई दुनियां है,
वह जो बोध का रहस्‍यमय संसार है,
उसका साक्षात्‍कार करना है,
उसके साक्षात्‍कार से जीवन सुगंध से भर जाता है।
ऐसी सुगंध से जो फिर कभी चुकती नहीं।
उस सुगंध का नाम भग वत्ता है।
परम रस का अनुभव--


--ओशो

धर्म नहीं—धार्मिकता



धर्म सिद्धांत नहीं है।
धर्म फिर क्‍या है?
धर्म ध्‍यान है, बोध है, बुद्धत्‍व है।
इसलिए मैं धार्मिकता की बात नहीं करता हूं।
चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है।
इस लिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए,
मुसलमान पैदा हो गए।
अगर धर्म की जगह धार्मिकता की बात फैले,
तो फिर ये भेद अपने आप गिर जाएंगे।
धार्मिकता कहीं हिंदू होती है,
कि मुसलमान या ईसाई होती है।
धार्मिकता तो बस धार्मिकता होती है।
स्‍वास्‍थ्‍य हिंदू होता है, कि मुसलमान, कि ईसाई।
प्रेम जैन होता है, बौद्ध होता है, कि सिक्‍ख ।
जीवन, अस्तित्‍व इन संकीर्ण धारणाओं में नहीं बंधता।
जीवन सभी संकीर्ण धारणाओं का अतिक्रमण करता है।
उनके पार जाता है।


---ओशो

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

देश-द्रोही या मानव द्रोही----

मैं कहूंगा कि भारत को पहला देश होना चाहिए जो राष्‍ट्रीयता छोड़ दे।
यह अच्‍छा होगा कि कृष्‍ण, बुद्ध, महावीर, पतंजलि और गोरख का देश
राष्‍ट्रीयता छोड़ दे और कहे की हम अंतर्राष्‍ट्रीय भूमि है।
भारत को तो संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की भूमि बन जाना चाहिए।
कह देना चाहिए, यह पहला राष्‍ट्र है,
जो हम संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ को सौंपते है—सम्‍हालो।
कोई तो शुरूआत करे----। और यह शुरूआत हो जाए
तो युद्धों की कोई जरूरत नहीं है, ये युद्ध जारी रहेगें
जब तक सीमाएं रहेंगी। ये सीमाएं जानी चाहिए।
तो ठीक ही कहते हो, कह सकते हो मुझे देश-द्रोही—
इन अर्थों में कि मैं मानव-द्रोही नहीं हूं।
लेकिन तुम्‍हारे सब देश-प्रेम मानव-द्रोही है।
देश-प्रेम का अर्थ होता है मानव-द्रोह।
देश-प्रेम का अर्थ होता खड़ों में बांटो।
तुमने देखा न जो आदमी प्रदेश को प्रेम करता है।
वह देश का दुश्‍मन हो जाता है,
और जो जिले को प्रेम करता है।
वह प्रदेश का दुश्‍मन हो जाता है।
और जो जिले को प्रेम करता है,
वह प्रदेश का भी दुश्‍मन हो जाता है।
मैं दुश्‍मन नहीं हूं देश का,

क्‍योंकि मेरी धारणा अंतर्राष्‍ट्रीय है।

यह सारी पृथ्‍वी एक है।

मैं बड़े के लिए छोटे को विसर्जित कर देना चाहता हूंद्य

ब्रह्मचर्य--

सेक्‍स तो संपदा है।
उससे लड़ कर उसको नष्‍ट मत कर लेना।
उसे प्रेम से और आहिस्ता से बदलने की कीमिया है।
खोजना है उसकी केमिस्‍ट्री कि वह कैसे बदल जाए।
और मैं कहता हूं, उस किमिया के दो सूत्र है।
पहला सूत्र—सम्‍मान का भाव।
और दूसरा सूत्र है—प्रेम का निरंतर विकास
जितना प्रेम बढ़ेगा, उतनी सेक्‍स की शक्ति
प्रेम के मार्ग से प्रवाहित होने लगेगी।
और धीरे-धीरे आप पाएंगे—
सारा प्रेम, सारा सेक्‍स,
सारी प्रेम की शक्ति प्रेम का फूल बन गई है,
और जीवन प्रेम के फूलों से भर गया है।
सिर्फ प्रेम को उपलब्‍ध व्‍यक्ति ब्रह्मचर्य को उपलब्‍ध होता है।
जितना बड़ा प्रेम, उतना बड़ा ब्रह्मचर्य।

विचार की तरंगें--

एक हिटलर पैदा होता है,
तो पूरी जर्मनी को अपना विचार दे देता है,
और पूरे जर्मनी का आदमी समझता है कि ये मेरे विचार है।
ये उसके विचार नहीं है,
एक बहुत डाइनेमिक आदमी अपने विचारों को विकीर्ण कर रहा है।
और लोगमें डाल रहा है, और लोग उसके विचारों की सिर्फ प्रतिध्‍वनियां है।
और यह डाइनामिज्‍म इतना गंभी और इतना गहरा है,
की मोहम्‍मद को मरे हजार साल हो गए,
जीसस को मरे दो हजार साल हो गए,
क्रिश्चियन सोचता है कि मैं अपने विचार कर रहा हूं,
वह दो हजार साल पहले जो आदमी छोड़ गया है, तरंगें, वे अब तक पकड़ रही है।
महावीर या बुद्ध या कृष्‍ण, कबीर, नानक,
अच्‍छे या बुरे कोई भी तरह के डाइनेमिक लोग—
जो छोड़ गए है वह तुम्‍हें पकड़ लेता है।
तैमूरलंग ने अभी भी पीछा नहीं छोड़ा है दिया है मनुष्‍यता का,
और न चंगीजखां ने पीछा छोड़ा है, न कृष्‍ण, न सुकरात, न सहजो ने, न तिलोमा,
न राम, न रावण, पीछा वे छोड़ते ही नहीं।
उनकी तरंगें पूरे वक्‍त होल रही है, तुम्‍हारी मन स्थिती जैसी हो,
या जिस हालात में हो वहीं तरंग को पकड़ उसमें सराबोर हो जाती है,
सही मायने में तुम-तुम हो ही नहीं,
तुम एक मात्र उपकर बन कर रहे गये हो, मात्र रेडियों।
जागना ही अपने होने की पहली शर्त है,
ध्‍यान जगाने की कला का नाम है, ध्‍यान तुम्‍हारी आंखों को खोल
पहली बार तुम्‍हें ये संसार दिखाता है।
सपने के सत्‍य में, जागरण के सत्‍य में क्या भेद है।
केवल—‘’ध्‍यान’’