कुल पेज दृश्य

कहानी--कथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कहानी--कथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 24 अप्रैल 2024

गिलगमेश अक्काडियन महाकाव्य-(कहानी कथा)

 गिलगमेश अक्काडियन महाकाव्य


वह एक राजा था, और अपने मध्य जीवन तक वह पूरी मानवता की तरह जीया - मृत्यु के प्रति सचेत हुए बिना। ऐसा नहीं कि वह मृत्यु को नहीं जानता था। बहुत से लोग मर गए थे, लेकिन वह आम भ्रम में था - जैसा कि पूरी मानवता है - कि मृत्यु किसी और की होती है, उसकी नहीं। इसलिए वह बेहोश रहता था और मृत्यु कभी कोई समस्या नहीं थी।

बेशक लोग मर रहे थे--उसने कई लोगों को मरते देखा था; वह युद्ध के मैदान में गया था - लेकिन उसने कभी भी गहराई तक प्रवेश नहीं किया था। तीर कभी उसके अपने हृदय पर ही नहीं लगा था। वह सामान्यतः तो जानता था कि मृत्यु होती है, परन्तु उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि यह विशेष रूप से उसके साथ भी घटित होने वाली है।

यह स्वाभाविक तर्क है। आप सदैव किसी मृत व्यक्ति के संपर्क में आते हैं, अपने आप को कभी भी मृत के रूप में नहीं देखते। मरने वाला तो हमेशा कोई और ही होता है, इसलिए चिंतित क्यों हों? दूसरे मरते हैं - तुम कभी नहीं मरते।

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

छोटी कथा--(कथा यात्रा)

एक बार किसी छोटे शहर में एक आगंतुक ने अनेक लोगों से वहां के नगर-प्रमुख के संबंध में पूछताछ की: आपके महापौर कैसे आदमी है?
            पुरोहित ने कहा: वह किसी काम का नहीं
            पेट्रोल-डिपो के मिस्त्री ने कहा: वह बिलकुल निकम्मा है।
            नाई ने कहा: मैंने अपने जीवन में उस दुष् को कभी वोट नहीं दिया।
            तब वह आगंतुक खुद महापौर से मिला। जो की बहुत बदनाम व्यक्ति था।
            उसने पूछा: आपको अपने काम के लिए क्या तनख्खाह मिलती है?’
            महापौर ने कहां: भगवान का नाम लो। मैं इसके लिए कोई तनख्खाह लूंगा मैं तो बस सेवा भाव से यह पद सम्हाल रखा है। इसे लोगे के प्रेम की खातिर स्वीकार किया हुआ है।
ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र


बुधवार, 9 मई 2012

जरूथुस्‍त्र--

एक बार पर्शिया का राज विशतस्‍या,  जब युद्ध जीतकर लौट रहा था, तो वह जरथुस्त्र के निवास के निकट जा पहुंचा। उसने इस रहस्‍यदर्शी संत के दर्शन करने की सोची। राज ने जरथुस्त्र के पास जाकर कहा, ‘’मैं आपके पास इसलिए अया हूं कि शायद आप मुझे सृष्‍टि और प्रकृति के नियम के विषय में कुछ समझा सकें। मैं यहां पर अधिक समय तो नहीं रूक सकता हूं, क्‍योंकि मैं युद्ध स्‍थल से लौट रहा हूं। और मुझे जल्‍दी ही अपने राज्‍य में वापस पहुंचना है, क्‍योंकि राज्‍य के महत्वपूर्ण मसले महल में मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है—कथा यात्रा (ओशो)

एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था। यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदर हो रही है।
      उसका सपना था कि उसे पृथ्‍वी की सबसे सुंदर जगह बनाया जाए। वह हमेशा अपने घोड़े को रोकता और एक बूढ़े व्‍यक्‍ति को देखता, वह एक सौ बीस साल का बूढ़ा रहा होगा जो बग़ीचे में काम करता रहता, बीज बोता, वृक्षों को पानी देता—ऐसे वृक्ष जिनको बड़ा होने में सैंकड़ो साल लगेंगे। ऐसे वृक्ष जो चार हजार साल जीते है।

रविवार, 15 मई 2011

बुद्ध की भविष्‍यवाणी—(ओशो की सभागार)

 कथा यात्रा--
सुभूति ने पूछा भगवान बुद्ध से जो आप बोल रहे है, वह आज आपके संग साथ होने पर भी हम समझ-समझ कर समझ नहीं पाते। क्‍या आने वाले समय में , युगांतर काल में, आखिरी पाँव सौ वर्षों में, इस सम्‍यक शिक्षा के पतन काल में जो कि जब इस सूत्र के ये बचन समझायें जा रहे होंगे तो इनके सत्‍य को समझेंगे?

बुधवार, 16 मार्च 2011

विवेकानंद और वेश्‍या– (कथा यात्रा)

 
ऐसा हुआ कि विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्‍यक्‍ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वह महाराज भक्‍त था विवेकानंद और रामकृष्‍ण का। जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्‍सव आयोजित कर दिया। उसने स्‍वागत उत्‍सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्‍याओं को भी बुला लिया। अब जैसा महा राजाओं का चलन होता है; उनके अपने ढंग के मन होते है। वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्‍याओं को लेकर संन्‍यासी का स्‍वागत करना उपयुक्‍त नहीं है। पर कोई और ढंग वह जानता ही नहीं था। उसने हमेशा यही जाना था कि जब तुम्‍हें किसी का स्‍वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।

रविवार, 23 जनवरी 2011

जूदास और जीसस

 
जूदास ने जीसस को धोखा दिया था। उसे बिकवाया था। उसे पकड़वाया था रात में आकर। जीसस रात में ठहरे हुए थे। और जूदास लाया दुश्मन के सिपाहियों को और जीसस को पकड़वा दिया। तो जूदास से ज्यादा गंदा नाम ईसाइयत के इतिहास में दूसरा नहीं है। यानी किसी आदमी को गाली देनी हो तो जूदास कह दो। तो इससे बड़ी कोई गाली नहीं है। जीसस को फांसी लगवाने से बड़ा और बुरा हो भी क्या सकता है।

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

बिल्‍ली मत पलना—(कथा यात्रा)

एक बार एक महात्मा मरने के करीब था। उसने अपने पिय शिष्‍य को अपने पास बुलाया और कहने लगा। देख तू मेरी एक बात मान जो चाहे करना पर बिल्‍ली मत पालना। ये में अपने जीवन भी निचोड़ तुझे दिये जा रहा हूं। ये तेरी जीवन का सूत्र है। शिष्‍य ने कहा पर गुरूदेव में इस सूत्र का अर्थ समझ नहीं पाया। पर गुरु के पास समय कम था सो वह स्‍वर्ग सीधार गये। अब युवक उस सूत्र में उलझा रह गया। कितने शस्‍त्र पढ़ पर उसका हल नहीं मिला।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

जीसस का जन्‍म और तीन भारतीय मनीषी--

जीसस के जन्‍म पर पूरब के तीन व्‍यक्‍ति जीसस की खोज में निकले। जीसस का जन्‍म हुआ बेथलहम की एक घुड़साल में, जहां जानवर बांधे जाते है। उस पशुशाला में गरीब बढ़ई के घर। और पूरव के तीन मनीषी यात्रा पर निकले कि कहीं कोई शुभ्र लेश्‍या का व्‍यक्‍ति जन्‍म लेने वाला है। और वो तीनों एक तारे का पीछा करते बेथलहम पहुंच गए।  इन तीन की वजह से हेरोत को पता चला,

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

भगवान महावीर और गौतम—(कथा यात्रा)


गौतम उस समय का बड़ा पंडित था। हजारों उसके शिष्‍य थे, जब वह महावीर को मिला, उसके पहले उसका बड़ा नाम था, वह ब्राह्मण घर में जन्‍मा था। महावीर से विवाद करने ही आया था। गौतम, महावीर से विवाद करना ठीक उल्‍टा होगा ये उसे ज्ञात नहीं था। वह थोथे ज्ञान से भरा था। तर्क बुद्धि थी। तक्र बुद्धि आदमी को अहंकारी बना देती है। महावीर को पराजित करने के लिए आया था। हरा दिये होंगे पंडित पुरोहित। जो जानकारी रखते होंगे। उसने सोचा महावीर भी जानकरी से भरा है।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस और मां शारद


      राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे। और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे। रामकृष्‍ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झाल के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा। सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे है। वर्षा के दिन करीब आ रहे है। काली बदलियां भी छा गई है। घनघोर, जल्‍दी रामकृष्‍ण लोट रहे है। तभी बगुलों की एक पंक्‍ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्‍ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्‍ण वहीं गर पड़े। घर उन्‍हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्‍ती। बामुशिकल से वे होश में लाए जा सके।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

नागार्जुन और चोर—

 
नागार्जुन से एक चोर ने कहा था कि तुम ही एक आदमी हो जो शायद मुझे बचा सको। यूं तो मैं बहुत महात्‍माओं के पास गया, लेकिन मैं जाहिर चोर हूं, मैं बड़ा प्रसिद्ध चारे हूं, और मेरी प्रसिद्धि यह है कि मैं आज तक पकड़ा नहीं गया हूं, मेरी प्रसिद्धि इतनी हो गई है कि जिनके घर चोरी भी नहीं कि वह भी लोगों से कहते है कि उसने हमारे घर चोरी की। क्‍योंकि मैं उसी के घर चोरी करता हूं जो सच में ही धनवान है। हर किसी अरे–गैरे –नत्थू खैरे के घर चोरी नहीं करता। सम्राटों पर ही मेरी नजर होती है। और कोर्इ मुझे पकड़ नहीं पाया है। लेकिन तुमसे मैं पूछता हूं। और महात्‍माओं से पूछता हूं तो वे कहते है: पहले चोरी छोड़ो।

रविवार, 21 नवंबर 2010

भगवान बुद्ध और यशोधरा--कथा यत्रा

 भगवान बुद्ध ओर यशोधरा-
गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्‍ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्‍चा, उनका बैटा एक ही दिन का था। राहुल एक ही दिन का था। जब आए तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्‍नी यशोधरा बहुत नाराज थी। स्‍वभावत:। और उसके एक बहुत महत्‍वपूर्ण सवाल पूछा। उसने पूछा कि मैं इतना जानना चाहती हूं; क्‍या तुम्‍हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं? क्‍या तुम सोचते हो कि मैं तुम्‍हें रोक लेती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्‍हें भेज सकते है, तो सत्‍य की खोज पर नहीं भेज सकेत?
तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्‍यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्‍लाती हूं, रूकावट डालती हूं।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

भगवान बुद्ध और ज्‍योतिषी— ( कथा यात्रा )

एक गर्म दोपहरी थी। भगवान बुद्ध नदी किनारे चले जा रहे थे।  नंगे पाव होने के कारण ठंडी बालु रेत का सहारा ले पैरों को ठंडा कर लेते थे। आस पास कहीं कोई वृक्ष नहीं था। नदी का पाट गर्मी के सुकड़ कर सर्प की तरह आड़ा तिरछा और संकरा भी हो गया।  चारों और बालु का विस्‍तार फैला हुआ था। सुर्य शिखर पर था। रेत गर्मी के कारण तप रही थी। भगवान पैरो की जलन को कम करने के लिए गीली रेत पर चल कर पैरो को ठंडा कर रहे थे। जिसके कारण उनके पद चाप नदी के गिले बालु पर चित्र वत छपे अति सुंदर लग रहे है। दुर तक कोई बड़ा पेड़ न होने के कारण, पास ही एक कैंदु की झाड़ी की छांव को देख कर पल भर विश्राम करने के लिए रूप गये। कैंदु की छांव इतनी सधन थी कि कोई-कोई धूप का चितका छन कर ही आपा रहा था।

बुधवार, 28 जुलाई 2010

अधूरी वासना—(कहानी) लेखक--ओशो

  
(28 नवंबर 1953 के नव भारत (जबलपुर) में इस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ यह कहानी पहली बार प्रकाशित हुई थी)
     ‘’ अधूरी वासना ’’ लेखक की रोमांटिक कहानी है।
     भारत के तत्‍व दर्शन में पुनर्जन्‍म का आधार इस जीवन की अधूरी छूटी वासनायें ही है। कहानी के लेखक नह ऐ अन्‍य जगह लिखा है कि ‘’ शरीर में वासनायें है पर वह शरीर के कारण नहीं है, वरन शरीर ही इन वासनाओं के कारण से है।
     अधूरी वासनायें जीवन के उस पास भी जाती है। और नया शरीर धारण करती है। जन्‍मों–पुनर्जन्‍मों का चक्र इन अधूरी छूटी वासना ओर का ही खेल है, लेखक की इस कहानी का विषय केंन्‍द्र यही है।
     23 अगस्‍त 1984 को पुन: नव भारत ने इस के साथ इस कहानी को प्रकाशित किया: संपादकीय टिप्‍पणी:-
     श्री रजनीश कुमार से आचार्य रजनीश और भगवान रजनीश तक का फासला तय करने वाले आचार्य रजनीश का जबलपुर से गहरा संबंध रहा है। अपनी चिंतन धारा और मान्‍यताओं के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्‍व में चर्चित श्री रजनीश ने आज से लगभग 31 वर्ष पूर्व नव भारतको एक रोमांटिक कहानी प्रकाशनार्थ भेजी थी और वह जिस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ प्रकाशित की गई थी, 28 नवंबर 1953 के नव भारत से लेकिर अक्षरशः: प्रकाशित कर रहे है।
    
      मैं पथ पर अकेला था, मेरा गीत था और दूर-दूर तक पहाड़ी पगडंडियों में चांदनी बिखरी सोई था। रातें ठंडी हो गई थी। और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी थी एक माह की दे थी कि यहां भी बर्फ के गोले पड़ने लगेंगे, नदिया जमकर चाँदी की धारों में बदल जायेगी और काले पहाड़ों की चोटियों पर शुभ्र हिम ऐसे चमकने लगेगा, जैसे पहाड़ों ने अपने जूड़ों पर जुही के सफेद फूल बाँध लिये हो।
      मैं अपने आप में खोया-खोया आगे बढ़ता गया। कभी-कभी पक्षी रात में मौन को तोड़ता निकल जाता और सूनी वादियाँ उसके परों की फड़फड़ाहट में गूंज जाती। फिर रात का ठंडा मौन वैसे ही वापस घिर आता जैसे नदी की छाती पर गिरे पत्‍थर से कांपती लहरें फिर एक दूसरे में मिलकर मौन जो जाती।