दूसरी
विधि:
यह
दूसरी विधि
तभी प्रयोग की
जा सकती है,
जब तुमने पहली
विधि पूरी कर
ली है। यह
प्रयोग अलग से
भी किया जा
सकता है।
लेकिन तब यह
बहुत कठिन
होगा। इसलिए
पहली विधि
पूरी करके ही
इसे करना अच्छा
है। और तब यह
विधि बहुत सरल
भी हो जायेगी।
‘’हे
दयामयी,
अपने रूप के
बहुत ऊपर और
बहुत नीचे,
आकाशीय उपस्थिति
में प्रवेश
करो।‘’
यह
दूसरी विधि
तभी प्रयोग की
जा सकती है,
जब तुमने पहली
विधि पूरी कर
ली है। यह
प्रयोग अलग से
भी किया जा
सकता है।
लेकिन तब यह
बहुत कठिन
होगा। इसलिए
पहली विधि
पूरी करके ही
इसे करना अच्छा
है। और तब यह
विधि बहुत सरल
भी हो जायेगी।
जब
भी ऐसा होता
है—कि तुम
हलके-फुलके
अनुभव करते हो,
जमीन से उठते
हुए अनुभव
करते हो,मानों
तुम उड़ सकते
हो—तभी अचानक
तुम्हें बोध
होगा कि तुम्हारा
शरीर को चारों
और एक नीली
आभा मंडल घेरे
है।















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