चौथी
विधि:
इस विधि में
आकाश के, स्पेस के
तीन गुण दिए
गए है।
1--आधारहीन:
आकाश में कोई
आधार नहीं हो
सकता।
2--शाश्वत:
वह कभी समाप्त
नहीं हो सकता।
3--निश्चल:
वह सदा ध्वनि-रहित
व मौन रहता
है।
इस आकाश
में प्रवेश
करो। वह तुम्हारे
भीतर ही है।
लेकिन मन
सदा आधार
खोजता है।
मेरे पास लोग
आते है और मैं
उनसे कहता हूं, ‘आंखें
बंद कर के मौन
बैठो और कुछ
भी मत करो।’ और
वे कहते है,
हमें कोई
अवलंबन दो,
सहारा दो।
सहारे के लिए
कोई मंत्र दो।
क्योंकि हम
खाली बैठ नहीं
सकते है। खाली
बैठना कठिन
है। यदि मैं
उन्हें कहता
हूं कि मैं
तुम्हें
मंत्र दे दूं
तो ठीक है। तब
वह बहुत खुश
होते है। वे
उसे दोहराते
रहते है। तब
सरल है।










