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सोमवार, 24 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-80

पूर्णता एवं शून्यता का एक ही अर्थ है-

प्रवचन-अस्सीवां 

प्रश्नसार:

1-यदि भीतर शून्य है तो इसे आत्मा क्यों कहते है?
2-बुद्ध पुरूष निर्णय कैसे लेता है?
3-संत लोग शांत जगहों पर क्यों रहते है?
4-आप कैसे जानते है कि चेतना शाश्वत है?
5-मेरे बुद्धत्व से संसार में क्या फर्क पड़ेगा?    

पहला प्रश्न :
आपने कहा कै हमारे भीतर वास्तव में कोई भी नहीं है। बस एक शून्य है? एक रिक्तता
है। परंतु फिर आप इसे प्राय: आत्मा अथवा केंद्र कह कर क्यों पुकारते हैं?

या अनात्मा, ना-कुछ या सब कुछ, विरोधाभासी लगते हैं, पर दोनों का एक ही अर्थ है। पूर्ण और शून्य का एक ही अर्थ है। शब्दकोश में वे विपरीत हैं पर जीवन में नहीं। इसे इस तरह समझो : यदि मैं कहूं कि मैं सबको प्रेम करता हूं या मैं कहूं कि मैं किसी को भी प्रेम नहीं करता तो इसका एक ही अर्थ होगा। यदि मैं किसी एक व्यक्ति को ही प्रेम करूं तभी अंतर पड़ेगा। यदि मैं सबको प्रेम करूं तो वह किसी को भी प्रेम न करने जैसा ही है। फिर कोई अंतर नहीं है। अंतर सदा मात्रा में होता है,

शनिवार, 22 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-79

शून्यता का दर्शन-

प्रवचन-उन्नासिवां 

सारसूत्र-

109-अपने निष्क्रय रूप को त्वचा की दीवारों का एक रिक्त कक्ष मानो-सर्वथ रिक्त।
110-हे गरिमामयी, लीला करो। यह ब्रह्मांड एक रिक्त खोल है। जिसमें तुम्हारा मन अनंत रूप में कौतुक करता है।
111-हे प्रिये, ज्ञान ओर अज्ञान, अस्तित्व ओर अनस्तित्व पर ध्यान दो।
112-आधारहीन, शाश्वत, निश्चल आकाश में प्रविष्ट होओ।
विधियों रिक्तता से संबंधित हैं। ये सर्वाधिक कोमल, सर्वाधिक सूक्ष्म हैं, क्योंकि खालीपन की परिकल्पना भी असंभव प्रतीत होती है। बुद्ध ने इन चारों विधियों का अपने शिष्यों और भिक्षुओं के लिए प्रयोग किया है। और इन चारों विधियों के कारण ही वे बिलकुल गलत समझ लिए गए। इन चारों विधियों के कारण ही भारत की धरती से बौद्ध धर्म पूरी तरह उखड़ गया।
बुद्ध कहते थे कि परमात्मा नहीं है। यदि परमात्मा है तो तुम पूरी तरह खाली नहीं हो
सकते। हो सकता है तुम न रही पर परमात्मा तो रहेगा ही, दिव्य तो रहेगा ही। और तुम्हारा मन तुम्हें धोखा दे सकता है, क्योंकि हो सकता है तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे मन की ही चाल हो। बुद्ध कहते थे कि कोई आत्मा नहीं है, क्योंकि यदि आत्मा हो तो तुम अपने अहंकार को उसके पीछे छिपा सकते हो। यदि तुम्हें लगे कि तुममें कोई आत्मा है तो तुम्हारे अहंकार का छूटना कठिन हो जाएगा। तब तुम पूरी तरह खाली नहीं हो पाओगे क्योंकि तुम तो रहोगे ही।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-78

अंत: प्रज्ञा से जीना-

प्रवचन-अट्ठहत्रवां 

प्रश्नसार:

1-कुछ विधिया बहुत विकसित लोगों के लिए लगती है।
2-अंतविंवेक को कैसे पहचानें?
3-क्या अंत:प्रज्ञा से जीने वाला व्यक्ति बौद्धिक रूप से कमजोर होगा?

पहला प्रश्न :
इन एक सौ बारह विधियों में से कुछ विधियां ऐसे लगती हैं जैसे विधियां परिणाम हो, जैसे कि जागतिक चेतना बन जाओ' या 'यही एक हो रहो' आदि। ऐसा लगता है जैसे इन विधियों को उपलब्ध होने के लिए भी हमें विधियों की जरूरत है। क्या ये विधियां बहुत विकसित लोगों के लिए थीं जो कि इंगित मात्र से ही ब्रह्मांडींय बन सकते थे?

विधियां बहुत विकसित लोगों के लिए नहीं थीं, बड़े निर्दोष लोगों के लिए थीं-भोले-भाले, सीधे-सादे श्रद्धा से भरे लोगों के लिए थी। फिर एक इशारा काफी है एक इंगित पर्याप्त है। तुम्हें कुछ करना पड़ता है क्योंकि तुम श्रद्धा नहीं कर सकते। तुम्हें भरोसा नहीं है। जब तक तुम कुछ करो न, तुम्हारे साथ कुछ हो नहीं सकता क्योंकि तुम कृत्य में विश्वास करते हो। यदि अचानक तुम्हारे बिना किए कुछ हो जाए तो तुम बहुत भयभीत हो जाओगे और उस पर विश्वास नहीं करोगे। तुम उसे नजर-अंदाज भी कर सकते हो; हो सकता है तुम अपने मन में इसकी छाप भी न बनने दो कि कभी ऐसा भी हुआ।

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-77

चेतना का विस्तार-तंत्र-सूत्र-5

प्रवचन-सत्रहत्ररवां 

सारसूत्र:

106-हर मनुष्य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो। अंत: आत्मचिंता को त्यागकर प्रत्येक प्राणी हो जाओ।
107-यह चेतना ही प्रत्येक प्राणी के यप में है, अन्य कुछ भी नहीं है।
108-यह चेतना ही प्रत्येक प्राणी की मार्गदर्शक सत्ता है, यही हो रहो।
अस्तित्व स्वयं में अखंड है। मनुष्य की समस्या मनुष्य की स्व-चेतना के कारण पैदा होती है। चेतना सबको यह भाव देती है कि वे पृथक हैं। और यह भाव, कि तुम अस्तित्व से भिन्न हो, सब समस्याओं का निर्माण करता है। मूलत: यह भाव झूठा है, और जो कुछ भी झूठ पर आधारित होगा वह संताप पैदा करेगा, समस्याएं, उलझनें निर्मित करेगा। और तुम चाहे जो भी करो, यदि वह इस झूठी पृथकता पर आधारित है तो गलत ही होगा।

तो मनुष्य के संताप की समस्या को शुरू से ही सुलझाना पड़ेगा : वह निर्मित कैसे होती है? चेतना तुम्हें यह भाव देती है कि तुम अपने अस्तित्व के केंद्र हो और अन्य लोग 'अन्य' हैं, कि तुम उनसे अलग हो। यह दूरी इसीलिए है क्योंकि तुम चेतन हो। जब तुम सोए होते हो तो कोई भिन्नता नहीं होती, तुम वापस ब्रह्मांड में मिल जाते हो। इसीलिए नींद से इतना आनंद आता है। सुबह तुम फिर ताजे, जीवंत और ऊर्जा से भरे होते हो।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-76

काम-उर्जा ही जीवन-ऊर्जा है

प्रवचन-छियत्रवां 

प्रश्नसार:

1-तंत्र की विधियां काम से ज्यादा संबंधित नहीं लगती है।
2-ज्ञान ओर अज्ञान आपस में किस प्रकार संबंधित है?  
3-कृष्ण मूर्ति विधियों के विरोध में क्यों है ?
4-व्यवस्था के हानि-लाभ क्या है?
पहला प्रश्न :
हमने सदा यहीसुना है कि तंत्र मूल रूप से काम-ऊर्जा तथा काम-केंद्र की विधियों से संबंधित है, लेकिन आप कहते हैं कि तंत्र में सब समाहित । यदि पहले दृष्टिकोण में कोई सच्चाई है तो विज्ञान भैरव तंत्र में अधिकांश विधियां अतांत्रिक मालूम होती हैं।
क्या यह सच है ?

बात जो समझने की है, वह है काम-ऊर्जा। जैसा तुम इसे समझते हो, वह तो बस एक अंश है, जीवन-ऊर्जा का एक हिस्सा है लेकिन तंत्र जानता है कि यह जीवन का ही पर्याय है। यह जीवन का कोई अंश, कोई हिस्सा नहीं है, स्वयं जीवन ही है। तो जब तंत्र कहता है काम-ऊर्जा तो उसका अर्थ
होता है जीवन-ऊर्जा।

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-75

विपरीत ध्रुवों में लय की खोज

प्रवचन-पिच्हत्रवां 

सारसूत्र:

102-अपने भीतर तथा बाहर एक साथ आत्मा की कल्पना करो, जब तक कि संपूर्ण अस्तित्व आत्मवान न हो जाए।
103-अपनी संपूर्ण चेतना से कामना के, जानने के आरंभ में ही, जानों।
104-हे शक्ति, प्रत्येक आभार सीमित है, सर्वशक्तिमान में विलीन हो रहा है।
104-सत्य में रूप अविभक्त हैं। सर्वव्यापी आत्मा तथा तुम्हारा अपना रूप अविभक्त है। दोनों को इसी चेतना से निर्मित जानों।
महाकवि वाल्ट व्हिटमैन ने कहा है, ‘मैं अपना ही विरोध करता हूं क्योंकि मैं विशाल हूं। मैं अपना ही विरोध करता हूं क्योंकि में सब विरोधों को समाहित करता हूं, क्योंकि मैं सब कुछ हूं।’  शिव के संबंध में, तंत्र के संबंध में भी यही कहा जा सकता है। तंत्र है विरोधों के बीच, विरोधाभासों के बीच लय की खोज। विरोधाभासी, विरोधी दृष्टिकोण तंत्र में एक हो जाते हैं। इसे गहराई से समझना पड़ेगा, तभी तुम समझ पाओगे कि इसमें इतनी विरोधाभासी, इतनी भिन्न विधियां क्यों हैं।

जीवन है विरोधों के बीच एक लयबद्धता : पुरुष और स्त्री, विधायक और निषेधात्मक, दिन और रात, जन्म और मृत्यु। इन दो विरोधों के बीच जीवन की धारा बहती है। किनारे विरोधी ध्रुव हैं। वे विरोधाभासी दिखाई पड़ते हैं पर वे हैं सहयोगी। विरोध का वह आभास झूठ है। जीवन, विरोधी ध्रुवों के बीच लय के बिना नहीं रह सकता। और जीवन में सब समाहित है।

शनिवार, 8 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-74

संवेदनशीलता ओर आसक्ति-

प्रवचन-चौहत्ररवां 

प्रश्नसार:

1-संवेदनशील होते हुए भी विरक्त कैसे हुआ जाए?
2-आप अपने ही शरीर को ठीक क्या नहीं कर सकते?
3-स्वयं श्रम करें या आप पर सब छोड़ दें?
4-क्या सच में जीसस को पता नहीं था कि पृथ्वी गोल है?   


पहला प्रश्न :

ध्यान की गहरई के साथ-साथ, व्यक्ति वस्तुओं तथा व्यक्तियों के प्रति अधिकाधिक और संवेदनशील होता जाता है। लेकिन इस गहन संवेदनशीलता के कारण व्यक्ति स्वयं को हर चीज के साथ जुड़ा हुआ और एक गहन अंतरंगता में पाला है, और यह अक्सर एक सूक्ष्म आसक्ति का कारण बन जाता है। तो संवेदनशील होते हुए भी विरक्त कैसे हुआ जाए?

संवेदनशील होते हुए कैसे हुआ जाए? ये दोनों बातें विरोधी नहीं है, विपरीत नहीं है। यदि तुम अधिक संवेदनशील हो तो तुम विरक्त होओगे; या तुम यदि विरक्त हो तो अधिकाधिक संवेदनशील होते जाओगे। संवेदनशीलता आसक्ति नहीं है, संवेदनशीलता सजगता है। केवल एक सजग व्यक्ति ही संवेदनशील हो सकता है। यदि तुम सजग नहीं हो तो असंवेदनशील होओगे। जब तुम बेहोश होते हो तो बिलकुल असंवेदनशील होते हो; जितनी अधिक सजगता, उतनी ही अधिक संवेदनशीलता।

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-73

रूपांतरण का भय-

प्रवचन-तिहत्ररवां 

सारसूत्र:

100-वस्तुओं ओर विषयों का गुणधर्म ज्ञानी व अज्ञानी के लिए समान ही होता है।
ज्ञानी की महानता यह है कि वि आत्मगत भाव में बना रहता है, वस्तुओं में नहीं।
101-सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी मानो।
बहुत लोग ध्यान में उत्सुक दिखाई पड़ते हैं लेकिन वह उत्सुकता बहुत गहरी नहीं हो सकती, क्योंकि इतने थोड़े से लोग ही उससे रूपांतरित हो पाते हैं। यदि रस बहुत गहरा हो तो वह अपने आप में ही एक आग बन जाता है। वह तुम्हें रूपांतरित कर देता है। बस उस गहन रस के कारण ही तुम बदलने लगते हो। प्राणों का एक नया केंद्र जगता है। तो इतने लोग उत्सुक दिखाई पड़ते हैं लेकिन कुछ भी नया उनमें जगता नहीं, कोई नया केंद्र जन्म नहीं लेता, किसी क्रिस्टलाइजेशन की उपलब्धि नहीं होती। वे वैसे के वैसे ही बने रहते हैं।

इसका अर्थ हुआ कि वे स्वयं को धोखा दे रहे हैं। बहुत सूक्ष्म होगी प्रवंचना, लेकिन होगी ही। यदि तुम औषधि लेते रहो उपचार कराते रहो, और फिर भी रोग वैसा का वैसा बना रहे-वरन बढ़ता ही जाए-तो तुम्हारी औषधि, तुम्हारे उपचार झूठे ही होंगे।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-72

असुरक्षा में जीना बुद्धत्व का मार्ग है-

प्रश्नसार-

1-कृपया बुद्ध के प्रेम को समझाएं।
2-क्या प्रेम गहरा होकर विवाह नहीं बन सकता?
3-क्या व्यक्ति असुरक्षा में जीते हुए निशिंचत रह सकता है?
4-अतिक्रमण की क्या अवश्यकता है?
पहला प्रश्न :
 आपने कहा कि प्रेम केवल मृत्यु के साथ ही संभव है। फिर क्या आप कृपया बुद्ध पुरुष के प्रेम के विषय में समझाएंगे?
व्यक्ति के लिए तो प्रेम सदा घृणा का ही अंग होता है सदा घृणा के साथ ही आता है। अज्ञानी मन के लिए तो प्रेम और घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अज्ञानी मन के लिए प्रेम कभी शुद्ध नहीं होता। और यही प्रेम का विषाद है क्योंकि वह घृणा जो है, विष बन जाती है। तुम किसी से प्रेम करते हो और उसी से घृणा भी करते हो।

लेकिन हो सकता है, तुम घृणा और प्रेम दोनों एक साथ न कर रहे होओ तो तुम्हें कभी इसका पता ही नहीं चलता। जब तुम किसी से प्रेम करते हो तो तुम घृणा वाले हिस्से को भूल जाते हो वह नीचे चला जाता है, अचेतन मन में चला जाता है और वहां प्रतीक्षा करता है। फिर जब तुम्हारा प्रेम थक जाता है तो वह अचेतन में गिर जाता है और घृणा वाला हिस्सा ऊपर आ जाता है।

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-71

परिधि का विस्मरण-

प्रवचन-इक्हत्रवां

सूत्र:  

98-किसी सरल मुद्रा में दोनों कांखों के मध्य-क्षेत्र (वक्षस्थल)
में धीरे-धीरे शांति व्याप्त होने दो।
99-स्वयं को सभी दिशाओं में परिव्याप्त होता हुआ
महसुस करो-सुदूर-समीप।
जीवन बाहर से एक झंझावात है-एक अनवरत द्वंद्व, एक उपद्रव, एक संघर्ष। लेकिन ऐसा केवल सतह पर है। जैसे सागर के ऊपर उन्मत्त और सतत संघर्षरत लहरें होती हैं। लेकिन यही सारा जीवन नहीं है। गहरे में एक केंद्र भी है-मौन, शांत, न कोई द्वंद्व, न कोई संघर्ष। केंद्र में जीवन एक मौन और शांत प्रवाह है जैसे कोई सरिता बिना संघर्ष, बिना कलह, बिना शोरगुल के बस बह रही हो। उस अंतस केंद्र की ही खोज है। तुम सतह के साथ, बाह्य के साथ तादाल्म बना सकते हो। फिर संताप और विषाद घिर आते हैं। यही है जो सबके साथ हुआ है; हमने सतह के साथ और उस पर चलने वाले कलह के साथ तादात्म्य बना लिया है।

सतह तो अशांत होगी ही, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। और यदि तुम केंद्र में अपनी जड़ें जमा सको तो परिधि की अशांति भी सुंदर हो जाएगी, उसका अपना ही सौंदर्य होगा। यदि तुम भीतर से मौन हो सको तो बाहर की सब ध्वनियां संगीतमय हो जाती हैं।

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-70

तपश्चर्या: अकेलेपन से गुजरने का साहस

प्रवचन-70-ओशो

 प्रश्नसार:

1—अकेलापन बहुत काटता है। क्या करे?
2—एकांत ओर पूर्णता में सामंजस्य कैसे बिठाएं
3—संबंधों को बढाएं या घटाएं?
4—यौन का आकर्षण क्या गर्भ में वापस लौटने का आकर्षण है?
5—आपका ‘हम’ से क्या तात्पर्य है?

 पहला प्रश्न :
एकांत में स्वयं का सामना करना बहुत भययुक्त और पीड़ादायी है। क्या करें?
यह भययुक्त भी है और पीड़ादायी भी, और व्यक्ति को इसे झेलना ही होता है। इससे बचने के लिए, मन को इससे हटाने के लिए, इससे भागने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहिए। इसे झेलना ही पड़ेगा और इससे गुजरना ही पड़ेगा। यह कष्ट यह पीड़ा तो शुभ लक्षण है कि अब तुम एक नए जन्म के निकट आ रहे हो क्योंकि हर जन्म पीड़ा के बाद ही होता है। इससे बचा नहीं जा सकता और न ही इससे बचना चाहिए, क्योंकि यह तुम्हारे विकास का एक अंग है। इस पीड़ा और कष्ट को ही तपश्चर्या कहा गया है। तपस का अर्थ ही है : दुष्कर संयम, सघन प्रयास।

तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-69

एकांत दर्पण बन जाता है

प्रवचन-69-(ओशो)

सारसूत्र:

1-किसी ऐसे स्थान पर वास करो जो अंतहीन रूप से विस्तीर्ण हो, वृक्षों, पहाडियों, प्राणियों से रहित हो। तब मन के भारों का अंत हो जाता है।
2-अंतरिक्ष को अपने ही आनंद-शरिर मानों।
अकेला पैदा होता है और अकेला ही मरता है लेकिन इन दोनों बिंदुओं के बीच वह समाज में, दूसरों के साथ रहता है। एकांत उसका मूल सत्य है; समाज केवल एक संयोग है। और जब तक मनुष्य अकेला न जी सके, जब तक अपने एकांत को उसकी पूरी गहराई से न जान ले, तब तक वह स्वयं से परिचित नहीं हो सकता। समाज में जो कुछ भी होता है वह बाहरी है, वह तुम नहीं हो, वह दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध हैं। तुम तो अज्ञात ही रह जाते हो, बाहर से तुम प्रकट नहीं हो सकते।

लेकिन हम दूसरों के साथ रहते हैं, इसलिए आत्मज्ञान बिलकुल भूल गया है। तुम अपने बारे में जो जानते हो वह दूसरों ने तुम्हें बताया है। कितनी अजीब, बेतुकी बात है कि दूसरे तुम्हें तुम्हारे बारे में बताएं! जो भी तुम्हारा परिचय है वह दूसरों ने तुम्हें दिया है; वह परिचय वास्तविक नहीं है, केवल एक लेबल-है।

सोमवार, 3 सितंबर 2018

तंत्र--सूत्र--(भाग--5) प्रवचन--68

लक्ष्य की धारणा ही बंधन है

प्रवचन-68-(ओशो)

 प्रश्नसार:

1-क्या कल्पना भी कामना नहीं है?
2-कल आपने कहा कि मन सत्य है, लेकिन फिर सभी गुरु मन को बाधा क्यों कहते है?
3—केंद्र के रूपांतरण पर इतना जोर क्यों है?
4-स्त्री ओर पुरूष के लिए अलग-अलग विधियां क्यों है?

पहला प्रश्न :

ऐसा कहा गया है कोई भी कामना, चाहे सांसारिक हो अथवा धार्मिक, मुक्ति की ओर नहीं ले जा सकती। लेकिन सुख ओर आनंद की विधायक कल्पना भी तो एक तरह की कामना ही है। इसलिए  क्या यह सत्य नहीं है की कल्पना भी कामना है अत: तनाव पैदा करती है?
कल्पना कामना नहीं है, एक खेल है कामना तो बिलकुल अलग बात है लेकिन तुम अपनी कल्पना को कामना पर आधारित कर सकते हो, तुम अपनी कामना को कल्पना द्वारा प्रक्षेपित कर सकते हो तब वह बंधन हो जाएगी। यदि तुम कल्पना के साथ बिना किसी कामना के खेलते हो-न कहीं पहुंचने के लिए, न कुछ पाने के लिए, बस एक खेल की तरह उसे लेते हो-तब तुम्हारी कल्पना न कामना होती है, न बंधन।

तंत्र--सूत्र--(भाग--5) प्रवचन--67

मन और पदार्थ के पार

प्रवचन-67-(ओशो) 

सूत्र:

94-अपने शरीर अस्थियों, मांस ओर रक्त को
ब्रह्मांडीय सार से भरा हुआ अनुभव करो।
95-अनुभव करो कि सृजन के शुद्ध गुण तुम्हारे स्तनों
में प्रवेश करके सूक्ष्म रूप धारण कर रहे है।
सदियों से विश्वभर के दार्शनिकों में यह विवाद रहा है कि क्या है वह मूल तत्व जिससे यह जगत निर्मित हुआ है?
ऐसे सिद्धांत हैं दर्शन की ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो कहती हैं कि पदार्थ मूल सत्य है और मन बस उसका ही विकास है, पदार्थ मूल है और मन उसी का परिणाम मात्र है, मन भी पदार्थ ही है बस जरा सूक्ष्म रूप में है। भारत में चार्वाक ने, ग्रीस में इपिकुरस ने यह धारणा दी। और आज भी मार्क्सवादी तथा दूसरे भौतिकवादी पदार्थ की भाषा में ही बात करते हैं।

रविवार, 2 सितंबर 2018

तंत्र--सूत्र--(भाग--5) प्रवचन--66

अंतस का आकाश ओर रहस्य

प्रवचन-66
प्रश्नसार:
1-आप किसे रहस्य कहते है?
2-मैं अपने को सामान्य अनुभव करता हूं, लेकिन कोई रूपांतरण नहीं देखता।
3-क्या अच्छे ओर बुरे जैसा कुछ होता है?
4-क्या कल्पना का उपयोग असीम के अनुभव के लिए किया जा सकता है?
 
पहला प्रश्न : कम रात आपने कहा जब मन में कोई विचार नहीं रहते तो मन शून्य आकाश बन जाता है और सब रहस्यों के द्वार खुल जाते हैं। मैं इस आंतरिक आकाश को स्पष्ट और गहरे से अनुभव करता हूं, पर इसमें कुछ ऐसा विशेष नहीं है जिसे मैं रहस्य कह सकूं। क्या आप बताएंगे कि रहस्य आप कि। कहते हैं और उसे कैसे अनुभव किया जाता है?
आंतरिक शून्य स्वयं में ही एक रहस्य है। न तुम उसे अनुभव कर सकते हो और न जान सकते हो। तुम वह हो सकते हो। और वह तुम हो ही। जब तरिक शून्यता होती है तो तुम नहीं होते। तुम उसे देख नहीं सकते। यदि तुम उसे देख सको तो तरिक शून्य अभी पैदा ही नहीं हुआ। कौन उसे देखेगा? यदि तुम उसे देख सकते हो तो तुम उससे भिन्न हो, इसलिए वह आंतरिक नहीं हुआ, वह बाह्य हुआ। वह तुमसे बाहर है। अंतस अभी शून्य नहीं हुआ, भरा ही हुआ है। द्रष्टा या साक्षी बनकर अहंकार बड़े सूक्ष्म रूप में वहां बैठा है। अंतस अभी शून्य नहीं हुआ, क्योंकि जब अंतस शून्य हो जाता है तो तुम नहीं रहते।

तंत्र--सूत्र--(भाग--5) प्रवचन--65

विज्ञान भैरव तंत्र-भाग-05-(ओशो)

प्रवचन-65-(ओशो)

जीवन एक रहस्य है।

सूत्र: 

92-चित को ऐसी अव्याख्य सूक्ष्मता में अपने ह्रदय के ऊपर, नीचे ओर भीतर देखा।
 93-अपने वर्तमान रूप का कोई भी अंग असीमित रूप से विस्तृत जानो।

जीवन कोई समस्या नहीं वरन एक रहस्य है। विज्ञान के लिए जीवन एक समस्या है, लेकिन धर्म के लिए यह एक रहस्य है। समस्या का समाधान हो सकता है, रहस्य का नहीं-उसे जीया जा सकता है, सुलझाया नहीं जा सकता। धर्म कोई समाधान नहीं देता, कोई उत्तर नहीं देता। विज्ञान के पास उत्तर हैं, धर्म के पास कोई उत्तर नहीं हैं।
यह मौलिक भेद है और इससे पहले कि तुम धर्म को समझने का कोई भी प्रयास करो, धार्मिक मन और वैज्ञानिक मन के दृष्टिकोण के बीच इस मौलिक भेद को गहराई से समझ लेना जरूरी है।