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रविवार, 1 जुलाई 2018

अमृत की दशा-(प्रवचन-05)

 प्रवचन--पांचवां 

मैं विचार में हूं--किस संबंध में आपसे बातें करूं। और बातें इतनी ज्यादा हैं और दुनिया इतनी बातों से भरी है कि संकोच होना बहुत स्वाभाविक है। बहुत विचार हैं, बहुत उपदेश हैं, सत्य के संबंध में बहुत से सिद्धांत हैं। यह डर लगता है कि कहीं मेरी बातें भी उस बोझ को और न बढ़ा दें, जो कि मनुष्य के ऊपर वैसे ही काफी है। बहुत संकोच अनुभव होता है। कुछ भी कहते समय डर लगता है कि कहीं वह बात आपके मन में बैठ न जाए। बहुत डर लगता है कि कहीं मेरी बात को आप पकड़ न लें। बहुत डर लगता है कि कहीं वह बात आपको प्रिय न लगने लगे; कहीं वह आपके मन में स्थान न बना ले।
चूंकि मनुष्य विचारों और सिद्धांतों के कारण ही पीड़ित और परेशान है। उपदेशों के कारण ही मनुष्य के जीवन में सत्य का आगमन नहीं हो पाता है। दूसरों के द्वारा कही गई और दी गई बातें ही उस सत्य के बीच में बाधा बन जाती हैं जो हमारे पास है और निरंतर है।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

अमृत की दशा-(प्रवचन-08)



अमृत की दशा-ओशो 
प्रवचन—आठवां 


वह वस्तुतः जिसे हम जीवन जानते हैं, वह जीवन नहीं है। जिसे हम जीवन मान कर जी लेते हैं और मर भी जाते हैं, वह जीवन नहीं है। बहुत कम सौभाग्यशाली लोग हैं जो जीवन को अनुभव कर पाते हैं। जो जीवन को अनुभव कर लेते हैं, उनकी कोई मृत्यु नहीं है। और जब तक मृत्यु है, मृत्यु का भय है, और जब तक प्रतीत होता है कि मैं समाप्त हो जाऊंगा, मिट जाऊंगा, तब तक जानना कि अभी जीवन का कोई संधान, जीवन का कोई संपर्क, जीवन का कोई अनुभव नहीं उपलब्ध हुआ है।
एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा को मैं प्रारंभ करना चाहूंगा। बहुत बार उस कहानी को देश के कोने-कोने में अनेक-अनेक लोगों से कहा है। फिर भी मेरा मन नहीं भरता और मुझे लगता है उसमें कुछ बात है जो सभी को खयाल में आ जानी चाहिए।

अमृत की दशा-(प्रवचन-07)



अमृत  की  दशा-ओशो

प्रवचन—सातवां

कुछ प्रश्न हैं।

सबसे पहले, पूछा है कि धर्मशास्त्र इत्यादि पाखंड हैं, तो वेद-उपनिषद में जो बातें हैं, वे सत्य माननी चाहिए या नहीं?

शास्त्रों में जो है, उसे ही आप कभी नहीं पढ़ते हैं। शास्त्र में जो है, उसे नहीं; आप जो पढ़ सकते हैं, उसे ही पढ़ते हैं।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी होगा।
यदि आप गीता को पढ़ते हैं, या उपनिषद को पढ़ते हैं, या बाइबिल को, या किसी और शास्त्र को, तो क्या आप सोचते हैं, जितने लोग पढ़ते हैं वे सब एक ही बात समझते हैं? निश्चित ही जितने लोग पढ़ते हैं, उतनी ही बातें समझते हैं। शास्त्र से जो आप समझते हैं, वह शास्त्र से नहीं, आपकी ही समझ से आता है। स्वाभाविक है। जितनी मेरी समझ है, जो मेरे संस्कार हैं, जो मेरी शिक्षा है, उसके माध्यम से ही मैं समझ सकूंगा।

अमृत की दशा-(प्रवचन-06)



प्रवचन--छटवां 


कोई मानसिक दासता और गुलामी न हो; कोई बंधे हुए रास्ते, बंधे हुए विचार और चित्त के ऊपर किसी भांति के चौखटे और जकड़न न हों, यह पहली शर्त मैंने कही, सत्य को जिसे खोजना हो उसके लिए। निश्चित ही जो स्वतंत्र नहीं है, वह सत्य को नहीं पा सकेगा। और परतंत्रता हमारी बहुत गहरी है। मैं उस परतंत्रता की बातें नहीं कर रहा हूं, जो राजनैतिक होती है, सामाजिक होती है, या आर्थिक होती है। मैं उस परतंत्रता की बात कर रहा हूं, जो मानसिक होती है। और जो मानसिक रूप से परतंत्र है, वह और चाहे कुछ भी उपलब्ध कर ले, जीवन में आनंद को और कृतार्थता को, आलोक को अनुभव नहीं कर सकेगा। यह मैंने कल कहा।
चित्त की स्वतंत्रता पहली भूमिका है। आज सुबह दूसरी भूमिका पर आपसे कुछ विचार करूं। दूसरी भूमिका है--चित्त की सरलता।
पहली भूमिका है: चित्त की स्वतंत्रता।
दूसरी भूमिका है: चित्त की सरलता।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

अमृत की दशा-(प्रवचन-04)


प्रवचन--चौथा 
मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं अत्यंत आनंदित हूं कि जीवन के संबंध में और उसके परिवर्तन के लिए थोड़ी सी बातें आपसे कह सकूंगा। इसके पहले कि मैं कुछ बातें आपको कहूं, एक छोटी सी कहानी से चर्चा को प्रारंभ करूंगा।
एक बहुत अंधेरी रात में एक अंधा आदमी अपने एक मित्र के घर मिलने गया था। जब वह वापस लौटने लगा, तो रास्ता अंधेरा था और अकेला था। उसके मित्र ने कहा कि मैं एक लालटेन हाथ में दिए देता हूं ताकि रास्ते पर साथ दे।
वह अंधा आदमी बोला, मेरे लिए लालटेन का क्या उपयोग होगा? मेरे लिए तो हाथ में लालटेन हो तो और न हो तो, दोनों हालतों में रास्ता अंधेरा है।

अमृत की दशा-(प्रवचन-03)

 प्रवचन-तीसरा  
 मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा प्रारंभ करूंगा।
ऐसी ही एक सुबह की बात है। एक छोटे से झोपड़े में एक फकीर स्त्री का आवास था। सुबह जब सूरज निकलता था और रात समाप्त हो रही थी, तो वह फकीर स्त्री अपने उस झोपड़े के भीतर थी। एक यात्री उस दिन उसके घर मेहमान था। वह भी एक साधु, एक फकीर था। वह झोपड़े के बाहर आया और उसने देखा कि बहुत ही सुंदर प्रभात का जन्म हो रहा है। उसने देखा कि बहुत ही सुंदर प्रभात का जन्म हो रहा है और बहुत ही प्रकाशवान सूर्य उठ रहा है। इतनी सुंदर सुबह थी और पक्षियों का इतना मीठा संगीत था, इतनी शांत और शीतल हवाएं थीं कि उसने भीतर आवाज दी उस फकीर स्त्री को। उस स्त्री का नाम राबिया था। उस साधु ने चिल्ला कर कहा, राबिया, भीतर क्या कर रही हो, बाहर आओ! परमात्मा ने एक बहुत सुंदर सुबह को जन्म दिया है!

अमृत की दशा-(प्रवचन-02)

प्रवचन-दूसरा -अमृत की दशा



 मेरे प्रिय आत्मन्!
आज की संध्या आपके बीच उपस्थित होकर मैं बहुत आनंदित हूं। एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा को मैं प्रारंभ करूंगा।
बहुत वर्ष हुए, एक साधु मरणशय्या पर था। उसकी मृत्यु निकट थी और उसको प्रेम करने वाले लोग उसके पास इकट्ठे हो गए थे। उस साधु की उम्र सौ वर्ष थी और पिछले पचास वर्षों से सैकड़ों लोगों ने उससे प्रार्थना की थी कि उसे जो अनुभव हुए हों, उन्हें वह एक शास्त्र में, एक किताब में लिख दे। हजारों लोगों ने उससे यह निवेदन किया था कि वह अपने आध्यात्मिक अनुभवों को, परमात्मा के संबंध में, सत्य के संबंध में उसे जो प्रतीतियां हुई हों, उन्हें एक ग्रंथ में लिख दे। लेकिन वह हमेशा इनकार करता रहा था। और आज सुबह उसने यह घोषणा की थी कि मैंने वह किताब लिख दी है जिसकी मुझसे हमेशा मांग की गई थी। और आज मैं अपने प्रधान शिष्य को उस किताब को भेंट कर दूंगा।

अमृत की दशा-(प्रवचन-01)

अमृत की दशा-(ओशो)
(ध्‍यान-साधना)  

प्रवचन-पहला

एक साधु के आश्रम में एक युवक बहुत समय से रहता था। फिर ऐसा संयोग आया कि युवक को आश्रम से विदा होना पड़ा। रात्रि का समय है, बाहर घना अंधेरा है। युवक ने कहा, रोशनी की कुछ व्यवस्था करने की कृपा करें।
उस साधु ने एक दीया जलाया, उस युवक के हाथ में दीया दिया, उसे सीढ़ियां उतारने के लिए खुद उसके साथ हो लिया। और जब वह सीढ़ियां पार कर चुका और आश्रम का द्वार भी पार कर चुका, तो उस साधु ने कहा कि अब मैं अलग हो जाऊं, क्योंकि इस जीवन के रास्ते पर बहुत दूर तक कोई किसी का साथ नहीं दे सकता है।