मैं
विचार में हूं--किस संबंध में आपसे बातें करूं। और बातें इतनी ज्यादा हैं और
दुनिया इतनी बातों से भरी है कि संकोच होना बहुत स्वाभाविक है। बहुत विचार हैं, बहुत उपदेश हैं, सत्य के संबंध में बहुत से सिद्धांत हैं। यह
डर लगता है कि कहीं मेरी बातें भी उस बोझ को और न बढ़ा दें, जो कि मनुष्य के ऊपर वैसे ही काफी है। बहुत
संकोच अनुभव होता है। कुछ भी कहते समय डर लगता है कि कहीं वह बात आपके मन में बैठ
न जाए। बहुत डर लगता है कि कहीं मेरी बात को आप पकड़ न लें। बहुत डर लगता है कि
कहीं वह बात आपको प्रिय न लगने लगे;
कहीं वह आपके मन में स्थान न
बना ले।
चूंकि
मनुष्य विचारों और सिद्धांतों के कारण ही पीड़ित और परेशान है। उपदेशों के कारण ही
मनुष्य के जीवन में सत्य का आगमन नहीं हो पाता है। दूसरों के द्वारा कही गई और दी
गई बातें ही उस सत्य के बीच में बाधा बन जाती हैं जो हमारे पास है और निरंतर है।





