शिशुवत
चरित्र ताओ का
लक्ष्य है—(प्रवचन—चौरनवां)
अध्याय
55
शिशु
का चरित्र
जो
चरित्र का धनी
है,
वह शिशुवत
होता है।
जहरीले
कीड़े उसे दंश
नहीं देते,
जंगली
जानवर उस पर
हमला नहीं
करते,
और
शिकारी परिन्दे
उस पर झपट्टा
नहीं मारते।
यद्यपि
उसकी
हड्डियां
मुलायम हैं,
उसकी
नसें कोमल, तो
भी उसकी पकड़
मजबूत होती
है।
यद्यपि
वह नर और नारी
के मिलन से
अनभिज्ञ है,
तो
भी उसके
अंग-अंग पूरे
हैं।
जिसका
अर्थ हुआ कि
उसका बल
अक्षुण्ण है।
दिन
भर चीखते रहने
पर भी उसकी
आवाज भर्राती
नहीं है;
जिसका
अर्थ हुआ कि
उसकी
स्वाभाविक
लयबद्धता
पूर्ण है।
लयबद्धता
को जानना
शाश्वत के साथ
तथाता में होना
है,
और
शाश्वतता को
जानना विवेक
कहलाता है।
लेकिन
जीवन में
संशोधन करना
अशुभ लक्षण
कहाता है;
और
मनोवेगों को
मन की राह
देना आक्रामक
है।
क्योंकि
चीजें अपने
यौवन पर पहुंच
कर बुढ़ाती
हैं;
वह
आक्रामक दावेदारी
ताओ के खिलाफ
है।
और
जो ताओ के
खिलाफ है वह
युवापन में ही
नष्ट होता है।